आत्मा-अद्वय
The Self is Non-Dual · 14 श्लोक
जनक आश्चर्य में हैं। अष्टावक्र अब एक नया question उठाते हैं: अगर तू सच में जानता है, तो छोटी-छोटी चीज़ों में अभी भी interest क्यों? यह प्रकरण ज्ञान के बाद की चुनौतियों पर है।
तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥
tavātma-jñānasya dhīrasya kathamarthārjane ratiḥ
अर्थ“अविनाशी, एक आत्मा को तत्त्वतः जान कर भी, हे आत्मज्ञानी धीर, तेरी अर्थ-अर्जन (धन कमाने) में रति कैसे?”
पाठक के लिए“अर्थ-अर्जन” यानी sense-pursuits। ज्ञान आ जाए, फिर भी मन कभी पैसे की तरफ़, कभी प्रशंसा की तरफ़ खींचता है। अष्टावक्र चौंकाते हैं, “अरे, तू तो जानता है, फिर यह क्या?” यह scolding नहीं, recognition की याद-दिलाई है।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥
śukter ajñānato lobho yathā rajata-vibhrame
अर्थ“आत्म-अज्ञान से ही विषयों के भ्रम-क्षेत्र में प्रीति होती है। जैसे सीप का अज्ञान होने पर चाँदी के भ्रम में लोभ होता है।”
पाठक के लिएएक important point। प्रीति (attraction) ख़ुद-ब-ख़ुद कम नहीं होती। बस “मैं कौन हूँ” का answer बदलने से प्रीति का base ख़त्म हो जाता है। दौड़ अपने आप रुकती है।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥
so’ham asmīti vijñāya kiṁ dīna iva dhāvasi
अर्थ“जिसमें यह विश्व लहरों की तरह समुद्र में स्फुरित होता है, ‘वही मैं हूँ’ यह जान कर भी, दीन की तरह क्यों दौड़ता है?”
पाठक के लिए“मैं ही समुद्र हूँ”। यह realize होते ही, लहरें “पराई” नहीं रहतीं। हर अच्छी-बुरी situation आपका ही form है। फिर कहीं “जाने” की क्या ज़रूरत?
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥
upasthe’tyanta-saṁsakto mālinyam adhigacchati
अर्थ“शुद्ध चैतन्य, अति-सुन्दर आत्मा को सुनकर भी, जो शरीर के निचले हिस्से में अत्यन्त आसक्त रहता है, वो मलिनता को प्राप्त होता है।”
पाठक के लिएयह श्लोक celibacy का mandate नहीं। यह attachment की warning है। sex की समस्या नहीं, उससे “बँधे” होने की समस्या है। जो काम होना है हो, मगर “मैं इस से बँधा हूँ” यह मान्यता न रहे।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
muner jānata āścaryaṁ mamatvam anuvartate
अर्थ“सब प्राणियों में आत्मा को, और सब प्राणियों को आत्मा में, जानने वाले मुनि का अहंकार (ममत्व) चलते रहना, यह आश्चर्य है।”
पाठक के लिए“ममत्व”, “मेरापन”। यह सबसे गहरा है। ज्ञान सुनो, पढ़ो, मानो, फिर भी “मेरी कार, मेरा घर, मेरा बेटा, मेरी इज़्ज़त” चलता रहता है। यह subtle work है, बीसों साल का। पर recognition की पहली flash से शुरुआत होती है।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥
āścaryaṁ kāma-vaśa-go vikalaḥ keli-śikṣayā
अर्थ“परम अद्वैत में स्थित, मोक्ष के अर्थ में लगा हुआ, और फिर भी काम के वश में हो कर, खेल-तमाशे की शिक्षा से विचलित, यह आश्चर्य है।”
पाठक के लिएआज के context में: हम spiritual texts पढ़ते हैं, podcasts सुनते हैं, और फिर social media पर 2 घंटे बिता देते हैं। अष्टावक्र मुस्कुरा कर कहेंगे, “आश्चर्य”।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥
āścaryaṁ kāmam ākāṅkṣet kālam antam anuśritaḥ
अर्थ“काम (इच्छा) को ज्ञान का बड़ा शत्रु जान कर, अति-दुर्बल हो कर भी, अन्त-काल के निकट हो कर भी, उसी काम को चाहना, यह आश्चर्य है।”
