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अंग 324

अंग
324
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तूं सतिगुरु हउ नउतनु चेला ॥
कहि कबीर मिलु अंत की बेला ॥4॥2॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप (मेरा) गुरू है। मैं आपका नया सिख हूँ (भाव। आपके साथ वैसे ही प्यार है जैसे नया नया सिख अपने गुरू के साथ करता है)। कबीर कहता है, अब तो (मनुष्य जनम) आखिरी समय है। मुझे जरूर मिल। 4। 2।
गउड़ी कबीर जी ॥
जब हम एको एकु करि जानिआ ॥
तब लोगह काहे दुखु मानिआ ॥1॥
हम अपतह अपुनी पति खोई ॥
हमरै खोजि परहु मति कोई ॥1॥ रहाउ ॥
हम मंदे मंदे मन माही ॥
साझ पाति काहू सिउ नाही ॥2॥
पति अपति ता की नही लाज ॥
तब जानहुगे जब उघरैगो पाज ॥3॥
कहु कबीर पति हरि परवानु ॥
सरब तिआगि भजु केवल रामु ॥4॥3॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ जब हमने (भाव। मैंने) ये समझ लिया है कि सब जगह एक परमात्मा ही व्यापक है। तो (पता नहीं) लोगों ने इस बात को क्यों बुरा मनाया है। 1। मैं निसंग हो गया हूँ और मुझे ये परवाह नहीं कि कोई मनुष्य इज्जत करे या ना करे। (आप लोगों को जगत में मान-सम्मान का ख्याल है। इस वास्ते जिस राह मैं पड़ा हूँ) उस राह पे मेरे पीछे ना चलो। 1। रहाउ। अगर मैं बुरा हूँ तो अपने ही अंदर बुरा हूँ ना। (किसी को इससे क्या?); मैंने किसी के साथ (इसलिए) कोई मेल-जोल भी नहीं रखा हुआ। 2। मेरी कोई इज्जत करे या निरादरी करे। मैं इसमें कोई हीनता नहीं समझता। क्योंकि आपको भी तब समझ आएगी (कि असल इज्जत व निरादरी कौन सी है) जब आपका ये जगत दिखावा उघड़ जाएगा। 3। हे कबीर ! कह, (असल) इज्जत उसी की है। जिसे प्रभू कबूल कर ले। (इसलिए। हे कबीर !) और सब कुछ (भाव। दुनिया की लोक-लाज) त्याग के परमात्मा का सिमरन कर। 4। 3।
गउड़ी कबीर जी ॥
नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु ॥
बन का मिरगु मुकति सभु होगु ॥1॥
किआ नागे किआ बाधे चाम ॥
जब नही चीनसि आतम राम ॥1॥ रहाउ ॥
मूड मुंडाए जौ सिधि पाई ॥
मुकती भेड न गईआ काई ॥2॥
बिंदु राखि जौ तरीऐ भाई ॥
खुसरै किउ न परम गति पाई ॥3॥
कहु कबीर सुनहु नर भाई ॥
राम नाम बिनु किनि गति पाई ॥4॥4॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ अगर नंगे फिरने से परमात्मा के साथ मिलाप हो सकता तो जंगल के हरेक पशु की मुक्ति हो जानी चाहिए। 1। तब तक नंगे रहने से क्या सँवर जाना है और शरीर पर चमड़ी (मृगशाला) लपेटने से क्या मिल जाना है? (हे भाई !) जब तक आप परमात्मा को नहीं पहचानता। 1। रहाउ। अगर सिर मुनाने से सिद्धि मिल सकती (तो क्या कारण है कि) कोई भी भेड़ (अब तक मुक्त नहीं हुई?)। 2। हे भाई ! अगर ब्रहमचारी रहने से (संसार-समुंद्र से) पार हो सकते हैं। तो हिजड़े को क्यों मुक्ति नहीं मिल जाती?। 3। हे कबीर ! (बेशक) कह, हे भाईओ ! परमात्मा का नाम सिमरे बिना किसी को मुक्ति नहीं मिली। 4। 4।
गउड़ी कबीर जी ॥
संधिआ प्रात इस्नानु कराही ॥
जिउ भए दादुर पानी माही ॥1॥
जउ पै राम राम रति नाही ॥
ते सभि धरम राइ कै जाही ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ रति बहु रूप रचाही ॥
तिन कउ दइआ सुपनै भी नाही ॥2॥
चारि चरन कहहि बहु आगर ॥
साधू सुखु पावहि कलि सागर ॥3॥
कहु कबीर बहु काइ करीजै ॥
