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अंग 346

अंग
346
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Ravi Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउ बनजारो राम को सहज करउ ब्यापारु ॥
मै राम नाम धनु लादिआ बिखु लादी संसारि ॥2॥
उरवार पार के दानीआ लिखि लेहु आल पतालु ॥
मोहि जम डंडु न लागई तजीले सरब जंजाल ॥3॥
जैसा रंगु कसुंभ का तैसा इहु संसारु ॥
मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥4॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: आँख,कान,नाक,जीभ आदि ज्ञानेंद्रियों का समूह मनुष्य,बन्जारे का टांडा है। इन्होंने नाम,व्यापार लादना है। पर इनके राह में रूप रस आदि अनेकों मुश्किल घाटियां हैं।)मैं प्रभू के नाम का व्यापारी हूँ; मैं ये ऐसा व्यापार कर रहा हूँ जिसमें से मुझे सहज अवस्था की कमाई मिले। (प्रभू की मेहर से) मैंने प्रभू के नाम का सौदा लादा है। पर संसार ने (आत्मिक मौत लाने वाली माया रूप) जहर का व्यापार किया है। 2। जीवों के लोक-परलोक की सब करतूतें जानने वाले हे चित्रगुप्तो ! (मेरे बारे) जो आपका जीअ करे लिख लेना (भाव। यमराज के पास पेश करने के लिए मेरे कामों में कोई बात आपको मिलनी ही नहीं। क्योंकि प्रभू की कृपा से) मैंने सारे जंजाल छोड़ दिए हैं। तभी तो मुझे जम का दण्ड लगना ही नहीं। 3। हे चमार रविदास ! कह, (ज्यों ज्यों मैं राम-नाम का वणज कर रहा हूं। मुझे यकीन कि) ये जगत ऐसे है जैसे कुसंभे का (कच्चा) रंग। और मेरे प्यारे राम के नाम का रंग ऐसा है जैसे मजीठ का (पक्का) रंग। 4।
गउड़ी पूरबी रविदास जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥
ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥1॥
सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥1॥ रहाउ ॥
मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥
करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥2॥
जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥
प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥3॥1॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी रविदास जीउ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जैसे (कोई) कूँआ मेंढकों से भरा हो। (उन मेंढकों को) कोई इलम नहीं होता (कि इस कूँएं से बाहर भी कोई और) देस परदेस भी है; वैसे ही मेरा मन माया (के कूँएं) में इतनी गहरी तरह फसा हुआ है कि इसे (माया के कूएं में से निकलने के लिए) कोई इस पार का उस पार का छोर नहीं सूझता। 1। हे सारे भवनों के सरदार ! मुझे एक पल भर के लिए (ही) दीदार दे। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मेरी मति (विकारों से) मैली हुई पड़ी है। (इस वास्ते) मुझे आपकी गती की पहचान नहीं आती (अर्थात। मुझे समझ नहीं आती कि आप कैसा है)। हे प्रभू ! मेहर कर। मुझे सुचॅजी मति समझा। (ताकि) मेरा भटकना समाप्त हो जाए। 2। हे प्रभु ! महान योगी भी आपके अनन्त गुणों का रहस्य नहीं पा सकते (पर) (हे प्रभू !) बड़े-बड़े जोगी (भी) आपके बेअंत गुणों का अंत नहीं पा सकते।
गउड़ी बैरागणि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥
तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार ॥1॥
पारु कैसे पाइबो रे ॥
मो सउ कोऊ न कहै समझाइ ॥
जा ते आवा गवनु बिलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ ॥
कवन करम ते छूटीऐ जिह साधे सभ सिधि होइ ॥2॥
करम अकरम बीचारीऐ संका सुनि बेद पुरान ॥
संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु ॥3॥
बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिधि बिकार ॥
सुध कवन पर होइबो सुच कुंचर बिधि बिउहार ॥4॥
रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार ॥
पारस मानो ताबो छुए कनक होत नही बार ॥5॥
परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट ॥
उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ॥6॥
