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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 531 · देवगंधारी

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अंग
531
देवगंधारी
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  1. देवगंधारी 5 ॥
  2. देवगंधारी 5 ॥
  3. देवगंधारी 5 ॥
  4. अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥
  5. देवगंधारी 5 ॥
  6. छके 3 ॥
  7. माई प्रभ के चरन निहारउ ॥

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
माई जो प्रभ के गुन गावै ॥ सफल आइआ जीवन फलु ता को पारब्रहम लिव लावै ॥1॥ रहाउ ॥
सुंदरु सुघड़ु सूरु सो बेता जो साधू संगु पावै ॥
नामु उचारु करे हरि रसना बहुड़ि न जोनी धावै ॥1॥
पूरन ब्रहमु रविआ मन तन महि आन न द्रिसटी आवै ॥
नरक रोग नही होवत जन संगि नानक जिसु लड़ि लावै ॥2॥14॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। परमात्मा के चरणों में प्रेम बनाए रखता है। उसका जगत में आना कामयाब हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! जो मनुष्य गुरू का साथ प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य सुजीवन वाला। सुघड़। शूरवीर बन जाता है। वह अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उच्चारता रहता है। और मुड़-मुड़ के जूनियों में नहीं भटकता। 1। हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य को परमात्मा संत जनों के पल्ले से लगा देता है। उसे संत जनों की संगति में नर्क व रोग नहीं व्याप्तते। सर्व-व्यापक प्रभू हर समय उसके मन में उसके हृदय में बसा रहता है। प्रभू के बिना उसको (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। 2। 14।

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
चंचलु सुपनै ही उरझाइओ ॥
इतनी न बूझै कबहू चलना बिकल भइओ संगि माइओ ॥1॥ रहाउ ॥
कुसम रंग संग रसि रचिआ बिखिआ एक उपाइओ ॥
लोभ सुनै मनि सुखु करि मानै बेगि तहा उठि धाइओ ॥1॥
फिरत फिरत बहुतु स्रमु पाइओ संत दुआरै आइओ ॥
करी क्रिपा पारब्रहमि सुआमी नानक लीओ समाइओ ॥2॥15॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! कहीं भी कभी ना टिकने वाला मानस मन (चंचल मन) सपने (में दिखने जैसे पदार्थों) में फसा रहता है। कभी इतनी बात भी नहीं समझता कि यहाँ से आखिर चले जाना है। माया के मोह में बुद्धू बना रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! मनुष्य फूलों (जैसे क्षण-भंगुर पदार्थों) के रंग व साथ के स्वाद में मस्त रहता है। सदा एक माया (एकत्र करने) का ही उपाय करता फिरता है। जब यह लोभ (की बात) सुनता है तो मन में खुशी मनाता है (जहाँ से कुछ प्राप्त होने की आशा होती है) उधर तुरंत उठ दौड़ता है। 1। हे नानक ! (कह) भटकता-भटकता जब मनुष्य बहुत थक गया और गुरू के दर पर आया। तब मालिक परमात्मा ने इस पर मेहर की। और। अपने चरणों में मिला लिया। 2। 15।

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
सरब सुखा गुर चरना ॥
कलिमल डारन मनहि सधारन इह आसर मोहि तरना ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा अरचा सेवा बंदन इहै टहल मोहि करना ॥
बिगसै मनु होवै परगासा बहुरि न गरभै परना ॥1॥
सफल मूरति परसउ संतन की इहै धिआना धरना ॥
भइओ क्रिपालु ठाकुरु नानक कउ परिओ साध की सरना ॥2॥16॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! गुरू के चरणों में पड़ने से सारे सुख मिल जाते हैं। (गुरू के चरन सारे) पाप दूर कर देते हैं। मन को सहारा देते हैं। मैं गुरू के चरणों का सहारा ले के ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघ रहा हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं गुरू के चरणों की ही टहल सेवा करता हूँ- यही मेरे वास्ते देव-पूजा है। यही देव-मूर्ति के आगे चंदन आदि की भेट है। यही देवते की सेवा है। यही देव-मूर्ति के आगे नमस्कार है। (हे भाई ! गुरू के चरणों में पड़ने से) मन खिल उठता है। आत्मिक जीवन की समझ पड़ जाती है। और। बार-बार जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ते। 1। हे भाई ! मैं संत-जनों के चरण परसता हूँ। यही मेरे वास्ते फल देने वाली मूर्ति है। यही मेरे लिए मूर्ति का ध्यान धरना है। हे भाई ! जब का मालिक प्रभू मुझ नानक पर दयावान हुआ है। मैं गुरू की शरण पड़ा हुआ हूँ। 2। 16।

अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥

देवगंधारी महला 5 ॥
अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥
चारि पदारथ अनद मंगल निधि सूख सहज सिधि लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मानु तिआगि हरि चरनी लागउ तिसु प्रभ अंचलु गहीऐ ॥
आंच न लागै अगनि सागर ते सरनि सुआमी की अहीऐ ॥1॥
कोटि पराध महा अक्रितघन बहुरि बहुरि प्रभ सहीऐ ॥
करुणा मै पूरन परमेसुर नानक तिसु सरनहीऐ ॥2॥17॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! अपने परमात्मा के पास ही अरजोई करनी चाहिए। (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) ये चारों पदार्थ। आनंद खुशियों के खजाने। आत्मिक अडोलता के सुख। करामाती ताकतें- हरेक चीज परमात्मा से मिल जाती हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं तो अहंकार त्याग के परमात्मा के चरणों में ही पड़ा रहता हूँ। भाई ! उस प्रभू का ही पल्ला पकड़ना चाहिए। (इस तरह विकारों की) आग के समुंद्र से सेक नहीं लगता। मालिक प्रभू की शरण ही मांगनी चाहिए। 1। हे भाई ! बड़े-बड़े अकृतज्ञों के करोड़ों पाप परमात्मा बार बार सह लेता है। हे नानक ! परमात्मा पूर्ण तौर पर करुणामय है उसी की ही शरण पड़ना चाहिए। 2। 17।

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
गुर के चरन रिदै परवेसा ॥
रोग सोग सभि दूख बिनासे उतरे सगल कलेसा ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के किलबिख नासहि कोटि मजन इसनाना ॥
नामु निधानु गावत गुण गोबिंद लागो सहजि धिआना ॥1॥
करि किरपा अपुना दासु कीनो बंधन तोरि निरारे ॥
जपि जपि नामु जीवा तेरी बाणी नानक दास बलिहारे ॥2॥18॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य के) हृदय में गुरू के चरन टिक जाते हैं। उस मनुष्य के सारे रोग। सारे गम। सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू के चरनों की बरकति से) जन्मों-जन्मांतरों के (किए) पाप नाश हो जाते हैं। (गुरू के चरण हृदय में बसाना ही) करोड़ों तीर्थों का स्नान है। करोड़ों तीर्थों के जल में चॅुभी है। (गुरू के चरणों की बरकति से) गोबिंद के गुण गाते-गाते नाम-खजाना मिल जाता है। आत्मिक अडोलता में सुरति जुड़ी रहती है। 1। हे भाई ! परमात्मा मेहर करके जिस मनुष्य को अपना दास बना लेता है। उसके माया के बंधन तोड़ के उसको माया के मोह से निर्लिप कर लेता है। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ। आपकी सिफत-सालाह की बाणी उचार के आपका नाम जप-जप के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 18।

छके 3 ॥

छके 3 ॥

हिन्दी अर्थ: छके 3।

माई प्रभ के चरन निहारउ ॥

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देवगंधारी महला 5 ॥
माई प्रभ के चरन निहारउ ॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! मैं (सदा) परमात्मा के (सुंदर) चरणों की ओर देखता रहता हूँ

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 531 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।