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653
सोरठ
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- नानक भए पुनीत हरि तीरथि नाइआ ॥26॥
- गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
- सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
- गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
- ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
- नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
- सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
- ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
- आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
- तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
नानक भए पुनीत हरि तीरथि नाइआ ॥26॥
नानक भए पुनीत हरि तीरथि नाइआ ॥26॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (ऐसे मनुष्य) हरी (के भजन रूप) तीर्थ में नहाते हैं और पवित्र हो जाते हैं। 26।
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
सलोकु मः 4 ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥1॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ अगर मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख है उसके अंदर ठंढ है और वह मन से तन से नाम में लीन रहता है। वह नाम ही चितवता है। नाम ही पढ़ता है और नाम में ही बिरती जोड़े रखता है। नाम (रूपी) सुंदर वस्तु पा के उसकी चिंताएं दूर हो जाती है। यदि गुरू मिल जाए तो नाम (हृदय में) अंकुरित होता है। तृष्णा दूर हो जाती है (माया की) सारी भूख दूर हो जाती है। हे नानक ! नाम में रंगे जाने के कारण नाम ही (हृदय रूप) पल्ले में उकर जाता है। 1।
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
मः 4 ॥
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥
ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥
किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥
वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥
एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥2॥
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥
ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥
किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥
वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥
एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिस मनुष्य को गुरू परमेश्वर ने मारा है (भाव। जिसे रॅब के राह से बिल्कुल ही नफ़रत है) वह भ्रम में भटकता हुआ अपने ठिकाने से हिल जाता है। उसके पीछे लोग फकॅड़ी बजाते हैं और आगे (जहाँ भी जाता है) मुँह कालिख कमाता है। उसके मुँह से निरी बकवास ही निकलती है और वह सदा निंदा करके दुखी होता रहता है। किसी के करने से कुछ होने वाला नहीं है (भाव। कोई उसे सद्बुद्धि नहीं दे सकता)।क्योंकि धुर से ही (किए बुरे कर्मों के संस्कारों के तहत अब भी) ऐसी ही (भाव। निंदनीय) कमाई करनी पड़ रही है। वह (मनमुख) जहाँ भी जाता है वहीं झूठा होता है। झूठ बोलता है और किसी को अच्छा नहीं लगता। हे संत जनो ! प्यारे मालिक प्रभू की महिमा देखो। कि जैसी कोई कमाई करता है। वैसा ही उसे फल मिलता है। ये सच्ची विचार सच्ची दरगाह में होती है। दास नानक पहले ही आपको ये कह के सुना रहा है (ताकि भले बीज बीज के भले फल की आशा की जा सके)। 2।
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
पउड़ी ॥
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥
गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥
गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥
नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥27॥
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥
गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥
गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥
नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥27॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सच्चे सतिगुरू ने (सत्संग रूप) गाँव बसाया है। (उस गाँव के लिए सत्संगी) रखवाले भी सतिगुरू ने ही दिए हैं। जिनके मन गुरू के चरणों में जुड़े हैं। उनकी आस पूरी हो गई है (भाव। तृष्णा मिट गई है); दयालु और बेअंत गुरू ने उनके सारे पाप नाश कर दिए हैं; अपनी मेहर करके सतिगुरू ने उनको अपना बना लिया है। हे नानक ! मैं सदा उस सतिगुरू से सदके हूँ। जिसमें इतने गुण हैं। 27।
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
सलोक मः 1 ॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥1॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे पण्डित ! इस वक्त (झुरने से) कुछ नहीं बनता;प्रभू की रजा में (अपने ही पिछले किए के अनुसार) लिखे (लेख) मिलते हैं; जब प्रभू का हुकम हुआ तब ये फैसला हुआ और (उस लेख के अनुसार) जीव (करम) कमाते फिरते हैं। 1।
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
मः 2 ॥
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
जहा दाणे तहां खाणे नानका सचु हे ॥2॥
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
जहा दाणे तहां खाणे नानका सचु हे ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! जीव के नाक में (रजा की) नाथ (नकेल) है जो खसम प्रभू के (अपने) हाथ में है। पिछले किए हुए कर्मों के अनुसार बना हुआ स्वभाव (निहित कर्म) धक्के दे के चला रहे हैं। सच ये है कि जहाँ जीव का दाना-पानी होता है वहाँ खाना पड़ता है। 2।
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
पउड़ी ॥
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
आपे रचनु रचाइ आपे ही घालिओनु ॥
आपे जंत उपाइ आपि प्रतिपालिओनु ॥
दास रखे कंठि लाइ नदरि निहालिओनु ॥
नानक भगता सदा अनंदु भाउ दूजा जालिओनु ॥28॥
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
आपे रचनु रचाइ आपे ही घालिओनु ॥
आपे जंत उपाइ आपि प्रतिपालिओनु ॥
दास रखे कंठि लाइ नदरि निहालिओनु ॥
नानक भगता सदा अनंदु भाउ दूजा जालिओनु ॥28॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू ने खुद ही सारे (जगत की) विउंते बना के कायम की हैं; खुद ही संसार की रचना करके खुद ही नाश करता है; खुद ही जीवों को पैदा करता है और खुद ही पालता है; खुद ही अपने सेवकों को गले से लगा के रखता है। खुद ही मेहर की नजर से देखता है। हे नानक ! भक्तों को सदा प्रसन्नता रहती है। (क्योंकि) उनका माया का प्यार उस प्रभू ने खुद जला दिया है। 28।
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
सलोकु मः 3 ॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥
हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥1॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥
हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे मन ! प्यार से एकाग्रचित्त हो के हरी का सिमरन कर; हरी में ये हमेशा के लिए गुण हैं कि दातें दे के पछताता नहीं। मैं हरी से सदा कुर्बान हूँ। जिसकी सेवा करने से सुख मिलता है; हे नानक ! गुरमुख जन अहंकार को सतिगुरू के शबद के द्वारा जला के हरी में मिले रहते हैं। 1।
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
मः 3 ॥
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥
नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥2॥
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥
नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हरी ने खुद ही मनुष्यों को सेवा में लगाया है। खुद ही बख्शिश करता है। खुद ही सबका माँ-बाप है और खुद ही सबकी संभाल करता है। हे नानक ! जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे अपने ठिकाने पर टिके हुए हैं। हरेक युग में उनकी शोभा होती है। 2।
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
पउड़ी ॥
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे करतार ! आप सारी कुदरत के रचयिता हैं;आपके बिना आपके जितना कोई और मुझे नहीं दिखता;
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 2: गुरु अंगद देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 653 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।