अखंड मंडल निरंकार महि अनहद बेनु बजावउगो ॥1॥ बैरागी रामहि गावउगो ॥ सबदि अतीत अनाहदि राता आकुल कै घरि जाउगो ॥1॥ रहाउ ॥ इड़ा पिंगुला अउरु सुखमना पउनै बंधि रहाउगो ॥ चंदु सूरजु दुइ सम करि राखउ ब्रहम जोति मिलि जाउगो ॥2॥ तीरथ देखि न जल महि पैसउ जीअ जंत न सतावउगो ॥ अठसठि तीरथ गुरू दिखाए घट ही भीतरि न॑ाउगो ॥3॥ पंच सहाई जन की सोभा भलो भलो न कहावउगो ॥ नामा कहै चितु हरि सिउ राता सुंन समाधि समाउगो ॥4॥2॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: क्योंकि मैं अविनाशी ठिकाने वाले निरंकार में जुड़ के (उसके प्यार की) एक-रस बाँसुरी बजा रहा हूँ। 1। (सतिगुरू के) शबद की बरकति से मैं वैरागवान हो के। विरक्त हो के प्रभू के गुण गा रहा हूँ। अविनाशी प्रभू (के प्यार) में रंगा गया हूँ। और सर्व-कुल-व्यापक प्रभू के चरणों में पहुँच गया हूँ। 1। रहाउ। (प्रभू की सिफत सालाह की बरकति से) चंचल मन को रोक के (मैं प्रभू-चरणों में) टिका हुआ हूँ- यही मेरा ईड़ा। पिंगला। सुखमना (का साधन) है; मेरे लिए बाई और दाई सारी सुर एक जैसी हैं (भाव। प्राण चढ़ाने उतारने मेरे लिए एक जैसे ही हैं। अनावश्यक हैं)। क्योंकि मैं परमात्मा की ज्योति में टिका बैठा हूँ। 2। न मैं तीर्थों के दर्शन करता हॅूँ। ना उनके पानी में चुभ्भी लगाता हूँ। और ना ही मैं उस पानी में रहने वाले जीवों को डराता हूँ। मुझे तो मेरे गुरू ने (मेरे अंदर ही) अढ़सठ तीर्थ दिखा दिए हैं। सो। मैं अपने अंदर ही (आत्म-तीर्थ पर) स्नान करता हॅू। 3। नामदेव कहता है- (कर्म-काण्ड। तीर्थ आदिक से लोग जगत में शोभा की कामना करते हैं। पर) मुझे (इन कर्मों के आधार पर) सज्जनों-मित्रों व लोगों की प्रसंशा की आवश्यक्ता नहीं। मुझे ये गर्ज नहीं कि कोई मुझे भला कहे; मेरा चित्त प्रभू (-प्यार) में रंगा गया है। मैं उस ठहराव में ठहरा हुआ हूँ जहाँ माया का कोई विचार नहीं चलता। 4। 2।
माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ ॥ हम नही होते तुम नही होते कवनु कहां ते आइआ ॥1॥ राम कोइ न किस ही केरा ॥ जैसे तरवरि पंखि बसेरा ॥1॥ रहाउ ॥ चंदु न होता सूरु न होता पानी पवनु मिलाइआ ॥ सासतु न होता बेदु न होता करमु कहां ते आइआ ॥2॥ खेचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ ॥ नामा प्रणवै परम ततु है सतिगुर होइ लखाइआ ॥3॥3॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: (अगर ये मान लें कि कर्मों की खेल है तो) जब माँ थी ना पिता था; ना कोई मनुष्य-शरीर था। और ना ही उसके द्वारा किए हुए कोई कर्म; जब कोई जीव ही नहीं थे। तब (हे प्रभू ! आपके बिना) और किस जगह से कोई जीव जनम ले सकता था। 1। हे राम ! आपके बिना और कोई भी किसी का सहायक नहीं है (ना कोई ‘कर्म’ आदि इस जीव को जनम-मरण में लाने वाला है। और ना ही कोई शास्त्र-निहित कर्म अथवा प्राणायाम आदि इसको चक्कर में से निकालने में समर्थ है)। जैसे वृक्षों पर पक्षियों का बसेरा होता है (वैसे ही आपके भेजे हुए जीव यहाँ आते हैं और आप स्वयं ही इन्हें अपने में जोड़ता है)। 1। रहाउ। जब ना चाँद था ना सूरज; जब पानी। हवा आदि तत्व भी अभी पैदा नहीं हुए थे। जब कोई वेद-शास्त्र भी नहीं थे; तब (हे प्रभू !) कर्मों का कोई अस्तित्व ही नहीं था। 2। नामदेव कहता है- कोई प्राणायाम करता है (और इसमें अपनी मुक्ति समझता है)। कोई तुलसी की माला आदि धारण करता है; पर मुझे अपने गुरू की कृपा से समझ आई है। गुरू ने मिल के मुझे ये बात समझाई है कि असल सहाई सबसे ऊँचा वह प्रभू (ही) है। जो जगत का मूल है (उसने जगत बनाया। और वही संसार-समुंद्र में से पार उतारता है)। 3। 3।
