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महला 2, गुरु अंगद देव जी
गुरु अंगद का असली नाम भाई लहिणा था। नानक से मिले 1532 में। मिलते ही नानक ने पहचान लिया कि यह व्यक्ति उत्तराधिकारी होने के योग्य है। नाम बदल कर "अंगद" (मेरा अंग) रखा। 1539 में नानक ने उनको गुरुगद्दी सौंपी, अपने बेटों को नहीं।
यह फ़ैसला बहुत क्रांतिकारी था। उस वक़्त की आध्यात्मिक परंपरा में गद्दी ख़ून के रिश्ते से आगे जाती थी। नानक ने योग्यता के आधार पर उत्तराधिकार की रीत डाल दी, और यही रीत आगे 10 गुरुओं तक चली।
उनका सबसे बड़ा योगदान: गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित रूप दिया। पंजाबी अब एक बाक़ायदा लिपि में लिखी जा सकती थी, जो संस्कृत की देवनागरी से अलग थी, फ़ारसी की शाहमुखी से अलग थी, और आम लोग जिसे आसानी से पढ़ सकते थे।
आदि ग्रंथ में महला 2 के सिर्फ़ 62 सलोक हैं, मुख्यत: वारों में पिरोए हुए। मगर हर सलोक कसा हुआ है, एक-दो पंक्तियों में एक पूरी बात।
महला 2 के सलोक बिखरे हैं, मुख्यत: इन वारों में:
- आसा-दी-वार में महला 2 के सलोकअंग 462-475
- मलार-की-वार में महला 2अंग 1278-1280
- सूही-की-वार में महला 2अंग 787-792
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
सिरी राग (2)
माझ (12)
- देंदे थावहु दिता चंगा मनमुखि ऐसा जाणीऐ ॥अंग 138
- अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥अंग 139
- दिसै सुणीऐ जाणीऐ साउ न पाइआ जाइ ॥अंग 139
- सेई पूरे साह जिनी पूरा पाइआ ॥अंग 146
- अठी पहरी अठ खंड नावा खंडु सरीरु ॥अंग 146
- पउणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥अंग 146
- आखणु आखि न रजिआ सुनणि न रजे कंन ॥अंग 147
- मंत्री होइ अठूहिआ नागी लगै जाइ ॥ आपण हथी आपणै दे कूचा आपे लाइ ॥अंग 148
- नानक परखे आप कउ ता पारखु जाणु ॥अंग 148
- निहफलं तसि जनमसि जावतु ब्रहम न बिंदते ॥अंग 148
- अगी पाला कि करे सूरज केही राति ॥अंग 150
- दीखिआ आखि बुझाइआ सिफती सचि समेउ ॥अंग 150
आसा (21)
- जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार ॥अंग 463
- इहु जगु सचै की है कोठड़ी सचे का विचि वासु ॥अंग 463
- नानक जीअ उपाइ कै लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥अंग 463
- हउमै एहा जाति है हउमै करम कमाहि ॥अंग 466
- सेव कीती संतोखीइंी जिन॑ी सचो सचु धिआइआ ॥अंग 466
- जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं ब्राहमणह ॥अंग 469
- एक क्रिसनं सरब देवा देव देवा त आतमा ॥अंग 469
- एह किनेही आसकी दूजै लगै जाइ ॥अंग 474
- सलामु जबाबु दोवै करे मुंढहु घुथा जाइ ॥अंग 474
- जितु सेविऐ सुखु पाईऐ सो साहिबु सदा सम॑ालीऐ ॥अंग 474
- चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥अंग 474
- जो जीइ होइ सु उगवै मुह का कहिआ वाउ ॥अंग 474
- नालि इआणे दोसती कदे न आवै रासि ॥अंग 474
- नालि इआणे दोसती वडारू सिउ नेहु ॥अंग 474
- होइ इआणा करे कंमु आणि न सकै रासि ॥अंग 474
- चाकरु लगै चाकरी जे चलै खसमै भाइ ॥अंग 474
- एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥अंग 474
- एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥अंग 475
- नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥अंग 475
- आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥अंग 475
- वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥अंग 475
सोरठ (1)
- नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥अंग 653
सूही (11)
- जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥अंग 787
- राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥अंग 787
- बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥अंग 787
- मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥अंग 787
- जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥अंग 788
- तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥अंग 788
- नानक तिना बसंतु है जिन॑ घरि वसिआ कंतु ॥अंग 791
- पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥अंग 791
- मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥अंग 791
- किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥अंग 791
- जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥अंग 792
रामकली (7)
मारू (1)
- आपे जाणै करे आपि आपे आणै रासि ॥अंग 1093
सारंग (9)
- गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥अंग 1237
- आपि उपाए नानका आपे रखै वेक ॥अंग 1238
- साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि ॥अंग 1238
- जिन वडिआई तेरे नाम की ते रते मन माहि ॥अंग 1238
- कीता किआ सालाहीऐ करे सोइ सालाहि ॥अंग 1239
- तिसु सिउ कैसा बोलणा जि आपे जाणै जाणु ॥अंग 1239
- सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥अंग 1239
- कथा कहाणी बेदंी आणी पापु पुंनु बीचारु ॥अंग 1243
- जैसा करै कहावै तैसा ऐसी बनी जरूरति ॥अंग 1245