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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 652 · सोरठ

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अंग
652
सोरठ
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  1. पिर की सार न जाणई दूजै भाइ पिआरु ॥
  2. हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥
  3. हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥
  4. नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
  5. रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥
  6. अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥
  7. मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥
  8. संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥

गुरु अमर दास जी · सोरठ की वार, सलोक · राग सोरठ

पिर की सार न जाणई दूजै भाइ पिआरु ॥

अंग 651 से चला आ रहा अंश

पिर की सार न जाणई दूजै भाइ पिआरु ॥
सा कुसुध सा कुलखणी नानक नारी विचि कुनारि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (क्योंकि) वह पति की कद्र नहीं जानती और उसकी माया में सुरति होती है। हे नानक! ऐसी जीव-स्त्री मन की खोटी और बुरे लक्षणों वाली होती है और नारियों में वह बुरी नारि (कहलाती) है। 2।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, पउड़ी · राग सोरठ

हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥

पउड़ी ॥
हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥
हरि नामु धिआई हरि उचरा हरि लाहा लैणी ॥
जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन हउ कुरबैणी ॥
जिना सतिगुरु मेरा पिआरा अराधिआ तिन जन देखा नैणी ॥
हउ वारिआ अपणे गुरू कउ जिनि मेरा हरि सजणु मेलिआ सैणी ॥24॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी! अपनी मेहर करें। मैं आपकी बाणी (भाव, आपका यश) उचारूँ। हरी का नाम सिमरूँ। हरी का नाम उच्चारण करूँ और यही लाभ कमाऊँ। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। जो दिन रात हरी का नाम जपते हैं। उनको मैं अपनी आँखों से देखूँ जो प्यारे सतिगुरू की सेवा करते हैं। मैं अपने सतिगुरू से सदके हूँ। जिसने मुझे प्यारा सज्जन प्रभू साथी मिला दिया है। 24।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, सलोक · राग सोरठ

हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥

सलोकु मः 4 ॥
हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥
हरि दासन कै वसि है जिउ जंती कै वसि जंतु ॥
हरि के दास हरि धिआइदे करि प्रीतम सिउ नेहु ॥
किरपा करि कै सुनहु प्रभ सभ जग महि वरसै मेहु ॥
जो हरि दासन की उसतति है सा हरि की वडिआई ॥
हरि आपणी वडिआई भावदी जन का जैकारु कराई ॥
सो हरि जनु नामु धिआइदा हरि हरि जनु इक समानि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि पैज रखहु भगवान ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ प्रभू की अपने सेवकों के साथ प्रीति होती है। प्रभू अपने सेवकों का मित्र है। जैसे बाजा बजाने वाले (वैजंत्री) के वश में होता है (जैसे चाहे बजाए) वैसे ही प्रभू अपने सेवकों के अधीन होता है। प्रभू के सेवक अपने प्रीतम प्रभू से प्रेम जोड़ के प्रभू को सिमरते हैं। (और विनती करते हैं कि) हे प्रभू मेहर करके सुनें। सारे संसार में (नाम की) बरखा हो (इस प्यार के कारण ही प्रभू अपने सेवकों को प्यार करता है)। हरी के सेवकों की शोभा हरी की ही महिमा (उस्तति) है; हरी को अपनी ये वडिआई (जो उसके सेवकों की होती है) अच्छी लगती है। (सो) वह अपने सेवक की जै-जैकार करवा देता है। हरी का दास वह है जो हरी का नाम सिमरता है। हरी और हरी का सेवक एक-रूप हैं। हे हरी! हे भगवान! दास नानक आपका सेवक है। (इस सेवक की भी) लाज रखें (अपने नाम की दाति दें)। 1।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, सलोक · राग सोरठ

नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥

मः 4 ॥
नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ उस सच्चे हरी ने नानक के (हृदय में) प्रेम पैदा किया है। (अब) उस के बिना जीया नहीं जाता; (कैसे मिले।) सतिगुरू मिल जाए तो पूरा हरी प्राप्त हो जाता है और जीभ हरी के नाम के स्वाद में रस जाती है। 2।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, पउड़ी · राग सोरठ

रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥

पउड़ी ॥
रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥
जीअ जंत सरबत नाउ तेरा धिआवणा ॥
तू दाता दातारु तेरा दिता खावणा ॥
भगत जना कै संगि पाप गवावणा ॥
जन नानक सद बलिहारै बलि बलि जावणा ॥25॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी! रात दिन। अमृत के वक्त (सुबह) (भाव हर वक्त) आप ही गाने के योग्य हैं। सारे जीव-जंतु आपका नाम सिमरते हैं। आप दातें देने वाले दातार हैं आपका ही दिया हुआ खाते हैं। और भक्तों की संगति में अपने पाप दूर करते हैं। हे दास नानक! (उन भक्तजनों से) सदा सदके हों। कुर्बान हों। 25।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, सलोक · राग सोरठ

अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥

सलोकु मः 4 ॥
अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥
अंदरि कपटु सभु कपटो करि जाणै कपटे खपहि खपाही ॥
सतिगुर का भाणा चिति न आवै आपणै सुआइ फिराही ॥
किरपा करे जे आपणी ता नानक सबदि समाही ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (मनमुख के) हृदय में अज्ञान है। (उसकी) अक्ल होछी होती है और सतिगुरू पर उसे सिदक नहीं होता; मन में धोखा (होने के कारण संसार में भी) वह सारा धोखा ही धोखा बरतता समझता है। (मनमुख बंदे खुद) दुखी होते हैं (तथा औरों को) दुखी करते रहते हैं; सतिगुरू का हुकम उनके चित्त में नहीं आता (भाव, भाणा नहीं मानते) और अपनी गरज़ के पीछे भटकते फिरते हैं; हे नानक! अगर हरी अपनी मेहर करे, तो ही वह गुरू के शबद में लीन होते हैं। 1।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, सलोक · राग सोरठ

मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥

मः 4 ॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥
अनदिनु जलत रहहि दिनु राती हउमै खपहि खपाहि ॥
अंतरि लोभु महा गुबारा तिन कै निकटि न कोई जाहि ॥
ओइ आपि दुखी सुखु कबहू न पावहि जनमि मरहि मरि जाहि ॥
नानक बखसि लए प्रभु साचा जि गुर चरनी चितु लाहि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ माया के मोह में ग्रसित मनमुखों का मन माया के प्यार में एक जगह नहीं टिकता; हर वक्त दिन रात (माया में) जलते रहते हैं। अहंकार में आप दुखी होते हैं। औरों को दुखी करते हैं। उनके अंदर लोभ-रूपी बड़ा अंधेरा होता है। कोई मनुष्य उनके नजदीक नहीं फटकता। वह अपने आप ही दुखी रहते हैं। कभी सुखी नहीं होते। सदा पैदा होने मरने के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे नानक! अगर वे गुरू के चरणों में चित्त जोड़ें, तो सच्चा हरी उनको बख्श ले। 2।

गुरु राम दास जी · सोरठ की वार, पउड़ी · राग सोरठ

संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥

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पउड़ी ॥
संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥
सेई बिचखण जंत जिनी हरि धिआइआ ॥
अंम्रितु नामु निधानु भोजनु खाइआ ॥
संत जना की धूरि मसतकि लाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य प्रभू को प्यारे हैं। वे संत जन हैं। भक्त हैं। वही कबूल हैं। वही मनुष्य विलक्ष्ण हैं जो हरी का नाम सिमरते हैं। आत्मिक जीवन देने वाला नाम खाजाना रूपी भोजन करते हैं। और संतों की चरण-धूड़ अपने माथे पर लगाते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 652 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।