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महला 9, गुरु तेग बहादुर जी
1675, चाँदनी चौक, दिल्ली। मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने गुरु तेग बहादुर जी को कुफ़्र-गरी के झूठे आरोप में सर कलम करवाया। उनसे पहले उनके तीन शिष्यों, भाई मती दास को आरे से चीरा गया, भाई दयाला को उबलते पानी में डाला गया, भाई सती दास को रुई में लपेट कर जलाया गया। गुरु तेग बहादुर ने तीनों को देखा, फिर अपना सर भेंट किया।
क्यों? कश्मीर के पंडितों का एक प्रतिनिधि-मंडल आनंदपुर साहिब आया था कुछ महीने पहले। उन्होंने कहा, औरंगज़ेब हमें ज़बरदस्ती मुसलमान बना रहा है। गुरु ने जवाब दिया, "किसी महान आत्मा को बलिदान देना होंगे।" उनके 9 बरस के बेटे, गोबिंद राय (बाद में गुरु गोबिंद सिंह), ने कहा, "पिता, आप से महान कौन है?" उसी क्षण से दिल्ली-मक्का तय हो गया।
आज सीस-गंज साहिब (शहादत-स्थल) और रकाब-गंज साहिब (जहाँ शव संस्कार हुआ) दिल्ली के दिल में हैं, लाल किले से 5 मिनट के फ़ासले में। हिन्दुस्तानी हर रोज़ वहाँ से गुज़रते हैं बिना यह जाने कि वो जगह क्या है।
उनकी 116 शबद + सलोक महला 9 की वाणी ग्रंथ साहिब में हैं, अंग 1426-1429 का सलोक-खण्ड सबसे प्रसिद्ध। राग जैजावंती में सब वाणी महला 9 की है।
M9 की मुख्य रचनाएँ:
- सलोक महला 9 (समापन-खण्ड)अंग 1426-1429
- राग जैजावंती (सिर्फ़ M9)अंग 1352
- M9 शबद विभिन्न रागों मेंअंग 219-220 (गउड़ी), 489 (गूजरी), 633 (सोरठ), ...
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
गउड़ी (9)
- साधो मन का मानु तिआगउ ॥अंग 219
- साधो रचना राम बनाई ॥अंग 219
- प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥अंग 219
- साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥अंग 219
- साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥अंग 219
- कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥अंग 219
- साधो राम सरनि बिसरामा ॥अंग 220
- मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥अंग 220
- नर अचेत पाप ते डरु रे ॥अंग 220
आसा (1)
- बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥अंग 411
देवगंधारी (3)
- यह मनु नैक न कहिओ करै ॥अंग 536
- सभ किछु जीवत को बिवहार ॥अंग 536
- जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥अंग 536
बिहागड़ा (1)
- हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥अंग 537
सोरठ (12)
- रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥अंग 631
- मन की मन ही माहि रही ॥अंग 631
- मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥अंग 631
- मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥अंग 632
- प्रानी कउनु उपाउ करै ॥अंग 632
- माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥अंग 632
- माई मनु मेरो बसि नाहि ॥अंग 632
- रे नर इह साची जीअ धारि ॥अंग 633
- इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥अंग 633
- मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥अंग 633
- जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥अंग 633
- प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥अंग 634
धनासरी (4)
- काहे रे बन खोजन जाई ॥अंग 684
- साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥अंग 684
- तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥अंग 685
- अब मै कउनु उपाउ करउ ॥अंग 685
जैतसरी (3)
- भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥अंग 702
- हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥अंग 703
- मन रे साचा गहो बिचारा ॥अंग 703
टोडी (1)
- कहउ कहा अपनी अधमाई ॥अंग 718
तिलंग (3)
बिलावल (3)
- दुख हरता हरि नामु पछानो ॥अंग 830
- हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥अंग 830
- जा मै भजनु राम को नाही ॥अंग 831
रामकली (3)
- रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥अंग 901
- साधो कउन जुगति अब कीजै ॥अंग 902
- प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥अंग 902
मारू (3)
- हरि को नामु सदा सुखदाई ॥अंग 1008
- अब मै कहा करउ री माई ॥अंग 1008
- माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥अंग 1008
बसंत (5)
- साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥अंग 1186
- पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥अंग 1186
- माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥अंग 1186
- मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥अंग 1186
- कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥अंग 1187
सारंग (4)
- हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥अंग 1231
- कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥अंग 1231
- कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥अंग 1231
- मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥अंग 1231
जैजावंती (4)
सलोक और अन्य वाणी (57)
- गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥अंग 1426
- बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥अंग 1426
- तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥अंग 1426
- बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥अंग 1426
- धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥अंग 1426
- पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥अंग 1426
- तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥अंग 1426
- तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥अंग 1426
- सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥अंग 1426
- जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥अंग 1427
- पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥अंग 1427
- घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥अंग 1427
- सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥अंग 1427
- उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥अंग 1427
- हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥अंग 1427
- भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥अंग 1427
- जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥अंग 1427
- जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥अंग 1427
- जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥अंग 1427
- भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥अंग 1427
- जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥अंग 1427
- जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥अंग 1427
- जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥अंग 1427
- निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥अंग 1427
- जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥अंग 1427
- प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥अंग 1427
- जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥अंग 1427
- माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥अंग 1427
- जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥अंग 1427
- मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥अंग 1428
- प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥अंग 1428
- सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥अंग 1428
- जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥अंग 1428
- जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥अंग 1428
- बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥अंग 1428
- करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥अंग 1428
- मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥अंग 1428
- नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥अंग 1428
- जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥अंग 1428
- जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥अंग 1428
- झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥अंग 1428
- गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥अंग 1428
- जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥अंग 1428
- एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥अंग 1428
- सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥अंग 1428
- तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥अंग 1428
- सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥अंग 1428
- निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥अंग 1429
- जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥अंग 1429
- रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥अंग 1429
- चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥अंग 1429
- जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥अंग 1429
- बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥अंग 1429
- बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥अंग 1429
- संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥अंग 1429
- नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥अंग 1429
- राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥अंग 1429