जीवन पदु निरबाणु इको सिमरीऐ ॥ दूजी नाही जाइ किनि बिधि धीरीऐ ॥ डिठा सभु संसारु सुखु न नाम बिनु ॥ तनु धनु होसी छारु जाणै कोइ जनु ॥ रंग रूप रस बादि कि करहि पराणीआ ॥ जिसु भुलाए आपि तिसु कल नही जाणीआ ॥ रंगि रते निरबाणु सचा गावही ॥ नानक सरणि दुआरि जे तुधु भावही ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: अगर वासना-रहित एक प्रभू को सिमरें तो असल जीवन का दर्जा हासिल होता है। (पर इस अवस्था की प्राप्ति के लिए) कोई और जगह नहीं। (क्योंकि) किसी और तरीके से मन टिक नहीं सकता। सारा संसार (टटोल के) देखा है। प्रभू के नाम के बिना सुख नहीं मिलता। (जगत इस तन और धन में सुख तलाशता है) ये शरीर और धन नाश हो जाएंगे। पर कोई विरला ही इस बात को समझता है। हे प्राणी ! आप क्या कर रहा है? (भाव। आप क्यों नहीं समझता कि जगत के) रंग-रूप और रस सब व्यर्थ हैं (इनके पीछे लगने से मन का टिकाव हासिल नहीं होता) ? (पर जीव के भी क्या बस में?) प्रभू जिस मनुष्य को खुद कुमार्ग पर डालता है। उसे मन की शांति की समझ नहीं आती। जो मनुष्य प्रभू के प्यार में रंगे हुए हैं। वह उस सदा कायम रहने वाले व वासना-रहित प्रभू को गाते हैं। हे नानक ! (प्रभू के आगे ये आरजू कर – हे प्रभू !) अगर आपको ठीक लगे तो जीव आपके दर पे आपकी शरण आते हैं। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य परमात्मा का आसरा लेते हैं। उनके लिए जनम-मरण का चक्र नहीं रहता। वे इसी जीवन में (प्रभू के दर पर) कबूल हो जाते हैं (क्योंकि) प्रभू की सिफत सालाह करके वे विकारों से बचे रहते हैं। वही मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्हें (ऐसे) गुरमुखों की संगति हासल होती है। पर अगर प्रभू का नाम बिसर जाय तो जीना धिक्कारयोग्य है टूटे हुए कच्चे धागे की तरह (व्यर्थ) है। हे नानक ! गुरमुखों के चरणों की धूड़ लाखों-करोड़ों प्रयाग आदि तीर्थों से भी ज्यादा पवित्र है। 16।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जिस मन में प्यार-स्वरूप हरी अकाल पुरख बस जाता है वह मन ऐसे है जैसे ओस की बूँद रूपी मोतियों से जड़ी हुई घास वाली धरती सोहने रंग वाली हो जाती है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर गुरू सतिगुरू नानक स्वयं प्रसन्न होता है। उसके सारे काम आसान हो जाते हैं। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ चारों तरफ दरियाओं पहाड़ों और वृक्षों पेड़ों पर से उड़ती-उड़ती चील ने जहाँ मुर्दा देखा वहीं आ बैठी (यही हाल उस मन का है जो परमात्मा से विछुड़ के विकारों में आ गिरता है)। 2।
पउड़ी ॥ जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥ नेड़ै देखउ पारब्रहमु इकु नामु धिआवउ ॥ होइ सगल की रेणुका हरि संगि समावउ ॥ दूखु न देई किसै जीअ पति सिउ घरि जावउ ॥ पतित पुनीत करता पुरखु नानक सुणावउ ॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं उस सच्चे प्रभू को सिमरूँ। जिससे सारे सुख और सारे फल मांगते हैं। उस पारब्रहम को अपने अंग-संग देखूँ और केवल उसी का ही नाम ध्याऊँ। सबके चरणों की धूड़ हो के मैं परमात्मा में लीन हो जाऊँ। मैं किसी भी जीव को दुख ना दूँ और (इस तरह) बा-इज्जत (अपने असल) घर जाऊँ (भाव। प्रभू की हजूरी में पहचूँ)। हे नानक ! मैं औरों को भी बताऊँ कि करतार अकाल-पुरख (विकारों में) गिरे हुओं को भी पवित्र करने वाला है। 17।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक दोहा महला 5॥ मैंने एक उस (हरी) को ही अपना मित्र बनाया है जो सारी ताकतों वाला है। परमात्मा ही मन और तन के काम आने वाली असली चीज है। मेरी जिंद उसके सदके हैं। 1।
