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अंग ९७१ · रामकली

अंग
971
रामकली
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  1. गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥
  2. जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥
  3. बंधचि बंधनु पाइआ ॥

गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥

अंग ९७० से चला आ रहा अंश

गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥
जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै ॥
आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै ॥2॥
जिह घरि कथा होत हरि संतन इक निमख न कीन॑ो मै फेरा ॥
लंपट चोर दूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा ॥3॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर ए संपै मो माही ॥
दइआ धरमु अरु गुर की सेवा ए सुपनंतरि नाही ॥4॥
दीन दइआल क्रिपाल दमोदर भगति बछल भै हारी ॥
कहत कबीर भीर जन राखहु हरि सेवा करउ तुम॑ारी ॥5॥8॥

हिन्दी अर्थ: हे गोबिंद ! हम जीव ऐसे विकारी हैं कि जिस आप प्रभू ने ये जीवात्मा और शरीर दिया उसकी बँदगी नहीं की। उससे प्यार नहीं किया। 1। रहाउ। (हे गोबिंद !) पराए धन (की लालसा)। पराई स्त्री (की कामना)। पराई चुग़ली। दूसरों से विरोध- ये विकार दूर नहीं होते। बार-बार जनम-मरण का चक्कर (हमें) मिल रहा है- फिर भी पर मन। पर तन आदि का ये लंबा सिलसिला खत्म नहीं होता। 2। जिन जगहों में प्रभू के भगत मिल के प्रभू की सिफत-सालाह करते हैं। वहाँ मैं एक पलक के लिए भी फेरा नहीं मारता। पर विषयी। चोर। बदमाश। शराबी- इनके साथ मेरा साथ रहता है। 3। काम। क्रोध। माया का मोह। अहंकार। ईष्या- मेरे पल्ले। बस ! यही धन है। दया। धर्म। सतिगुरू की सेवा- मुझे इनका विचार कभी सपने में भी नहीं आया। 4। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे कृपालु ! हे दामोदर ! हे भगती से प्यार करने वाले ! हे भय हरण ! कबीर कहता है- मुझ दास को (विकारों की) बिपता में से बचा ले। मैं (नित्य) आपकी ही बँदगी करूँ। 5। 8।

जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥

जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥
जाहि बैकुंठि नही संसारि ॥
निरभउ कै घरि बजावहि तूर ॥
अनहद बजहि सदा भरपूर ॥1॥
ऐसा सिमरनु करि मन माहि ॥
बिनु सिमरन मुकति कत नाहि ॥1॥ रहाउ ॥
जिह सिमरनि नाही ननकारु ॥
मुकति करै उतरै बहु भारु ॥
नमसकारु करि हिरदै माहि ॥
फिरि फिरि तेरा आवनु नाहि ॥2॥
जिह सिमरनि करहि तू केल ॥
दीपकु बांधि धरिओ बिनु तेल ॥
सो दीपकु अमरकु संसारि ॥
काम क्रोध बिखु काढीले मारि ॥3॥
जिह सिमरनि तेरी गति होइ ॥
सो सिमरनु रखु कंठि परोइ ॥
सो सिमरनु करि नही राखु उतारि ॥
गुर परसादी उतरहि पारि ॥4॥
जिह सिमरनि नाही तुहि कानि ॥
मंदरि सोवहि पटंबर तानि ॥
सेज सुखाली बिगसै जीउ ॥
सो सिमरनु तू अनदिनु पीउ ॥5॥
जिह सिमरनि तेरी जाइ बलाइ ॥
जिह सिमरनि तुझु पोहै न माइ ॥
सिमरि सिमरि हरि हरि मनि गाईऐ ॥
इहु सिमरनु सतिगुर ते पाईऐ ॥6॥
सदा सदा सिमरि दिनु राति ॥
ऊठत बैठत सासि गिरासि ॥
जागु सोइ सिमरन रस भोग ॥
हरि सिमरनु पाईऐ संजोग ॥7॥
जिह सिमरनि नाही तुझु भार ॥
सो सिमरनु राम नाम अधारु ॥
कहि कबीर जा का नही अंतु ॥
तिस के आगे तंतु न मंतु ॥8॥9॥

