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345
गउड़ी
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· सत वार · राग गउड़ी
जब लगु घट महि दूजी आन ॥
जब लगु घट महि दूजी आन ॥
तउ लउ महलि न लाभै जान ॥
रमत राम सिउ लागो रंगु ॥
कहि कबीर तब निरमल अंग ॥8॥1॥
तउ लउ महलि न लाभै जान ॥
रमत राम सिउ लागो रंगु ॥
कहि कबीर तब निरमल अंग ॥8॥1॥
हिन्दी अर्थ: (पर) जब तक मनुष्य के मन में दुनियावी इज्जत आदि की वासना है, तब तक वह प्रभू के चरणों में नहीं जुड़ सकता। परमात्मा का सिमरन करते-करते परमात्मा के साथ प्यार हो जाता है और तब कबीर कहता है कि शरीर पवित्र हो जाता है। 8। 1।
· शबद · राग गउड़ी
देवा पाहन तारीअले ॥
रागु गउड़ी चेती बाणी नामदेउ जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवा पाहन तारीअले ॥
राम कहत जन कस न तरे ॥1॥ रहाउ ॥
तारीले गनिका बिनु रूप कुबिजा बिआधि अजामलु तारीअले ॥
चरन बधिक जन तेऊ मुकति भए ॥
हउ बलि बलि जिन राम कहे ॥1॥
दासी सुत जनु बिदरु सुदामा उग्रसैन कउ राज दीए ॥
जप हीन तप हीन कुल हीन क्रम हीन नामे के सुआमी तेऊ तरे ॥2॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवा पाहन तारीअले ॥
राम कहत जन कस न तरे ॥1॥ रहाउ ॥
तारीले गनिका बिनु रूप कुबिजा बिआधि अजामलु तारीअले ॥
चरन बधिक जन तेऊ मुकति भए ॥
हउ बलि बलि जिन राम कहे ॥1॥
दासी सुत जनु बिदरु सुदामा उग्रसैन कउ राज दीए ॥
जप हीन तप हीन कुल हीन क्रम हीन नामे के सुआमी तेऊ तरे ॥2॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी चेती बाणी नामदेउ जीउ की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू! (वह) पत्थर (भी समुंद्र पर) आपने तैरा दिए (जिनपे आपका ‘राम’ नाम लिखा गया था। भला) वह मनुष्य (संसार समुंद्र से) क्यों नहीं तैरेंगे। जो आपका नाम सिमरते हैं? रहाउ। हे प्रभू! आपने (बुरे कर्मों वाली) वेश्वा को (विकारों से) बचा लिया। आपने कुरूप कुबिजा का कुब्ब दूर कर दिया। आपने विकारों में गले हुए अजामल को तार दिया। (कृष्ण जी के) पैरों में निशाना मारने वाला शिकारी (और) ऐसे कई (विकारी) लोग (आपकी मेहर से) मुक्त हो गए। मैं सदके हूँ उनसे जिन्होंने प्रभू का नाम सिमरा। 1। हे प्रभू! दासी का पुत्र बिदर आपका भगत (प्रसिद्ध हुआ)। सुदामा (इसकी आपने दरिद्रता खत्म कर दी)। उग्रसैन को आपने राज दिया। हे नामदेव के स्वामी! आपकी कृपा से वे सभी तैर गए जिन्होंने कोई जप नहीं किए। कोई तप नहीं साधे। जिनकी कोई ऊंची कुल नहीं थी। कोई अच्छे अमल नहीं थे। 2। 1।
· शबद · राग गउड़ी
मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥
रागु गउड़ी रविदास जी के पदे गउड़ी गुआरेरी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभांती ॥1॥
राम गुसईआ जीअ के जीवना ॥
मोहि न बिसारहु मै जनु तेरा ॥1॥ रहाउ ॥
मेरी हरहु बिपति जन करहु सुभाई ॥
चरण न छाडउ सरीर कल जाई ॥2॥
कहु रविदास परउ तेरी साभा ॥
बेगि मिलहु जन करि न बिलांबा ॥3॥1॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभांती ॥1॥
राम गुसईआ जीअ के जीवना ॥
मोहि न बिसारहु मै जनु तेरा ॥1॥ रहाउ ॥
मेरी हरहु बिपति जन करहु सुभाई ॥
चरण न छाडउ सरीर कल जाई ॥2॥
कहु रविदास परउ तेरी साभा ॥
बेगि मिलहु जन करि न बिलांबा ॥3॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी रविदास जी के पदे गउड़ी गुआरेरी सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ (हे प्रभू!) दिन रात मुझे ये सोच रहती है (मेरा क्या बनेगा?) बुरे लोगों के साथ मेरा उठना-बैठना है। खोट मेरा (नित्य कर्म) है; मेरा जनम (भी) नीच जाति में से है। 1। हे मेरे राम! हे मेरे राम! हे धरती के साई! हे मेरी जिंद के आसरे! मुझे ना बिसारना। मैं आपका दास हूँ। 1। रहाउ। (हे प्रभू!) मेरी ये बिपता काटें; मुझ सेवक को अच्छी भावना वाला बना लें; चाहे मेरे शरीर की सक्ता भी चली जाए। (हे राम!) मैं आपके चरण नहीं छोड़ूँगा। 2। हे रविदास! (प्रभू दर पर) कहें, (हे प्रभू!) मैं आपकी शरण पड़ा हूँ। मुझ सेवक को जल्दी मिलें। ढील ना करें। 3। 1।
