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अंग ९७२ · रामकली

अंग
972
रामकली
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  1. जब नख सिख इहु मनु चीन॑ा ॥
  2. चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥
  3. दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥
  4. आनीले कागदु काटीले गूडी आकास मधे भरमीअले ॥
  5. बेद पुरान सासत्र आनंता गीत कबित न गावउगो ॥

जब नख सिख इहु मनु चीन॑ा ॥

अंग ९७१ से चला आ रहा अंश

जब नख सिख इहु मनु चीन॑ा ॥
तब अंतरि मजनु कीन॑ा ॥1॥
पवनपति उनमनि रहनु खरा ॥
नही मिरतु न जनमु जरा ॥1॥ रहाउ ॥
उलटी ले सकति सहारं ॥
पैसीले गगन मझारं ॥
बेधीअले चक्र भुअंगा ॥
भेटीअले राइ निसंगा ॥2॥
चूकीअले मोह मइआसा ॥
ससि कीनो सूर गिरासा ॥
जब कुंभकु भरिपुरि लीणा ॥
तह बाजे अनहद बीणा ॥3॥
बकतै बकि सबदु सुनाइआ ॥
सुनतै सुनि मंनि बसाइआ ॥
करि करता उतरसि पारं ॥
कहै कबीरा सारं ॥4॥1॥10॥

हिन्दी अर्थ: अब जब अपने इस मन को अच्छी तरह देखता हूँ। तो अपने अंदर ही स्नान करता हूँ। 1। जीवात्मा का पूर्ण खिड़ाव में बने रहना ही आत्मा की सबसे श्रेष्ठ अवस्था है। इस अवस्था को जनम-मरन और बुढ़ापा छू नहीं सकते। 1। रहाउ। माया वाला सहारा अब उलट गया है। (माया की जगह मेरा मन अब) प्रभू-चरणों में डुबकी लगा रहा है। टेढ़ी चालें चलने वाला ये मन अब भेदा जा चुका है क्योंकि निसंग हो के अब ये प्रभू को मिल गया है। 2। मेरी मोह भरी आशाएं अब खत्म हो गई हैं; (मेरे अंदर की) शांति ने मेरे अंदर की तपश बुझा दी है। अब जबकि मन की बिरती सर्व-व्यापक प्रभू में जुड़ गई है। इस अवस्था में (मेरे अंदर। मानो) एक-रस वीणा बज रही है। 3। उपदेश करने वालें सतिगुरू ने जिसको अपना शबद सुनाया। अगर उसको ध्यान से सुन के अपने मन में बसा लिया। तब प्रभू का सिमरन करके वह पार लांघ गया। कबीर कहता है (कि इस सारी तब्दीली में) असल राज की बात (ये है) 4। 1। 10।

चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥

चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥
जोती अंतरि ब्रहमु अनूपु ॥1॥
करु रे गिआनी ब्रहम बीचारु ॥
जोती अंतरि धरिआ पसारु ॥1॥ रहाउ ॥
हीरा देखि हीरे करउ आदेसु ॥
कहै कबीरु निरंजन अलेखु ॥2॥2॥11॥

हिन्दी अर्थ: ये चाँद और सूरज दोनों ही उस परमात्मा की ज्योति का (बाहरी दिखाई देता) स्वरूप हैं। हरेक की रौशनी में सुंदर प्रभू स्वयं बस रहा है। 1। हे विचारवान मनुष्य ! (आप तो चाँद-सूरज आदि रौशनी वाली चीजें देख के सिर्फ इन्हें ही सलाह रहे हैं। इनको नूर देने वाले। रौशन करने वाले) परमात्मा (की महिमा) की विचार कर। उसने यह सारा संसार अपने नूर में से पैदा किया है। 1। रहाउ। मैं हीरे (आदि सुंदर कीमती चमकते पदार्थों) को देख के (उस) हीरे को सिर झुकाता हूँ (जिसने इनको ये गुण बख्शा है। और कबीर कहता है- (जो इनमें बसता हुआ भी) माया के प्रभाव से रहित है। और जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते। 2। 2। 11।

दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥

दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥
निगम हुसीआर पहरूआ देखत जमु ले जाई ॥1॥ रहाउ ॥
नंीबु भइओ आंबु आंबु भइओ नंीबा केला पाका झारि ॥
नालीएर फलु सेबरि पाका मूरख मुगध गवार ॥1॥
हरि भइओ खांडु रेतु महि बिखरिओ हसतंी चुनिओ न जाई ॥
कहि कमीर कुल जाति पांति तजि चीटी होइ चुनि खाई ॥2॥3॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! हे जगत के लोगो ! सचेत रहें। जागते रहें। आप तो (अपनी ओर से) जागते हुए लूटे जा रहे हैं; वेद शास्त्र रूपी सचेत पहरेदारों के देखते हुए भी आपको जम-राज लिए जा रहा है (भाव। शास्त्रों की रक्षा पहरेदारी में भी आप ऐसे काम किए जा रहे हैं। जिनके कारण जनम-मरण का चक्कर बना हुआ है)। 1। रहाउ। (शास्त्रों के बताए कर्मकाण्ड में फंसे) मूर्ख मति-हीन अंजान लोगों को नीम का वृक्ष आम दिखाई देता है। आम का पौधा नीम लगता है; पका हुआ केला इन्हें झाड़ियाँ नजर आती हैं। और सिंबल इन्हें नारियल का पका फल दिखाई देता है। 1। कबीर कहता है-परमात्मा को ऐसे समझें जैसे खाण्ड रेत में मिली हुई हो। वह खांड हाथियों द्वारा नहीं चुनी जा सकती। (हाँ। अगर) चींटी हो तो वह (इस खाण्ड को) चुन के खा सकती है। इसी तरह मनुष्य कुल-जाति-खानदान (का गुमान) छोड़ के प्रभू को मिल सकता है। 2। 3। 12।

आनीले कागदु काटीले गूडी आकास मधे भरमीअले ॥

बाणी नामदेउ जीउ की रामकली घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आनीले कागदु काटीले गूडी आकास मधे भरमीअले ॥
पंच जना सिउ बात बतऊआ चीतु सु डोरी राखीअले ॥1॥
मनु राम नामा बेधीअले ॥
जैसे कनिक कला चितु मांडीअले ॥1॥ रहाउ ॥
आनीले कुंभु भराईले ऊदक राज कुआरि पुरंदरीए ॥
हसत बिनोद बीचार करती है चीतु सु गागरि राखीअले ॥2॥
मंदरु एकु दुआर दस जा के गऊ चरावन छाडीअले ॥
पांच कोस पर गऊ चरावत चीतु सु बछरा राखीअले ॥3॥
कहत नामदेउ सुनहु तिलोचन बालकु पालन पउढीअले ॥
अंतरि बाहरि काज बिरूधी चीतु सु बारिक राखीअले ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: बाणी नामदेउ जीउ की रामकली घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ (हे त्रिलोचन ! देख। लड़का) कागज लाता है। उसकी गॅुडी काटता है उस गॅुडी व पतंग को आसमान में उड़ाता है। साथियों के साथ गप्पें भी मारता जाता है। पर उसका मन (पतंग की) डोर में टिका रहता है। 1। वैसे ही मेरा मन परमात्मा के नाम में बेधा हुआ है। (हे त्रिलोचन !) जैसे सोनियारे का मन (औरों से बात-चीत करते हुए भी। कुठाली में पड़े हुए सोने में) जुड़ा रहता है।1। रहाउ। (हे त्रिलोचन !) जवान लड़कियाँ शहर से (बाहर जाती हैं) अपना-अपना घड़ा उठा लेती हैं। पानी से भरती हैं। (आपस में) हसती हैं। हसीं की बातें व और कई विचारें करती हैं। पर अपना चित्त अपने-अपने घड़े में रखती हैं। 2। (हे त्रिलोचन !) एक घर है जिसके दस दरवाजे हैं। इस घर में से मनुष्य गऊएं चराने के लिए छोड़ता है; ये गाएँ पाँच कोस पर जा के चरती हैं। पर अपना चित्त अपने बछड़े में रखती हैं (वैसे ही दस-इन्द्रियों वाले इस शरीर में से मेरी ज्ञान-इन्द्रियां शरीर के निर्वाह के लिए काम-काज करती हैं। पर मेरी सुरति अपने प्रभू-चरणों में ही है)। 3। हे त्रिलोचन ! सुन। नामदेव (एक और दृष्टांत) कहता है- माँ अपने बच्चे को पालने में डालती है। अंदर-बाहर घर के कामों में व्यस्त रहती है। पर अपनी सुरति अपने बच्चे में रखती है। 4। 1।

बेद पुरान सासत्र आनंता गीत कबित न गावउगो ॥

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बेद पुरान सासत्र आनंता गीत कबित न गावउगो ॥

हिन्दी अर्थ: मुझे वेद-शास्त्र। पुराण आदि के गीत काव्य आदि गाने की आवश्यक्ता नहीं।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 972 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९७२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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