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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 323 · गउड़ी

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अंग
323
गउड़ी
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  1. नानक लड़ि लाइ उधारिअनु दयु सेवि अमिता ॥19॥
  2. धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥
  3. परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥
  4. प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥
  5. तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥
  6. जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥
  7. मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥
  8. अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥
  9. माधउ जल की पिआस न जाइ ॥

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

नानक लड़ि लाइ उधारिअनु दयु सेवि अमिता ॥19॥

अंग 322 से चला आ रहा अंश

नानक लड़ि लाइ उधारिअनु दयु सेवि अमिता ॥19॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! ऐसे बेअंत प्रभू को सिमरें। जिसने अपने साथ लगा के (अनेकों जीव) बचाए हैं। 19।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥

सलोक मः 5 ॥
धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥
नानक सेई तंन फुटंनि जिना सांई विसरै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ वे कोझे धंधे घाटे वाले हैं जिनके कारण एक परमात्मा चित्त में ना आए। (क्योंकि) हे नानक! वे शरीर विकारों से गंदे हो जाते हैं जिन्हें मालिक प्रभू भूल जाता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥

मः 5 ॥
परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥
सभे सिख उबारिअनु प्रभि काज सवारे ॥
निंदक पकड़ि पछाड़िअनु झूठे दरबारे ॥
नानक का प्रभु वडा है आपि साजि सवारे ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उस सृजनहार ने (नाम की दाति दे के जीव को) प्रेत से देवते बना दिया है। प्रभू ने स्वयं काज सँवारे हैं और सारे सिख (विकारों से) बचा लिए हैं। झूठे और निंदकों को पकड़ के अपनी हजूरी में उसने (जैसे) पटका के धरती पे दे मारा है। नानक का प्रभू सबसे बड़ा है। उसने जीव पैदा करके खुद ही (‘नाम’ में जोड़ के) सँवार दिए हैं। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥

पउड़ी ॥
प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥
अगम अगोचरु साहिबो जीआं का परणा ॥
हसत देइ प्रतिपालदा भरण पोखणु करणा ॥
मिहरवानु बखसिंदु आपि जपि सचे तरणा ॥
जो तुधु भावै सो भला नानक दास सरणा ॥20॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ परमात्मा बेअंत है। उसका कोई अंत नहीं पा सकता। सारा जगत उसी ने बनाया है। वह मालिक अपहुँच है। जीवों की इंद्रियों की पहुँच से परे है। सब जीवों का आसरा है। हाथ दे के सब की रक्षा करता है। सब को पालता है। वह प्रभू मेहर करने वाला है। बख्शिश करने वाला है। जीव उसको सिमर के पार हो जाता है। हे दास नानक! (कहें) ‘जो कुछ आपकी रजा में हो रहा है। वह ठीक है। हम जीव आपकी शरण में हैं’। 20।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥

सलोक मः 5 ॥
तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥
नानक चरणी लगिआ उधरै सभो कोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जिस-जिस मनुष्य के सिर पर रक्षक वह प्रभू है उन्हें (माया की) कोई भूख नहीं रह जाती। हे नानक! परमात्मा के चरणों में लग के हरेक जीव माया की भूख से बच जाता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, सलोक · राग गउड़ी

जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥

मः 5 ॥
जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥
नानक परमेसरु जजमानु तिसहि भुख न मूलि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ (जो मनुष्य) मंगता (बन के मालिक प्रभू से) सदा नाम मांगता है (उसकी अर्ज) मालिक कबूल करता है। हे नानक! जिस मनुष्य का जजमान (खुद) परमेश्वर है उसे रक्ती भी (माया की) भूख नहीं रहती। 2।

गुरु अर्जन देव जी · गउड़ी की वार, पउड़ी · राग गउड़ी

मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥

पउड़ी ॥
मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥
प्रीति लगी हरि नाम सिउ ए हसती घोड़े ॥
राज मिलख खुसीआ घणी धिआइ मुखु न मोड़े ॥
ढाढी दरि प्रभ मंगणा दरु कदे न छोड़े ॥
नानक मनि तनि चाउ एहु नित प्रभ कउ लोड़े ॥21॥1॥ सुधु कीचे

