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अंग 1185

अंग
1185
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बाह पकरि भवजलु निसतारिओ ॥2॥
प्रभि काटि मैलु निरमल करे ॥
गुर पूरे की सरणी परे ॥3॥
आपि करहि आपि करणैहारे ॥
करि किरपा नानक उधारे ॥4॥4॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बाँह से पकड़ कर उसने (मुझे) संसार-समुंद्र (के विकारों) से पार लंघा दिया है। 2। परमात्मा ने (स्वयं उनके अंदर से विकारों की) मैल काट के उनको पवित्र जीवन वाला बना लिया। हे भाई ! जो भी मनुष्य पूरे गुरू की शरण पड़ गए। 3। हे सब कुछ कर सकने वाले प्रभू ! आप सब कुछ स्वयं ही कर रहा है। मेहर कर के (मुझे) नानक को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा ले। 4। 4। 17।
बसंतु महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देखु फूल फूल फूले ॥
अहं तिआगि तिआगे ॥
चरन कमल पागे ॥
तुम मिलहु प्रभ सभागे ॥
हरि चेति मन मेरे ॥ रहाउ ॥
सघन बासु कूले ॥
इकि रहे सूकि कठूले ॥
बसंत रुति आई ॥
परफूलता रहे ॥1॥
अब कलू आइओ रे ॥
इकु नामु बोवहु बोवहु ॥
अन रूति नाही नाही ॥
मतु भरमि भूलहु भूलहु ॥
गुर मिले हरि पाए ॥ जिसु मसतकि है लेखा ॥
मन रुति नाम रे ॥
गुन कहे नानक हरि हरे हरि हरे ॥2॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ (फिर) देख (आपके अंदर) फूल ही फूल खिले हुए हैं (आपके अंदर आत्मिक प्रफुल्लता है)। हे मेरे मन ! (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। अहम् दूर कर। हे भाग्यशाली मन ! प्रभू के सुंदर चरणों से चिपका रह। प्रभू के साथ जुड़ा रह। हे मेरे मन ! परमात्मा को याद करता रह। रहाउ। (तब वृक्ष तरावट से) घनी छाया वाले। सुगंधि वाले और कोमल हो जाते हैं। पर कई वृक्ष ऐसे भी हैं जो (बसंत के आने पर भी) सूखे रहते हैं। और सूखे काष्ठ की तरह कठोर रहते हैं (इस तरह। हे मेरे मन ! जब बसंत की ऋतु आती है। हे मन ! चाहे आत्मिक जीवन की उमंग प्राप्त कर सकने वाली मनुष्य-जीवन की ऋतु आपके ऊपर आई है। फिर भी जो भाग्यशाली मनुष्य हरी-नाम जपता है। वही) खिला रह सकता है। 1। हे मेरे मन ! अब मनुष्य-जन्म मिलने पर (नाम बोने का) समय आपको मिला हुआ है। (अपने हृदय के खेत में) सिर्फ हरी-नाम बीज। सिर्फ हरी-नाम बो। (मनुष्य-जीवन के बिना) किसी और जन्म में परमात्मा का नाम नहीं बोया जा सकेगा। हे मेरे मन ! देखना। (माया की) दौड़-भाग में पड़ के कहीं गलत राह पर ना पड़ जाना। हे मन ! (ये मानस-जनम ही) नाम-बीजने का समय है। (पर। हे मन !) गुरू को मिल के ही हरी-नाम प्राप्त किया जा सकता है। जिस मनुष्य के माथे पर (धुर से ही नाम की प्राप्ति का) लेख उघड़ता है हे मन ! यह मौसम (अर्थात् मनुष्य जन्म) प्रभु नाम के सिमरन का है, हे नानक ! वह मनुष्य ही सदा परमात्मा के गुण उचारता है। 2। 18।
बसंतु महला 5 घरु 2 हिंडोल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥
हरि नामै के होवहु जोड़ी गुरमुखि बैसहु सफा विछाइ ॥1॥
इन॑ बिधि पासा ढालहु बीर ॥
गुरमुखि नामु जपहु दिनु राती अंत कालि नह लागै पीर ॥1॥ रहाउ ॥
करम धरम तुम॑ चउपड़ि साजहु सतु करहु तुम॑ सारी ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु जीतहु ऐसी खेल हरि पिआरी ॥2॥
उठि इसनानु करहु परभाते सोए हरि आराधे ॥
