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श्री राम गीता · खण्ड 4: अद्वैत-स्वरूप

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श्री राम गीता · खण्ड 4

तीन देह, पाँच कोश

वह बचा हुआ साक्षी · श्लोक 27 से 34

अब तक राम ने “तत् त्वम् असि” वाक्य का मर्म खोला है। इस खण्ड में वे उपाधियों की परतें एक-एक उतारते हैं। स्थूल देह, सूक्ष्म देह, कारण देह, ये तीन शरीर, और इनके भीतर पाँच कोश। बुद्धि की तीन अवस्थाएँ। और अन्त में “नेति-नेति” से सब छोड़ कर जो शुद्ध साक्षी बचता है, वही आत्मा है। जैसे स्फटिक रंग के पास उसी रंग का जान पड़ता है, फिर भी रहता निर्लिप्त ही है।

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अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

कोशेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृतिर्विभाति सङ्गात्स्फतिकोपलो यथा।
असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥31॥

यह आत्मा उन कोशों में उन्हीं की आकृति लिए चमकता है, जैसे स्फटिक रंग के संग उसी रंग का जान पड़ता है; पर ठीक से विचार करने पर यह असंग, अजन्मा, अद्वय ही जाना जाता है।

राम गीता, खण्ड 4

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राम पहले उस तरीक़े की ओर इशारा करते हैं जिससे “तत् त्वम् असि” का बोध होता है। दोनों पदों का पूरा-पूरा अर्थ ले लें तो विरोध खड़ा हो जाता है, और एकदम छोड़ दें तो भी काम नहीं चलता। इसलिए जैसे “वह यही पुरुष है” कहने पर देश-काल का भेद छोड़ कर केवल पुरुष-मात्र बच रहता है, वैसे ही यहाँ भाग-लक्षणा से वही शुद्ध चैतन्य बच रहता है, बिना किसी दोष के। यही दोनों पदों को जोड़ने का ठीक उपाय है।

श्लोक 27

एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवेत्तथाजहल्लक्षणता विरोधतः।
सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥27॥

अब राम उपाधियों की पहली परत खोलते हैं, स्थूल देह। पाँच भूत आपस में मिल कर, पंचीकृत होकर, यह स्थूल शरीर बनता है। यही सुख-दुःख आदि कर्मों का भोग-स्थान है, जिसका आदि भी है और अन्त भी, जो आदि-कर्म से उपजा है, और जो आत्मा की केवल एक मायामयी उपाधि भर है।

श्लोक 28

रसादिपञ्चीकृतभूतसम्भवं भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम्।
शरीरमाद्यन्तवदादिकर्मजं मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः ॥28॥

इसके भीतर दूसरी परत है, सूक्ष्म देह। मन, बुद्धि और दस इन्द्रियों से युक्त, प्राणों से सजा हुआ, और अपंचीकृत भूतों से बना। ज्ञानी इसे आत्मा का दूसरा शरीर कहते हैं, जो भोक्ता के सुख आदि भोगने का साधन बनता है।

श्लोक 29

सूक्ष्मं मनोबुद्धिदशेन्द्रियैर्युतं प्राणैरपञ्चीकृतभूतसम्भवम्।
भोक्तुः सुखादेरनुसाधनं भवेत् शरीरमन्यद्विदुरात्मनो बुधाः ॥29॥

और इन दोनों के मूल में तीसरी परत है, कारण देह। यह अनादि है, जिसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता, जिसमें माया ही प्रधान है, वही परम कारण-शरीर है। उपाधियों के इस भेद से ही आत्मा अलग-अलग जान पड़ता है। इसलिए राम कहते हैं, इन परतों को क्रम से छाँट कर अपनी आत्मा को आत्मा में ही ठीक-ठीक धारण कीजिए।

श्लोक 30

अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं मायाप्रधानं तु परं शरीरकम्।
उपाधिभेदात्तु यतः पृथक्स्थितं स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥30॥

अब राम वह उपमा रखते हैं जो पूरी राम गीता का शिखर है। यह आत्मा उन कोशों में बैठ कर उन्हीं की आकृति लिए चमकने लगता है, ठीक जैसे स्फटिक किसी रंग के पास रख देने पर उसी रंग का जान पड़ता है। पर है वह असंग ही, अजन्मा, अद्वय। इसी आत्मा पर जब चारों ओर से विचार किया जाता है, तब यही सच खुलता है।

श्लोक 31

कोशेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृतिर्विभाति सङ्गात्स्फतिकोपलो यथा।
असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥31॥

फिर राम बुद्धि की तीन अवस्थाओं की ओर मुड़ते हैं। तीन गुणों के कारण बुद्धि की वृत्ति यहाँ तीन रूपों में दिखती है, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद से। ये तीनों आपस में एक-दूसरे को काट देती हैं, इसलिए मिथ्या ही हैं। उस नित्य, परम, केवल, कल्याण-रूप ब्रह्म में इनकी कोई जगह नहीं।

श्लोक 32

बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः ।
अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारितो मृषा नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥32॥

यह बुद्धि की वृत्ति देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन-आत्मा, इन सबके संग से लगातार घूमती रहती है। इसकी जड़ तमस् में है, इसलिए यह अज्ञान का लक्षण है। जब तक यह वृत्ति बनी रहती है, तब तक यह संसार उपजता रहता है।

श्लोक 33

देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां सङ्घादजस्त्रं परिवर्तते धियः।
वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥33॥

और अन्त में राम का अन्तिम वचन। “नेति-नेति” के प्रमाण से सब कुछ छाँट दीजिए। हृदय में जो घनीभूत चैतन्य का अमृत है, उसे चख कर सारे जगत को छोड़ दीजिए। जैसे कोई पानी पी लेने पर उसमें घुले रस को भी अपने आप छोड़ देता है, वैसे ही यह सारा संसार, जिसका सत् रूप आत्मा ने ही उधार दे रखा था, अपने आप छूट जाता है।

श्लोक 34

नेतिप्रमाणेन निराकृताखिलो हृदा समास्वादितचिद्घनामृतः।
त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं पीत्वा यथाम्भः प्रजहाति तत्फलम् ॥34॥

॥ तीन देह, पाँच कोश ॥

विस्तार: यह खण्ड और गहरा

तीन देह: स्थूल (पंचीकृत भूतों से बना, सुख-दुःख का भोग-स्थान), सूक्ष्म (मन-बुद्धि-दस इन्द्रिय-प्राण, अपंचीकृत भूतों से), और कारण (अनादि, अनिर्वाच्य, माया-प्रधान)। आत्मा इन तीनों से परे, इनका साक्षी है।

स्फटिक की उपमा: यह खण्ड का प्राण है। स्फटिक पारदर्शी है; लाल फूल के पास रखो तो लाल दिखता है, नीले के पास नीला। फूल हटते ही वह फिर निर्मल। आत्मा भी कोशों के पास उन्हीं का रूप लिए जान पड़ता है, पर रहता असंग ही है।

बुद्धि की तीन अवस्थाएँ: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, ये तीन गुणों से उपजती हैं और एक-दूसरे को काट देती हैं। जो आती-जाती हैं वे सत्य नहीं हो सकतीं। जो तीनों में बना रहता है, वही नित्य साक्षी है।

नेति-नेति: “यह नहीं, यह नहीं”। यह कोई शून्य नहीं, बल्कि छँटाई की विधि है। हर उपाधि को “यह मैं नहीं” कह कर हटाते जाइए। जो हटाने के बाद भी बचा रहे, हटाने वाला स्वयं, वही आत्मा है।

पानी और रस वाली उपमा: जो पानी पी लेता है, उसमें घुले रस को अलग से छोड़ने की मेहनत नहीं करनी पड़ती; वह अपने आप छूट जाता है। वैसे ही जिसने भीतर के अमृत को चख लिया, उसके लिए संसार अपने आप झड़ जाता है।