लोकन की चतुराई उपमा ते बैसंतरि जारि ॥ कोई भला कहउ भावै बुरा कहउ हम तनु दीओ है ढारि ॥1॥ जो आवत सरणि ठाकुर प्रभु तुमरी तिसु राखहु किरपा धारि ॥ जन नानक सरणि तुमारी हरि जीउ राखहु लाज मुरारि ॥2॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: दुनिया वाली समझदारी।और दुनियावी बड़प्पन-इन्हें मैंने आग में जला दिया है। चाहे मुझे कोई अच्छा कहे चाहे कोई बुरा कहे।मैंने तो अपना शरीर (ठाकुर के चरनों में) भेट कर दिया है। 1। हे मालिक ! हे प्रभू ! जो भी कोई (भाग्यशाली) आपकी शरण आ पड़ता है।आप मेहर करके उसकी रक्षा करता है। हे दास नानक ! (कह) हे हरी जी ! हे मुरारी ! मैं आपकी शरण आया हूँ।मेरी इज्जत रख। 2। 4।
देवगंधारी ॥ हरि गुण गावै हउ तिसु बलिहारी ॥ देखि देखि जीवा साध गुर दरसनु जिसु हिरदै नामु मुरारी ॥1॥ रहाउ ॥ तुम पवित्र पावन पुरख प्रभ सुआमी हम किउ करि मिलह जूठारी ॥ हमरै जीइ होरु मुखि होरु होत है हम करमहीण कूड़िआरी ॥1॥ हमरी मुद्र नामु हरि सुआमी रिद अंतरि दुसट दुसटारी ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरणि तुम॑ारी ॥2॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ मैं उस (गुरू।साधू) से कुर्बान जाता हूँ जो (हर समय) परमात्मा के सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है। उस गुरू का साधु के दर्शन कर करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है जिसके हृदय में (सदा) परमात्मा का नाम बसता है। 1।रहाउ। हे स्वामी ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! आप सदा ही पवित्र है।पर हम मैले जीवन वाले हैं।हम आपको कैसे मिल सकते हैं। हमारे दिल में कुछ और होता है।हमारे मुँह पर कुछ और होता है (मुँह से हम कुछ और कहते हैं)।हम बुरे भाग्यों वाले हैं।हम सदा झूठी माया के ग्राहक बने रहते हैं। 1। हे हरी ! हे स्वामी ! आपका नाम हमारा दिखावा है (हम दिखावे के तौर पर जपते रहते हैं)।पर हमारे हृदय में सदा बुरे विचार भरे रहते हैं। हे दास नानक ! (कह) हे स्वामी ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ।जैसे भी हैं सके मुझे (इस पाखण्ड से) बचा ले। 2। 4।
देवगंधारी ॥ हरि के नाम बिना सुंदरि है नकटी ॥ जिउ बेसुआ के घरि पूतु जमतु है तिसु नामु परिओ है ध्रकटी ॥1॥ रहाउ ॥ जिन कै हिरदै नाहि हरि सुआमी ते बिगड़ रूप बेरकटी ॥ जिउ निगुरा बहु बाता जाणै ओहु हरि दरगह है भ्रसटी ॥1॥ जिन कउ दइआलु होआ मेरा सुआमी तिना साध जना पग चकटी ॥ नानक पतित पवित मिलि संगति गुर सतिगुर पाछै छुकटी ॥2॥6॥ छका 1
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना ये सुंदर (मानस) काया बद्शकल ही जानो। जैसे अगर किसी वैश्या के घर पुत्र पैदा हो जाए।तो उसका नाम हरामी पड़ जाता है (चाहे वह शकल से सुंदर ही क्यों ना हो)। 1।रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में मालिक प्रभू की (याद) नहीं।वे मनुष्य बद्सूरत ही हैं; वे कोढ़ी हैं।जैसे कोई गुरू से बेमुख मनुष्य (चाहे चतुराई की) बहुत सारी बातें करनी जानता हैं (लोगों को अपनी बातों से रिझा ले।पर) परमात्मा की दरगाह में भ्रष्ट ही (गिना जाता) है। 1। हे नानक ! (कह) जिन मनुष्यों पर प्यारा प्रभू मेहरवान होता है वे मनुष्य संत जनों के पैर परसते रहते हैं। गुरू की संगति में मिल के विकारी मनुष्य भी अच्छे आचरण वाले बन जाते हैं।गुरू के डाले हुए मार्ग पर चल के वे विकारों के पँजे में से बच निकलते हैं। 2। 9।छका 1। छका- छक्का। छे शब्दों का संग्रह।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे माँ ! गुरू के चरणों में चित्त जोड़ना चाहिए। (गुरू के माध्यम से जब) परमात्मा दयावान होता है।तो (हृदय का) कमल-पुष्प खिल उठता है।हे माँ ! सदा (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। 1।रहाउ। हे माँ ! शरीरों के अंदर एक परमात्मा ही बस रहा है।बाहर सारे जगत पसारे में भी एक परमात्मा ही बस रहा है।सारी सृष्टि में वही एक व्यापक है। हरेक शरीर में हर जगह सर्व-व्यापक परमात्मा ही (बसता) दिखाई दे रहा है। 1। हे प्रभू ! बेअंत ऋषि-मुनि जन।और।बेअंत (आपके) सेवक-जन आपकी उपमा करते आ रहे हैं।किसी से भी आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सका। हे दास नानक ! (कह) हे सुख देने वाले ! हे दुखों के नाश करने वाले ! आपसे सदा सदके जाना चाहिए। 2। 1।
देवगंधारी ॥ माई होनहार सो होईऐ ॥ राचि रहिओ रचना प्रभु अपनी कहा लाभु कहा खोईऐ ॥1॥ रहाउ ॥ कह फूलहि आनंद बिखै सोग कब हसनो कब रोईऐ ॥ कबहू मैलु भरे अभिमानी कब साधू संगि धोईऐ ॥1॥ कोइ न मेटै प्रभ का कीआ दूसर नाही अलोईऐ ॥ कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिह प्रसादि सुखि सोईऐ ॥2॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे माँ ! (जगत में) वही कुछ घटित हो रहा है जो (परमात्मा की मर्जी के अनुसार।आज्ञा मुताबिक) जरूर होना है। परमात्मा खुद अपनी इस जगत खेल में व्यस्त है।कहीं लाभ हो रहा है।कहीं कुछ गवा रहा है। 1।रहाउ। हे माँ ! (जगत में) कहीं खुशियां बढ़-फूल रही हैं।कहीं विषय-विकारों के कारण चिंता-फिक्र बढ़ रहे हैं।कहीं हसीं हो रही है।कहीं रोया जा रहा है। कहीं कोई अहंकारी मनुष्य अहंकार की मैल से लिप्त हैं।कहीं गुरू की संगति में बैठ के (अहं की मैल को) धोया जा रहा है। 1। (हे माँ ! जगत में परमात्मा के बिना) कोई दूसरा नहीं दिखता।कोई जीव उस परमात्मा का किया (हुकम) मिटा नहीं सकता। हे नानक ! कह, मैं उस गुरू से कुर्बान हूँ जिसकी कृपा से (परमात्मा की रजा में रह के) आत्मिक आनंद में लीन रह सकते हैं। 2। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।