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अंग 1107

अंग
1107
राग तुखारी
राग: तुखारी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तुखारी छंत महला 1 बारह माहा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू सुणि किरत करंमा पुरबि कमाइआ ॥ सिरि सिरि सुख सहंमा देहि सु तू भला ॥
हरि रचना तेरी किआ गति मेरी हरि बिनु घड़ी न जीवा ॥
प्रिअ बाझु दुहेली कोइ न बेली गुरमुखि अंम्रितु पीवां ॥
रचना राचि रहे निरंकारी प्रभ मनि करम सुकरमा ॥
नानक पंथु निहाले सा धन तू सुणि आतम रामा ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: तुखारी छंत महला 1 बारह माहा वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे हरी ! (मेरी विनती) सुन। पूर्बले कमाए हुए किए कर्मों के अनुसार हरेक जीव के सिर पर जो सुख और दुख (झेलने के लिए) आप देता है वही ठीक है। हे हरी ! मैं आपकी रची माया में (व्यस्त) हूँ। मेरा क्या हाल होंगे। आपके बिना (आपकी याद के बिना) एक घड़ी भी जीना- ये कैसी जिंदगी है। हे प्यारे ! आपके बिना मैं दुखी हूँ। (इस दुख में से निकालने के लिए) कोई मददगार नहीं। (मेहर कर कि) गुरू की शरण पड़ कर मैं आपका आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता रहूँ। हम जीव निरंकार की रची हुई माया में ही फसे हुए हैं (ये कैसा जीवन है।)। प्रभू को मन में बसाना ही सबसे श्रेष्ठ कर्म है (यही है मनुष्य के लिए जीवन-मनोरथ)। हे नानक ! (कह-) हे सर्व व्रापक परमात्मा ! आप (जीव-स्त्री की आरजू) सुन (और। उसको अपने दर्शन दे)। जीव-स्त्री आपका राह ताक रही है। 1।
बाबीहा प्रिउ बोले कोकिल बाणीआ ॥
सा धन सभि रस चोलै अंकि समाणीआ ॥
हरि अंकि समाणी जा प्रभ भाणी सा सोहागणि नारे ॥
नव घर थापि महल घरु ऊचउ निज घरि वासु मुरारे ॥
सभ तेरी तू मेरा प्रीतमु निसि बासुर रंगि रावै ॥
नानक प्रिउ प्रिउ चवै बबीहा कोकिल सबदि सुहावै ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (जैसे) पपीहा ‘प्रिउ प्रिउ’ बोलता है जैसे कोयल (‘कू कू’ की मीठी) बोली बोलती है (वैसे ही जो जीव स्त्री वैराग में आ के मीठी सुर से प्रभू-पति को याद करती है। वह) जीव-स्त्री (प्रभू-मिलाप के) सारे आनंद माणती है। और उसके चरणों में टिकी रहती है। जब वह प्रभू को अच्छी लग जाती है। (तब उसकी मेहर से) उसके चरणों में जुड़ी रहती है। वही जीव-स्त्री अच्छे भाग्यों वाली है। वह अपने शरीर को (शारीरिक इन्द्रियों को) जुगति में रख के प्रभू के अपने स्वरूप में टिक जाती है। और (मायावी पदार्थों के मोह से उठ के) प्रभू के ऊँचे ठिकाने पर जा पहुँचती है। हे नानक ! वह जीव-स्त्री प्रभू के प्यार में रंगीज के दिन-रात उसको सिमरती है। और कहती है- ये सारी सृष्टि आपकी रची हुई है। आप ही मेरा प्यारा खसम साई है। जैसे पपीहा ‘पिउ पिउ’ बोलता है जैसे कोयल मीठे बोल बोलती है। वैसे ही वह जीव-स्त्री गुरू-शबद द्वारा (प्रभू की सिफतसालाह करके) सुंदर लगती है। 2।
तू सुणि हरि रस भिंने प्रीतम आपणे ॥
मनि तनि रवत रवंने घड़ी न बीसरै ॥
किउ घड़ी बिसारी हउ बलिहारी हउ जीवा गुण गाए ॥
ना कोई मेरा हउ किसु केरा हरि बिनु रहणु न जाए ॥
ओट गही हरि चरण निवासे भए पवित्र सरीरा ॥
नानक द्रिसटि दीरघ सुखु पावै गुर सबदी मनु धीरा ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे प्रीतम ! हे रस भरे हरी ! हे मेरे मन-तन में रमे हुए ! आप (मेरी आरजू) सुन। (मेरा मन आपको) एक घड़ी भर के लिए भी नहीं भुला सकता। मैं एक घड़ी के लिए भी आपको नहीं बिसार सकता। मैं (आपसे) सदा सदके हूँ। आपकी सिफतसालाह कर कर के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। (परमात्मा के बिना अंत तक साथ निभाने वाला) ना कोई मेरा (सदा का) साथी है ना ही मैं किसी का (सदा के लिए) साथी हूँ। परमात्मा की याद के बिना मेरे मन को धैर्य नहीं बँधता। जिस मनुष्य ने परमात्मा का आसरा लिया है। जिसके हृदय में प्रभू के चरण बस गए हैं। उस का शरीर पवित्र हो जाता है। हे नानक ! वह मनुष्य लंबे जिगरे वाला हो जाता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। गुरू के शबद से उसका मन धैर्यवान हो जाता है। 3।
बरसै अंम्रित धार बूंद सुहावणी ॥
साजन मिले सहजि सुभाइ हरि सिउ प्रीति बणी ॥
हरि मंदरि आवै जा प्रभ भावै धन ऊभी गुण सारी ॥
घरि घरि कंतु रवै सोहागणि हउ किउ कंति विसारी ॥
उनवि घन छाए बरसु सुभाए मनि तनि प्रेमु सुखावै ॥
नानक वरसै अंम्रित बाणी करि किरपा घरि आवै ॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में)। प्रभू की सिफतसालाह की सोहावनी बॅूँदों की धारा बरसती है। उस अडोल अवस्था में टिकी हुई को प्रेम में टिकी हुई को सज्जन-प्रभू आ मिलता है। प्रभू के साथ उसकी प्रीति बन जाती है। (उस जीव-स्त्री का हृदय प्रभू-देव के ठहरने के लिए मन्दिर बन जाता है) जब प्रभू को अच्छा लगता है। वह उस जीव-स्त्री के हृदय-मन्दिर में आ ठहरता है। वह जीव-स्त्री उतावली हो हो के उसके गुण गाती है। (और कहती है-) हरेक भाग्यवान के हृदय-घर में प्रभू-पति रलियां माणता है। प्रभू-पति ने मुझे क्यों भुला दिया है। (वह तरले ले ले के गुरू के आगे यूँ अरदास करती है-) हे झुके घटा बन के आए बादल ! प्रेम से बरस (हे तरस करके आए गुरू पातशाह ! प्रेम से मेरे अंदर सिफत-सालाह की बरखा कर)। प्रभू का प्यार मेरे मन में। मेरे तन में आनंद पैदा करता है। हे नानक ! जिस (सौभाग्य भरे) हृदय-घर में सिफतसालाह की बाणी की बरखा होती है। प्रभू कृपा धार के स्वयं वहाँ आ टिकता है। 4। भाव। सिफत सालाह की बरकति से मनुष्य का मन विकारों से अडोल रहता है। उसके अंदर हर वक्त परमात्मा के मिलाप के प्रति आर्कषण बना रहता है।
चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: चेत (का महीना) अच्छा लगता है। (चेत में) बसंत (का मौसम भी) प्यारा लगता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “तुखारी छंत महला 1 बारह माहा वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।