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भगत नामदेव
पंढरपुर के विट्ठल मंदिर के सामने एक दर्ज़ी का बच्चा खड़ा था, हाथ में दूध का कटोरा। माँ ने कहा था, "जा, विट्ठल को दूध पिला कर आ।" बच्चा 5 साल का था। मूर्ति के सामने कटोरा रखा। मूर्ति ने नहीं पिया। बच्चे ने रोना शुरू किया। फिर परंपरा कहती है, मूर्ति ने उठ कर पिया।
यह कथा सच हो या न हो, यह नामदेव की पूरी यात्रा का सार है, सीधा भाव, बिना किसी बिचौलिए के। 1270 में महाराष्ट्र के नरस-वामनी गाँव में पैदा हुए, बाद में पंढरपुर, और आख़िरी 20 साल पंजाब के घुमान में बिताए। इसीलिए उनकी वाणी में मराठी का असर है, मगर वह पंजाबी इलाक़े में लोकप्रिय हुई।
आदि ग्रंथ में 61 शबद। एक ख़ास गुण: नामदेव की वाणी दार्शनिक बहस में जाने के बजाय अक्सर सीधी, निर्मल स्तुति रहती है। यह "जो दिख रहा है, वो ही है" वाला स्वर।
नामदेव शबद आदि ग्रंथ में:
- नामदेव शबद गउड़ी मेंअंग 345-346
- नामदेव शबद आसा मेंअंग 485-487
- नामदेव शबद धनासरी मेंअंग 693-695
- नामदेव शबद मलार मेंअंग 1292
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
गउड़ी (1)
- देवा पाहन तारीअले ॥अंग 345
आसा (5)
गूजरी (2)
सोरठ (3)
- जब देखा तब गावा ॥अंग 656
- पाड़ पड़ोसणि पूछि ले नामा का पहि छानि छवाई हो ॥अंग 657
- अणमड़िआ मंदलु बाजै ॥अंग 657
धनासरी (5)
टोडी (2)
तिलंग (2)
बिलावल (1)
- सफल जनमु मो कउ गुर कीना ॥अंग 857
गोंड (7)
- असुमेध जगने ॥अंग 873
- नाद भ्रमे जैसे मिरगाए ॥अंग 873
- मो कउ तारि ले रामा तारि ले ॥अंग 873
- मोहि लागती तालाबेली ॥अंग 874
- हरि हरि करत मिटे सभि भरमा ॥अंग 874
- भैरउ भूत सीतला धावै ॥अंग 874
- बिलावलु गोंड ॥अंग 874
रामकली (4)
माली गउड़ा (3)
मारू (1)
भैरों (12)
- रे जिहबा करउ सत खंड ॥अंग 1163
- पर धन पर दारा परहरी ॥अंग 1163
- दूधु कटोरै गडवै पानी ॥ कपल गाइ नामै दुहि आनी ॥1॥अंग 1163
- मै बउरी मेरा रामु भतारु ॥अंग 1164
- कबहू खीरि खाड घीउ न भावै ॥अंग 1164
- हसत खेलत तेरे देहुरे आइआ ॥अंग 1164
- जैसी भूखे प्रीति अनाज ॥अंग 1164
- घर की नारि तिआगै अंधा ॥अंग 1164
- संडा मरका जाइ पुकारे ॥अंग 1165
- सुलतानु पूछै सुनु बे नामा ॥अंग 1165
- जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥अंग 1166
- आउ कलंदर केसवा ॥अंग 1167
बसंत (3)
- साहिबु संकटवै सेवकु भजै ॥अंग 1195
- लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥अंग 1196
- सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥अंग 1196
सारंग (3)
- काएं रे मन बिखिआ बन जाइ ॥अंग 1252
- बदहु की न होड माधउ मो सिउ ॥अंग 1252
- दास अनिंन मेरो निज रूप ॥अंग 1252
मलार (2)
- सेवीले गोपाल राइ अकुल निरंजन ॥अंग 1292
- मो कउ तूं न बिसारि तू न बिसारि ॥अंग 1292
कानड़ा (1)
- ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥अंग 1318