माया का खेल
The Play of Illusion · श्लोक 35 से 42
अगर सब एक है, तो “अनेक” क्यों दिखता है? यह वेदान्त का सबसे बड़ा सवाल। राम का जवाब: माया।
माया-शक्तिर्जगन्मातुर्ज्ञानेन निवर्तते॥
māyā-śaktir jagan-mātur jñānena nivartate
अर्थ“अनादि, भाव-रूपा, अज्ञान-कारण, यह माया-शक्ति, जगत् की माता। ज्ञान से निवृत्त हो जाती है।”
अहं-कर्तेति सम्मोह आदिर्भवति देहिनाम्॥
ahaṁ-karteti sammoha ādir bhavati dehinām
अर्थ“माया अव्यक्त-रूपिणी से, अक्षर ब्रह्म पर अध्यस्त (super-imposed) हो कर, ‘मैं कर्ता’ यह सम्मोह देहधारियों का मूल बनता है।”
तत्त्व-ज्ञानात्पुनस्तेषां ब्रह्मैकं प्रथते स्फुटम्॥
tattva-jñānāt punas teṣāṁ brahmaikaṁ prathate sphuṭam
अर्थ“रस्सी पर साँप की तरह, आत्मा पर विश्व विमोहित को दिखता है। तत्त्व-ज्ञान से फिर ब्रह्म-एक स्पष्ट होता है।”
अज्ञान-कल्पितं सर्वं नित्यानन्द-सरूपिणम्॥
ajñāna-kalpitaṁ sarvaṁ nityānanda-sa-rūpiṇam
अर्थ“सत्य, ज्ञान, स्वयं-प्रकाश, चिद्-आत्मा को जो जानते, उनके लिए सब अज्ञान-कल्पित, और नित्य-आनन्द-स्वरूप का दर्शन।”
स्वप्न-नाशे यथा नाशो जागरे साम्यतां वजेत्॥
svapna-nāśe yathā nāśo jāgare sāmyatāṁ vrajet
अर्थ“जैसे स्वप्न में भिन्न-धर्म वाली अनेक चीज़ें प्रकट होती हैं, और स्वप्न के नाश पर सब का नाश। ऐसे ही जागृति में, समता को प्राप्त।”
तथात्मनि निरालम्बे जगत् माया-विजृम्भितम्॥
tathātmani nirālambe jagat māyā-vijṛmbhitam
अर्थ“जैसे सूर्य के अस्त होने पर भी, लोक में उसकी किरणें भासित दिखें, वैसे निरालम्ब आत्मा में जगत् माया-विजृम्भित।”
सत्ये जगति नैकत्वं स्वच्छन्दं नैव पश्यति॥
satye jagati naikatvaṁ svacchandaṁ naiva paśyati
अर्थ“माया से मोहित, अज्ञान-अन्धकार से घिरा सब लोक, सत्य जगत् में एकत्व को स्वच्छन्द नहीं देखता।”
तस्यावयव-भूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्॥
tasyāvayava-bhūtais tu vyāptaṁ sarvam idaṁ jagat
अर्थ“माया को प्रकृति जान, मायी को महेश्वर। उसके अवयव-भूतों से सब जगत् व्याप्त।”