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चुना हुआ कथा-पाठ
कृष्ण गोपों से उनके जीवन के आधार पर प्रश्न करते हैं। उत्सव बदलता है, इन्द्र क्रुद्ध होते हैं और पर्वत पूरे व्रज का आश्रय बनता है।

हमारा जीवन किसके सहारे है?
वर्षा के बाद शरद् आई थी। व्रज में इन्द्र के उत्सव की तैयारी देखकर कृष्ण ने नन्द से उसके विषय में पूछा। नन्द ने वर्षा का महत्त्व समझाया: जल से अन्न होता है और अन्न से जीवन चलता है। इसलिए वर्षा देने वाले इन्द्र का आदर किया जाता है। कृष्ण ने बात सुनकर गोपों के अपने जीवन की ओर प्रश्न मोड़ा। उनका मुख्य काम खेती या व्यापार नहीं, गोपालन था। उनकी आजीविका गायों, वन और पर्वतों के बीच चलती थी।
उन्होंने गोपों के सामने गोवर्धन और गायों के उत्सव का प्रस्ताव रखा। जिस जीवन का वे पालन करते थे, उसके आधार को वे प्रत्यक्ष सम्मान दें। नन्द और दूसरे गोपों को यह बात अच्छी लगी। उन्होंने पर्वत के लिए अर्पण तैयार किए, लोगों को भोजन कराया और सजी हुई गायों के साथ परिक्रमा की।
कथा यहाँ एक अद्भुत दृश्य रखती है। कृष्ण पर्वत पर एक दूसरे रूप में प्रकट होकर अर्पण स्वीकार करते हैं, और अपने गोप-रूप में लोगों के साथ उसी स्वरूप का पूजन भी करते हैं। उत्सव समाप्त होने पर सब अपने निवासों को लौटते हैं।
मान भंग हुआ, वर्षा आई
अपना उत्सव रुकने से इन्द्र क्रुद्ध हुए। उन्होंने सांवर्तक मेघों को आदेश दिया कि गोपों की गायों पर वर्षा और वायु का प्रहार करें। जो वर्षा पहले जीवन का सहारा बताई गई थी, वही अब भय का कारण बन गई। जल चारों ओर भरने लगा। गायें काँप रही थीं; कुछ अपने बछड़ों को शरीर की ओट दे रही थीं। व्रज के स्त्री-पुरुष और पशु व्याकुल हो उठे।
कृष्ण ने यह दशा देखी और रक्षा का निर्णय किया। उन्होंने गोवर्धन उठाया और उसे व्रज के ऊपर छत्र की तरह धारण कर लिया। गोपों से कहा कि भीतर आएँ और निर्भय होकर बैठें। लोग गायों और सामान से भरी गाड़ियों के साथ उस आश्रय में पहुँचे। पर्वत अब पूजा का स्थान भर नहीं रहा; उसके नीचे पूरा समुदाय इकट्ठा था।
विष्णुपुराण के अनुसार सात रात तक मेघ बरसते रहे। कृष्ण पर्वत धारण किए रहे। जब इन्द्र ने देखा कि उनका प्रहार अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर रहा, तो उन्होंने वर्षा रुकवाई। आकाश साफ़ हुआ। लोग आश्रय से बाहर आए और कृष्ण ने गोवर्धन उसके स्थान पर रख दिया।
इन्द्र की वापसी
इसके बाद इन्द्र कृष्ण से मिलने आए। उन्होंने उन्हें गोपबालकों के साथ गायें चराते देखा। वे अपना किया स्वीकार करते हैं और कृष्ण की रक्षा-लीला की प्रशंसा करते हैं। गायों के आग्रह का उल्लेख करके वे कृष्ण का अभिषेक करते हैं। इसी संवाद में गोविन्द नाम आता है, गायों के स्वामी के रूप में।
बात यहीं नहीं रुकती। इन्द्र अर्जुन का उल्लेख करते हैं, जो उनके अंश से जन्मा है, और कृष्ण से उसकी रक्षा की प्रार्थना करते हैं। कृष्ण उसे स्वीकार करते हैं। इस प्रकार पर्वत और गायों का प्रसंग आगे महाभारत की कथा की दिशा में एक संबंध भी खोल देता है। फिर इन्द्र लौट जाते हैं और कृष्ण गोपों तथा गायों के साथ व्रज में आ जाते हैं।
पाठकीय मनन
पहले नन्द वर्षा से जीवन का संबंध बताते हैं। फिर कृष्ण गोपों की आजीविका का प्रश्न रखते हैं। अंत में संकट के बीच गाय, बछड़े, स्त्रियाँ, पुरुष और गाड़ियाँ एक ही छत के नीचे आती हैं। इसे पढ़ते हुए आश्रय की उस सामूहिक छवि पर ठहरिए। कथा के धार्मिक तर्क अपने स्थान पर हैं; पाठक के सामने यह भी दिखता है कि किसी समुदाय का जीवन कितने साथ जुड़े प्राणियों और कामों से बनता है।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का सम्पूर्ण विष्णुपुराण, संस्कृत तथा मुनिलाल गुप्त का हिन्दी अनुवाद।
इस कथा का पाठ: विष्णु पुराण 5.10.1 से 49; 5.11.1 से 25; 5.12.1 से 26
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए प्रसंग का स्वतंत्र कथा-गद्य और अलग चिह्नित पाठकीय मनन; श्लोकानुसार अनुवाद नहीं।
सीमाएँ और पाठ-भेद: गीताप्रेस 5.11.16 में एक हाथ से पर्वत धारण करने का अर्थ दिया है; टेलर का अनुवाद वहाँ एक उँगली कहता है। इस कथा में उँगली का विशेषण नहीं जोड़ा गया। मूल 5.10.38 से 44 के अनुष्ठान में पशुबलि और मांस का भी उल्लेख है; यहाँ अनुष्ठान की विधि नहीं दी गई है। अन्य पुराणों की पूजा-पद्धति इस पाठ में नहीं मिलाई गई।
तुलना के पाठ: गीता प्रेस का संस्कृत-हिन्दी संस्करण (विष्णु पुराण 5.10.1 से 49; 5.11.1 से 25; 5.12.1 से 26); मैककोमस टेलर, ए.एन.यू. प्रेस, 2021 (विष्णु पुराण 5.10.1 से 49; 5.11.1 से 25; 5.12.1 से 26)।