नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: हे मन ! आप क्या समझ के (इस जगत को) सदा कायम रहने वाला माने बैठा है। 1। हे मन ! (अच्छी तरह समझ ले कि) धन। स्त्री। जयदाद। घर- इनमें से कोई भी चीज़ (मौत के वक्त जीव के) साथ नहीं जाती। 2। हे नानक ! कह- (हे भाई !) सिर्फ परमात्मा की भक्ति ही मनुष्य के साथ रहती है (इसलिए) सिर्फ परमात्मा के प्यार में (टिक के) उसका भजन किया कर। 3। 4।
बसंतु महला 9 ॥ कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥ कछु बिगरिओ नाहिन अजहु जाग ॥1॥ रहाउ ॥ सम सुपनै कै इहु जगु जानु ॥ बिनसै छिन मै साची मानु ॥1॥ संगि तेरै हरि बसत नीत ॥ निस बासुर भजु ताहि मीत ॥2॥ बार अंत की होइ सहाइ ॥ कहु नानक गुन ता के गाइ ॥3॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 9॥ हे भाई ! नाशवंत दुनिया के लोभ में फस के (हरी-नाम से टूट के) कहाँ भटकता फिरता है। अब तो समझदार बन। (और। परमात्मा का नाम जपा कर। अगर बाकी की उम्र सिमरन में गुजार ले। तो भी आपका) कुछ बिगड़ा नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! इस जगत को सपने (में देखे पदार्थों) के बराबर समझ। इह बात सच्ची मान कि (यह जगत) एक छिन में नाश हो जाता है। 1। हे मित्र ! परमात्मा सदा आपके साथ बसता है। आप दिन-रात उसका ही भजन किया कर। 2। हे नानक ! कह- (हे भाई !) आखिरी समय में परमात्मा ही मददगार बनता है। आप (सदा) उसके गुण गाया कर। 3। 5।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1 असटपदीआ घरु 1 दुतुकीआ सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई !) देख। जिसके चित्त में परमात्मा का नाम नहीं है वह माया-ग्रसित जीव कौए (के स्वभाव वाला) है; प्रभू का नाम भुला के (वह कौए की तरह) चौगे पर गिरता है। उसका मन (माया की ओर ही) डोलता रहता है। उसके चित्त में (सदा) खोट ही होता है। पर दुनिया की माया के साथ यह प्रीति झूठी है। कभी भी साथ नहीं निभती। 1। (हे भाई !) काम और क्रोध (मानो) जहर है (जो आत्मिक जीवन को समाप्त कर देता है)। यह (जैसे) एक करड़ा बज्र बोझ है (जिसके नीचे दब के आत्मिक जीवन मर जाता है)। गुणों वाला आचरण (आत्मिक जीवन) परमात्मा का नाम सिमरन के बिना कभी बन ही नहीं सकता। 1। (हे भाई !) देख। जैसे बवंडर में रेत का घर बना हुआ हो। जैसे बरखा के वक्त बुलबुला बन जाता है (वैसे ही इस शरीर की भी हस्ती है। जिसको सृजनहार ने अपनी कुदरति का) चक्का घुमा के (पिता के वीर्य की) बूँद मात्र से रच दिया है (जैसे कोई कुम्हार चक्का घुमा के मिट्टी से बर्तन बना देता है)। (सो। हे भाई ! यदि तूने आत्मिक मौत से बचना है तो अपनी जिंद को) उस प्रभू के नाम की दासी बना जिसकी ज्योति सब जीवों में मौजूद है। 2। हे प्रभू ! आप सारे जीव पैदा करके सब के सिर पर शिरोमणि है। गुरू है। मेरी यह तमन्ना है कि मैं आपकी भगती करूँ। मैं आपके चरणों में लगा रहूँ। आपके नाम-रंग में रंगा रहूँ और आपका ही पल्ला पकड़े रखूँ। जो मनुष्य आपके नाम को (अपनी जिंद से) दूर-दूर रख के (जीवन-पथ पर) चलता है वह आपका चोर है। 