कहि कबीर मिलु अंत की बेला ॥4॥2॥
जब हम एको एकु करि जानिआ ॥
तब लोगह काहे दुखु मानिआ ॥1॥
हम अपतह अपुनी पति खोई ॥
हमरै खोजि परहु मति कोई ॥1॥ रहाउ ॥
हम मंदे मंदे मन माही ॥
साझ पाति काहू सिउ नाही ॥2॥
पति अपति ता की नही लाज ॥
तब जानहुगे जब उघरैगो पाज ॥3॥
कहु कबीर पति हरि परवानु ॥
सरब तिआगि भजु केवल रामु ॥4॥3॥
नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु ॥
बन का मिरगु मुकति सभु होगु ॥1॥
किआ नागे किआ बाधे चाम ॥
जब नही चीनसि आतम राम ॥1॥ रहाउ ॥
मूड मुंडाए जौ सिधि पाई ॥
मुकती भेड न गईआ काई ॥2॥
बिंदु राखि जौ तरीऐ भाई ॥
खुसरै किउ न परम गति पाई ॥3॥
कहु कबीर सुनहु नर भाई ॥
राम नाम बिनु किनि गति पाई ॥4॥4॥
संधिआ प्रात इस्नानु कराही ॥
जिउ भए दादुर पानी माही ॥1॥
जउ पै राम राम रति नाही ॥
ते सभि धरम राइ कै जाही ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ रति बहु रूप रचाही ॥
तिन कउ दइआ सुपनै भी नाही ॥2॥
चारि चरन कहहि बहु आगर ॥
साधू सुखु पावहि कलि सागर ॥3॥
कहु कबीर बहु काइ करीजै ॥
सरबसु छोडि महा रसु पीजै ॥4॥5॥
किआ जपु किआ तपु किआ ब्रत पूजा ॥
जा कै रिदै भाउ है दूजा ॥1॥
रे जन मनु माधउ सिउ लाईऐ ॥
चतुराई न चतुरभुजु पाईऐ ॥ रहाउ ॥
परहरु लोभु अरु लोकाचारु ॥
परहरु कामु क्रोधु अहंकारु ॥2॥
करम करत बधे अहंमेव ॥
मिलि पाथर की करही सेव ॥3॥
कहु कबीर भगति करि पाइआ ॥
भोले भाइ मिले रघुराइआ ॥4॥6॥
गरभ वास महि कुलु नही जाती ॥
ब्रहम बिंदु ते सभ उतपाती ॥1॥
कहु रे पंडित बामन कब के होए ॥
बामन कहि कहि जनमु मत खोए ॥1॥ रहाउ ॥
जौ तूं ब्राहमणु ब्रहमणी जाइआ ॥
तउ आन बाट काहे नही आइआ ॥2॥
तुम कत ब्राहमण हम कत सूद ॥
हम कत लोहू तुम कत दूध ॥3॥
कहु कबीर जो ब्रहमु बीचारै ॥
सो ब्राहमणु कहीअतु है हमारै ॥4॥7॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।