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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

वाणी: महला 9

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वाणी

महला 9, गुरु तेग बहादुर जी

1621-1675 · नौवें गुरु · दिल्ली में शहीद · 116 शबद + सलोक

1675, चाँदनी चौक, दिल्ली। मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने गुरु तेग बहादुर जी को कुफ़्र-गरी के झूठे आरोप में सर कलम करवाया। उनसे पहले उनके तीन शिष्यों, भाई मती दास को आरे से चीरा गया, भाई दयाला को उबलते पानी में डाला गया, भाई सती दास को रुई में लपेट कर जलाया गया। गुरु तेग बहादुर ने तीनों को देखा, फिर अपना सर भेंट किया।

क्यों? कश्मीर के पंडितों का एक प्रतिनिधि-मंडल आनंदपुर साहिब आया था कुछ महीने पहले। उन्होंने कहा, औरंगज़ेब हमें ज़बरदस्ती मुसलमान बना रहा है। गुरु ने जवाब दिया, "किसी महान आत्मा को बलिदान देना होंगे।" उनके 9 बरस के बेटे, गोबिंद राय (बाद में गुरु गोबिंद सिंह), ने कहा, "पिता, आप से महान कौन है?" उसी क्षण से दिल्ली-मक्का तय हो गया।

आज सीस-गंज साहिब (शहादत-स्थल) और रकाब-गंज साहिब (जहाँ शव संस्कार हुआ) दिल्ली के दिल में हैं, लाल किले से 5 मिनट के फ़ासले में। हिन्दुस्तानी हर रोज़ वहाँ से गुज़रते हैं बिना यह जाने कि वो जगह क्या है।

उनकी 116 शबद + सलोक महला 9 की वाणी ग्रंथ साहिब में हैं, अंग 1426-1429 का सलोक-खण्ड सबसे प्रसिद्ध। राग जैजावंती में सब वाणी महला 9 की है।

M9 की मुख्य रचनाएँ:

आदि ग्रंथ में इनके शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।

गउड़ी (9)
  1. साधो मन का मानु तिआगउ ॥अंग 219
  2. साधो रचना राम बनाई ॥अंग 219
  3. प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥अंग 219
  4. साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥अंग 219
  5. साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥अंग 219
  6. कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥अंग 219
  7. साधो राम सरनि बिसरामा ॥अंग 220
  8. मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥अंग 220
  9. नर अचेत पाप ते डरु रे ॥अंग 220
आसा (1)
  1. बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥अंग 411
देवगंधारी (3)
  1. यह मनु नैक न कहिओ करै ॥अंग 536
  2. सभ किछु जीवत को बिवहार ॥अंग 536
  3. जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥अंग 536
बिहागड़ा (1)
  1. हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥अंग 537
सोरठ (12)
  1. रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥अंग 631
  2. मन की मन ही माहि रही ॥अंग 631
  3. मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥अंग 631
  4. मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥अंग 632
  5. प्रानी कउनु उपाउ करै ॥अंग 632
  6. माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥अंग 632
  7. माई मनु मेरो बसि नाहि ॥अंग 632
  8. रे नर इह साची जीअ धारि ॥अंग 633
  9. इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥अंग 633
  10. मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥अंग 633
  11. जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥अंग 633
  12. प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥अंग 634
धनासरी (4)
  1. काहे रे बन खोजन जाई ॥अंग 684
  2. साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥अंग 684
  3. तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥अंग 685
  4. अब मै कउनु उपाउ करउ ॥अंग 685
जैतसरी (3)
  1. भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥अंग 702
  2. हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥अंग 703
  3. मन रे साचा गहो बिचारा ॥अंग 703
टोडी (1)
  1. कहउ कहा अपनी अधमाई ॥अंग 718
तिलंग (3)
  1. चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥अंग 726
  2. जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥अंग 726
  3. हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥अंग 727
बिलावल (3)
  1. दुख हरता हरि नामु पछानो ॥अंग 830
  2. हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥अंग 830
  3. जा मै भजनु राम को नाही ॥अंग 831
रामकली (3)
  1. रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥अंग 901
  2. साधो कउन जुगति अब कीजै ॥अंग 902
  3. प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥अंग 902
मारू (3)
  1. हरि को नामु सदा सुखदाई ॥अंग 1008
  2. अब मै कहा करउ री माई ॥अंग 1008
  3. माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥अंग 1008
बसंत (5)
  1. साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥अंग 1186
  2. पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥अंग 1186
  3. माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥अंग 1186
  4. मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥अंग 1186
  5. कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥अंग 1187
सारंग (4)
  1. हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥अंग 1231
  2. कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥अंग 1231
  3. कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥अंग 1231
  4. मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥अंग 1231
जैजावंती (4)
  1. रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरै काजि है ॥अंग 1352
  2. रामु भजु रामु भजु जनमु सिरातु है ॥अंग 1352
  3. रे मन कउन गति होइ है तेरी ॥अंग 1352
  4. बीत जैहै बीत जैहै जनमु अकाजु रे ॥अंग 1352
सलोक और अन्य वाणी (57)
  1. गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥अंग 1426
  2. बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥अंग 1426
  3. तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥अंग 1426
  4. बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥अंग 1426
  5. धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥अंग 1426
  6. पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥अंग 1426
  7. तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥अंग 1426
  8. तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥अंग 1426
  9. सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥अंग 1426
  10. जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥अंग 1427
  11. पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥अंग 1427
  12. घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥अंग 1427
  13. सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥अंग 1427
  14. उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥अंग 1427
  15. हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥अंग 1427
  16. भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥अंग 1427
  17. जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥अंग 1427
  18. जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥अंग 1427
  19. जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥अंग 1427
  20. भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥अंग 1427
  21. जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥अंग 1427
  22. जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥अंग 1427
  23. जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥अंग 1427
  24. निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥अंग 1427
  25. जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥अंग 1427
  26. प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥अंग 1427
  27. जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥अंग 1427
  28. माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥अंग 1427
  29. जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥अंग 1427
  30. मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥अंग 1428
  31. प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥अंग 1428
  32. सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥अंग 1428
  33. जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥अंग 1428
  34. जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥अंग 1428
  35. बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥अंग 1428
  36. करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥अंग 1428
  37. मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥अंग 1428
  38. नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥अंग 1428
  39. जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥अंग 1428
  40. जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥अंग 1428
  41. झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥अंग 1428
  42. गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥अंग 1428
  43. जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥अंग 1428
  44. एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥अंग 1428
  45. सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥अंग 1428
  46. तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥अंग 1428
  47. सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥अंग 1428
  48. निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥अंग 1429
  49. जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥अंग 1429
  50. रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥अंग 1429
  51. चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥अंग 1429
  52. जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥अंग 1429
  53. बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥अंग 1429
  54. बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥अंग 1429
  55. संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥अंग 1429
  56. नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥अंग 1429
  57. राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥अंग 1429