Lulla Family

अंग ५३४ · देवगंधारी

अंग
534
देवगंधारी
अंग बदलें या अंश चुनें · ५ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. साधसंगति की सरनी परीऐ चरण रेनु मनु बाछै ॥1॥
  2. देवगंधारी 5 ॥
  3. हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥
  4. करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥
  5. मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥

साधसंगति की सरनी परीऐ चरण रेनु मनु बाछै ॥1॥

अंग ५३३ से चला आ रहा अंश

साधसंगति की सरनी परीऐ चरण रेनु मनु बाछै ॥1॥
जुगति न जाना गुनु नही कोई महा दुतरु माइ आछै ॥
आइ पइओ नानक गुर चरनी तउ उतरी सगल दुराछै ॥2॥2॥28॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! साध-संगत की शरण पड़ना चाहिए।मेरा मन साध जनों के चरणों की धूड़ ही मांगता है। 1। हे भाई ! यह माया (एक ऐसा समुंद्र है जिससे) पार लांघना बहुत ही मुश्किल है।मुझे (इससे पार लांघने का) कोई तरीका नहीं आता।मुझ में कोई (ऐसा) गुण (भी) नहीं है (जिसकी सहायता से मैं इस माया-समुंद्र से पार लांघ सकूँ)। हे नानक ! जब मनुष्य गुरू के चरणों में आ पड़ता है तब (इसके अंदर से) सारी बुरी वासना दूर हो जाती है (और।हरी-नाम जप के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है)। 2। 2। 28।

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
अंम्रिता प्रिअ बचन तुहारे ॥
अति सुंदर मनमोहन पिआरे सभहू मधि निरारे ॥1॥ रहाउ ॥
राजु न चाहउ मुकति न चाहउ मनि प्रीति चरन कमलारे ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा मोहि ठाकुर ही दरसारे ॥1॥
दीनु दुआरै आइओ ठाकुर सरनि परिओ संत हारे ॥
कहु नानक प्रभ मिले मनोहर मनु सीतल बिगसारे ॥2॥3॥29॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ आपकी सिफत-सलाह के वचन आत्मिक जीवन देने वाले हैं - हे प्यारे ! हे बेअंत सुंदर ! हे प्यारे मनमोहन ! हे सब जीवों में और सबसे न्यारे प्रभू !। 1।रहाउ। हे प्यारे प्रभू ! मैं राज नहीं मांगता।मैं मुक्ति नहीं मांगता।(मेहर कर।सिर्फ आपके) सुंदर कोमल चरणों का प्यार मेरे मन में टिका रहे। (हे भाई ! लोग तो) ब्रहमा।शिव करामाती योगी।ऋषि।मुनि।इन्द्र (आदि के दर्शन चाहते हैं।पर) मुझे मालिक प्रभू के दर्शन ही चाहिए। 1। हे ठाकुर ! मैं गरीब आपके दर पर आया हूँ।मैं हार के आपके संतों की शरण पड़ा हूँ। हे नानक ! (कह, जिस मनुष्य को) मन मोहने वाले प्रभू जी मिल जाते हैं उसका मन शांत हो जाता है।खिल उठता है। 2। 3। 29।

हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥

देवगंधारी महला 5 ॥
हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥
दीन दइआल भए प्रभ अपने बहुड़ि जनमि नही मारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगमि गुण गावह हरि के रतन जनमु नही हारिओ ॥
प्रभ गुन गाइ बिखै बनु तरिआ कुलह समूह उधारिओ ॥1॥
चरन कमल बसिआ रिद भीतरि सासि गिरासि उचारिओ ॥
नानक ओट गही जगदीसुर पुनह पुनह बलिहारिओ ॥2॥4॥30॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम जप के परमात्मा का सेवक (संसार समुंद्र से) पार लंघा लिया जाता है। दीनों पर दया करने वाले प्रभू उस सेवक के अपने बन जाते हैं।प्रभू उसको बार बार जनम-मरण में नहीं डालता। 1।रहाउ। हे भाई ! आएँ हम गुरू की संगति में बैठ के परमात्मा के गुण गाएं।हे भाई ! प्रभू का सेवक (गुण गा के) अपना श्रेष्ठ मानस जनम व्यर्थ नहीं गवाता। प्रभू के गुण गा के सेवक विषयों (विषौ-विकारों) के जल से भरे संसार-समुंद्र से खुद पार लांघ जाता है।अपनी सारी कुलों को भी (उसमें डूबने से) बचा लेता है। 1। हे भाई ! सेवक के हृदय में परमात्मा के सुंदर चरण हमेशा बसते रहते हैं।सेवक हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ परमात्मा का नाम जपता रहता है। हे नानक ! सेवक ने जगत के मालिक परमात्मा का आसरा लिया होता है।मैं उस सेवक से बार बार बलिहार जाता हूँ। 2। 4। 30।

करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥

रागु देवगंधारी महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥
कथन सुनावन गीत नीके गावन मन महि धरते गार ॥1॥
अति सुंदर बहु चतुर सिआने बिदिआ रसना चार ॥2॥
मान मोह मेर तेर बिबरजित एहु मारगु खंडे धार ॥3॥
कहु नानक तिनि भवजलु तरीअले प्रभ किरपा संत संगार ॥4॥1॥31॥

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! जो मनुष्य त्यागी साधुओं वाले) भेष करके जंगलों में भटकते फिरते हैं।सुंदर प्रभू उनसे दूर रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य औरों को उपदेश कहने सुनाने वाले हैं।जो सुंदर-सुंदर गीत भी गाने वाले हैं वह (अपने इस गुण का) मन में अहंकार बनाए रखते हैं (मोहन प्रभू उनसे भी दूर ही रहता है)। 1। हे भाई ! विद्या की बल पर जिनकी जीभ सुंदर (बोलने वाली बन जाती) है।जो देखने में बड़े सुंदर हैं।चतुर हैं।समझदार हैं (मोहन प्रभू उनसे भी अलग ही रहता है)। 2। (हे भाई ! मोहन प्रभू उनके ही हृदय में बसता है जो अहंकार से।मोह से।मेर-तेर से बचे रहते हैं।पर) अहंकार से।मोह से।मेर-तेर से बचे रहना - ये रास्ता तलवार की धार जैसा बारीक है (इस पर चलना कोई आसान खेल नहीं)। 3। हे नानक ! उस मनुष्य ने संसार समुंद्र पार कर लिया है जो प्रभू की कृपा से साध-संगति में निवास रखता है। 4। 1। 31।

मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥

रागु देवगंधारी महला 5 घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥
आन न समसरि कोऊ लागै ढूढि रहे हम मूचा ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बेअंतु अति बडो गाहरो थाह नही अगहूचा ॥
तोलि न तुलीऐ मोलि न मुलीऐ कत पाईऐ मन रूचा ॥1॥
खोज असंखा अनिक तपंथा बिनु गुर नही पहूचा ॥
कहु नानक किरपा करी ठाकुर मिलि साधू रस भूंचा ॥2॥1॥32॥

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे बहिन ! मैंने देख लिया है कि वह सुंदर प्रभू बहुत ऊँचा है सबसे ऊँचा है। मैं बहुत तलाश कर करके थक चुका हूँ।कोई और उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 1।रहाउ। वह परमात्मा बहुत बेअंत है।वह प्रभू बहुत ही गंभीर है उसकी गहराई नहीं नापी जा सकती। वह इतना ऊँचा है कि उस तक पहुँचा नहीं जा सकता।किसी पत्थर से उसे तौला नहीं जा सकता।किसी कीमत से उसे खरीदा नहीं जा सकता।पता नहीं चलता कि कहाँ उस सुंदर प्रभू को तलाशें। 1। अनेकों तलाश करें।अनेकों रास्ते देखें (कुछ नहीं बन सकता)।गुरू की शरण पड़े बिना उस प्रभू के चरणों में नहीं पड़ सकते। हे नानक ! कह,प्रभू ने जिस मनुष्य पर कृपा की।वह गुरू को मिल के उसके नाम का रस भोगता है। 2। 1। 32।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५३४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English