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अंग 536

अंग
536
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन नानक दास दास को करीअहु मेरा मूंडु साध पगा हेठि रुलसी रे ॥2॥4॥37॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मुझे अपने दासों का दास बना ले।मेरा सिर आपके संत-जनों के पैरों तले पड़ा रहे। 2। 4। 37।
रागु देवगंधारी महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥
गावन भावन संतन तोरै चरन उवा कै पाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जासन बासन सहज केल करुणा मै एक अनंत अनूपै ठाउ ॥1॥
रिधि सिधि निधि कर तल जगजीवन स्रब नाथ अनेकै नाउ ॥
दइआ मइआ किरपा नानक कउ सुनि सुनि जसु जीवाउ ॥2॥1॥38॥6॥44॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले प्रभू ! (मेहर कर) मैं आपके उन संतों के चरणों में पड़ा रहूँ।और उन संतों पर से सदके जाता रहूँ। जो आपकी सिफत-सालाह के गीत गाते रहते हैं।जो आपको अच्छे लगते हैं।और।जो सदा ही जीवन राह बताने के समर्थ हैं। 1।रहाउ। हे तरस स्वरूप प्रभू ! (मेहर कर।मैं उन संतों के चरणों में पड़ा रहूँ) जिन्हें और कोई वासना नहीं।जो सदा आत्मिक अडोलता के रंग में रंगे रहते हैं।जो सदा आपके बेअंत और सुंदर स्वरूप में टिके रहते हैं1। हे जगत के जीवन प्रभू ! हे सबके नाथ प्रभू ! हे अनेकों नामों वाले प्रभू ! रिद्धियां-सिद्धियां और निधियां आपके हाथों की तलियों पर (सदा टिकी रहती हैं)। हे प्रभू ! (अपने) दास नानक पर दया कर।मेहर कर।कृपा कर कि (आपके संत-जनों से आपकी) सिफत-सालाह सुन सुन के मैं नानक आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 2। 1। 38। 6। 44।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला 9 ॥
यह मनु नैक न कहिओ करै ॥
सीख सिखाइ रहिओ अपनी सी दुरमति ते न टरै ॥1॥ रहाउ ॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै ॥
करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ॥1॥
सुआन पूछ जिउ होइ न सूधो कहिओ न कान धरै ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते काजु सरै ॥2॥1॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई ! ये मन रक्ती भर भी मेरा कहा नहीं मानता। मैं अपनी ओर से इसे शिक्षा दे दे के थक गया हूँ।फिर भी यह खोटी मति से नहीं हटता। 1।रहाउ। हे भाई ! माया के नशे में ये मन झल्ला हुआ पड़ा है।ये कभी सिफत-सालाह की बाणी नहीं उचारता। दिखावा करके दुनिया को ठॅगता रहता है।और।(ठॅगी से एकत्र किए हुए धन द्वारा) अपना पेट भरता रहता है। 1। हे भाई ! कुत्ते की पूँछ की तरह ये मन कभी सीधा नहीं होता।(किसी की भी) दी हुई शिक्षा को ध्यान से नहीं सुनता। हे नानक ! (दुबारा इसे) कह, (हे मन !) परमात्मा के नाम का भजन किया कर जिसकी बरकति से आपका जनम-मनोरथ हल हैं जाए। 2। 1।
देवगंधारी महला 9 ॥
सभ किछु जीवत को बिवहार ॥
मात पिता भाई सुत बंधप अरु फुनि ग्रिह की नारि ॥1॥ रहाउ ॥
तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेति पुकारि ॥
आध घरी कोऊ नहि राखै घर ते देत निकारि ॥1॥
म्रिग त्रिसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदै बिचारि ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते होत उधार ॥2॥2॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई !ये सब कुछ जीवन का ही मेल-जोल है जो – माता।पिता।भाई।पुत्र।रिश्तेदार और घर की पत्नी (आदि है) । 1।रहाउ। हे भाई ! (मौत आने पर) जब प्राण शरीर से अलग हो जाते हैं।तब (ये सारे संबंधी) ऊँचा ऊँचा कहते हैं कि ये गुजर चुका है गुजर चुका है। कोई भी संबंधी आधी घड़ी के लिए भी (उसको) घर में नहीं रखता।घर से निकाल देते हैं। 1। हे भाई ! अपने हृदय में विचार करके देख लो।ये जगत-खेल मृग-तृष्णा (ठॅग नीरे) की तरह है (प्यासे हिरन के पानी के पीछे दौड़ने की तरह मनुष्य माया के पीछे दौड़-दौड़ के आत्मिक मौत मर जाता है)। हे नानक ! कह, (हे भाई !) सदा परमात्मा के नाम का भजन किया कर जिसकी बरकति से (संसार के मोह से) पार-उतारा होता है। 2। 2।
देवगंधारी महला 9 ॥
जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥
अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत ॥1॥ रहाउ ॥
मेरउ मेरउ सभै कहत है हित सिउ बाधिओ चीत ॥
अंति कालि संगी नह कोऊ इह अचरज है रीति ॥1॥
मन मूरख अजहू नह समझत सिख दै हारिओ नीत ॥
नानक भउजलु पारि परै जउ गावै प्रभ के गीत ॥2॥3॥6॥38॥47॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई ! दुनियां में (संबन्धियों का) प्यार मैंने झूठा ही देखा है। चाहे स्त्री है चाहे मित्र हैं, सारे ही अपने-अपने सुख के खातिर ही (मनुष्य के) साथ चलते फिरते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! (सबका) चित्त मोह से बँधा होता है (उस मोह के कारण) हर कोई यही कहता है ‘ये मेरा है ये मेरा है’।पर। आखिरी वक्त पर कोई भी साथी नहीं बनता।(जगत की) ये आश्चर्यजनक रीति चली आ रही है। 1। हे मूर्ख मन ! आपको मैं सदा शिक्षा दे दे के थक गया हूँ।आप अभी भी नहीं समझता। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जब मनुष्य परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाता है।तब संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 2। 3। 6। 38। 47।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मुझे अपने दासों का दास बना ले।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।