इस पृष्ठ पर
महला 4, गुरु राम दास जी
1534-1581 · चौथे गुरु · अमृतसर के संस्थापक · 638 शबद
गुरु राम दास का असली नाम भाई जेठा था, अमर दास जी के दामाद। 1574 में गुरुगद्दी मिली। पहला बड़ा काम: एक नया शहर बसाना। "रामदासपुर" नाम था पहले। आज उसे हम अमृतसर कहते हैं।
उन्होंने अमृत-सरोवर (पवित्र ताल) खुदवाया, और उसी के बीच में हरमंदिर साहिब की नींव रखी। यह फ़ैसला प्रतीकात्मक था, गुरु ने मंदिर को धरती के स्तर पर रखा, ऊँचाई पर नहीं। नीचे जा कर ही ऊपर पहुँचा जाता है।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना "लावां" है, चार छंदों का विवाह-गीत। आज भी हर सिख शादी में पढ़ी जाती है। दूल्हा-दुल्हन ग्रंथ साहिब के चारों ओर चार बार प्रदक्षिणा करते हैं, हर बार एक लावां सुनते हुए।
638 शबद आदि ग्रंथ में। उनके अलावा 31 वारों में से कई इन्होंने रचीं।
महला 4 की मुख्य रचनाएँ:
- लावां (सूही राग)अंग 773-774
- सोहिला में महला 4 के शबदअंग 13
- महला 4 की वारेंआसा, गउड़ी, बिलावल, सोरठ में
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
सलोक और अन्य वाणी (5)
सिरी राग (30)
- मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥अंग 39
- नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥अंग 40
- गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥अंग 40
- हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥अंग 41
- रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥अंग 41
- दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥अंग 41
- पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥अंग 76
- मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥अंग 78
- हरि जीअ सभे प्रतिपालदा घटि घटि रमईआ सोइ ॥अंग 81
- हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥अंग 83
- सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥अंग 83
- तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥अंग 83
- सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥अंग 84
- हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥अंग 84
- हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥अंग 84
- तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥अंग 85
- सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु संबाहिआ ॥अंग 85
- सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥अंग 86
- हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥अंग 86
- जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥अंग 87
- हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥अंग 87
- हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥अंग 88
- सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥अंग 88
- सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥अंग 89
- हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥अंग 89
- हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥अंग 90
- हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥अंग 90
- हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥अंग 90
- कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥अंग 91
- हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥अंग 91
माझ (10)
- हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥अंग 94
- मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥अंग 94
- हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥अंग 95
- हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥अंग 95
- हरि गुर गिआनु हरि रसु हरि पाइआ ॥अंग 95
- हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई ॥अंग 95
- आवहु भैणे तुसी मिलहु पिआरीआ ॥अंग 96
- आदि पुरखु अपरंपरु आपे ॥अंग 129
- जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥अंग 140
- परहरि काम क्रोधु झूठु निंदा तजि माइआ अहंकारु चुकावै ॥अंग 141
गउड़ी (109)
- पंडितु सासत सिम्रिति पड़िआ ॥अंग 163
- निरगुण कथा कथा है हरि की ॥अंग 164
- माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥अंग 164
- भीखक प्रीति भीख प्रभ पाइ ॥अंग 164
- सतिगुर सेवा सफल है बणी ॥अंग 165
- हरि आपे जोगी डंडाधारी ॥अंग 165
- साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥अंग 165
- जिउ जननी गरभु पालती सुत की करि आसा ॥अंग 165
- हलु जोतै उदमु करे मेरा पुतु धी खाइ ॥अंग 166
- नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥अंग 166
- हमरै मनि चिति हरि आस नित किउ देखा हरि दरसु तुमारा ॥अंग 167
- घर मंदर घोड़े खुसी मनु अन रसि लाइआ ॥अंग 167
- जिउ जननी सुतु जणि पालती राखै नदरि मझारि ॥अंग 168
- जिसु मिलिऐ मनि होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीऐ ॥अंग 168
- हरि दइआलि दइआ प्रभि कीनी मेरै मनि तनि मुखि हरि बोली ॥अंग 168
- जगजीवन अपरंपर सुआमी जगदीसुर पुरख बिधाते ॥अंग 169
- करहु क्रिपा जगजीवन दाते मेरा मनु हरि सेती राचे ॥अंग 169
- तुम दइआल सरब दुख भंजन इक बिनउ सुनहु दे काने ॥अंग 169
- मेरे मन सो प्रभु सदा नालि है सुआमी कहु किथै हरि पहु नसीऐ ॥अंग 170
