नेति-नेति और तत्-त्वम्-असि
माया का विलय · श्लोक 17 से 26
पिछले खण्ड में राम यह ठहरा चुके हैं कि बाँधता कर्म है और खोलता ज्ञान। अब वे उसी बात को उसके अन्तिम छोर तक ले जाते हैं। पहले नेति-नेति की कैंची चलती है, एक-एक धारणा कटती जाती है; फिर उस निर्मल बोध के सामने माया पिघल जाती है; और जब सब झड़ चुका होता है, तब राम वह महावाक्य आपके हाथ में रख देते हैं, तत्-त्वम्-असि, वही आप हैं।

राम पहले एक सन्तुलन रखते हैं। जब तक देह आदि में माया से जन्मी यह बुद्धि बनी है कि यही हम हैं, तब तक विधि के कहे कर्म करते रहना ठीक है। पर साथ ही वे राह दिखा देते हैं, नेति-नेति के वाक्यों से एक-एक करके सब का निषेध कीजिए, और जब परम आत्मा का बोध हो जाए, तब इन क्रियाओं को छोड़ दीजिए। फिर वे उस घड़ी का चित्र खींचते हैं, जिस क्षण परम-आत्मा और जीव-आत्मा के भेद को काट देने वाला वह देदीप्यमान विज्ञान भीतर चमक उठता है, उसी क्षण अपने कारकों और कार्य सहित माया, जो इस आत्म-संसृति की जड़ थी, तत्काल पिघल जाती है।
श्लोक 17 · 18
यावच्छारीरादिषु माययात्मधीस्तावद्विधेयो विधिवादकर्मणाम्। नेतीति वाक्यैरखिलं निषिध्य तत् ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत्क्रियाः ॥17॥
यदा परात्मात्मविभेदभेदकं विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम्। तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥18॥
अब राम एक तर्क की गाँठ खोलते हैं। श्रुति के प्रमाण से जो माया नष्ट हो चुकी, वह फिर कार्य कैसे रचेगी। निर्मल और अद्वितीय विज्ञान-मात्र से अविद्या ऐसी जाती है कि दोबारा जन्म नहीं लेती। और जब वह फिर पैदा ही नहीं होती, तो हम ही कर्ता हैं, यह भाव लौट कर आएगा कहाँ से। इसी से राम वह निष्कर्ष रख देते हैं, कि वह विद्या स्वतन्त्र है, किसी और की मुहताज नहीं, और अकेली ही मोक्ष के लिए चमकती है।
श्लोक 19 · 20
श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा कथं भविषत्यपि कार्यकारिणी। विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयतस्तस्मादविद्या न पुनर्भविष्यति ॥19॥
यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते कर्ताहमस्येति मतिः कथं भवेत्। तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते विद्य विमोक्षाय विभाति केवला ॥20॥
यहाँ राम श्रुति को स्वयं गवाह बना कर खड़ा कर देते हैं। तैत्तिरीय श्रुति आदर के साथ सब कर्मों के संन्यास को स्पष्ट रूप से श्रेष्ठ कहती है; और वाजसनेयी श्रुति बस इतना कह कर रुक जाती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान है, कर्म नहीं। फिर वे उस तुलना पर हाथ रखते हैं जो विरोधी पक्ष लाता है, कि आपने ज्ञान को कर्म के बराबर दिखा दिया, पर जो यज्ञ का दृष्टान्त दिया वह बराबर का नहीं ठहरता। यज्ञ तो भिन्न-भिन्न फलों और बहुत से कारकों से सधता है, और ज्ञान इसके ठीक उलट है, अकेला और अकारक।
श्लोक 21 · 22
सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम्। एतावदित्याह च वाजिनां श्रुतिर्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥21॥
विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः। फलैः पृथक्त्वाद्बहुकारकैः क्रतुः संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥22॥
अब राम उस भाव की जड़ पकड़ते हैं जिससे कर्म बँधता है। मैं हूँ और मेरे साथ दोष लगा है, यह अनात्म-बुद्धि अज्ञानी में बैठी होती है, तत्त्व को देख चुके ज्ञानी में नहीं। इसी से वे कहते हैं कि जिनका आत्मा अविकारी हो चुका, ऐसे बुद्धिमानों को विधान से कहा गया कर्म छोड़ देना चाहिए। और फिर राम सीधे आप की ओर मुड़ते हैं। श्रद्धा से भरा, गुरु की कृपा से शुद्ध हुआ मन जब तत्-त्वम्-असि के वाक्य से जीव और आत्मा के एकत्व को जान लेता है, तब वह सुखी हो जाता है, मेरु पर्वत-सा अकम्प, जिसे कोई हिला नहीं सकता।
श्लोक 23 · 24
सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधीरज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः। तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभिर्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥23॥
श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीति वाक्यतो गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः। विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः सुखी भवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥24॥
अंत में राम महावाक्य के भीतर झाँकने का तरीका बता देते हैं। वाक्य का अर्थ जानने की विधि में पहले उसके पदों का अर्थ जानना ही कारण है। तत् और त्वम्, इन दो पदों के अर्थ हैं परमात्मा और जीव, और तब असि से इन दोनों का एकत्व खुलता है। पर यहाँ एक सावधानी है। दोनों आत्माओं के बीच का जो ऊपरी विरोध है, एक परोक्ष और दूर, दूसरा प्रत्यक्ष और पास, उसे छोड़ देना है; और दोनों में जो एक चिद्-स्वरूप समान है, उसी को थाम लेना है। लक्षणा से शुद्ध करके, उसी से लक्षित उस अपने आत्मा को जान लीजिए, राम कहते हैं, और तब आप अद्वय हो जाते हैं।
श्लोक 25 · 26
आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः। तत्त्वम्पदार्थौ परमात्मजीवकावसीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥25॥
प्रत्यक्परोक्षादि विरोधमात्मनोर्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम्। संशोधितां लक्षणया च लक्षितां ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत् ॥26॥