· शबद · राग गउड़ी
बेगम पुरा सहर को नाउ ॥
बेगम पुरा सहर को नाउ ॥
दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥
नां तसवीस खिराजु न मालु ॥
खउफु न खता न तरसु जवालु ॥1॥
अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥1॥ रहाउ ॥
काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥
दोम न सेम एक सो आही ॥
आबादानु सदा मसहूर ॥
ऊहां गनी बसहि मामूर ॥2॥
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥
महरम महल न को अटकावै ॥
कहि रविदास खलास चमारा ॥
जो हम सहरी सु मीतु हमारा ॥3॥2॥
दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥
नां तसवीस खिराजु न मालु ॥
खउफु न खता न तरसु जवालु ॥1॥
अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥1॥ रहाउ ॥
काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥
दोम न सेम एक सो आही ॥
आबादानु सदा मसहूर ॥
ऊहां गनी बसहि मामूर ॥2॥
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥
महरम महल न को अटकावै ॥
कहि रविदास खलास चमारा ॥
जो हम सहरी सु मीतु हमारा ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: (जिस आत्मिक-अवस्था रूपी शहर में मैं बसता हूँ) उस शहर का नाम है बे-ग़मपुरा (भाव, उस अवस्था में कोई ग़म नहीं छू सकता); उस जगह पर ना कोई दुख है। ना चिंता और ना कोई घबराहट। वहां दुनिया वाली घबराहट नहीं और ना ही उस जायदाद को मसुल है; उस अवस्था में किसी पाप कर्म करने का खतरा नहीं; कोई डर नहीं; कोई गिरावट नहीं। 1। हे मेरे वीर! अब मैंने बसने के लिए सुंदर जगह ढूँढ ली है। वहां सदा सुख ही सुख है। 1। रहाउ। वह (आत्मिक अवस्था एक ऐसी) बादशाहत (है जो) सदा ही टिकी रहने वाली है। वहाँ किसी का दूसरा-तीसरा दर्जा नहीं। सब एक जैसे ही हैं। वह शहर सदा सघन है और आबाद है। वहाँ धनी और तृप्त लोग ही बसते हैं (भाव, उस आत्मिक दर्जे पे जो जो पहुँचते हैं उनके अंदर कोई भेदभाव नहीं रहता ओर उन्हें दुनिया की भूख नहीं रहती)। 2। (उस आत्मिक शहर में पहुँचे हुए बंदे उस अवस्था में) आनंद से विचरते हैं; वह उस (ईश्वरीय) महल का भेद जानने वाले होते हैं; (इस वास्ते) कोई (उनके राह में) रोक नहीं डाल सकता। चमार रविदास जिसने (दुख-अंदोह-तशवीश आदि से) छुटकारा पा लिया है कहता है, हमारा मित्र वह है जो हमारा सत्संगी है। 3। 2।
· शबद · राग गउड़ी
घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गउड़ी बैरागणि रविदास जीउ ॥
घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥
रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरारि ॥1॥
को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ॥1॥ रहाउ ॥
गउड़ी बैरागणि रविदास जीउ ॥
घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥
रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरारि ॥1॥
को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गउड़ी बैरागणि रविदास जीउ ॥ (जिन राहों से प्रभू के नाम का सौदा लाद के ले जाने वाला मेरा टांडा गुजरना है। वे) रास्ते बहुत मुश्किल पहाड़ी रास्ते हैं। और मेरा (मन-) बैल कमजोर सा है; प्यारे प्रभू के आगे ही मेरी आरजू है, हे प्रभू! मेरी राशि पूँजी की आप स्वयं रक्षा करें। 1। हे भाई! (अगर सोहाने प्रभू की कृपा से) प्रभू के नाम का वणज करने वाला कोई बंदा मुझे मिल जाए तो मेरा माल भी लादा जा सके (भाव, तो उस गुरमुखि की सहायता से मैं भी हरी-नाम रूपी वणज कर सकूँ)। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी; भगत रविदास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 345 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।