Lulla Family

अंग 652

अंग
652
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पिर की सार न जाणई दूजै भाइ पिआरु ॥
सा कुसुध सा कुलखणी नानक नारी विचि कुनारि ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: (क्योंकि) वह पति की कद्र नहीं जानती और उसकी माया में सुरति होती है। हे नानक ! ऐसी जीव-स्त्री मन की खोटी और बुरे लक्षणों वाली होती है और नारियों में वह बुरी नारि (कहलाती) है। 2।
पउड़ी ॥
हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥
हरि नामु धिआई हरि उचरा हरि लाहा लैणी ॥
जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन हउ कुरबैणी ॥
जिना सतिगुरु मेरा पिआरा अराधिआ तिन जन देखा नैणी ॥
हउ वारिआ अपणे गुरू कउ जिनि मेरा हरि सजणु मेलिआ सैणी ॥24॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! अपनी मेहर कर।मैं आपकी बाणी (भाव।आपका यश) उचारूँ। हरी का नाम सिमरूँ।हरी का नाम उच्चारण करूँ और यही लाभ कमाऊँ। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ।जो दिन रात हरी का नाम जपते हैं। उनको मैं अपनी आँखों से देखूँ जो प्यारे सतिगुरू की सेवा करते हैं। मैं अपने सतिगुरू से सदके हूँ।जिसने मुझे प्यारा सज्जन प्रभू साथी मिला दिया है। 24।
सलोकु मः 4 ॥
हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥
हरि दासन कै वसि है जिउ जंती कै वसि जंतु ॥
हरि के दास हरि धिआइदे करि प्रीतम सिउ नेहु ॥
किरपा करि कै सुनहु प्रभ सभ जग महि वरसै मेहु ॥
जो हरि दासन की उसतति है सा हरि की वडिआई ॥
हरि आपणी वडिआई भावदी जन का जैकारु कराई ॥
सो हरि जनु नामु धिआइदा हरि हरि जनु इक समानि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि पैज रखहु भगवान ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ प्रभू की अपने सेवकों के साथ प्रीति होती है।प्रभू अपने सेवकों का मित्र है। जैसे बाजा बजाने वाले (वैजंत्री) के वश में होता है (जैसे चाहे बजाए) वैसे ही प्रभू अपने सेवकों के अधीन होता है। प्रभू के सेवक अपने प्रीतम प्रभू से प्रेम जोड़ के प्रभू को सिमरते हैं। (और विनती करते हैं कि) हे प्रभू मेहर करके सुन।सारे संसार में (नाम की) बरखा हो (इस प्यार के कारण ही प्रभू अपने सेवकों को प्यार करता है)। हरी के सेवकों की शोभा हरी की ही महिमा (उस्तति) है; हरी को अपनी ये वडिआई (जो उसके सेवकों की होती है) अच्छी लगती है।(सो) वह अपने सेवक की जै-जैकार करवा देता है। हरी का दास वह है जो हरी का नाम सिमरता है।हरी और हरी का सेवक एक-रूप हैं। हे हरी ! हे भगवान ! दास नानक आपका सेवक है।(इस सेवक की भी) लाज रख (अपने नाम की दाति दे)। 1।
मः 4 ॥
नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ उस सच्चे हरी ने नानक के (हृदय में) प्रेम पैदा किया है।(अब) उस के बिना जीया नहीं जाता; (कैसे मिले।) सतिगुरू मिल जाए तो पूरा हरी प्राप्त हो जाता है और जीभ हरी के नाम के स्वाद में रस जाती है। 2।
पउड़ी ॥
रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥
जीअ जंत सरबत नाउ तेरा धिआवणा ॥
तू दाता दातारु तेरा दिता खावणा ॥
भगत जना कै संगि पाप गवावणा ॥
जन नानक सद बलिहारै बलि बलि जावणा ॥25॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! रात दिन।अमृत के वक्त (सुबह) (भाव हर वक्त) आप ही गाने के योग्य है। सारे जीव-जंतु आपका नाम सिमरते हैं। आप दातें देने वाला दातार है आपका ही दिया हुआ खाते हैं। और भक्तों की संगति में अपने पाप दूर करते हैं। हे दास नानक ! (उन भक्तजनों से) सदा सदके हो।कुर्बान हो। 25।
सलोकु मः 4 ॥
अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥
अंदरि कपटु सभु कपटो करि जाणै कपटे खपहि खपाही ॥
सतिगुर का भाणा चिति न आवै आपणै सुआइ फिराही ॥
किरपा करे जे आपणी ता नानक सबदि समाही ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (मनमुख के) हृदय में अज्ञान है।(उसकी) अक्ल होछी होती है और सतिगुरू पर उसे सिदक नहीं होता; मन में धोखा (होने के कारण संसार में भी) वह सारा धोखा ही धोखा बरतता समझता है।(मनमुख बंदे खुद) दुखी होते हैं (तथा औरों को) दुखी करते रहते हैं; सतिगुरू का हुकम उनके चित्त में नहीं आता (भाव।भाणा नहीं मानते) और अपनी गरज़ के पीछे भटकते फिरते हैं; हे नानक ! अगर हरी अपनी मेहर करे।तो ही वह गुरू के शबद में लीन होते हैं। 1।
मः 4 ॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥
अनदिनु जलत रहहि दिनु राती हउमै खपहि खपाहि ॥
अंतरि लोभु महा गुबारा तिन कै निकटि न कोई जाहि ॥
ओइ आपि दुखी सुखु कबहू न पावहि जनमि मरहि मरि जाहि ॥
नानक बखसि लए प्रभु साचा जि गुर चरनी चितु लाहि ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ माया के मोह में ग्रसित मनमुखों का मन माया के प्यार में एक जगह नहीं टिकता; हर वक्त दिन रात (माया में) जलते रहते हैं।अहंकार में आप दुखी होते हैं।औरों को दुखी करते हैं। उनके अंदर लोभ-रूपी बड़ा अंधेरा होता है।कोई मनुष्य उनके नजदीक नहीं फटकता। वह अपने आप ही दुखी रहते हैं।कभी सुखी नहीं होते।सदा पैदा होने मरने के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे नानक ! अगर वे गुरू के चरणों में चित्त जोड़ें।तो सच्चा हरी उनको बख्श ले। 2।
पउड़ी ॥
संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥
सेई बिचखण जंत जिनी हरि धिआइआ ॥
अंम्रितु नामु निधानु भोजनु खाइआ ॥
संत जना की धूरि मसतकि लाइआ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य प्रभू को प्यारे हैं।वे संत जन हैं।भक्त हैं।वही कबूल हैं। वही मनुष्य विलक्ष्ण हैं जो हरी का नाम सिमरते हैं। आत्मिक जीवन देने वाला नाम खाजाना रूपी भोजन करते हैं। और संतों की चरण-धूड़ अपने माथे पर लगाते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(क्योंकि) वह पति की कद्र नहीं जानती और उसकी माया में सुरति होती है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।