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अंग ५३५ · देवगंधारी

अंग
535
देवगंधारी
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  1. मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥
  2. एकै रे हरि एकै जान ॥
  3. देवगंधारी 5 ॥
  4. धिआए गाए करनैहार ॥
  5. उलटी रे मन उलटी रे ॥

मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥

देवगंधारी महला 5 ॥
मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥
खंड दीप सभ भीतरि रविआ पूरि रहिओ सभ लोऊ ॥1॥ रहाउ ॥
अगम अगंमा कवन महिंमा मनु जीवै सुनि सोऊ ॥
चारि आसरम चारि बरंना मुकति भए सेवतोऊ ॥1॥
गुरि सबदु द्रिड़ाइआ परम पदु पाइआ दुतीअ गए सुख होऊ ॥
कहु नानक भव सागरु तरिआ हरि निधि पाई सहजोऊ ॥2॥2॥33॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे बहन ! मैंने इस अनेकों रंगों वाले जगत को (ध्यान से) देखा है।मुझे इसमें परमात्मा के बिना और कोई नहीं दिखता। हे बहन ! धरती के सारे खण्डों में।देशों में सभी में परमात्मा ही मौजूद है।सब भवनों में परमात्मा ही व्यापक है। 1।रहाउ। हे बहन ! परमात्मा अपहुँच है।हम जीवों की बुद्धि उस तक नहीं पहुँच सकती।उसकी महिमा कोई भी बयान नहीं कर सकता।हे बहन ! उसकी शोभा सुन-सुन के मेरे मन को आत्मिक जीवन मिल रहा है। चारों आश्रमों।चारों वर्णों के जीव उसकी सेवा-भक्ति कर के (माया के बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 1। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने अपना शबद पक्का करके टिका दिया उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया।उसके अंदर से मेर-तेर दूर हो गई।उसको आत्मिक आनंद मिल गया। उसने संसार-समुंद्र पार कर लिया।उसको परमात्मा का नाम-खजाना मिल गया।उसको आत्मिक अडोलता हासिल हो गई। 2। 2। 33।

एकै रे हरि एकै जान ॥

रागु देवगंधारी महला 5 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकै रे हरि एकै जान ॥
एकै रे गुरमुखि जान ॥1॥ रहाउ ॥
काहे भ्रमत हउ तुम भ्रमहु न भाई रविआ रे रविआ स्रब थान ॥1॥
जिउ बैसंतरु कासट मझारि बिनु संजम नही कारज सारि ॥
बिनु गुर न पावैगो हरि जी को दुआर ॥
मिलि संगति तजि अभिमान कहु नानक पाए है परम निधान ॥2॥1॥34॥

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 6 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! हर जगह एक परमात्मा को ही बसता समझ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर एक परमात्मा को ही (हर जगह बसता) समझ। 1।रहाउ। हे भाई ! आप क्यों भटकते हैं।भटकना त्याग दो।हे भाई ! परमात्मा सब जगह में व्याप रहा है। 1। हे भाई ! जैसे (हरेक) लकड़ी में आग (बसती है।पर) जुगति के बिना (वह आग हासिल नहीं की जा सकती।और।आग से किए जाने वाले) काम सिरे नहीं चढ़ सकते। (इसी तरह।चाहे परमात्मा हर जगह बस रहा है।पर) गुरू को मिले बिना कोई मनुष्य परमात्मा का दर नहीं पा सकेगा। हे नानक ! कह, साध-संगति में मिल के अपना अहंकार त्याग के सबसे श्रेष्ठ (नाम-) खजाना मिल जाता है। 2। 1। 34।

देवगंधारी 5 ॥

देवगंधारी 5 ॥
जानी न जाई ता की गाति ॥1॥ रहाउ ॥
कह पेखारउ हउ करि चतुराई बिसमन बिसमे कहन कहाति ॥1॥
गण गंधरब सिध अरु साधिक ॥
सुरि नर देव ब्रहम ब्रहमादिक ॥
चतुर बेद उचरत दिनु राति ॥
अगम अगम ठाकुरु आगाधि ॥
गुन बेअंत बेअंत भनु नानक कहनु न जाई परै पराति ॥2॥2॥35॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! उस परमात्मा की आत्मक अवस्था समझी नहीं जा सकती (कि परमात्मा कैसा है,ये बात जानी नहीं जा सकती)। 1।रहाउ। हे भाई ! अपनी अकल का जोर लगा के मैं वह परमात्मा कहाँ से दिखाऊँ।(नहीं दिखा सकता)।जो मनुष्य उसे बयान करने का प्रयत्न करते हैं वे भी हैरान ही रह जाते हैं (उसका स्वरूप कहा नहीं जा सकता)। 1। हे भाई ! शिव जी के गुण।देवताओं के रागी।करामाती योगी।योग-साधना करने वाले। दैवी गुणों वाले मनुष्य।देवते।ब्रह्मज्ञानी।ब्रह्मा आदि बड़े देवतागण। चारों वेद (उस परमात्मा के गुणों को) दिन-रात उच्चारण करते हैं। फिर भी उस परमात्मा तक (अपनी अकल के जोर से) पहुँच नहीं सकते।वह अपहुँच है वह अथाह है। हे नानक ! कह, परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।वह बेअंत है।उसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।वह परे से परे है। 2। 2। 35।

धिआए गाए करनैहार ॥

देवगंधारी महला 5 ॥
धिआए गाए करनैहार ॥
भउ नाही सुख सहज अनंदा अनिक ओही रे एक समार ॥1॥ रहाउ ॥
सफल मूरति गुरु मेरै माथै ॥
जत कत पेखउ तत तत साथै ॥
चरन कमल मेरे प्रान अधार ॥1॥
समरथ अथाह बडा प्रभु मेरा ॥
घट घट अंतरि साहिबु नेरा ॥
ताकी सरनि आसर प्रभ नानक जा का अंतु न पारावार ॥2॥3॥36॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य सृजनहार परमात्मा का ध्यान धरता है करतार के गुण गाता है। उसे कोई डर छू नहीं सकता।उसे आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद मिले रहते हैं।हे भाई ! आप उस करतार को अपने हृदय में संभाल के रखें।वही एक है और वही अनेकों रूपों वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस गुरू के दर्शन जीवन के फल देने वाले हैं वह मेरे माथे पर (अपना हाथ रखे हुए है।उसकी बरकति से) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही परमात्मा मुझे अपने साथ बसता प्रतीत होता है। उस परमात्मा के सुंदर चरण मेरे प्राणों का आसरा बन गए हैं। 1। जिस (के स्वरूप) का इस पार उस पार की थाह नहीं लगाई जा सकती। प्रत्येक शरीर के अन्दर (पास) वह मालिक प्रभु है।हे नानक ! (कहें, हे भाई !) मैंने उस परमात्मा की शरण देखी है उस प्रभू का आसरा चाहा है जिस (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता। 2। 3। 36।

उलटी रे मन उलटी रे ॥

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देवगंधारी महला 5 ॥
उलटी रे मन उलटी रे ॥
साकत सिउ करि उलटी रे ॥
झूठै की रे झूठु परीति छुटकी रे मन छुटकी रे साकत संगि न छुटकी रे ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ काजर भरि मंदरु राखिओ जो पैसै कालूखी रे ॥
दूरहु ही ते भागि गइओ है जिसु गुर मिलि छुटकी त्रिकुटी रे ॥1॥
मागउ दानु क्रिपाल क्रिपा निधि मेरा मुखु साकत संगि न जुटसी रे ॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे मेरे मन !उनसे अपने आप को सदा परे रख।दूर रख। जो मनुष्य परमात्मा के साथ सदा टूटे रहते हैं। हे मन ! साकत झूठे मनुष्य की प्रीति को भी झूठ ही समझ।ये कभी तोड़ नहीं निभती।ये जरूर टूट जाती है।फिर।साकत की संगति में रहने से विकारों से कभी भी निजात नहीं मिल सकती। 1।रहाउ। हे मन ! जैसे कोई घर काजल से भर लिया जाए।उसमें जो भी मनुष्य प्रवेश करेगा वह कालिख से भर जाएगा (वैसे ही परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य से मुंह जोड़ने से विकारों की कालिख ही मिलेगी)। गुरू को मिल के जिस मनुष्य के माथे की त्रिकुटी मिट जाती है (जिसके अंदर से विकारों की कशिश दूर हो जाती है) वह दूर से ही साकत मनुष्य से परे परे रहता है। 1। हे कृपा के घर प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! मैं आपके पास एक दान माँगता हूँ (मेहर कर) मुझे किसी साकत का साथ ना मिले।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५३५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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