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1105
मारू
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राजन कउनु तुमारै आवै ॥
राजन कउनु तुमारै आवै ॥
ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहु गरीबु मोहि भावै ॥1॥ रहाउ ॥
हसती देखि भरम ते भूला स्री भगवानु न जानिआ ॥
तुमरो दूधु बिदर को पान॑ो अंम्रितु करि मै मानिआ ॥1॥
खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी ॥
कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ॥2॥9॥
ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहु गरीबु मोहि भावै ॥1॥ रहाउ ॥
हसती देखि भरम ते भूला स्री भगवानु न जानिआ ॥
तुमरो दूधु बिदर को पान॑ो अंम्रितु करि मै मानिआ ॥1॥
खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी ॥
कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ॥2॥9॥
हिन्दी अर्थ: हे राजा (दुर्योधन) ! आपके घर कौन आए। (मुझे आपके घर आने की उत्सुकता ही नहीं हो सकती)। मैंने बिदर का इतना प्रेम देखा है कि वह गरीब (भी) मुझे प्यारा लगता है। 1। रहाउ। आप हाथी (आदि) देख के मान में आ के भटक गए हैं। परमात्मा को भुला बैठे हैं। एक तरफ आपका दूध है। दूसरी तरफ बिदर का पानी है; ये पानी मुझे अमृत दिखता है। 1। (बिदर के घर का पकाया हुआ) साग (आपकी रसोई की पकी) खीर जैसा मुझे (मीठा) लगता है। (क्योंकि बिदर के पास रह कर मेरी) रात प्रभू के गुण गाते हुए बीती है। कबीर का मालिक प्रभू आनंद और मौज का मालिक है (जैसे उसने कृष्ण-रूप में आ के किसी ऊँचे मरातबे की परवाह नहीं की। वैसे) वह किसी की ऊँची जाति की परवाह नहीं करता। 2। 9।
गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥
सलोक कबीर ॥
गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥
खेतु जु मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ ॥1॥
सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥
पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु ॥2॥2॥
गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥
खेतु जु मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ ॥1॥
सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥
पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु ॥2॥2॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य इस जगत-रूपी रण-भूमि में वीर हो के विकारों के मुकाबले में डट के खड़ा है। और यह समझता है कि ये मानस-जीवन ही मौका है जब इनके साथ लड़ा जा सकता है। वह है असली शूरवीर (सूरमा)। उसके दसम-द्वार पर धौंसा बजता है। उसके निशाने पर चोट लगती है (भाव। उसका मन प्रभू-चरणों में ऊँची उड़ानें लगाता है। जहाँ किसी विकार की सुनवाई नहीं हो सकती। उसके हृदय में प्रभू-चरणों से जुड़े रहने की कसक पड़ती है)। 1। (हाँ, एक और भी शूरवीर है) उस मनुष्य को भी सूरमा समझना चाहिए जो गरीबों की खातिर लड़ता है। (गरीब के लिए लड़ता-लड़ता) टुकड़े-टुकड़े हो के मरता है। पर लड़ाई के मैदान को कभी नहीं छोड़ता (पर पीछे को पैर नहीं हटाता। अपनी जान बचाने के लिए गरीब की पकड़ी हुई बाँह नहीं छोड़ता)। 2। 2।
कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की
कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चारि मुकति चारै सिधि मिलि कै दूलह प्रभ की सरनि परिओ ॥
मुकति भइओ चउहूं जुग जानिओ जसु कीरति माथै छत्रु धरिओ ॥1॥
राजा राम जपत को को न तरिओ ॥
गुर उपदेसि साध की संगति भगतु भगतु ता को नामु परिओ ॥1॥ रहाउ ॥
संख चक्र माला तिलकु बिराजित देखि प्रतापु जमु डरिओ ॥
निरभउ भए राम बल गरजित जनम मरन संताप हिरिओ ॥2॥
अंबरीक कउ दीओ अभै पदु राजु भभीखन अधिक करिओ ॥
नउ निधि ठाकुरि दई सुदामै ध्रूअ अटलु अजहू न टरिओ ॥3॥
भगत हेति मारिओ हरनाखसु नरसिंघ रूप होइ देह धरिओ ॥
नामा कहै भगति बसि केसव अजहूं बलि के दुआर खरो ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चारि मुकति चारै सिधि मिलि कै दूलह प्रभ की सरनि परिओ ॥
मुकति भइओ चउहूं जुग जानिओ जसु कीरति माथै छत्रु धरिओ ॥1॥
राजा राम जपत को को न तरिओ ॥
गुर उपदेसि साध की संगति भगतु भगतु ता को नामु परिओ ॥1॥ रहाउ ॥
