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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

वाणी: रविदास

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वाणी

भगत रविदास

1450-1520 (परंपरा) · बनारस · 41 शबद

"मन चंगा तो कठौती में गंगा।" इस एक वाक्य ने पूरी ज़ाति-व्यवस्था की परंपरा को सात शब्दों में जवाब दे दिया। रविदास बनारस के चमड़ा-दुकानदार थे। समाज ने उन्हें "अछूत" कहा। उन्होंने जवाब में हरि-नाम पर 41 शबदों का एक पूरा वाणी-संग्रह खड़ा कर दिया, जो 500 साल बाद आदि ग्रंथ की मान्य वाणी है।

परंपरा कहती है रविदास मीराबाई के गुरु थे। दोनों ने जाति की जकड़न को भक्ति से तोड़ा। आज पंजाब में रविदासिया समाज (1 करोड़ से अधिक लोग) उन्हीं की आध्यात्मिक परंपरा पर टिका है।

उनकी वाणी का स्वर एक ख़ास गरिमा लिए रहता है। वह आत्म-दया और सफ़ाई, दोनों से बची रहती है, और बस इतना कहती है: यह दिख रहा है, यह बोल रहा हूँ।

आदि ग्रंथ में इनके शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।

सिरी राग (1)
  1. तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥अंग 93
गउड़ी (4)
  1. मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥अंग 345
  2. घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥अंग 345
  3. कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥अंग 346
  4. सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥अंग 346
आसा (5)
  1. म्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥अंग 486
  2. संत तुझी तनु संगति प्रान ॥अंग 486
  3. तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥अंग 486
  4. कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु ॥अंग 486
  5. हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे ॥अंग 487
गूजरी (1)
  1. दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥अंग 525
सोरठ (6)
  1. जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥अंग 657
  2. जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥अंग 658
  3. दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥अंग 658
  4. सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥अंग 658
  5. जल की भीति पवन का थंभा रकत बुंद का गारा ॥अंग 659
  6. चमरटा गांठि न जनई ॥अंग 659
धनासरी (3)
  1. धनासरी भगत रविदास जी कीअंग 694
  2. चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥अंग 694
  3. नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥अंग 694
जैतसरी (1)
  1. नाथ कछूअ न जानउ ॥अंग 710
सूही (3)
  1. सह की सार सुहागनि जानै ॥अंग 793
  2. जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥अंग 793
  3. ऊचे मंदर साल रसोई ॥अंग 794
बिलावल (2)
  1. दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥अंग 858
  2. जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥अंग 858
गोंड (2)
  1. मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥अंग 875
  2. जे ओहु अठसठि तीरथ न॑ावै ॥अंग 875
रामकली (1)
  1. पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसै ॥अंग 973
मारू (2)
  1. ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥अंग 1106
  2. सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥अंग 1106
केदारा (1)
  1. खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥अंग 1124
भैरों (1)
  1. बिनु देखे उपजै नही आसा ॥अंग 1167
बसंत (1)
  1. तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥अंग 1196
मलार (3)
  1. नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चंमारं ॥अंग 1293
  2. हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ ॥अंग 1293
  3. मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते ॥अंग 1293