Lulla Family

अंग 795

अंग
795
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला 1 चउपदे घरु 1 ॥
तू सुलतानु कहा हउ मीआ तेरी कवन वडाई ॥
जो तू देहि सु कहा सुआमी मै मूरख कहणु न जाई ॥1॥
तेरे गुण गावा देहि बुझाई ॥
जैसे सच महि रहउ रजाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो किछु होआ सभु किछु तुझ ते तेरी सभ असनाई ॥
तेरा अंतु न जाणा मेरे साहिब मै अंधुले किआ चतुराई ॥2॥
किआ हउ कथी कथे कथि देखा मै अकथु न कथना जाई ॥
जो तुधु भावै सोई आखा तिलु तेरी वडिआई ॥3॥
एते कूकर हउ बेगाना भउका इसु तन ताई ॥
भगति हीणु नानकु जे होइगा ता खसमै नाउ न जाई ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है,वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति सदा शाश्वत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है,उसे गुरु-कृपा से पाया जा सकता है। रागु बिलावलु महला 1 चउपदे घरु 1 ॥ हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह करके मैं आपकी वडिआई नहीं कर रहा।(यह तो यूँ ही है कि) आप बादशाह है।और मैं आपको मीयाँ कह रहा हूँ।(पर। इतनी सिफत सालाह करनी मेरी अपनी समर्था नहीं है) हे मालिक प्रभू ! (सिफत सालाह करने का) जितना बल आप देता है मैं उतना आपके गुण कह लेता हूँ।मुझ अन्जान से आपके गुण बयान नहीं हैं सकते। 1। मुझे (ऐसी) समझ दे कि मैं आपकी सिफत-सालाह कर सकूँ और सिफत-सालाह की बरकति से मैं आपके (चरणों) में टिका रह सकूँ, हे रजा के मालिक प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला है । 1।रहाउ। ये जितना जगत बना हुआ है ये सारा आपसे ही बना है।ये सारी आपकी ही बुजुर्गी है। हे मालिक प्रभू ! मैं आपके गुणों का अंत नहीं जान सकता।मैं अंधा हूँ (तुच्छ बुद्धि हूँ) मेरे में कोई समझदारी नहीं है (कि मैं आपके गुणों का अंत जान सकूँ)। 2। मैं आपके गुण बिल्कुल नहीं कह सकता।आपके गुण कह-कह के जब मैं देखता हूँ (तो मुझे समझ आ जाती है कि) आपका स्वरूप बयान से परे है।मैं बयान करने के लायक नहीं हूँ। आपकी थोड़ी सी उपमा भी जो मैं करता हूँ वही कहता हूँ जो आपको भाती है (भाव।जितनी आप बयान करने की खुद ही समझ देता है)। 3। (हे प्रभू ! यहाँ कामादिक) अनेकों कुत्ते हैं।मैं (इनमें) बाहर का बेगाना सा (आ के फसा) हूँ।(जितनी भी आपकी सिफत-सालाह करता हूँ वह भी मैं) अपने इस शरीर को (कामादिक कुक्तों से बचाने के लिए भौंकता ही हूँ।जैसे बाहरी कुक्ता वैरी कुक्तों से बचने के लिए भौंकता है)। (मुझे ये धरवास है कि) अगर (आपका दास) नानक भक्ति से वंचित है (तो भी आप मेरे सिर पर रखवाला पति है।और आप) पति की ये शोभा दूर नहीं हैं गई (कि आप आदि युगों से शरण आए हुओं की सहायता करता आया है)। 4। 1।
बिलावलु महला 1 ॥
मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ॥
एकु सबदु मेरै प्रानि बसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा ॥1॥
मनु बेधिआ दइआल सेती मेरी माई ॥
कउणु जाणै पीर पराई ॥
हम नाही चिंत पराई ॥1॥ रहाउ ॥
अगम अगोचर अलख अपारा चिंता करहु हमारी ॥
जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा घटि घटि जोति तुम॑ारी ॥2॥
सिख मति सभ बुधि तुम॑ारी मंदिर छावा तेरे ॥
तुझ बिनु अवरु न जाणा मेरे साहिबा गुण गावा नित तेरे ॥3॥
जीअ जंत सभि सरणि तुम॑ारी सरब चिंत तुधु पासे ॥
जो तुधु भावै सोई चंगा इक नानक की अरदासे ॥4॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ मेरा मन (प्रभू देव के रहने के लिए) मन्दिर (बन गया) है।मेरा शरीर (भाव।मेरी हरेक ज्ञान-इन्द्रीय मन्दिर की यात्रा करने वाला) रमता साधू बन गया है (भाव।मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ बाहर भटकने की जगह अंदर बसते परमात्मा की ओर पलट आई हैं)।अब मैं हृदय-तीर्थ पर स्नान करता हूँ। परमात्मा की सिफत सालाह का शबद मेरी जिंद में टिक गया है (मेरी जिंद का आसरा बन गया है।इस वास्ते मुझे यकीन हो गया है कि) मैं दोबारा जनम में नहीं आऊँगा। 1। हे मेरी माँ ! (मेरा) मन दया-के-घर प्रभू (के चरणों) में भेदा गया है। क्योंकि मुझे यकीन हो गया है कि (परमात्मा के बिना) कोई और किसी दूसरे का दुख-दर्द नहीं समझ सकता। इसीलिए अब मैं (प्रभू के बिना) किसी और की आस नहीं रखता।1।रहाउ। हे अपहुँच ! हे अगोचर ! हे अदृश्य ! हे बेअंत प्रभू् ! आप ही हमारी सब जीवों की संभाल करता है। आप जल में।धरती में।आकाश में हर जगह नाकोनाक व्यापक है।हरेक (जीव के) हृदय में आपकी ज्योति मौजूद है। 2। हे मेरे मालिक-प्रभू ! सब जीवों के मन और शरीर आपके ही रचे हुए हैं।शिक्षा।बुद्धि।समझ सभ जीवों को आपसे ही मिलती है। आपके बराबर का मैं किसी और को नहीं जानता।मैं नित्य आपके ही गुण गाता हूँ। 3। सारे जीव-जंतु आपके ही आसरे हैं।आपको ही सबकी संभाल का फिक्र है। नानक की (आपके दर पर) सिर्फ यही विनती है कि जो आपकी रजा में हैं वही मुझे अच्छा लगे (मैं सदा आपकी रजा में राजी रहूँ)। 4। 2।
बिलावलु महला 1 ॥
आपे सबदु आपे नीसानु ॥
आपे सुरता आपे जानु ॥
आपे करि करि वेखै ताणु ॥
तू दाता नामु परवाणु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ (जिस मनुष्य को नाम की दाति मिल जाती है उसे यह यकीन बन जाता है कि प्रभू) स्वयं ही सिफत-सालाह है (भाव।जहाँ उसकी सिफत-सालाह होती है वहाँ वह मौजूद है)।स्वयं ही (जीव के लिए जीवन-यात्रा में) राहदारी है। प्रभू खुद ही (जीवों की अरदासें) सुनने वाला है।खुद ही (जीवों के दुख-दर्द) जानने वाला है। प्रभू स्वयं ही जगत-रचना रच के खुद ही अपना (यह) बल देख रहा है। हे प्रभू ! आप (जीवों को सबि दातें) देने वाला है।(जिसको आप अपना नाम बख्शता है।वह आपके दर पर) कबूल हैं जाता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है,वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति सदा शाश्वत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है,उसे गुरु।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।