अंग
1106
मारू
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रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥
अबल बलु तोड़िआ अचल चलु थपिआ अघड़ु घड़िआ तहा अपिउ पीआ ॥1॥
मन आदि गुण आदि वखाणिआ ॥
तेरी दुबिधा द्रिसटि संमानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
अरधि कउ अरधिआ सरधि कउ सरधिआ सलल कउ सललि संमानि आइआ ॥
बदति जैदेउ जैदेव कउ रंमिआ ब्रहमु निरबाणु लिव लीणु पाइआ ॥2॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥
अबल बलु तोड़िआ अचल चलु थपिआ अघड़ु घड़िआ तहा अपिउ पीआ ॥1॥
मन आदि गुण आदि वखाणिआ ॥
तेरी दुबिधा द्रिसटि संमानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
अरधि कउ अरधिआ सरधि कउ सरधिआ सलल कउ सललि संमानि आइआ ॥
बदति जैदेउ जैदेव कउ रंमिआ ब्रहमु निरबाणु लिव लीणु पाइआ ॥2॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ (सिफतसालाह की बरकति से ही) बाई सुर में प्राण चढ़ भी गए हैं। सुखमना में अटकाए भी गए हैं। और दाहिनी सुर के रास्ते सोलह बार 'ओम' कह के (उतर) भी आए हैं (भाव। प्राणायाम का सारा उद्यम सिफत सालाह में ही आ गया है। सिफतसालाह के मुकाबले में प्राण चढ़ाने। टिकाने और उतारने वाले साधन प्राणायाम की आवश्यक्ता नहीं रह गई)। (इस सिफतसालाह के सदका) (विकारों में पड़ने के कारण) कमजोर (हुए) मन का ('दुबिधा द्रिसटि' वाला) बल टूट गया है। अमोड़ मन का चंचल स्वभाव रुक गया है। ये अल्हड़ मन अब सुंदर घड़ा हुआ (तराशा हुआ) हो गया है। यहाँ पहुँच के इसने नाम-अमृत पी लिया है। 1। हे मन ! जगत के मूल प्रभू की सिफतसालाह करने से आपका भेद-भाव वाला स्वभाव समतल हो जाएगा। 1। रहाउ। जैदेउ कहता है- अगर आराधने-योग्य प्रभू की आराधना करें। अगर श्रद्धा-योग्य प्रभू में सिदक धरें। तो उसके साथ एक-रूप हुआ जा सकता है। जैसे पानी के साथ पानी। जैदेव-प्रभू का सिमरन करने से वह वासना रहित बेपरवाह प्रभू मिल जाता है। 2। 1।
कबीरु ॥ मारू ॥
कबीरु ॥ मारू ॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥
पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥1॥ रहाउ ॥
लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥
धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥1॥
जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥
सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥2॥
धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥
कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥3॥1॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥
पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥1॥ रहाउ ॥
लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥
धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥1॥
जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥
सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥2॥
धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥
कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥3॥1॥
हिन्दी अर्थ: कबीरु॥ मारू॥ हे मन ! (अब ही वक्त है) प्रभू का सिमरन कर। (नहीं तो समय बीत जाने पर) अफसोस करेगा। विकारों में फसी हुई आपकी कमजोर जीवात्मा (जिंद) (धन पदार्थ का) लोभ कर रही है। पर आप थोड़े ही दिनों में (ये सब कुछ छोड़ के यहाँ से) चले जाएँगे। 1। रहाउ। हे मन ! आप लालच में फस के जीवन व्यर्थ गवा रहे हैं। माया की भटकना में टूटे हुए फिरते हैं। ना कर ये मान धन और जवानी का। (मौत आने पर) कागज़ की तरह जल जाएगा। 1। हे मन ! जब जम ने आ कर केसों से पकड़ कर आपको जमीन पर पटका। तब आपकी (उसके आगे) कोई पेश नहीं चलेगी। आप अब प्रभू का सिमरन-भजन नहीं करता। आप दया नहीं पालता। मरने के वक्त दुखी होंगे। 2। हे मन ! जब धर्मराज ने (आपसे जीवन में किए कामों का) हिसाब माँगा। क्या मुँह ले के उसके सामने (आप) होंगे। कबीर कहता है-हे संत जनो ! सुनो। साध-संगति में रह के ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। 3। 1।
रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥1॥ रहाउ ॥
जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहंी ढरै ॥
नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥1॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥2॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥1॥ रहाउ ॥
जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहंी ढरै ॥
नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥1॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥2॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी रविदास जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ हे सुंदर प्रभू ! आपके बिना ऐसी करनी और कौन कर सकता है। (हे भाई !) मेरा प्रभू गरीबों को मान देने वाला है। (गरीब के) सिर पर छत्र झुला देता है। (भाव। गरीब को भी राजा बना देता है)। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य को इतना नीच समझा जाता हो) कि उसकी छूत सारे संसार को लग जाए (भाव। जिस मनुष्य के छूने मात्र से और सारे लोग अपने आप अस्वच्छ अपवित्र समझने लग जाएं) उस मनुष्य पर (हे प्रभू !) आप ही कृपा करते हैं। (हे भाई !) मेरा गोबिंद नीच लोगों को ऊँचा बना देता है। वह किसी से डरता नहीं। 1। (प्रभू की कृपा से ही) नामदेव। कबीर त्रिलोचन। सधना और सैण (आदि भगत संसार-समुंद्र से) पार लांघ गए। रविदास कहता है- हे संत जनो ! सुनो। प्रभू सब कुछ करने के समर्थ है। 2। 1।
मारू ॥
मारू ॥
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥
चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥1॥
हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥
अवर सभ छाडि बचन रचना ॥1॥ रहाउ ॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥
बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥2॥
सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥
कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥3॥2॥15॥
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥
चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥1॥
हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥
अवर सभ छाडि बचन रचना ॥1॥ रहाउ ॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥
बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥2॥
सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥
कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥3॥2॥15॥
हिन्दी अर्थ: मारू॥ (हे पंडित !) जो प्रभू सुखों का समुद्र है। जिस प्रभू के वश में स्वर्ग के पाँचों वृक्ष। चिंतामणी और कामधेनु हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पदार्थ। आठ बड़ी (रिद्धियां-सिद्धियां) और नौ निधियां ये सब कुछ उसी के हाथों की तली पर हैं। 1। (हे पण्डित !) आप जीभ से सदा एक परमात्मा का नाम क्यों नहीं जपता। और सब फोकियाँ बातें त्याग के 1। रहाउ। (हे पण्डित !) पुराणों के अनेकों किस्मों के प्रसंग। वेदों की बताई हुई विधियां। ये सब वाक्या-रचना ही हैं (अनुभवी ज्ञान नहीं है जो प्रभू के चरणों में जुड़ने से हृदय में पैदा होता है)। (हे पंडित ! वेदों के रचयता) व्यास ऋषि ने सोच-विचार के यही परम-तत्व बताया है (कि इन पुस्तकों के पाठ आदिक) परमात्मा के नाम का सिमरन करने की बराबरी नहीं कर सकते। 2। रविदास कहता है- (हे पण्डित !) बड़ी किस्मत से जिस मनुष्य की सुरति प्रभू-चरणों में जुड़ती है। उसका मन आत्मिक अडोलता में टिका रहता है कोई विकार उसमें नहीं उठता उस सेवक की मति (माया की ओर से) निर्मोह रहती है और जनम-मरण (भाव, सारी उम्र) के उसके डर नाश हो जाते हैं।3।2।15।
रचयिता और स्रोत
इस अंग पर पहले जयदेव जी, फिर कबीर जी, और फिर रविदास जी की रचनाएँ आती हैं। पाठ के भीतर दिए रचयिता-संकेत इनके बीच का क्रम स्पष्ट करते हैं।
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत जयदेव जी; भगत कबीर जी; भगत रविदास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११०६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।