हिन्दी अर्थ: जिस सिमरन की बरकति से मुक्ति का दर दिखाई दे जाता है। (उस रास्ते) आप प्रभू के चरणों में जा पहुँचेगा। संसार (-समुंद्र) में नहीं (भटकेगा); जिस अवस्था में कोई डर नहीं छूता। उसमें पहुँच के आप (आत्मिक आनंद के। मानो) बाजे बजाएगा। वह बाजे (आपके अंदर) सदा एक-रस बजेंगे। (उस आनंद में) कोई कमी नहीं आएगी। 1। हे भाई ! आप अपने मन में ऐसा (बल रखने वाला) सिमरन कर प्रभू का सिमरन किए बिना किसी भी अन्य तरीके से (माया के बँधनों) से निजात नहीं मिलती । 1। रहाउ। जिस सिमरन से (विकार आपके राह में) रुकावट नहीं डाल सकेगे। वह सिमरन (माया के बँधनों से) आजाद कर देता है। (विकारों का) बोझ (मन से) उतर जाता है। प्रभू को सदा सिर झुका। ता कि बार-बार आपको (जगत में) आना ना पड़े। 2। (हे भाई !) जिस सिमरन से आप आनंद ले रहे हैं (भाव। चिंता आदि से बचे रहते हैं)। आपके अंदर सदा (ज्ञान का) दीपक जलता रहता है। (विकारों के) तेल (वाला दीया) नहीं रहता। वह दीया (जिस मनुष्य के अंदर जग जाए उसको) संसार में अमर कर देता है। काम-क्रोध आदि के जहर को (अंदर से) मार के निकाल देता है। 3। जिस सिमरन की बरकति से आपकी उच्च आत्मिक अवस्था बनती है। आप उस सिमरन (रूपी माला) को परो के सदा गले में डाले रख। (कभी भी गले से) उतार के ना रखना। सदा सिमरन कर। गुरू की मेहर से (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। 4। (हे भाई !) जिस सिमरन से आपको किसी की मुथाजी नहीं रहती। अपने घर में बे-फिक्र हो के सोता है। हृदय में सुख है। जीवात्मा खिली रहती है। ऐसा सिमरन-रूपी अमृत हर वक्त पीता रह। 5। जिस सिमरन के कारण आपका आत्मिक रोग काटा जाता है। आपको माया नहीं सताती। हे भाई ! सदा ये सिमरन कर। अपने मन में हरी की सिफत-सालाह कर (पर। गुरू की शरण पड़)। ये सिमरन गुरू से ही मिलता है। 6। हे भाई ! सदा दिन-रात। उठते-बैठते। खाते हुए। साँस लेते हुए। सोते हुए हर वक्त सिमरन का रस ले। (हे भाई !) प्रभू का सिमरन सौभाग्य से मिलता है। 7। जिस सिमरन से आपके ऊपर से (विकारों का) बोझ उतर जाएगा। प्रभू के नाम के उस सिमरन को (अपनी जीवात्मा का) आसरा बना। कबीर कहता है- उस प्रभू के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। (उसकी याद के बिना) कोई और मंत्र। कोई और टूणा-टटका उसके सामने नहीं चल सकता (किसी और ढंग-तरीके से उसको मिला नहीं जा सकता)। 8। 9।

बंधचि बंधनु पाइआ ॥

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रामकली घरु 2 बाणी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंधचि बंधनु पाइआ ॥
मुकतै गुरि अनलु बुझाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली घरु 2 बाणी कबीर जी की सतिगुर प्रसादि॥ (माया से) मुक्त गुरू ने माया को रोक लगा दी है। मेरी तृष्णा की आग बुझा दी है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 971 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९७१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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