- दइआ करहु हरि दरसु दिखावहु मेरै मनि तनि लोच घणेरी ॥1॥अंग 170
- इहु मनूआ खिनु न टिकै बहु रंगी दह दह दिसि चलि चलि हाढे ॥अंग 170
- कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥अंग 171
- इसु गड़ महि हरि राम राइ है किछु सादु न पावै धीठा ॥अंग 171
- हरि हरि अरथि सरीरु हम बेचिआ पूरे गुर कै आगे ॥अंग 171
- हम अहंकारी अहंकार अगिआन मति गुरि मिलिऐ आपु गवाइआ ॥अंग 172
- गुरमति बाजै सबदु अनाहदु गुरमति मनूआ गावै ॥अंग 172
- गुरमुखि जिंदू जपि नामु करंमा ॥अंग 172
- करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥अंग 234
- मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥अंग 234
- सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥अंग 300
- हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥अंग 300
- तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥अंग 301
- विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥अंग 301
- सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥अंग 301
- तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥अंग 301
- मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥अंग 301
- मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥अंग 301
- तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥अंग 301
- मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥अंग 301
- जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥अंग 301
- तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥अंग 301
- सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥अंग 302
- सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥अंग 302
- जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥अंग 302
- हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥अंग 302
- आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥अंग 302
- तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥अंग 302
- सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥अंग 302
- इकु मनु इकु वरतदा जितु लगै सो थाइ पाइ ॥अंग 303
- जिन हरि हिरदै सेविआ तिन हरि आपि मिलाए ॥अंग 303
- सतिगुर विचि वडी वडिआई जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआवै ॥अंग 303
- पूरे गुर का हुकमु न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ॥अंग 303
- सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥अंग 304
- हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥अंग 304
- सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥अंग 304
- तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥अंग 304
- सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥अंग 304
- जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥अंग 305
- तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥अंग 305
- अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कंमि न आवै ॥अंग 305
- गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥अंग 305
- जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥अंग 306
- मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥अंग 306
- साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥अंग 306
- नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥अंग 306
- सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥अंग 307
- तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥अंग 307
- धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥अंग 307
- जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥अंग 308
- तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥अंग 308
- जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥अंग 308
- होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥अंग 308
- जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥अंग 309
- काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥अंग 309
- जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥अंग 309
- वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥अंग 309
- इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥अंग 309
- सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥अंग 310
- सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥अंग 310
- सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥अंग 310
- करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥अंग 310
- गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥अंग 310
- हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥अंग 310
- जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥अंग 311
- अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥अंग 311
- सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥अंग 311
- सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥अंग 311
- सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥अंग 312
- साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥अंग 312
- सतिगुरु पुरखु अगंमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥अंग 312
- सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥अंग 312
- किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥अंग 312
- सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥अंग 313
- सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥अंग 313
- मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥अंग 313
- गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥अंग 313
- सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥अंग 313
- मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥अंग 313
- तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥अंग 314
- इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥अंग 314
- सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥अंग 314
- जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥अंग 314
- तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥अंग 315
- हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥अंग 316
- मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥अंग 316
- जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन॑ा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥अंग 316
- जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥अंग 317
- सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥अंग 317
- तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥अंग 317
आसा (30)
- सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥अंग 348
- तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥अंग 365
- किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥अंग 366
- हिरदै सुणि सुणि मनि अंम्रितु भाइआ ॥अंग 366
- मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥अंग 366
- गुरमुखि हरि गुण आखि वखाणी ॥1॥अंग 367
- नामु सुणी नामो मनि भावै ॥अंग 367
- गुरमुखि हरि हरि वेलि वधाई ॥अंग 367
- हरि हरि नाम की मनि भूख लगाई ॥अंग 367
- हथि करि तंतु वजावै जोगी थोथर वाजै बेन ॥अंग 368
- कब को भालै घुंघरू ताला कब को बजावै रबाबु ॥अंग 368
- सतसंगति मिलीऐ हरि साधू मिलि संगति हरि गुण गाइ ॥अंग 368
- आइआ मरणु धुराहु हउमै रोईऐ ॥अंग 369
- जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥अंग 369
- हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥अंग 369
- माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥अंग 369
- जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥अंग 442
- झिमि झिमे झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा राम ॥अंग 442
- हरि ऊतमु कामु जपीऐ हरि नामु हरि जपीऐ असथिरु होवै ॥अंग 444
- गुण गिआनु पदारथु हरि हरि किरतारथु सोभा गुरमुखि होई ॥अंग 445
- धुरि मसतकि भागु हरि नामि सुहागु हरि नामै हरि गुण गाइआ ॥अंग 446
- मनि हरि हरि भाउ गुरु करे पसाउ जीवन मुकतु सुखु होई ॥अंग 447
- गोविंदु अलख अपारु अपरंपरु आपु आपणा जाणै ॥अंग 448
- हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥अंग 448
- गुरमुखि ढूंढि ढूढेदिआ हरि सजणु लधा राम राजे ॥अंग 449
- हरि अंम्रित भगति भंडार है गुर सतिगुर पासे राम राजे ॥अंग 449
- जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥अंग 450
- जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥अंग 450
- जिन॑ा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥अंग 451
- मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥अंग 451
गूजरी (8)
- हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥अंग 492
- गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥अंग 492
- जो जनु सुणै सरधा भगति सेती करि किरपा हरि निसतारे ॥1॥अंग 493
- होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥अंग 493
- गुरमुखि सखी सहेली मेरी मो कउ देवहु दानु हरि प्रान जीवाइआ ॥अंग 493
- जिन सतिगुरु पुरखु जिनि हरि प्रभु पाइआ मो कउ करि उपदेसु हरि मीठ लगावै ॥अंग 494
- माई बाप पुत्र सभि हरि के कीए ॥अंग 494
- हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥अंग 506
देवगंधारी (6)
बिहागड़ा (29)
- हरि हरि नामु धिआईऐ मेरी जिंदुड़ीए गुरमुखि नामु अमोले राम ॥अंग 537
- अंम्रितु हरि हरि नामु है मेरी जिंदुड़ीए अंम्रितु गुरमति पाए राम ॥अंग 538
- जगि सुक्रितु कीरति नामु है मेरी जिंदुड़ीए हरि कीरति हरि मनि धारे राम ॥अंग 539
- हउ बलिहारी तिन॑ कउ मेरी जिंदुड़ीए जिन॑ हरि हरि नामु अधारो राम ॥अंग 539
- जिन हरि हरि नामु न चेतिओ मेरी जिंदुड़ीए ते मनमुख मूड़ इआणे राम ॥अंग 540
- सभि जीअ तेरे तूं वरतदा मेरे हरि प्रभ तूं जाणहि जो जीइ कमाईऐ राम ॥अंग 541
- सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥अंग 548
- जीअ जंत सभि तेरिआ तू सभना रासि ॥अंग 549
- तेरी वडिआई तूहै जाणदा तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥अंग 549
- जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥अंग 550
- हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥अंग 550
- आपे धरती आपे है राहकु आपि जंमाइ पीसावै ॥अंग 550
- अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥अंग 551
- जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥अंग 551
- आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥अंग 551
- आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥अंग 552
- आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥अंग 552
- बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥अंग 552
- आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥अंग 552
- आपे सिव संकर महेसा आपे गुरमुखि अकथ कहाणी ॥अंग 553
- आपे तंतु परम तंतु सभु आपे आपे ठाकुरु दासु भइआ ॥अंग 553
- आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥अंग 554
- आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥अंग 554
- जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥अंग 554
- जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥अंग 555
- आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥अंग 555
- आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥अंग 556
- सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥अंग 556
- आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥अंग 556
वडहंस (30)
- सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥अंग 560
- मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥अंग 561
- मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥अंग 561
- मेरै मनि मेरै मनि सतिगुरि प्रीति लगाई राम ॥अंग 572
- हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी राम ॥अंग 572
- हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥अंग 573
- हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥अंग 574
- देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥अंग 575
- देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥अंग 575
- तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥अंग 585
- तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥अंग 586
- सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥अंग 586
- तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥अंग 587
- तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥अंग 587
- जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥अंग 588
- जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥अंग 588
- तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥अंग 589
- जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥अंग 589
- हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥अंग 590
- गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥अंग 590
- से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥अंग 590
- गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥अंग 591
- जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥अंग 591
- जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥अंग 592
- हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥अंग 592
- हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥अंग 593
- धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥अंग 593
- धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥अंग 594
- जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥अंग 594
- तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥अंग 594
सोरठ (45)
- आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥अंग 604
- आपे अंडज जेरज सेतज उतभुज आपे खंड आपे सभ लोइ ॥अंग 604
- आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥अंग 605
- आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥अंग 605
- आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥अंग 606
- आपे सेवा लाइदा पिआरा आपे भगति उमाहा ॥अंग 606
- अनिक जनम विछुड़े दुखु पाइआ मनमुखि करम करै अहंकारी ॥अंग 607
- हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥अंग 607
- अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥अंग 607
- सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥अंग 642
- तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥अंग 642
- हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥अंग 643
- तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥अंग 643
- सो हरि पुरखु अगंमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥अंग 644
- हरि आपि वरतै आपि हरि आपि बुलाइदा ॥अंग 644
- एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥अंग 645
- जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥अंग 645
- बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥अंग 645
- से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥अंग 646
- जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥अंग 646
- हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥अंग 646
- हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥अंग 647
- हरि रसना हरि जसु गावै खरी सुहावणी ॥अंग 647
- गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥अंग 648
- धनु संपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥अंग 648
- तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥अंग 648
- जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥अंग 649
- धंनु धनु भाग तिना भगत जना जो हरि नामा हरि मुखि कहतिआ ॥अंग 649
- हउ बलिहारी तिंन कंउ जो गुरमुखि सिखा ॥अंग 650
- हम ढाढी हरि प्रभ खसम के नित गावह हरि गुण छंता ॥अंग 650
- हरि हरि संत मिलहु मेरे भाई हरि नामु द्रिड़ावहु इक किनका ॥अंग 650
- हरि हरि मेलि साध जन संगति मुखि बोली हरि हरि भली बाणि ॥अंग 651
- जिना गुरु गोपिआ आपणा ते नर बुरिआरी ॥अंग 651
- हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥अंग 652
- हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥अंग 652
- नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥अंग 652
- रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥अंग 652
- अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥अंग 652
- मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥अंग 652
- संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥अंग 652
- गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥अंग 653
- सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥अंग 653
- गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥अंग 653
- सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥अंग 653
- तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥अंग 653
धनासरी (13)
- जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥अंग 666
- हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥अंग 667
- हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥अंग 667
- हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥अंग 667
- हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥अंग 668
- कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥अंग 668
- उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥अंग 668
- हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥अंग 669
- गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥1॥अंग 669
- सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥अंग 669
- इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥अंग 669
- मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥अंग 670
- गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥अंग 690
जैतसरी (11)
- मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥अंग 696
- हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा ॥अंग 696
- हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥अंग 697
- सतिगुरु साजनु पुरखु वड पाइआ हरि रसकि रसकि फल लागिबा ॥अंग 697
- जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥अंग 697
- सतसंगति साध पाई वडभागी मनु चलतौ भइओ अरूड़ा ॥अंग 698
- हरि हरि सिमरहु अगम अपारा ॥अंग 698
- हरि हरि हरि हरि नामु जपाहा ॥अंग 698
- रसि रसि रामु रसालु सलाहा ॥अंग 699
- आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥अंग 699
- मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥अंग 699
टोडी (1)
बैराड़ी (6)
- सुनि मन अकथ कथा हरि नाम ॥अंग 719
- मन मिलि संत जना जसु गाइओ ॥अंग 719
- हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥अंग 719
- जपि मन राम नामु निसतारा ॥अंग 720
- जपि मन हरि निरंजनु निरंकारा ॥अंग 720
- जपि मन हरि हरि नामु नित धिआइ ॥अंग 720
तिलंग (3)
सूही (23)
- मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥अंग 731
- हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥अंग 731
- हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥अंग 731
- हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥अंग 732
- गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥अंग 732
- हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥अंग 732
- जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥अंग 733
- नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥अंग 733
- तिन॑ी अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥अंग 733
- जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥अंग 733
- जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥अंग 734
- तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥अंग 735
- तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥अंग 735
- जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥अंग 735
- कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥अंग 736
- कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥1॥अंग 757
- अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥अंग 758
- हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥अंग 773
- धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥अंग 773
- गुरमुखि हरि गुण गाए ॥अंग 774
- आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥अंग 775
- गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥अंग 776
- मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥अंग 776
बिलावल (30)
- उदम मति प्रभ अंतरजामी जिउ प्रेरे तिउ करना ॥अंग 798
- हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥अंग 799
- हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥अंग 799
- आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥अंग 799
- खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥अंग 800
- अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥अंग 800
- बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥अंग 800
- आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥अंग 833
- हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥अंग 833
- गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥अंग 834
- सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥अंग 835
- अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥अंग 835
- मै मनि तनि प्रेमु अगम ठाकुर का खिनु खिनु सरधा मनि बहुतु उठईआ ॥अंग 836
- मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥अंग 844
- हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥अंग 845
- मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥अंग 845
- उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥अंग 849
- तू हरि प्रभु आपि अगंमु है सभि तुधु उपाइआ ॥अंग 849
- सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥अंग 849
- सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥अंग 850
- गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥अंग 850
- जिथै जाईऐ जगत महि तिथै हरि साई ॥अंग 851
- जितने पातिसाह साह राजे खान उमराव सिकदार हहि तितने सभि हरि के कीए ॥अंग 851
- जिस नो हरि भगति सचु बखसीअनु सो सचा साहु ॥अंग 852
- जिनी गुरमुखि हरि नाम धनु न खटिओ से देवालीए जुग माहि ॥अंग 852
- हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥अंग 853
- सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥अंग 853
- पारब्रहमि दइआलि सागरु तारिआ ॥अंग 854
- जो बोले पूरा सतिगुरू सो परमेसरि सुणिआ ॥अंग 854
- कोई निंदकु होवै सतिगुरू का फिरि सरणि गुर आवै ॥अंग 855
गोंड (6)
- जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥अंग 859
- ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥अंग 860
- हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥अंग 860
- जितने साह पातिसाह उमराव सिकदार चउधरी सभि मिथिआ झूठु भाउ दूजा जाणु ॥अंग 861
- हरि अंतरजामी सभतै वरतै जेहा हरि कराए तेहा को करईऐ ॥अंग 861
- हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै जिउ त्रिखावंतु बिनु नीर ॥1॥अंग 861
रामकली (6)
- जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥अंग 880
- राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥अंग 880
- हरि के सखा साध जन नीके तिन ऊपरि हाथु वतावै ॥अंग 881
- जे वड भाग होवहि वड मेरे जन मिलदिआ ढिल न लाईऐ ॥अंग 881
- सतगुर दइआ करहु हरि मेलहु मेरे प्रीतम प्राण हरि राइआ ॥अंग 882
- सतगुरु दाता वडा वड पुरखु है जितु मिलिऐ हरि उर धारे ॥अंग 882
नट नारायण (15)
- मेरे मन जपि अहिनिसि नामु हरे ॥अंग 975
- राम जपि जन रामै नामि रले ॥अंग 975
- मेरे मन जपि हरि हरि नामु सखे ॥अंग 975
- मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥अंग 976
- मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥अंग 976
- मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥अंग 976
- मेरे मन सेव सफल हरि घाल ॥अंग 977
- मन मिलु संतसंगति सुभवंती ॥अंग 977
- कोई आनि सुनावै हरि की हरि गाल ॥अंग 977
- राम मेरे मनि तनि नामु अधारे ॥अंग 980
- राम हम पाथर निरगुनीआरे ॥अंग 981
- राम हरि अंम्रित सरि नावारे ॥अंग 981
- राम गुर सरनि प्रभू रखवारे ॥अंग 982
- राम करि किरपा लेहु उबारे ॥अंग 982
- मेरे मन भजु ठाकुर अगम अपारे ॥अंग 983
माली गउड़ा (5)
मारू (13)
- जपिओ नामु सुक जनक गुर बचनी हरि हरि सरणि परे ॥अंग 995
- सिध समाधि जपिओ लिव लाई साधिक मुनि जपिआ ॥अंग 995
- हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥अंग 996
- हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥अंग 996
- हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥अंग 996
- हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥अंग 997
- हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥अंग 997
- हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥अंग 998
- सचा आपि सवारणहारा ॥अंग 1069
- हरि अगम अगोचरु सदा अबिनासी ॥अंग 1070
- नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥अंग 1087
- सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥अंग 1087
- चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥अंग 1087
तुखारी (4)
केदारा (2)
- मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥अंग 1118
- मेरे मन हरि हरि गुन कहु रे ॥अंग 1118
भैरों (7)
- हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥अंग 1133
- बोलि हरि नामु सफल सा घरी ॥अंग 1134