रामकली घरु 2 ॥ बानारसी तपु करै उलटि तीरथ मरै अगनि दहै काइआ कलपु कीजै ॥ असुमेध जगु कीजै सोना गरभ दानु दीजै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥1॥ छोडि छोडि रे पाखंडी मन कपटु न कीजै ॥ हरि का नामु नित नितहि लीजै ॥1॥ रहाउ ॥ गंगा जउ गोदावरि जाईऐ कुंभि जउ केदार न॑ाईऐ गोमती सहस गऊ दानु कीजै ॥ कोटि जउ तीरथ करै तनु जउ हिवाले गारै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥2॥ असु दान गज दान सिहजा नारी भूमि दान ऐसो दानु नित नितहि कीजै ॥ आतम जउ निरमाइलु कीजै आप बराबरि कंचनु दीजै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥3॥ मनहि न कीजै रोसु जमहि न दीजै दोसु निरमल निरबाण पदु चीनि॑ लीजै ॥ जसरथ राइ नंदु राजा मेरा राम चंदु प्रणवै नामा ततु रसु अंम्रितु पीजै ॥4॥4॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: रामकली घरु 2॥ (हे मेरे मन !) यदि कोई मनुष्य काशी जा के उल्टा लटक के तप करे। तीर्थों पर शरीर त्यागे। (धूणियों की) आग में जले। या योगाभ्यास आदि से शरीर को चिरंजीवी कर ले। अगर कोई अश्वमेघ यज्ञ करे। या सोना (फल आदि में) छुपा के दान करे; तो भी ये सारे काम प्रभू के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। 1। हे (मेरे) पाखण्डी मन ! कपट ना कर। छोड़ ये कपट। ये कपट छोड़ दे। सदा परमात्मा का नाम ही सिमरना चाहिए। 1। रहाउ। (हे मेरे मन !) कुम्भ के मेले पर अगर गंगा या गोदावरी तीर्थ पर जाएं। केदार तीर्थ पर स्नान करें अथवा गोमती नदी के किनारे पर हजार गऊऔं का दान करें; (हे मन !) अगर कोई करोड़ों बार तीर्थ यात्रा करे। या अपना शरीर हिमालय पर्वत की बर्फ में गला दे। तो भी ये सारे काम प्रभू के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। 2। (हे मेरे मन !) यदि घोड़े दान करें। हाथी दान करें। पत्नी दान कर दें। अपनी जमीन दान कर दें; अगर सदा ही ऐसा (कोई ना कोई) दान करते ही रहें; अगर अपना-आप भी भेट कर दें; अगर अपने बराबर तोल के सोना दान करें। तो भी (हे मन !) ये सारे काम प्रभू के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। 3। (हे जिंदे ! यदि सदा ऐसे ही काम करते रहना है। और नाम नहीं सिमरना तो फिर) मन में गिला ना करना। जम को दोष ना देना (कि वह क्यों आ गया है; इन कामों से जम से खलासी नहीं मिलनी); (हे जिंदे !) पवित्र। वासना-रहित अवस्था के साथ जान-पहचान डाल। नामदेव विनती करता है (सब रसों का) मूल-रस नाम-अमृत ही पीना चाहिए। ये नाम-अमृत ही मेरा (नामदेव का) राजा रामचंद्र है। जो राजा दशरथ का पुत्र है। 4। 4।
रामकली बाणी रविदास जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसै ॥ लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे जउ पारसहि न परसै ॥1॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: रामकली बाणी रविदास जी की सतिगुर प्रसादि॥ हर जगह प्रभू का नाम पढ़ते (भी) हैं। सुनते (भी) हैं और विचारते (भी) हैं (भाव। सब जीव प्रभू का नाम पढ़ते हैं। विचारते हैं और सुनते हैं; पर कामादिकों के कारण मन मेंसंशय की गाँठ बनी रहने के कारण। इनके अंदर) प्रभू का प्यार पैदा नहीं होता। प्रभू के दर्शन नहीं होते; (दर्शन हों भी तो कैसे। कामादिकों के कारण। मन के साथ प्रभू की छूह ही नहीं बनती। और) जब तक लोहा पारस से ना छूए। तब तक ये शुद्ध सोना कैसे बन सकता है। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “क्योंकि मैं अविनाशी ठिकाने वाले निरंकार में जुड़ के (उसके प्यार की) एक-रस बाँसुरी बजा रहा हूँ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।