श्री राम गीता · खण्ड 5: माया का खेल

श्री राम गीता · खण्ड 5

माया का खेल

The Play of Illusion · श्लोक 35 से 42

अगर सब एक है, तो “अनेक” क्यों दिखता है? यह वेदान्त का सबसे बड़ा सवाल। राम का जवाब: माया।

श्लोक 35
अनादिर्भाव-रूपा सा प्रोच्यतेऽज्ञान-कारणम्।
माया-शक्तिर्जगन्मातुर्ज्ञानेन निवर्तते॥
anādir bhāva-rūpā sā procyate’jñāna-kāraṇam
māyā-śaktir jagan-mātur jñānena nivartate

अर्थ“अनादि, भाव-रूपा, अज्ञान-कारण, यह माया-शक्ति, जगत् की माता। ज्ञान से निवृत्त हो जाती है।”

सन्दर्भमाया की definition। “अनादि” (बिना शुरुआत के), “भाव-रूपा” (existence जैसी दिखती)। मगर ज्ञान से ख़त्म।
श्लोक 36
माययाव्यक्तरूपिण्या ब्रह्मण्यध्यस्तमक्षरम्।
अहं-कर्तेति सम्मोह आदिर्भवति देहिनाम्॥
māyayāvyakta-rūpiṇyā brahmaṇy adhyastam akṣaram
ahaṁ-karteti sammoha ādir bhavati dehinām

अर्थ“माया अव्यक्त-रूपिणी से, अक्षर ब्रह्म पर अध्यस्त (super-imposed) हो कर, ‘मैं कर्ता’ यह सम्मोह देहधारियों का मूल बनता है।”

श्लोक 37
रज्जौ सर्प इवात्मन्यं विश्वं भाति विमोहिनाम्।
तत्त्व-ज्ञानात्पुनस्तेषां ब्रह्मैकं प्रथते स्फुटम्॥
rajjau sarpa ivātmany aṁ viśvaṁ bhāti vimohinām
tattva-jñānāt punas teṣāṁ brahmaikaṁ prathate sphuṭam

अर्थ“रस्सी पर साँप की तरह, आत्मा पर विश्व विमोहित को दिखता है। तत्त्व-ज्ञान से फिर ब्रह्म-एक स्पष्ट होता है।”

सन्दर्भरस्सी-साँप का metaphor, अद्वैत-वेदान्त का signature analogy।
श्लोक 38
सत्यं ज्ञानं स्वयंप्रकाशं चिदात्मानं विदुस्तु ये।
अज्ञान-कल्पितं सर्वं नित्यानन्द-सरूपिणम्॥
satyaṁ jñānaṁ svayaṁ-prakāśaṁ cid-ātmānaṁ vidus tu ye
ajñāna-kalpitaṁ sarvaṁ nityānanda-sa-rūpiṇam

अर्थ“सत्य, ज्ञान, स्वयं-प्रकाश, चिद्-आत्मा को जो जानते, उनके लिए सब अज्ञान-कल्पित, और नित्य-आनन्द-स्वरूप का दर्शन।”

श्लोक 39
यथा स्वप्ने भिन्न-धर्मा नाना दृष्ट्या प्रकाशते।
स्वप्न-नाशे यथा नाशो जागरे साम्यतां वजेत्॥
yathā svapne bhinna-dharmā nānā dṛṣṭyā prakāśate
svapna-nāśe yathā nāśo jāgare sāmyatāṁ vrajet

अर्थ“जैसे स्वप्न में भिन्न-धर्म वाली अनेक चीज़ें प्रकट होती हैं, और स्वप्न के नाश पर सब का नाश। ऐसे ही जागृति में, समता को प्राप्त।”

सन्दर्भस्वप्न-जागृति analogy। संसार स्वप्न के समान।
श्लोक 40
यथा सूर्ये निरुद्धेऽपि भान्ति लोके च तत्करा।
तथात्मनि निरालम्बे जगत् माया-विजृम्भितम्॥
yathā sūrye niruddhe’pi bhānti loke ca tat-karā
tathātmani nirālambe jagat māyā-vijṛmbhitam

अर्थ“जैसे सूर्य के अस्त होने पर भी, लोक में उसकी किरणें भासित दिखें, वैसे निरालम्ब आत्मा में जगत् माया-विजृम्भित।”

श्लोक 41
मायया मोहितः सर्वो लोकोऽज्ञान-तमोवृतः।
सत्ये जगति नैकत्वं स्वच्छन्दं नैव पश्यति॥
māyayā mohitaḥ sarvo loko’jñāna-tamo-vṛtaḥ
satye jagati naikatvaṁ svacchandaṁ naiva paśyati

अर्थ“माया से मोहित, अज्ञान-अन्धकार से घिरा सब लोक, सत्य जगत् में एकत्व को स्वच्छन्द नहीं देखता।”

श्लोक 42
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।
तस्यावयव-भूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्॥
māyāṁ tu prakṛtiṁ vidyān māyinaṁ tu maheśvaram
tasyāvayava-bhūtais tu vyāptaṁ sarvam idaṁ jagat

अर्थ“माया को प्रकृति जान, मायी को महेश्वर। उसके अवयव-भूतों से सब जगत् व्याप्त।”

सन्दर्भ“मायी”। माया का wielder। माया एक है, मगर उसके पीछे एक conscious one है।
॥ माया का खेल ॥