- सुक्रितु करणी सारु जपमाली ॥अंग 1134
- सभि घट तेरे तू सभना माहि ॥अंग 1134
- हरि का संतु हरि की हरि मूरति जिसु हिरदै हरि नामु मुरारि ॥अंग 1134
- ते साधू हरि मेलहु सुआमी जिन जपिआ गति होइ हमारी ॥अंग 1135
- सतसंगति साई हरि तेरी जितु हरि कीरति हरि सुनणे ॥अंग 1135
बसंत (8)
- जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥अंग 1177
- रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥अंग 1177
- राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥अंग 1178
- तुम॑ वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥अंग 1178
- मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥अंग 1178
- मनु खिनु खिनु भरमि भरमि बहु धावै तिलु घरि नही वासा पाईऐ ॥अंग 1179
- आवण जाणु भइआ दुखु बिखिआ देह मनमुख सुंञी सुंञु ॥अंग 1179
- कांइआ नगरि इकु बालकु वसिआ खिनु पलु थिरु न रहाई ॥अंग 1191
सारंग (54)
- हरि के संत जना की हम धूरि ॥अंग 1198
- गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥अंग 1198
- हरि हरि अंम्रित नामु देहु पिआरे ॥अंग 1199
- गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥अंग 1199
- मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥अंग 1199
- जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥अंग 1200
- काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥अंग 1200
- जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1200
- जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1201
- जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥अंग 1201
- जपि मन निरभउ ॥अंग 1201
- जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1202
- जपि मन सिरी रामु ॥अंग 1202
- आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥अंग 1237
- गुरमुखि चलतु रचाइओनु गुण परगटी आइआ ॥अंग 1238
- मनमुखि दूजा भरमु है दूजै लोभाइआ ॥अंग 1238
- हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥अंग 1239
- नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥अंग 1239
- नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥अंग 1240
- नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥अंग 1240
- नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥अंग 1240
- नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥अंग 1241
- नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुटंबु सबाइआ ॥अंग 1241
- नाइ मंनिऐ दुरमति गई मति परगटी आइआ ॥अंग 1242
- नाइ मंनिऐ सुरति ऊपजै नामे मति होई ॥अंग 1242
- नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥अंग 1242
- बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥अंग 1243
- जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥अंग 1243
- निंमु बिरखु बहु संचीऐ अंम्रित रसु पाइआ ॥अंग 1244
- जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥अंग 1244
- सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥अंग 1244
- सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥अंग 1244
- गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ ॥अंग 1244
- सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥अंग 1244
- सतिगुरु अंम्रित बिरखु है अंम्रित रसि फलिआ ॥अंग 1245
- भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥अंग 1245
- गुरमुखि सभ पवितु है धनु संपै माइआ ॥अंग 1246
- सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥अंग 1246
- गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥अंग 1246
- खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥अंग 1246
- गड़ि॑ काइआ सीगार बहु भांति बणाई ॥अंग 1247
- नामु सलाहनि नामु मंनि असथिरु जगि सोई ॥अंग 1247
- नामु सलाहनि भाउ करि निज महली वासा ॥अंग 1247
- सभु को लेखे विचि है मनमुखु अहंकारी ॥अंग 1247
- लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥अंग 1248
- मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥अंग 1248
- आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥अंग 1248
- आसा विचि अति दुखु घणा मनमुखि चितु लाइआ ॥अंग 1249
- इसतरी पुरखै बहु प्रीति मिलि मोहु वधाइआ ॥अंग 1249
- इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥अंग 1250
- नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥अंग 1250
- सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥अंग 1250
- गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥अंग 1250
- वडा आपि अगंमु है वडी वडिआई ॥अंग 1251
मलार (9)
- अनदिनु हरि हरि धिआइओ हिरदै मति गुरमति दूख विसारी ॥अंग 1262
- गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धूरि साधू की ताई ॥अंग 1263
- तिसु जन कउ हरि मीठ लगाना जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥अंग 1263
- जितने जीअ जंत प्रभि कीने तितने सिरि कार लिखावै ॥अंग 1263
- जिन॑ कै हीअरै बसिओ मेरा सतिगुरु ते संत भले भल भांति ॥अंग 1264
- अगमु अगोचरु नामु हरि ऊतमु हरि किरपा ते जपि लइआ ॥अंग 1264
- गुर परसादी अंम्रितु नही पीआ त्रिसना भूख न जाई ॥अंग 1265
