पंच-कोश विवेक
The Five Sheaths · श्लोक 17 से 26
राम अब technical होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् का पंच-कोश concept। पाँच आवरण: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द। “मैं” इन सबके पीछे।
अन्नमयोऽयं कोशः स्यादात्मा नायं प्रकीर्तितः॥
anna-mayo’yaṁ kośaḥ syād ātmā nāyaṁ prakīrtitaḥ
अर्थ“‘मैं देह हूँ, यह देह मेरी’, यह मूढ़-बुद्धि की धारणा। यह अन्नमय कोश है, यह आत्मा नहीं कही गयी।”
प्राणमयोऽयं कोशो हि ज्ञेयो नैव चायमात्मा॥
prāṇa-mayo’yaṁ kośo hi jñeyo naiva cāyam ātmā
अर्थ“पाँच प्राण और पाँच कर्म-इन्द्रिय, यह प्राणमय कोश। यह भी आत्मा नहीं।”
मनोमयोऽयं कोशः स्यान्नैव चायमपि स्वयम्॥
mano-mayo’yaṁ kośaḥ syān naiva cāyam api svayam
अर्थ“पाँच ज्ञान-इन्द्रिय और मन सहित, यह मनोमय कोश। यह भी ‘मैं’ नहीं।”
कर्मणां वा प्रकर्ता च नैवायं प्रकृतेः परम्॥
karmaṇāṁ vā prakartā ca naivāyaṁ prakṛteḥ param
अर्थ“बुद्धि, ज्ञान-इन्द्रियों के साथ, विज्ञानमय कोश। कर्मों का कर्ता, मगर यह भी प्रकृति से परे नहीं।”
आनन्दमयकोशोऽसौ ज्ञेयो नैव चायमात्मनः॥
ānanda-maya-kośo’sau jñeyo naiva cāyam ātmanaḥ
अर्थ“सुषुप्ति में जो अवस्था, आनन्द-घन-रूपिणी, वह आनन्दमय कोश। यह आत्मा भी नहीं।”
स्वरूपं ज्ञानमानन्दः परं ब्रह्मेति निश्चयः॥
svarūpaṁ jñānam ānandaḥ paraṁ brahmeti niścayaḥ
अर्थ“पंच-कोशों से अतिरिक्त, साक्षी, सच्-चित्-आत्मा का स्वरूप, ज्ञान और आनन्द, यही परम ब्रह्म है, यह निश्चय।”
तथा पञ्चकोश-भिन्नः साक्षी कूटस्थ ईश्वरः॥
tathā pañca-kośa-bhinnaḥ sākṣī kūṭa-stha īśvaraḥ
अर्थ“जैसे माँ की गोद में बच्चा या दूध को अलग पहचाना जा सकता है, वैसे पंच-कोश से भिन्न साक्षी कूटस्थ ईश्वर।”
आत्मा शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि सर्वसाक्षी सनातनः॥
ātmā śuddho’si buddho’si sarva-sākṣī sanātanaḥ
अर्थ“देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहंकार से रहित। तू आत्मा शुद्ध, बुद्ध, सर्व-साक्षी, सनातन।”
अनन्तं नित्यं विज्ञानघनं ज्ञेयं चिदाकृतिम्॥
anantaṁ nityaṁ vijñāna-ghanaṁ jñeyaṁ cid-ākṛtim
अर्थ“‘नहीं, नहीं’ इस तरह जाने योग्य, ब्रह्म-वादियों ने कहा। अनन्त, नित्य, विज्ञान-घन, चित्-आकृति, यह जानना।”
आत्मानं तं विजानीयाद् वस्तुतत्त्वावलोकिनम्॥
ātmānaṁ taṁ vijānīyād vastu-tattvāvalokinam
अर्थ“साक्षी, द्रष्टा, एक, कूटस्थ, अविकारी, उस आत्मा को जान, जो वस्तु के तत्त्व को देखने वाला।”