मः 5 ॥ जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥ हरि छोडनि से दुरजना पड़हि दोजक कै सूलि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे अति प्यारे प्रभू ! अगर आप मेरा हाथ पकड़ ले। मैं तूझे कभी ना छोड़ूं। जो मनुष्य प्रभू को बिसार देते हैं वह दुष्कर्मी हो के नर्क की असह पीड़ा में पड़ते हैं (भाव। पीड़ा से तड़फते हैं)। 2।
पउड़ी ॥ सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥ जपि जपि जीवहि संत जन पापा मलु धोवै ॥ चरन कमल हिरदै वसहि संकट सभि खोवै ॥ गुरु पूरा जिसु भेटीऐ मरि जनमि न रोवै ॥ प्रभ दरस पिआस नानक घणी किरपा करि देवै ॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस परमात्मा के घर में सारे खजाने हैं वह जो कुछ करता है वही होता है। उसके संत जन उसको सिमर-सिमर के जीते हैं (भाव। उसके सिमरन को अपनी जिंदगी का आसरा बनाते हैं। क्योंकि प्रभू उनके) पापों की सारी मैल धो देता है। प्रभू के सुंदर चरण उनके मन में बसते हैं। प्रभू उनके सारे कलेश नाश कर देता है। (पर यह दाति गुरू के द्वारा ही मिलती है) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिलता है वह ना जनम-मरण के चक्कर में पड़ता है और ना ही दुखी होता है। प्रभू के दर्शन की चाह नानक को भी तीव्र है। पर वह अपने दर्शन स्वयं ही मेहर करके देता है। 18।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणा महला 5॥ (हे भाई !) अगर आप रक्ती मात्र भी (मन की) भटकना दूर कर दे और सिर्फ प्यारे प्रभू से प्रेम करे; तो जहाँ जाएगा वहीं वह प्रभू हाजिर (दिखेगा)। 1।
मः 5 ॥ चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥ हंसा सेती चितु उलासहि कुकड़ दी ओडारी ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ (जिन मनुष्यों को) आती तो खूंडी की खेल खेलनी है। (पर। बड़े खिलाड़ियों की नकल करके) सुंदर घोड़ों पर चढ़ के बंदूकों के हत्थे (हाथ में) पकड़ते हैं (वे ऐसे हास्यास्पद लगते हैं। (जिन्हें) आती तो मुर्गे की उड़ान है पर हँसों के साथ (उड़ने के लिए अपने) मन को उत्साह देते हों। (ठीक यही हाल उन मनमुखों का समझो जो गुरमुखों की रीस करते हैं)। 2।
पउड़ी ॥ रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥ हरि जसु लिखहि लाइ भावनी से हसत पविता ॥ अठसठि तीरथ मजना सभि पुंन तिनि किता ॥ संसार सागर ते उधरे बिखिआ गड़ु जिता ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे मित्र ! जो मनुष्य जीभ से हरी नाम उच्चारता है। और कानों से हरी नाम सुनता है। वह (मनुष्य संसार सागर से) बच जाता है। उसके वह हाथ पवित्र हैं जो श्रद्धा से परमात्मा की सिफत सालाह लिखते हैं। उस मनुष्य ने जैसे। अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लिया है और सारे पुंन कर्म कर लिए हैं। ऐसे मनुष्य संसार समुंद्र (के विकारों में डूबने) से बच जाते हैं। उन्होंने माया का किला जीत लिया (समझो)।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर वासना-रहित एक प्रभू को सिमरें तो असल जीवन का दर्जा हासिल होता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।