संख चक्र माला तिलकु बिराजित देखि प्रतापु जमु डरिओ ॥
निरभउ भए राम बल गरजित जनम मरन संताप हिरिओ ॥2॥
अंबरीक कउ दीओ अभै पदु राजु भभीखन अधिक करिओ ॥
नउ निधि ठाकुरि दई सुदामै ध्रूअ अटलु अजहू न टरिओ ॥3॥
भगत हेति मारिओ हरनाखसु नरसिंघ रूप होइ देह धरिओ ॥
नामा कहै भगति बसि केसव अजहूं बलि के दुआर खरो ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (जगत में) चार किस्म की मुक्तियाँ (मिथी गई हैं)। ये चारों मुक्तियाँ (अठारह) सिद्धियों के साथ मिल के पति (-प्रभू) की शरण पड़ी हुई हैं। (जो मनुष्य उस प्रभू का नाम सिमरता है। उसको ये हरेक किस्म की) मुक्ति मिल जाती है। वह मनुष्य चारों युगों में मशहूर हो जाता है। उसकी (हर जगह) शोभा होती है। उसके सिर पर छत्र झूलता है। 1। प्रकाश-रूप परमात्मा का नाम सिमर के बेअंत जीव तैर गए हैं। जिस जिस मनुष्य ने अपने गुरू की शिक्षा पर चल के साध-संगति की। उसका नाम भगत पड़ गया। 1। रहाउ। (प्रभू का) संख, चक्र, माला, तिलक आदि चमकता देख के। प्रताप देख के। जमराज भी सहम जाता है (जिन्होंने उस प्रभू को सिमरा है) उनको कोई डर नहीं रह जाता (क्योंकि उनसे तो जम भी डरता है)। प्रभू का प्रताप उनके अंदर उछाले मारता है। उनके जनम-मरण के कलेश नाश हो जाते हैं। 2। (अंबरीक ने नाम सिमरा। प्रभू ने) अंबरीक को निर्भयता का उच्चतम दर्जा बख्शा (और दुर्वासा उसका कुछ ना बिगाड़ सका)। प्रभू ने विभीषण को राज दे के बड़ा बना दिया; सुदामा (गरीब) को ठाकुर ने नौ निधियाँ दे दीं। ध्रुव को अटल पदवी बख्शी जो आज तक कायम है। 3। प्रभू ने अपने भक्त (प्रहलाद) की खातिर नरसिंघ का रूप धारण किया। और हरणाकश को मारा। नामदेव कहता है- परमात्मा भगती के अधीन है। (देखें !) अभी तक वह (अपने भगत राजा) बलि के दरवाजे पर खड़ा हुआ है। 4। 1।
मारू कबीर जीउ ॥
मारू कबीर जीउ ॥
दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥
पेटु भरिओ पसूआ जिउ सोइओ मनुखु जनमु है हारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति कबहू नही कीनी रचिओ धंधै झूठ ॥
सुआन सूकर बाइस जिवै भटकतु चालिओ ऊठि ॥1॥
आपस कउ दीरघु करि जानै अउरन कउ लग मात ॥
मनसा बाचा करमना मै देखे दोजक जात ॥2॥
कामी क्रोधी चातुरी बाजीगर बेकाम ॥
निंदा करते जनमु सिरानो कबहू न सिमरिओ रामु ॥3॥
कहि कबीर चेतै नही मूरखु मुगधु गवारु ॥
रामु नामु जानिओ नही कैसे उतरसि पारि ॥4॥1॥
दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥
पेटु भरिओ पसूआ जिउ सोइओ मनुखु जनमु है हारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति कबहू नही कीनी रचिओ धंधै झूठ ॥
सुआन सूकर बाइस जिवै भटकतु चालिओ ऊठि ॥1॥
आपस कउ दीरघु करि जानै अउरन कउ लग मात ॥
मनसा बाचा करमना मै देखे दोजक जात ॥2॥
कामी क्रोधी चातुरी बाजीगर बेकाम ॥
निंदा करते जनमु सिरानो कबहू न सिमरिओ रामु ॥3॥
कहि कबीर चेतै नही मूरखु मुगधु गवारु ॥
रामु नामु जानिओ नही कैसे उतरसि पारि ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: मारू कबीर जीउ॥ हे कमले मनुष्य ! आपने धर्म (मनुष्य जीवन का फर्ज) बिसार दिया है। आप पशुओं की तरह पेट भर के सोए रहते हैं; आपने मानस जीवन को ऐसे ही गँवा लिया है। 1। रहाउ। आप कभी सत्संग में नहीं गए। जगत के झूठे धंधों में ही मस्त हैं; कौए। कुत्ते। सूअर की तरह भटकते ही (जगत से) चले जाएँगे। 1। जो मनुष्य मन। वचन व कर्म द्वारा औरों को तुच्छ जानते हैं और अपने आप को बड़े समझते हैं। ऐसे लोग मैंने नर्क में जाते देखे हैं (भाव। नित्य ये देखने में आता है कि ऐसे अहंकारी मनुष्य अहंकार में इस तरह दुखी होते हैं जैसे दोज़क की आग में जल रहे हों)। 2। काम वश हो के। क्रोध अधीन हो के। चतुराइयाँ, ठगियाँ, नकारेपन में। दूसरों की निंदा करके (हे कमले !) आपने जीवन गुजार दिया है। कभी प्रभू को याद नहीं किया। 3। कबीर कहता है- मूर्ख मूढ़ गवार मनुष्य परमात्मा को नहीं सिमरता। प्रभू के नाम के साथ सांझ नहीं डालता। (संसार-समुंद्र में से) कैसे पार लंघेगा। 4।1।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1105 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1105 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।