अंग
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सूही
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किआ तू सोइआ जागु इआना ॥
किआ तू सोइआ जागु इआना ॥
तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अंबरावै ॥
सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम॑ारि सवेरा ॥2॥
जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥
सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥
कहि रविदास निदानि दिवाने ॥
चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥3॥2॥
तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अंबरावै ॥
सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम॑ारि सवेरा ॥2॥
जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥
सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥
कहि रविदास निदानि दिवाने ॥
चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: हे अंजान ! होश कर ! आप क्यों सो रहे हैं। आप जगत में इस जीवन को सदा कायम रहने वाला समझ बैठे हैं। 1।रहाउ। (आप हर वक्त रिजक की ही फिक्र में रहते हैं।देख) जिस प्रभू ने जिंद दी है।वह रिजक भी पहुँचाता है। सारे शरीरों में बैठा हुआ वह स्वयं रिजक के आहर पैदा कर रहा है। मैं (इतना बड़ा हॅूँ) मेरी (इतनी मल्कियत है) - छोड़ ये बातें।प्रभू की बंदगी कर। अब वक्त रहते उसका नाम अपने दिल में संभाल। 2। उम्र बीतने पर आ रही है।पर आपने अपना राह सही नहीं बनाया; शाम पड़ रही है।हर तरफ अंधकार ही अंधकार छाने वाला है। रविदास कहता है, हे कमले मनुष्य ! आप प्रभू को याद नहीं करते। दुनिया (जिससे आप मन जोड़े बैठे हैं) अंत में नाश हो जाने वाली है। 3। 2।
सूही ॥
सूही ॥
ऊचे मंदर साल रसोई ॥
एक घरी फुनि रहनु न होई ॥1॥
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥1॥ रहाउ ॥
भाई बंध कुटंब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥2॥
घर की नारि उरहि तन लागी ॥
उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥3॥
कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥
हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥4॥3॥
ऊचे मंदर साल रसोई ॥
एक घरी फुनि रहनु न होई ॥1॥
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥1॥ रहाउ ॥
भाई बंध कुटंब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥2॥
घर की नारि उरहि तन लागी ॥
उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥3॥
कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥
हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: सूही ॥ (अगर) ऊँचे-ऊँचे पक्के घर व रसोईखाने हों (तो भी क्या हुआ।) मौत आने से (इनमें) एक घड़ी भी (ज्यादा) रहने को नहीं मिलता। 1। (पक्के घर आदि तो कहाँ रहे) ये शरीर (भी) घास के छप्पर की तरह ही है। घास जल जाती है।और मिट्टी में मिल जाती है (यही हाल शरीर का होता है)। 1।रहाउ। (जब मनुष्य मर जाता है तब) रिश्तेदार।परिवार।सज्जन। साथी - ये सभी कहने लग जाते हैं कि इसे अब जल्दी बाहर निकालो। 2। अपनी पत्नी (भी) जो सदा (मनुष्य) के साथ लगी रहती थी। ये कह के परे हट जाती है ये तो अब मर गया है।मर गया। 3। रविदास कहता है, सारा जगत ही (शरीर को।जायदाद को।संबन्धियों को अपना समझ के) ठगा जा रहा है। पर मैं एक परमात्मा का नाम सिमर के (इस ठगी से) बचा हूँ। 4। 3।
रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥
तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥
बावलि होई सो सहु लोरउ ॥
तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥
मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥1॥
तै साहिब की मै सार न जानी ॥
जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥1॥ रहाउ ॥
काली कोइल तू कित गुन काली ॥
अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥
पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥
जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥2॥
विधण खूही मुंध इकेली ॥
ना को साथी ना को बेली ॥
करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥
जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥3॥
वाट हमारी खरी उडीणी ॥
खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥
उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥
सेख फरीदा पंथु सम॑ारि सवेरा ॥4॥1॥
रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥
तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥
बावलि होई सो सहु लोरउ ॥
तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥
मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥1॥
तै साहिब की मै सार न जानी ॥
जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥1॥ रहाउ ॥
काली कोइल तू कित गुन काली ॥
अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥
पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥
जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥2॥
विधण खूही मुंध इकेली ॥
ना को साथी ना को बेली ॥
करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥
जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥3॥
वाट हमारी खरी उडीणी ॥
खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥
उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥
सेख फरीदा पंथु सम॑ारि सवेरा ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥ बड़ी दुखी हो के।बड़ी तड़फ के अब मैं हाथ मल रही हूँ। पागल हो के अब मैं उस पति को तलाशती फिरती हूँ। हे पति प्रभू ! आपका कोई दोष (मेरी इस बुरी हालत के लिए) नहीं। मेरे में ही अवगुण थे।तभी आपने अपने मन में मेरे साथ रोष किया। 1। हे मेरे मालिक ! मैंने आपकी कद्र नहीं जानी। जवानी का समय गवा के अब बाद में मैं झुर रही हूँ। 1।रहाउ। (अब मैं कोयल को पूछती फिरती हूँ-) हे काली कोयल ! (भला।मैं तो अपने कर्मों की मारी दुखी जली सड़ी हुई हूँ) आप भी क्यों काली (हो गई) हैं। (कोयल भी यही उक्तर देती है) मुझे मेरे प्रीतम के विछोड़े ने जला डाला है। (ठीक है) पति से विछुड़ के कहीं कोई सुख पा सकी है।(पर। जीव-स्त्री के वश की भी बात नहीं) जब प्रभू खुद मेहरवान होता है तो खुद ही मिला लेता है। 2। (इस जगत रूप) डरावने कूएं में मैं जीव-स्त्री अकेली (गिर गई थी। यहाँ) कोई मेरा साथी नहीं (मेरे दुखों में) कोई मेरा मददगार नहीं। अब जब प्रभू ने मेहर करके मुझे सत्संग में मिलाया है। (सत्संग में आ के) जब मैं देखती हूँ तो मुझे मेरा रॅब बेली दिख रहा है। 3। हे भाई ! हमारा यह जीवन-पथ बहुत भयावह है। खंडे से भी तीखा है। बड़ी तेज धार वाला है; इसके ऊपर से हमें गुजरना है।इस वास्ते। हे फरीद ! सुबह-सुबह रास्ता संभाल। 4। 1।
सूही ललित ॥
सूही ललित ॥
बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥
भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥1॥
हथु न लाइ कसुंभड़ै जलि जासी ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
इक आपीन॑ै पतली सह केरे बोला ॥
दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥2॥
कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥
हंसु चलसी डुंमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥3॥2॥
बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥
भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥1॥
हथु न लाइ कसुंभड़ै जलि जासी ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
इक आपीन॑ै पतली सह केरे बोला ॥
दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥2॥
कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥
हंसु चलसी डुंमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: सूही ललित ॥ (जिस मनुष्य ने माया से ही मन लगाए रखा) वह (बेड़ा) तैयार करने की उम्र में नाम-रूप बेड़ा तैयार ना कर सका।और। जब सरोवर (लबालब) भर के (बाहर) उछलने लग पड़ता है तब इसमें तैरना मुश्किल हो जाता है (भाव।जब मनुष्य विकारों की अति कर देता है तो इनके चस्के में से निकलना दुश्वार हो जाता है)। 1। हे सज्जन ! दगाबाज माया के साथ ही अपने मन को ना जोड़े रख।ये माया चार दिन की खेल है। 1। जो जीव-सि्त्रयाँ (माया से मोह डालने के कारण) अपने आप में कमजोर आत्मिक जीवन वाली हो जाती हैं।उनको (प्रभू-) पति के दर से निरादरी के बोल नसीब होते हैं; उनपे पति के मिलाप की अवस्था नहीं आती और मानस जन्म का समय हाथ से छूट जाने पर (जब नाम-सिमरन का बेड़ा तैयार हो सकता था) प्रभू से मेल नहीं हो सकता। 2। फरीद कहता है, हे सहेलियो ! जब पति-प्रभू का बुलावा (इस जगत में से चलने के लिए) आएगा। तो (माया में ही ग्रसी रहने वाली जीव-स्त्री का) आत्मा-हंस दुबिधा में (दुचिती में यहाँ से) जाएगा (भाव।माया से विछुड़ने का चित्त नहीं करेगा)। 3। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत रविदास जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७९४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।