पाठक के लिएयह श्लोक सब उम्र के साधकों के लिए है। जवानी में इच्छाएँ “natural” लगती हैं। बुढ़ापे में वही इच्छाएँ “embarrassing”। पर इच्छाएँ बदलती नहीं, बस energy बदलती है। मूल समस्या वही है।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥
āścaryaṁ mokṣa-kāmasya mokṣād eva vibhīṣikā
अर्थ“इस लोक और पर-लोक से विरक्त, नित्य-अनित्य का विवेक करने वाले, मोक्ष चाहने वाले को, मोक्ष से ही डर लगना, यह आश्चर्य है।”
पाठक के लिएहर साधक यहाँ रुकता है। ध्यान में जब “मैं” disappear होने लगता है, panic आती है। “कहीं मैं ख़त्म तो नहीं हो जाऊँगा?” अष्टावक्र कहते हैं, यह डर ही आख़िरी obstacle है।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥
ātmānaṁ kevalaṁ paśyan na tuṣyati na kupyati
अर्थ“मगर धीर पुरुष, चाहे खाया जा रहा हो, चाहे पीड़ित हो, सदा सिर्फ़ आत्मा को देखता है, न तुष्ट होता है, न क्रोधित।”
पाठक के लिए“भोज्यमान” का literal अर्थ है “खाया जा रहा”, यानी consumed। प्रशंसा, सुख, सब “खाते” हैं। और “पीड़्यमान” यानी tortured। दोनों situation में same response, यह धीर का mark है।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥
saṁstave cāpi nindāyāṁ kathaṁ kṣubhyet mahāśayaḥ
अर्थ“अपने काम करते शरीर को वो दूसरे के शरीर की तरह देखता है। प्रशंसा हो या निन्दा, महाशय कैसे क्षुब्ध हो?”
पाठक के लिएएक practice: कभी-कभी अपने शरीर को बाहर से देखिए, जैसे CCTV से। “वो आदमी चल रहा है, खा रहा है।” यह simple shift काफ़ी है। शरीर detach होने लगता है। फिर जब कोई बोलता है, “तुम्हारा कुछ बुरा हुआ”, आप पूछते हैं, “किसका?”
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥
api sannihite mṛtyau kathaṁ trasyati dhīra-dhīḥ
अर्थ“यह विश्व माया-मात्र है, यह देख कर कौतुक रहित हो कर, मृत्यु निकट आने पर भी, धीर-धी कैसे डरे?”
पाठक के लिए“माया-मात्र” का मतलब “नहीं है” नहीं, “जैसा दिखता वैसा नहीं”। संसार real है, मगर permanent नहीं। हर experience आता है, चला जाता है। मृत्यु भी एक ऐसा ही event।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥
tasyātma-jñāna-tṛptasya tulanā kena jāyate
अर्थ“जिसका मन निःस्पृह है, निराशा में भी, उस आत्म-ज्ञान से तृप्त महात्मा की तुलना किस से हो सकती है?”
पाठक के लिए“तुलना केन जायते?”, “तुलना किस से हो?” यह rhetorical है। ज्ञानी की कोई तुलना नहीं। कोई scale नहीं जिस पर वो माप जाए। वो अपने आप में एक category है।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥
idaṁ grāhyam idaṁ tyājyaṁ sa kiṁ paśyati dhīradhīḥ
अर्थ“स्वभाव से ही जानने वाला, यह दृश्य कुछ नहीं है यह जानने वाला धीर, ‘यह लेने योग्य है, यह छोड़ने योग्य’ किसे देखता है?”
पाठक के लिएहमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा यही है, क्या रखूँ-क्या छोड़ूँ। यह श्लोक उस मन्थन से छुड़ाता है। जो आता है, सब आपका ही form है। न रखो, न छोड़ो, बस होने दो।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥
yadṛcchayāgato bhogo na duḥkhāya na tuṣṭaye
अर्थ“जिसने अन्दर से कषाय (attachment-stains) छोड़ दिए, जो निर्द्वन्द्व है, निराशीष है, उस के लिए अनायास आया भोग, न दुःख देता है, न तुष्टि।”
पाठक के लिएप्रकरण 3 ख़त्म। यह प्रकरण साधक के सबसे common issue पर है, “ज्ञान सुना, फिर भी आदतें वैसी क्यों?” अष्टावक्र कहते हैं, ज्ञान deepen करो, आदतें अपने आप settle होंगी। force नहीं, recognition की steady reaffirmation।