3। हे मेरी माँ ! जो मनुष्य (विकारों की) जहर ही पल्ले बाँधता है वह अपनी इज्जत गवा लेता है। पर जो व्यक्ति सदा-स्थिर परमात्मा के नाम-रंग में रंगा जाता है। वह प्रभू के देश में आदर से जाता है। (उसको ये यकीन होता है कि) प्रभू जो कुछ करता है अपनी रज़ा में करता है (किसी और का उसकी रज़ा में कोई दख़ल नहीं)। और जो व्यक्ति उसके डर-अदब में रहने लग जाता है वह (इस जीवन-यात्रा में काम-क्रोध आदि की ओर से) बे-फिक्र हो के चलता है। 4। सुंदर जीव-स्त्री दुनिया के बढ़िया पदार्थों के भोग की अभिलाषा करती है। पर ये पान फूल मीठे पदार्थों के सवाद- यह सब और। और विकार और रोग ही पैदा करते हैं। जितना ज्यादा वह इन भोगों में खिल्लियाँ उड़ाती है और खुश होती है उतना ही ज्यादा दुख-रोग व्यापता है। पर। जो जीव-स्त्री प्रभू की शरण में आ जाती है (वह रजा में चलती है उसको निष्चय हो जाता है कि) जो कुछ प्रभू करता है वही होता है। 5। जो जीव-स्त्री सुंदर-सुंदर कपड़े पहनती है बढ़-चढ़ के श्रृंगार करती है। अपनी काया को देख-देख के फूली नहीं समाती। उसका रूप उसको और ज्यादा विकारों की तरफ प्रेरित करता है। दुनियाँ की आशाएं और ख़्वाहिशें उसके (दसवें) दरवाजे को बँद कर देती हैं। परमात्मा के नाम के बिना उसका हृदय-घर सूना ही रहता है। 6। हे जिंदे ! उठ उद्यम कर। आप सारे जगत के राजा-प्रभू की अंश है। आप राज-पुत्री है। आप राज कुमारी है। अमृत बेला की संभाल कर के नित्य उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम सिमर। प्रभू के प्रेम के आसरे रह के उस प्रीतम की सेवा-भक्ति कर। और गुरू के शबद में जुड़ के माया की तृष्णा को दूर कर। यह तृष्णा जहर है जो आपके आत्मिक जीवन को मार देगी। 7। हे नानक ! (प्रार्थना कर और कह-) आप मोहन ने (अपने करिश्मों से) मेरा मन मोह लिया है। (कृपा कर ताकि) मैं गुरू के शबद के माध्यम से आपको पहचान सकूँ। हे प्रभू ! हम जीव आपके दर पर खड़े (विनती करते हैं)। कृपा कर। आपके नाम में जुड़ के हम संतोष धारण कर सकें। 8। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ (माया के मोह के कारण) गलत रास्ते पर पड़ा हुआ मन भटकता है (माया की खातिर ही) दौड़-भाग करता रहता है। बड़ा लालची हुआ रहता है। उस माया के लालच में फसा रहता है। जिसके फंदे में से निकलना बहुत मुश्किल है (जब तक मन माया के अधीन रहता है। तब तक) यह कभी ठहराव की अवस्था में नहीं दिखता। एक प्रभू के प्रेम में (मगन) नहीं दिखता। जैसे मछली (भिक्ती के लालच में) अपने गले में कुंडी डलवा लेती है। (वैसे ही मन माया की गुलामी में अपने आप को फसा लेता है)। 1। (माया के मोह के कारण) गलत राह पर पड़ा हुआ मन सदा-स्थिर प्रभू के नाम में (जुड़ के ही) अपनी भूल को समझता है। (जब मन) गुरू के शबद को विचारता है तब यह आत्मिक अडोलता के भाव में (टिकता है)। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! आप क्या समझ के (इस जगत को) सदा कायम रहने वाला माने बैठा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।