- हरि जन बोलत स्रीराम नामा मिलि साधसंगति हरि तोर ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1265
- राम राम बोलि बोलि खोजते बडभागी ॥अंग 1265
कानड़ा (61)
- मेरा मनु साध जनां मिलि हरिआ ॥अंग 1294
- मेरा मनु संत जना पग रेन ॥अंग 1294
- जपि मन राम नाम परगास ॥अंग 1295
- मेरै मनि राम नामु जपिओ गुर वाक ॥अंग 1295
- मेरे मन हरि हरि राम नामु जपि चीति ॥अंग 1295
- जपि मन राम नाम जगंनाथ ॥अंग 1296
- मन जापहु राम गुपाल ॥अंग 1296
- हरि गुन गावहु जगदीस ॥अंग 1296
- भजु रामो मनि राम ॥अंग 1297
- सतिगुर चाटउ पग चाट ॥अंग 1297
- जपि मन गोबिद माधो ॥अंग 1297
- हरि जसु गावहु भगवान ॥अंग 1297
- जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥अंग 1308
- जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥अंग 1308
- मनु गुरमति रसि गुन गावैगो ॥अंग 1309
- मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥अंग 1310
- मन गुरमति चाल चलावैगो ॥अंग 1310
- मनु सतिगुर सरनि धिआवैगो ॥अंग 1311
- राम नामु निधानु हरि गुरमति रखु उर धारि ॥अंग 1312
- गोविंदु गोविदु गोविदु हरि गोविदु गुणी निधानु ॥अंग 1312
- तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥अंग 1313
- हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥अंग 1313
- हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥अंग 1313
- सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥अंग 1313
- हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥अंग 1313
- हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥अंग 1313
- हरि हरि अंम्रितु नाम रसु हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥अंग 1314
- हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥अंग 1314
- राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥अंग 1314
- हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥अंग 1314
- हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥अंग 1314
- हरि तुम॑ वड वडे वडे वड ऊचे सभ ऊपरि वडे वडौना ॥अंग 1315
- हमरे हरि जगजीवना हरि जपिओ हरि गुर मंत ॥अंग 1315
- हरि प्रभु सजणु नामु हरि मै मनि तनि नामु सरीरि ॥अंग 1315
- सुतिआ हरि प्रभु चेति मनि हरि सहजि समाधि समाइ ॥अंग 1315
- हरि इकसु सेती पिरहड़ी हरि इको मेरै चिति ॥अंग 1315
- पंचे सबद वजे मति गुरमति वडभागी अनहदु वजिआ ॥अंग 1315
- भगति सरोवरु उछलै सुभर भरे वहंनि ॥अंग 1316
- हरि हरि नाम असंख हरि हरि के गुन कथनु न जाहि ॥अंग 1316
- हरि अगमु अगोचरु अगमु हरि किउ करि हरि दरसनु पिखा ॥अंग 1316
- हरि हरि नामु अंम्रितु है हरि जपीऐ सतिगुर भाइ ॥अंग 1316
- हरि हरि नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥अंग 1316
- हउ वारिआ तिन कउ सदा सदा जिना सतिगुरु मेरा पिआरा देखिआ ॥अंग 1316
- राम नामु रमु रवि रहे रमु रामो रामु रमीति ॥अंग 1316
- हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु भागि वसै वडभागि ॥अंग 1317
- धनु धनु सुहावी सफल घड़ी जितु हरि सेवा मनि भाणी ॥अंग 1317
- हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥अंग 1317
- गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥अंग 1317
- तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे वसगति कीता ॥अंग 1317
- मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥अंग 1317
- मनु तनु तामि सगारवा जां देखा हरि नैणे ॥अंग 1317
- जगंनाथ जगदीसर करते अपरंपर पुरखु अतोलु ॥अंग 1317
- हरि जन हरि हरि चउदिआ सरु संधिआ गावार ॥अंग 1317
- अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥अंग 1318
- जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥अंग 1318
- गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥अंग 1318
- हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम॑ारे ॥अंग 1318
- इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥अंग 1318
- हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥अंग 1318
- नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥अंग 1318
- कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥अंग 1318
कल्याण (12)
- रामा रम रामै अंतु न पाइआ ॥अंग 1319
- हरि जनु गुन गावत हसिआ ॥अंग 1319
- मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥अंग 1320
- हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥अंग 1320
- प्रभ कीजै क्रिपा निधान हम हरि गुन गावहगे ॥अंग 1321
- छका 1 ॥अंग 1321
- रामा रम रामो सुनि मनु भीजै ॥अंग 1323
- राम गुरु पारसु परसु करीजै ॥अंग 1324
- रामा रम रामो रामु रवीजै ॥अंग 1324
- रामा रम रामो पूज करीजै ॥अंग 1325
- रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥अंग 1325
- रामा हम दासन दास करीजै ॥अंग 1326
प्रभाती (7)
- रसकि रसकि गुन गावह गुरमति लिव उनमनि नामि लगान ॥अंग 1335
- उगवै सूरु गुरमुखि हरि बोलहि सभ रैनि सम॑ालहि हरि गाल ॥अंग 1335
- इकु खिनु हरि प्रभि किरपा धारी गुन गाए रसक रसीक ॥अंग 1335
- अगम दइआल क्रिपा प्रभि धारी मुखि हरि हरि नामु हम कहे ॥अंग 1336
- मनि लागी प्रीति राम नाम हरि हरि जपिओ हरि प्रभु वडफा ॥अंग 1336
- गुर सतिगुरि नामु द्रिड़ाइओ हरि हरि हम मुए जीवे हरि जपिभा ॥अंग 1337
- जपि मन हरि हरि नामु निधान ॥अंग 1337