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अंग ११८६ · बसंत

अंग
1186
बसंत
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  1. तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥
  2. मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥
  3. साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥
  4. पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥
  5. माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥
  6. मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥

तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥

अंग ११८५ से चला आ रहा अंश

तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥
तू समरथु सुआमी मेरा हउ किआ जाणा तेरी पूजा ॥3॥
तेरा महलु अगोचरु मेरे पिआरे बिखमु तेरा है भाणा ॥
कहु नानक ढहि पइआ दुआरै रखि लेवहु मुगध अजाणा ॥4॥2॥20॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप (सबसे) बड़े दातार हैं। आप (सबसे) बड़े समझदार हैं (आपके बराबर का) कोई अन्य दूसरा नहीं। आप सब ताकतों के मालिक हैं। आप मेरे पति हैं। मैं आपकी भक्ति करनी नहीं जानता (आप स्वयं ही मेहर करें। तो कर सकता हॅूँ)। 3। हे मेरे प्यारे प्रभू ! जहाँ आप बसते हैं वह ठिकाना हम जीवों की ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। आपकी रजा में चलना बड़ा मुश्किल काम है। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) मैं आपके दर पर गिर गया हूँ। मुझ मूर्ख को मुझ अंजान को (आप स्वयं हाथ दे के) बचा ले। ४।२।२०।

मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥

बसंतु हिंडोल महला 5 ॥
मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥
पिता पारब्रहम प्रभ धनी ॥
मोहि निसतारहु निरगुनी ॥1॥ रहाउ ॥
ओपति परलउ प्रभ ते होवै इह बीचारी हरि जनी ॥2॥
नाम प्रभू के जो रंगि राते कलि महि सुखीए से गनी ॥3॥
अवरु उपाउ न कोई सूझै नानक तरीऐ गुर बचनी ॥4॥3॥21॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 5॥ हे भाई ! अहंकार के कारण (जीव की बुद्धि माया की खातिर) दौड़-भाग में फसी रहती है। (तभी जीव अपने) मूल-प्रभू के साथ सांझ नहीं डालता। और अपने आप को भी नहीं समझता। 1। हे मेरे पिता पारब्रहम ! हे मेरे मालिक प्रभू ! मुझ गुणहीन को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा। 1। रहाउ। हे भाई ! संत-जनों ने तो यही विचार किया है कि जगत की उत्पक्ति और जगत का विनाश परमात्मा के हुकम अनुसार ही होता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं। मैं तो उनको ही सुखी जीवन वाले समझता हूँ। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू के बचनों पर चल कर ही संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। कोई और तरीका नहीं सूझता (जिसकी मदद से पार हुआ जा सके)। 4। 3। 21।

साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बसंतु हिंडोल महला 9 ॥
साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥
या भीतरि जो रामु बसतु है साचो ताहि पछानो ॥1॥ रहाउ ॥
इहु जगु है संपति सुपने की देखि कहा ऐडानो ॥
संगि तिहारै कछू न चालै ताहि कहा लपटानो ॥1॥
उसतति निंदा दोऊ परहरि हरि कीरति उरि आनो ॥
जन नानक सभ ही मै पूरन एक पुरख भगवानो ॥2॥1॥

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ रागु बसंतु हिंडोल महला 9॥ हे संत जनो ! इस शरीर को नाशवंत समझो। इस शरीर में जो पदार्थ बस रहा है। (सिर्फ) उसको सदा कायम रहने वाला जानो। 1। रहाउ। हे भाई ! यह जगत उस धन के समान ही है जो सपने में मिल जाता है (और। जागते ही खत्म हो जाता है) (इस जगत को धन को) देख के अहंकार क्यों करता है। यहाँ कोई भी चीज़ (अंत समय में) आपके साथ नहीं जा सकती। फिर इससे क्यों चिपका हुआ है। 1। हे भाई ! किसी की खुशामद किसी की निंदा- ये दोनों काम छोड़ दे। सिर्फ परमात्मा की सिफत-सालाह (अपने) हृदय में बसाओ। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) सिर्फ वह भगवान पुरख ही (सलाहने-योग्य है जो) सब जीवों में व्यापक है। 2। 1।

पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥

बसंतु महला 9 ॥
पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥
मनु चंचलु या ते गहिओ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जोगी जंगम अरु संनिआस ॥
सभ ही परि डारी इह फास ॥1॥
जिहि जिहि हरि को नामु सम॑ारि ॥
ते भव सागर उतरे पारि ॥2॥
जन नानक हरि की सरनाइ ॥
दीजै नामु रहै गुन गाइ ॥3॥2॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे भाई ! पापों में फसाने वाली काम-वासना (मनुष्य के) हृदय में टिकी रहती है। इस वास्ते (मनुष्य का) चंचल मन काबू में नहीं आ सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! जोगी जंगम और सन्यासी (जो अपनी तरफ़ से माया का) त्याग कर गए हैं- इस सबके ऊपर ही (माया ने काम-वासना का) यह फंदा फेंका हुआ है। 1। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाया है। वे सभी संसार-समुंद्र (के विकारों) से पार लांघ जाते हैं। 2। हे नानक ! परमात्मा का दास परमात्मा की शरण पड़ा रहता है (परमात्मा के दर पर वह अरजोई करता रहता है- हे प्रभू ! अपने दास को अपना) नाम दे (ताकि आपका दास आपके) गुण गाता रहे (इस तरह वह कामादिक विकारों की मार से बचा रहता है)। 3। 2।

माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥

बसंतु महला 9 ॥
माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥
मनु मेरो धावन ते छूटिओ करि बैठो बिसरामु ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ ममता तन ते भागी उपजिओ निरमल गिआनु ॥
लोभ मोह एह परसि न साकै गही भगति भगवान ॥1॥
जनम जनम का संसा चूका रतनु नामु जब पाइआ ॥
त्रिसना सकल बिनासी मन ते निज सुख माहि समाइआ ॥2॥
जा कउ होत दइआलु किरपा निधि सो गोबिंद गुन गावै ॥
कहु नानक इह बिधि की संपै कोऊ गुरमुखि पावै ॥3॥3॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे (मेरी) माँ ! (जब का गुरू की शरण पड़ कर) मैंने नाम-धन हासिल किया है। मेरा मन (माया की खातिर) दौड़-भाग करने से बच गया है। (अब मेरा मन नाम-धन में) ठिकाना बना के बैठ गया है। 1। रहाउ। हे मेरी माँ ! (गुरू की किरपा से मेरे अंदर) शुद्ध-स्वरूप-परमात्मा के साथ गहरी सांझ बन गई है (जिसके कारण) मेरे शरीर में से माया जोड़ने की (धन एकत्र करने की) लालसा दूर हो गई है। (जब से मैंने) भगवान की भक्ति हृदय में बसाई है लोभ और मोह ये मेरे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। 1। हे मेरी माँ ! जब से (गुरू की कृपा से) मैंने परमात्मा का अमूल्य नाम पाया है। मेरा जन्मों-जन्मांतरों का सहम दूर हो गया है; मेरे मन में से सारी तृष्णा समाप्त हो गई है। अब मैं उस आनंद में टिका रहता हूँ जो सदा मेरे साथ बना रहने वाला है। 2। हे माँ ! कृपा का खजाना गोबिंद जिस मनुष्य पर दयावान होता है। वह मनुष्य उसके गुण गाता रहता है। हे नानक ! कह- (हे माँ !) कोई विरला मनुष्य इस किस्म का धन गुरू के सन्मुख रह के हासिल करता है। 3। 3।

मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥

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बसंतु महला 9 ॥
मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥
तनु बिनसै जम सिउ परै कामु ॥1॥ रहाउ ॥
इहु जगु धूए का पहार ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे मन ! आप परमात्मा का नाम क्यों भुलाए बैठे हैं। (जब) शरीर नाश हो जाता है। (तब परमात्मा के नाम के बिना) जमों से वास्ता पड़ता है। 1। रहाउ। हे मन ! यह संसार (तो। मानो) धूएँ का पहाड़ है (जिसको हवा का एक बुल्ला उड़ा के ले जाता है)।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी; महला ९: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११८६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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