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है उसका) मन परमात्मा के साथ रंगा जाता है उस के लिए प्रभू का नाम ही बढ़िया भोजन व पोशाक है। परमात्मा के नाम के साथ उसका प्यार बन जाता है। यही उसके लिए हाथी घोड़े है। प्रभू के सिमरन से वह कभी अकता नहीं। यही उसके लिए राज-माल। जमीनें और बेअंत खुशियां हैं। वह ढाढी प्रभू के दर से ही सदा मांगता है। प्रभू का दर कभी नहीं छोड़ता। हे नानक! सिफत सालाह करने वाले के मन में। तन में सदा ये चाव बना रहता है। वह सदा प्रभू को मिलने की तमन्ना रखता है। 21। 1।

भगत कबीर जी · शबद · राग गउड़ी

अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥

रागु गउड़ी भगतां की बाणी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
गउड़ी गुआरेरी स्री कबीर जीउ के चउपदे 14 ॥
अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥
राम उदकि तनु जलत बुझाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मनु मारण कारणि बन जाईऐ ॥
सो जलु बिनु भगवंत न पाईऐ ॥1॥
जिह पावक सुरि नर है जारे ॥
राम उदकि जन जलत उबारे ॥2॥
भव सागर सुख सागर माही ॥
पीवि रहे जल निखुटत नाही ॥3॥
कहि कबीर भजु सारिंगपानी ॥
राम उदकि मेरी तिखा बुझानी ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी भगतां की बाणी सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ गउड़ी गुआरेरी श्री कबीर जीउ के चउपदे 14 ॥ (ढूँढते-ढूँढते) अब मैंने प्रभू के नाम का अमृत ढूँढ लिया है। उस नाम-अमृत ने मेरे तपते शरीर को ठंडा कर दिया है। 1। रहाउ। जंगलों की ओर (तीर्थों आदि पर) मन को मारने के लिए (शांत करने के लिए) जाते हैं। पर वह (नाम-रूपी) अमृत (जो मन को शांत कर सके) प्रभू के बिना (प्रभू के सिमरन के बिना) नहीं मिल सकता। 1। (तृष्णा की) जिस आग ने देवते और मनुष्य जला डाले हैं। प्रभू के (नाम-) अमृत ने भगत जनों को जलने से बचा लिया है। 2। (वह भगत-जन जिनको ‘राम-उदक’ ने जलने से बचाया है) इस संसार समुंद्र में (जो अब उनके लिए) सुखों का समुंद्र (बन गया है) नाम-अमृत लगातार पी रहे हैं और वह अमृत कभी खत्म नहीं होता। 3। कबीर कहता है, (हे मन!) परमात्मा का सिमरन करें। परमात्मा के नाम-अमृत ने मेरी (माया की) तृष्णा मिटा दी है। 4। 1।

भगत कबीर जी · शबद · राग गउड़ी

माधउ जल की पिआस न जाइ ॥

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गउड़ी कबीर जी ॥
माधउ जल की पिआस न जाइ ॥
जल महि अगनि उठी अधिकाइ ॥1॥ रहाउ ॥
तूं जलनिधि हउ जल का मीनु ॥
जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ॥1॥
तूं पिंजरु हउ सूअटा तोर ॥
जमु मंजारु कहा करै मोर ॥2॥
तूं तरवरु हउ पंखी आहि ॥
मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ॥3॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ हे माया के पति प्रभू! आपके नाम-अमृत की प्यास मिटती नहीं (भाव, आपका नाम जप-जप के मैं तृप्त नहीं होता)। आपका नाम अमृत पीते पीते और अधिक चाहत पैदा हो रही है। 1। रहाउ। हे प्रभू! आप जल का खजाना (समुंद्र) हैं। मैं उस जल की मछली हूँ। जल में ही मैं जीवित रह सकती हूँ। जल के बिना मैं मर जाती हूँ। 1। आप मेरा पिंजरा हैं। मैं आपका कमजोर सा तोता हूँ। (आपके आसरे रहने पर) जम-रूपी बिल्ला मेरा क्या बिगाड़ लेगा? 2। हे प्रभू! आप सुंदर वृक्ष हैं और मैं (उस वृक्ष पर आसरा लेने वाला) पंछी हूँ। (मुझ) अभागे को (अभी तक) आपके दर्शन नसीब नहीं हुए। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 323 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।