भगति जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार ॥
सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार ॥7॥
अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥
प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥8॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: (पर) हे रविदास चमार ! आप प्रभू की सिफत सालाह कर। ताकि आपको प्रेम और भक्ति की दाति मिल सके। 3। 1। भाव। प्रभू दर पर अरदास- हे प्रभू ! मेरे माया-मोहे-मन को अपना दीदार बख्श के अच्छी तरह सुकर्म में लगाओ। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे पंडित जी ! आप कहते हैं कि हरेक युग में अपना-अपना कर्म ही प्रधान है। इस अनुसार) सतिजुग में दान आदि प्रधान था। त्रेता युग यज्ञों में प्रवृत्त रहा। द्वापर में देवताओं की पूजा प्रधान कर्म था; (इसी तरह आप कहते हैं कि) तीनों युग इन तीनों कर्मों धर्मों पर जोर देते हैं; और अब कलयुग में सिर्फ (राम) नाम का आसरा है। 1। पर हे पण्डित ! (इन युगों के बँटे हुए कर्मों धर्मों से। संसार समुंद्र का) परला छोर कैसे ढूँढोगे। (तुममें से) कोई भी मुझे ऐसा काम समझा के नहीं बता सका। जिसकी सहायता से (मनुष्य के) जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो सकें। 1। रहाउ। (शास्त्रों अनुसार) कई तरीकों से वर्ण आश्रमों के कर्तव्यों की हद-बंदी की गई है; (इन शास्त्रों को मानने वाला) सारा जगत यही निर्धारित कर्म-धर्म कर रहा है। पर किस कर्म-धर्म के करने से (आवागमन से) निजात मिल सकती है। वह कौन सा कर्म है जिसके साधने से जनम-मनोरथ सफल होता है। (ये बात आप नहीं बता सके)। 2। वेदों और पुराणों को सुन के (बल्कि और ही) शंका बढ़ती है। यही विचार करते रह जाते हैं कि भला कौन सा कर्म शास्त्रोंके अनुसार है। और कौन सा कर्म शास्त्रों में वर्जित किया है। (वर्ण-आश्रमों के कर्म-धर्म करते हुए ही। मनुष्य के) दिल में सहम तो टिका रहता है। (फिर) वह कौन सा कर्म-धर्म (आप बताते हो) जो मन का अहंकार दूर करे। 3। (हे पण्डित ! तूम तीर्थ-सनान पर जोर देते हैं। पर तीर्थों पर जा के शरीर का) बाहरी क्षेत्र ही पानी में धोते हैं। दिल में कई किस्म के विकार टिके ही रहते हैं। (इस तीर्थ-स्नान से) कौन पवित्र हो सकता है। ये सुच तो ऐसी ही होती है जैसे हाथी का स्नान-कर्म है। 4। (पर। हे पण्डित !) सारा संसार ये बात जानता है कि सूरज के चढ़ने से कैसे रात (का अंधेरा) दूर हो जाता है। ये बात भी याद रखने वाली है कि तांबे के पारस के साथ छूने से उसके सोना बनने में देर नहीं लगती। 5। (इसी तरह) यदि पूर्बले भाग्य जागें तो सतिगुरू मिल जाता है जो सब पारसों से बढ़िया पारस है। (गुरू की कृपा से) मन में परमात्मा के मिलने की तांघ पैदा हो जाती है। वह अंतरात्मे ही प्रभू से मिल लेता है। मन के कठोर किवाड़ खुल जाते हैं। 6। जिस मनुष्य ने प्रभू की भगती में जुड़ के (इस भगती की बरकति से) भटकनों। विकारों और माया के बंधनों को काट के अपनी बुद्धि को माया में डोलने से रोक लिया है। वही मनुष्य (प्रभू की याद में) टिक के आनंद से (प्रभू को) अंतर-आत्मा में ही मिल लेता है। और उस एक परमात्मा के गुणों की याद में जुड़ा रहता है। जो माया के तीन गुणों से परे है। 7। (प्रभू की याद के बिना) मन को विकारों से रोकने के अगर अन्य अनेकों प्रयत्न भी किए जाएं। (तो भी विकारों में) भटकनों की फाही टाले नहीं टलती। (कर्म-काण्ड के) इन यत्नों से प्रभू की प्यार भरी याद (दिल में) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए मैं रविदास इन कर्मों-धर्मों से निराश हूँ। 8। 1।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की, जिसने सामाजिक संरचना को अंदर से चुनौती दी।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आँख,कान,नाक,जीभ आदि ज्ञानेंद्रियों का समूह मनुष्य,बन्जारे का टांडा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।