श्री राम गीता · खण्ड 3: पंच-कोश विवेक

श्री राम गीता · खण्ड 3

पंच-कोश विवेक

The Five Sheaths · श्लोक 17 से 26

राम अब technical होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् का पंच-कोश concept। पाँच आवरण: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द। “मैं” इन सबके पीछे।

श्लोक 17 · अन्नमय कोश
देहोऽहं ममायं देह इति बुद्धिर्विमूढधीः।
अन्नमयोऽयं कोशः स्यादात्मा नायं प्रकीर्तितः॥
deho’haṁ mamāyaṁ deha iti buddhir vimūḍha-dhīḥ
anna-mayo’yaṁ kośaḥ syād ātmā nāyaṁ prakīrtitaḥ

अर्थ“‘मैं देह हूँ, यह देह मेरी’, यह मूढ़-बुद्धि की धारणा। यह अन्नमय कोश है, यह आत्मा नहीं कही गयी।”

सन्दर्भपहला कोश: शरीर। यह अन्न से बना, अन्न से चलता, अन्न में मिल जाता। इसे “मैं” मानना mistake।
श्लोक 18 · प्राणमय कोश
प्राणानां पञ्चकं चैव कर्मेन्द्रियाणि पञ्च च।
प्राणमयोऽयं कोशो हि ज्ञेयो नैव चायमात्मा॥
prāṇānāṁ pañcakaṁ caiva karmendriyāṇi pañca ca
prāṇa-mayo’yaṁ kośo hi jñeyo naiva cāyam ātmā

अर्थ“पाँच प्राण और पाँच कर्म-इन्द्रिय, यह प्राणमय कोश। यह भी आत्मा नहीं।”

सन्दर्भदूसरा कोश: प्राण-शरीर। body को energize करने वाला। यह भी जब तक body, तब तक। आत्मा से अलग।
श्लोक 19 · मनोमय कोश
ज्ञानेन्द्रियैः पञ्चभिश्च मनसा सहितैः सदा।
मनोमयोऽयं कोशः स्यान्नैव चायमपि स्वयम्॥
jñānendriyaiḥ pañcabhiś ca manasā sahitaiḥ sadā
mano-mayo’yaṁ kośaḥ syān naiva cāyam api svayam

अर्थ“पाँच ज्ञान-इन्द्रिय और मन सहित, यह मनोमय कोश। यह भी ‘मैं’ नहीं।”

सन्दर्भतीसरा कोश: मन। पाँच इन्द्रियाँ + विचारक mind। यह layer हमारी identity का बड़ा हिस्सा है, मगर यह भी तू नहीं।
श्लोक 20 · विज्ञानमय कोश
बुद्धिः ज्ञानेन्द्रियैः सार्धं विज्ञानमय एव हि।
कर्मणां वा प्रकर्ता च नैवायं प्रकृतेः परम्॥
buddhiḥ jñānendriyaiḥ sārdhaṁ vijñāna-maya eva hi
karmaṇāṁ vā prakartā ca naivāyaṁ prakṛteḥ param

अर्थ“बुद्धि, ज्ञान-इन्द्रियों के साथ, विज्ञानमय कोश। कर्मों का कर्ता, मगर यह भी प्रकृति से परे नहीं।”

सन्दर्भचौथा कोश: बुद्धि। यहाँ “कर्ता” बैठा है। हर decision यहाँ से। मगर यह भी layer है।
श्लोक 21 · आनन्दमय कोश
सुषुप्तौ या त्ववस्था स्यादानन्द-घन-रूपिणी।
आनन्दमयकोशोऽसौ ज्ञेयो नैव चायमात्मनः॥
suṣuptau yā tv avasthā syād ānanda-ghana-rūpiṇī
ānanda-maya-kośo’sau jñeyo naiva cāyam ātmanaḥ

अर्थ“सुषुप्ति में जो अवस्था, आनन्द-घन-रूपिणी, वह आनन्दमय कोश। यह आत्मा भी नहीं।”

सन्दर्भपाँचवाँ कोश: सुख का अनुभव। सोते समय भी “मैं था”, यह feel। यह deep layer मगर अभी भी आत्मा नहीं।
श्लोक 22 · पाँचों से परे
पञ्चकोशातिरिक्तस्य साक्षिणः सच्चिदात्मनः।
स्वरूपं ज्ञानमानन्दः परं ब्रह्मेति निश्चयः॥
pañca-kośātiriktasya sākṣiṇaḥ sac-cid-ātmanaḥ
svarūpaṁ jñānam ānandaḥ paraṁ brahmeti niścayaḥ

अर्थ“पंच-कोशों से अतिरिक्त, साक्षी, सच्-चित्-आत्मा का स्वरूप, ज्ञान और आनन्द, यही परम ब्रह्म है, यह निश्चय।”

सन्दर्भcore declaration। पाँच कोशों के साक्षी। उनके पीछे जो awareness। वही “मैं”, वही ब्रह्म।
श्लोक 23
यथा शिशुर्मातुरङ्के क्षीरं वा भिन्न-वेदितः।
तथा पञ्चकोश-भिन्नः साक्षी कूटस्थ ईश्वरः॥
yathā śiśur mātur aṅke kṣīraṁ vā bhinna-veditaḥ
tathā pañca-kośa-bhinnaḥ sākṣī kūṭa-stha īśvaraḥ

अर्थ“जैसे माँ की गोद में बच्चा या दूध को अलग पहचाना जा सकता है, वैसे पंच-कोश से भिन्न साक्षी कूटस्थ ईश्वर।”

श्लोक 24
देहेन्द्रिय-मनो-बुद्धि-प्राण-अहंकार-वर्जितः।
आत्मा शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि सर्वसाक्षी सनातनः॥
dehendriya-mano-buddhi-prāṇa-ahaṅkāra-varjitaḥ
ātmā śuddho’si buddho’si sarva-sākṣī sanātanaḥ

अर्थ“देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहंकार से रहित। तू आत्मा शुद्ध, बुद्ध, सर्व-साक्षी, सनातन।”

श्लोक 25
नेति नेतीति विज्ञेयो ब्रह्म-वादिभिरीरितः।
अनन्तं नित्यं विज्ञानघनं ज्ञेयं चिदाकृतिम्॥
neti netīti vijñeyo brahma-vādibhir īritaḥ
anantaṁ nityaṁ vijñāna-ghanaṁ jñeyaṁ cid-ākṛtim

अर्थ“‘नहीं, नहीं’ इस तरह जाने योग्य, ब्रह्म-वादियों ने कहा। अनन्त, नित्य, विज्ञान-घन, चित्-आकृति, यह जानना।”

सन्दर्भ“नेति नेति”। हर concept को negate करते जाओ। जो last में बचे, वो असली। यह उपनिषद् की classic method।
श्लोक 26
साक्षिणं द्रष्टारमेकं कूटस्थमविकारिणम्।
आत्मानं तं विजानीयाद् वस्तुतत्त्वावलोकिनम्॥
sākṣiṇaṁ draṣṭāram ekaṁ kūṭa-stham avikāriṇam
ātmānaṁ taṁ vijānīyād vastu-tattvāvalokinam

अर्थ“साक्षी, द्रष्टा, एक, कूटस्थ, अविकारी, उस आत्मा को जान, जो वस्तु के तत्त्व को देखने वाला।”

॥ पंच-कोश विवेक ॥