बिखड़े दाउ लंघावै मेरा सतिगुरु सुख सहज सेती घरि जाते ॥3॥
हरि आपे खेलै आपे देखै हरि आपे रचनु रचाइआ ॥
जन नानक गुरमुखि जो नरु खेलै सो जिणि बाजी घरि आइआ ॥4॥1॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 घरु 2 हिंडोल सतिगुर प्रसादि॥ हे मेरे वीर ! इकट्ठे हो के साध-संगति में बैठा करो। (वहाँ प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के (अपने मन में से) मेर-तेर मिटाया करो। गुरू की शरण पड़े रहना- यह चौपड़ का कपड़ा बिछा के मन को टिकाया करो। (साध-संगति में) हरी-नाम सिमरन का चौपड़ खेलने वाले साथी बना करो। 1। इस तरह (इस जीवन-खेल में) दाँव चलाओ (पासा फेंको)। हे वीर ! (अर्थात। हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर दिन-रात परमात्मा का नाम जपा करो। (यदि इस तरह ये खेल खेलते रहोगे तो) जिंदगी के आखिरी समय में (जमों का) दुख नहीं सताएगा। 1। रहाउ। हे मेरे वीर ! नेक काम करने को आप चौपड़ की खेल बनाओ। ऊँचे आचरण को नरद बनाओ। (इस नरद की बरकति से) आप (अपने अंदर से) काम को क्रोध को लोभ को और मोह को वश में करो। हे वीर ! ऐसी ही खेल परमात्मा को भाती है (पसंद आती है)। 2। हे मेरे वीर ! अमृत बेला में उठ के (नाम-जल में) डुबकी लगाया करो। सोए हुए भी परमात्मा की आराधना में जुड़े रहो। (जो मनुष्य यह उद्यम करते हैं उन्हें) प्यारा गुरू (कामादिक वैरियों से मुकाबले के) मुश्किल पैतड़ों में कामयाब कर देता है। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद से प्रभू-चरणों में टिके रहते हैं। 3। हे दास नानक ! (कह- हे वीर !) परमात्मा स्वयं ही जगत-खेल खेलता है। स्वयं ही यह जगत खेल देखता है। प्रभू ने स्वयं ही ये रचना रची हुई है। यहाँ जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (कामादिक के मुकाबले की जीवन-खेल) खेलता है। वह यह बाजी जीत के प्रभू-दर पर पहुँचता है। 4। 1। 19।
बसंतु महला 5 हिंडोल ॥
तेरी कुदरति तूहै जाणहि अउरु न दूजा जाणै ॥
जिस नो क्रिपा करहि मेरे पिआरे सोई तुझै पछाणै ॥1॥
तेरिआ भगता कउ बलिहारा ॥
थानु सुहावा सदा प्रभ तेरा रंग तेरे आपारा ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी सेवा तुझ ते होवै अउरु न दूजा करता ॥
भगतु तेरा सोई तुधु भावै जिस नो तू रंगु धरता ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 हिंडोल॥ हे प्रभू ! आपकी कुदरति (ताकत) आप स्वयं ही जानता है। कोई और (आपकी समर्था को) नहीं समझ सकता। हे मेरे प्यारे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप (स्वयं) मेहर करता है। वही आपके साथ सांझ डालता है। 1। हे प्रभू ! मैं आपके भक्तों से सदा सदके जाता हूँ। (उनकी ही कृपा से आपके दर पर पहुँचा जा सकता है)। हे प्रभू ! जहाँ आप बसता है वह जगह हमेशा सुंदर है। बेअंत हैं आपके रंग-तमाशे। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपकी भक्ति आपकी प्रेरणा से ही हैं सकती है। (आपकी प्रेरणा के बिना) कोई भी अन्य प्राणी (आपकी भगती) नहीं कर सकता। आपका भक्त (भी) वही मनुष्य (बनता है जो) आपको प्यारा लगता है जिस (के मन) को आप (अपने प्यार का) रंग चढ़ाता है। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बाँह से पकड़ कर उसने (मुझे) संसार-समुंद्र (के विकारों) से पार लंघा दिया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।