सा कुसुध सा कुलखणी नानक नारी विचि कुनारि ॥2॥
हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥
हरि नामु धिआई हरि उचरा हरि लाहा लैणी ॥
जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन हउ कुरबैणी ॥
जिना सतिगुरु मेरा पिआरा अराधिआ तिन जन देखा नैणी ॥
हउ वारिआ अपणे गुरू कउ जिनि मेरा हरि सजणु मेलिआ सैणी ॥24॥
हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥
हरि दासन कै वसि है जिउ जंती कै वसि जंतु ॥
हरि के दास हरि धिआइदे करि प्रीतम सिउ नेहु ॥
किरपा करि कै सुनहु प्रभ सभ जग महि वरसै मेहु ॥
जो हरि दासन की उसतति है सा हरि की वडिआई ॥
हरि आपणी वडिआई भावदी जन का जैकारु कराई ॥
सो हरि जनु नामु धिआइदा हरि हरि जनु इक समानि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि पैज रखहु भगवान ॥1॥
नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥2॥
रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥
जीअ जंत सरबत नाउ तेरा धिआवणा ॥
तू दाता दातारु तेरा दिता खावणा ॥
भगत जना कै संगि पाप गवावणा ॥
जन नानक सद बलिहारै बलि बलि जावणा ॥25॥
अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥
अंदरि कपटु सभु कपटो करि जाणै कपटे खपहि खपाही ॥
सतिगुर का भाणा चिति न आवै आपणै सुआइ फिराही ॥
किरपा करे जे आपणी ता नानक सबदि समाही ॥1॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥
अनदिनु जलत रहहि दिनु राती हउमै खपहि खपाहि ॥
अंतरि लोभु महा गुबारा तिन कै निकटि न कोई जाहि ॥
ओइ आपि दुखी सुखु कबहू न पावहि जनमि मरहि मरि जाहि ॥
नानक बखसि लए प्रभु साचा जि गुर चरनी चितु लाहि ॥2॥
संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥
सेई बिचखण जंत जिनी हरि धिआइआ ॥
अंम्रितु नामु निधानु भोजनु खाइआ ॥
संत जना की धूरि मसतकि लाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(क्योंकि) वह पति की कद्र नहीं जानती और उसकी माया में सुरति होती है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।