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अंग ३२२ · गउड़ी

अंग
322
गउड़ी
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  1. जीवन पदु निरबाणु इको सिमरीऐ ॥
  2. जंमणु मरणु न तिन॑ कउ जो हरि लड़ि लागे ॥
  3. धरणि सुवंनी खड़ रतन जड़ावी हरि प्रेम पुरखु मनि वुठा ॥
  4. फिरदी फिरदी दह दिसा जल परबत बनराइ ॥
  5. जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥
  6. एकु जि साजनु मै कीआ सरब कला समरथु ॥
  7. जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥
  8. सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥
  9. भोरी भरमु वञाइ पिरी मुहबति हिकु तू ॥
  10. चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥
  11. रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥

जीवन पदु निरबाणु इको सिमरीऐ ॥

अंग ३२१ से चला आ रहा अंश

जीवन पदु निरबाणु इको सिमरीऐ ॥
दूजी नाही जाइ किनि बिधि धीरीऐ ॥
डिठा सभु संसारु सुखु न नाम बिनु ॥
तनु धनु होसी छारु जाणै कोइ जनु ॥
रंग रूप रस बादि कि करहि पराणीआ ॥
जिसु भुलाए आपि तिसु कल नही जाणीआ ॥
रंगि रते निरबाणु सचा गावही ॥
नानक सरणि दुआरि जे तुधु भावही ॥2॥

हिन्दी अर्थ: अगर वासना-रहित एक प्रभू को सिमरें तो असल जीवन का दर्जा हासिल होता है। (पर इस अवस्था की प्राप्ति के लिए) कोई और जगह नहीं। (क्योंकि) किसी और तरीके से मन टिक नहीं सकता। सारा संसार (टटोल के) देखा है। प्रभू के नाम के बिना सुख नहीं मिलता। (जगत इस तन और धन में सुख तलाशता है) ये शरीर और धन नाश हो जाएंगे। पर कोई विरला ही इस बात को समझता है। हे प्राणी ! आप क्या कर रहे हैं? (भाव। आप क्यों नहीं समझते कि जगत के) रंग-रूप और रस सब व्यर्थ हैं (इनके पीछे लगने से मन का टिकाव हासिल नहीं होता) ? (पर जीव के भी क्या बस में?) प्रभू जिस मनुष्य को खुद कुमार्ग पर डालता है। उसे मन की शांति की समझ नहीं आती। जो मनुष्य प्रभू के प्यार में रंगे हुए हैं। वह उस सदा कायम रहने वाले व वासना-रहित प्रभू को गाते हैं। हे नानक ! (प्रभू के आगे ये आरजू करें - हे प्रभू !) अगर आपको ठीक लगे तो जीव आपके दर पे आपकी शरण आते हैं। 2।

जंमणु मरणु न तिन॑ कउ जो हरि लड़ि लागे ॥

पउड़ी ॥
जंमणु मरणु न तिन॑ कउ जो हरि लड़ि लागे ॥
जीवत से परवाणु होए हरि कीरतनि जागे ॥
साधसंगु जिन पाइआ सेई वडभागे ॥
नाइ विसरिऐ ध्रिगु जीवणा तूटे कच धागे ॥
नानक धूड़ि पुनीत साध लख कोटि पिरागे ॥16॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य परमात्मा का आसरा लेते हैं। उनके लिए जनम-मरण का चक्र नहीं रहता। वे इसी जीवन में (प्रभू के दर पर) कबूल हो जाते हैं (क्योंकि) प्रभू की सिफत सालाह करके वे विकारों से बचे रहते हैं। वही मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्हें (ऐसे) गुरमुखों की संगति हासल होती है। पर अगर प्रभू का नाम बिसर जाय तो जीना धिक्कारयोग्य है टूटे हुए कच्चे धागे की तरह (व्यर्थ) है। हे नानक ! गुरमुखों के चरणों की धूड़ लाखों-करोड़ों प्रयाग आदि तीर्थों से भी ज्यादा पवित्र है। 16।

धरणि सुवंनी खड़ रतन जड़ावी हरि प्रेम पुरखु मनि वुठा ॥

सलोकु मः 5 ॥
धरणि सुवंनी खड़ रतन जड़ावी हरि प्रेम पुरखु मनि वुठा ॥
सभे काज सुहेलड़े थीए गुरु नानकु सतिगुरु तुठा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जिस मन में प्यार-स्वरूप हरी अकाल पुरख बस जाता है वह मन ऐसे है जैसे ओस की बूँद रूपी मोतियों से जड़ी हुई घास वाली धरती सोहने रंग वाली हो जाती है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर गुरू सतिगुरू नानक स्वयं प्रसन्न होता है। उसके सारे काम आसान हो जाते हैं। 1।

फिरदी फिरदी दह दिसा जल परबत बनराइ ॥

मः 5 ॥
फिरदी फिरदी दह दिसा जल परबत बनराइ ॥
जिथै डिठा मिरतको इल बहिठी आइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ चारों तरफ दरियाओं पहाड़ों और वृक्षों पेड़ों पर से उड़ती-उड़ती चील ने जहाँ मुर्दा देखा वहीं आ बैठी (यही हाल उस मन का है जो परमात्मा से विछुड़ के विकारों में आ गिरता है)। 2।

जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥

पउड़ी ॥
जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥
नेड़ै देखउ पारब्रहमु इकु नामु धिआवउ ॥
होइ सगल की रेणुका हरि संगि समावउ ॥
दूखु न देई किसै जीअ पति सिउ घरि जावउ ॥
पतित पुनीत करता पुरखु नानक सुणावउ ॥17॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं उस सच्चे प्रभू को सिमरूँ। जिससे सारे सुख और सारे फल मांगते हैं। उस पारब्रहम को अपने अंग-संग देखूँ और केवल उसी का ही नाम ध्याऊँ। सबके चरणों की धूड़ हो के मैं परमात्मा में लीन हो जाऊँ। मैं किसी भी जीव को दुख ना दूँ और (इस तरह) बा-इज्जत (अपने असल) घर जाऊँ (भाव। प्रभू की हजूरी में पहचूँ)। हे नानक ! मैं औरों को भी बताऊँ कि करतार अकाल-पुरख (विकारों में) गिरे हुओं को भी पवित्र करने वाला है। 17।

एकु जि साजनु मै कीआ सरब कला समरथु ॥

सलोक दोहा मः 5 ॥
एकु जि साजनु मै कीआ सरब कला समरथु ॥
जीउ हमारा खंनीऐ हरि मन तन संदड़ी वथु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक दोहा महला 5॥ मैंने एक उस (हरी) को ही अपना मित्र बनाया है जो सारी ताकतों वाला है। परमात्मा ही मन और तन के काम आने वाली असली चीज है। मेरी जिंद उसके सदके हैं। 1।

जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥

मः 5 ॥
जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥
हरि छोडनि से दुरजना पड़हि दोजक कै सूलि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे अति प्यारे प्रभू ! अगर आप मेरा हाथ पकड़ ले। मैं आपको कभी ना छोड़ूं। जो मनुष्य प्रभू को बिसार देते हैं वह दुष्कर्मी हो के नर्क की असह पीड़ा में पड़ते हैं (भाव। पीड़ा से तड़फते हैं)। 2।

सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥

पउड़ी ॥
सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥
जपि जपि जीवहि संत जन पापा मलु धोवै ॥
चरन कमल हिरदै वसहि संकट सभि खोवै ॥
गुरु पूरा जिसु भेटीऐ मरि जनमि न रोवै ॥
प्रभ दरस पिआस नानक घणी किरपा करि देवै ॥18॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस परमात्मा के घर में सारे खजाने हैं वह जो कुछ करता है वही होता है। उसके संत जन उसको सिमर-सिमर के जीते हैं (भाव। उसके सिमरन को अपनी जिंदगी का आसरा बनाते हैं। क्योंकि प्रभू उनके) पापों की सारी मैल धो देता है। प्रभू के सुंदर चरण उनके मन में बसते हैं। प्रभू उनके सारे कलेश नाश कर देता है। (पर यह दाति गुरू के द्वारा ही मिलती है) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिलता है वह ना जनम-मरण के चक्कर में पड़ता है और ना ही दुखी होता है। प्रभू के दर्शन की चाह नानक को भी तीव्र है। पर वह अपने दर्शन स्वयं ही मेहर करके देता है। 18।

भोरी भरमु वञाइ पिरी मुहबति हिकु तू ॥

सलोक डखणा मः 5 ॥
भोरी भरमु वञाइ पिरी मुहबति हिकु तू ॥
जिथहु वंञै जाइ तिथाऊ मउजूदु सोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणा महला 5॥ (हे भाई !) अगर आप रक्ती मात्र भी (मन की) भटकना दूर कर दें और सिर्फ प्यारे प्रभू से प्रेम करें; तो जहाँ जाएँगे वहीं वह प्रभू हाजिर (दिखेगा)। 1।

चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥

मः 5 ॥
चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥
हंसा सेती चितु उलासहि कुकड़ दी ओडारी ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ (जिन मनुष्यों को) आती तो खूंडी की खेल खेलनी है। (पर। बड़े खिलाड़ियों की नकल करके) सुंदर घोड़ों पर चढ़ के बंदूकों के हत्थे (हाथ में) पकड़ते हैं (वे ऐसे हास्यास्पद लगते हैं। (जिन्हें) आती तो मुर्गे की उड़ान है पर हँसों के साथ (उड़ने के लिए अपने) मन को उत्साह देते हों। (ठीक यही हाल उन मनमुखों का समझो जो गुरमुखों की रीस करते हैं)। 2।

रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥

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पउड़ी ॥
रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥
हरि जसु लिखहि लाइ भावनी से हसत पविता ॥
अठसठि तीरथ मजना सभि पुंन तिनि किता ॥
संसार सागर ते उधरे बिखिआ गड़ु जिता ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे मित्र ! जो मनुष्य जीभ से हरी नाम उच्चारता है। और कानों से हरी नाम सुनता है। वह (मनुष्य संसार सागर से) बच जाता है। उसके वह हाथ पवित्र हैं जो श्रद्धा से परमात्मा की सिफत सालाह लिखते हैं। उस मनुष्य ने जैसे। अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लिया है और सारे पुंन कर्म कर लिए हैं। ऐसे मनुष्य संसार समुंद्र (के विकारों में डूबने) से बच जाते हैं। उन्होंने माया का किला जीत लिया (समझो)।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३२२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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