सरबसु छोडि महा रसु पीजै ॥4॥5॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ (जो मनुष्य) सवेरे और शाम को (भाव। दोनों वक्त निरा) स्नान ही करते हैं (और समझते हैं कि हम पवित्र हो गए हैं। वे इस तरह हैं) जैसे पानी में मेंढक बस रहे हैं। 1। पर अगर उनके हृदय में परमात्मा के नाम का प्यार नहीं है तो वे सारे धर्मराज के वश पड़ते हैं। 1। रहाउ। (कई मनुष्य) शरीर के मोह में ही (भाव। शरीर को पालने के खातिर ही) कई भेष बनाते हैं; उनको कभी सपने में दया नहीं आई (उनका हृदय कभी द्रवित नहीं हुआ)। 2। ब्हुत समझदार मनुष्य चार वेद (आदि धर्म पुस्तकों को) ही (निरे) पढ़ते हैं (पर निरा पढ़ने से क्या होना है?)। इस संसार समुंद्र में (सिर्फ) संत-जन ही (असल) सुख पाते हैं। 3। हे कबीर ! कह, सारी विचारों का निष्कर्श ये है कि सब पदार्थों का मोह त्याग के परमात्मा के नाम का रस पीना चाहिए। 4। 5।
कबीर जी गउड़ी ॥
किआ जपु किआ तपु किआ ब्रत पूजा ॥
जा कै रिदै भाउ है दूजा ॥1॥
रे जन मनु माधउ सिउ लाईऐ ॥
चतुराई न चतुरभुजु पाईऐ ॥ रहाउ ॥
परहरु लोभु अरु लोकाचारु ॥
परहरु कामु क्रोधु अहंकारु ॥2॥
करम करत बधे अहंमेव ॥
मिलि पाथर की करही सेव ॥3॥
कहु कबीर भगति करि पाइआ ॥
भोले भाइ मिले रघुराइआ ॥4॥6॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: कबीर जी गउड़ी ॥ उसका जप करना किस अर्थ? उसका तप करना किस मतलब का? उसकी वर्त और पूजा के क्या गुण?। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के बिना और किसी का प्यार है।1। हे भाई ! मन को परमात्मा के साथ जोड़ना चाहिए (सिमरन को त्याग के और) समझदारियों से ईश्वर नहीं मिल सकता। 1। रहाउ। (हे भाई !) लालच, दिखावा, काम, क्रोध और अहंकार छोड़ दे। 2। मनुष्य धार्मिक रस्में करते-करते अहंकार में बंधे हुए हैं। और मिल के पत्थरों ही की पूजा कर रहे हैं (पर ये सब कुछ व्यर्थ है)। 3। हे कबीर ! कह, परमात्मा बंदगी करने से (ही) मिलता है। भोले स्वाभाव से प्राप्त होता है। 4। 6।
गउड़ी कबीर जी ॥
गरभ वास महि कुलु नही जाती ॥
ब्रहम बिंदु ते सभ उतपाती ॥1॥
कहु रे पंडित बामन कब के होए ॥
बामन कहि कहि जनमु मत खोए ॥1॥ रहाउ ॥
जौ तूं ब्राहमणु ब्रहमणी जाइआ ॥
तउ आन बाट काहे नही आइआ ॥2॥
तुम कत ब्राहमण हम कत सूद ॥
हम कत लोहू तुम कत दूध ॥3॥
कहु कबीर जो ब्रहमु बीचारै ॥
सो ब्राहमणु कहीअतु है हमारै ॥4॥7॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ माँ के पेट में तो किसी को ये समझ नहीं होती कि मैं किस कुल का हूँ। सारे जीवों की उत्पत्ति परमात्मा के अंश से (हो रही) है (सब का मूल कारण परमात्मा स्वयं है); 1। हे पण्डित ! आप ब्राहमण कब से बन गए हैं? ये कह,कह के कि मैं ब्राहमण हूँ। मैं ब्राहमण हूँ। मानस जनम (अहंकार में व्यर्थ) ना गवाओ। 1। रहाउ। अगर (हे पण्डित !) आप (सचमुच) ब्राहमण है और ब्राहमणी के गर्भ से पैदा हुआ है। तो किसी और रास्ते से क्यों नहीं पैदा हो गया?। 2। (हे पंडित !) आप कैसे ब्राहमण (बन गए) ? हम कैसे शूद्र (रह गए) ? हमारे शरीर में कैसे निरा लहू ही है? आपके शरीर में कैसे (लहू की जगह) दूध है?। 3। हे कबीर ! कह, जो परमात्मा (ब्रहम) को सिमरता है – हम तो उस मनुष्य को ब्राहमण कहते हैं 4। 7।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।