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अंग ५३६ · देवगंधारी

अंग
536
देवगंधारी
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  1. जन नानक दास दास को करीअहु मेरा मूंडु साध पगा हेठि रुलसी रे ॥2॥4॥37॥
  2. सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥
  3. यह मनु नैक न कहिओ करै ॥
  4. सभ किछु जीवत को बिवहार ॥
  5. जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥

जन नानक दास दास को करीअहु मेरा मूंडु साध पगा हेठि रुलसी रे ॥2॥4॥37॥

अंग ५३५ से चला आ रहा अंश

जन नानक दास दास को करीअहु मेरा मूंडु साध पगा हेठि रुलसी रे ॥2॥4॥37॥

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मुझे अपने दासों का दास बना ले।मेरा सिर आपके संत-जनों के पैरों तले पड़ा रहे। 2। 4। 37।

सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥

रागु देवगंधारी महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥
गावन भावन संतन तोरै चरन उवा कै पाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जासन बासन सहज केल करुणा मै एक अनंत अनूपै ठाउ ॥1॥
रिधि सिधि निधि कर तल जगजीवन स्रब नाथ अनेकै नाउ ॥
दइआ मइआ किरपा नानक कउ सुनि सुनि जसु जीवाउ ॥2॥1॥38॥6॥44॥

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले प्रभू ! (मेहर कर) मैं आपके उन संतों के चरणों में पड़ा रहूँ।और उन संतों पर से सदके जाता रहूँ। जो आपकी सिफत-सालाह के गीत गाते रहते हैं।जो आपको अच्छे लगते हैं।और।जो सदा ही जीवन राह बताने के समर्थ हैं। 1।रहाउ। हे तरस स्वरूप प्रभू ! (मेहर कर।मैं उन संतों के चरणों में पड़ा रहूँ) जिन्हें और कोई वासना नहीं।जो सदा आत्मिक अडोलता के रंग में रंगे रहते हैं।जो सदा आपके बेअंत और सुंदर स्वरूप में टिके रहते हैं1। हे जगत के जीवन प्रभू ! हे सबके नाथ प्रभू ! हे अनेकों नामों वाले प्रभू ! रिद्धियां-सिद्धियां और निधियां आपके हाथों की तलियों पर (सदा टिकी रहती हैं)। हे प्रभू ! (अपने) दास नानक पर दया कर।मेहर कर।कृपा कर कि (आपके संत-जनों से आपकी) सिफत-सालाह सुन सुन के मैं नानक आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 2। 1। 38। 6। 44।

यह मनु नैक न कहिओ करै ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला 9 ॥
यह मनु नैक न कहिओ करै ॥
सीख सिखाइ रहिओ अपनी सी दुरमति ते न टरै ॥1॥ रहाउ ॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै ॥
करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ॥1॥
सुआन पूछ जिउ होइ न सूधो कहिओ न कान धरै ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते काजु सरै ॥2॥1॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई ! ये मन रक्ती भर भी मेरा कहा नहीं मानता। मैं अपनी ओर से इसे शिक्षा दे दे के थक गया हूँ।फिर भी यह खोटी मति से नहीं हटता। 1।रहाउ। हे भाई ! माया के नशे में ये मन झल्ला हुआ पड़ा है।ये कभी सिफत-सालाह की बाणी नहीं उचारता। दिखावा करके दुनिया को ठॅगता रहता है।और।(ठॅगी से एकत्र किए हुए धन द्वारा) अपना पेट भरता रहता है। 1। हे भाई ! कुत्ते की पूँछ की तरह ये मन कभी सीधा नहीं होता।(किसी की भी) दी हुई शिक्षा को ध्यान से नहीं सुनता। हे नानक ! (दुबारा इसे) कह, (हे मन !) परमात्मा के नाम का भजन किया कर जिसकी बरकति से आपका जनम-मनोरथ हल हो जाए। 2। 1।

सभ किछु जीवत को बिवहार ॥

देवगंधारी महला 9 ॥
सभ किछु जीवत को बिवहार ॥
मात पिता भाई सुत बंधप अरु फुनि ग्रिह की नारि ॥1॥ रहाउ ॥
तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेति पुकारि ॥
आध घरी कोऊ नहि राखै घर ते देत निकारि ॥1॥
म्रिग त्रिसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदै बिचारि ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते होत उधार ॥2॥2॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई !ये सब कुछ जीवन का ही मेल-जोल है जो - माता।पिता।भाई।पुत्र।रिश्तेदार और घर की पत्नी (आदि है) । 1।रहाउ। हे भाई ! (मौत आने पर) जब प्राण शरीर से अलग हो जाते हैं।तब (ये सारे संबंधी) ऊँचा ऊँचा कहते हैं कि ये गुजर चुका है गुजर चुका है। कोई भी संबंधी आधी घड़ी के लिए भी (उसको) घर में नहीं रखता।घर से निकाल देते हैं। 1। हे भाई ! अपने हृदय में विचार करके देख लो।ये जगत-खेल मृग-तृष्णा (ठॅग नीरे) की तरह है (प्यासे हिरन के पानी के पीछे दौड़ने की तरह मनुष्य माया के पीछे दौड़-दौड़ के आत्मिक मौत मर जाता है)। हे नानक ! कह, (हे भाई !) सदा परमात्मा के नाम का भजन किया कर जिसकी बरकति से (संसार के मोह से) पार-उतारा होता है। 2। 2।

जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥

देवगंधारी महला 9 ॥
जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥
अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत ॥1॥ रहाउ ॥
मेरउ मेरउ सभै कहत है हित सिउ बाधिओ चीत ॥
अंति कालि संगी नह कोऊ इह अचरज है रीति ॥1॥
मन मूरख अजहू नह समझत सिख दै हारिओ नीत ॥
नानक भउजलु पारि परै जउ गावै प्रभ के गीत ॥2॥3॥6॥38॥47॥

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 9 ॥ हे भाई ! दुनियां में (संबन्धियों का) प्यार मैंने झूठा ही देखा है। चाहे स्त्री है चाहे मित्र हैं, सारे ही अपने-अपने सुख के खातिर ही (मनुष्य के) साथ चलते फिरते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! (सबका) चित्त मोह से बँधा होता है (उस मोह के कारण) हर कोई यही कहता है ‘ये मेरा है ये मेरा है’।पर। आखिरी वक्त पर कोई भी साथी नहीं बनता।(जगत की) ये आश्चर्यजनक रीति चली आ रही है। 1। हे मूर्ख मन ! आपको मैं सदा शिक्षा दे दे के थक गया हूँ।आप अभी भी नहीं समझता। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जब मनुष्य परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाता है।तब संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 2। 3। 6। 38। 47।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी; महला ९: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५३६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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