अष्टावक्र गीता · प्रकरण 3: आत्मा-अद्वय

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 3

आत्मा-अद्वय

The Self is Non-Dual · 14 श्लोक

जनक आश्चर्य में हैं। अष्टावक्र अब एक नया question उठाते हैं: अगर तू सच में जानता है, तो छोटी-छोटी चीज़ों में अभी भी interest क्यों? यह प्रकरण ज्ञान के बाद की चुनौतियों पर है।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥
avināśinam ātmānam ekaṁ vijñāya tattvataḥ
tavātma-jñānasya dhīrasya kathamarthārjane ratiḥ

अर्थ“अविनाशी, एक आत्मा को तत्त्वतः जान कर भी, हे आत्मज्ञानी धीर, तेरी अर्थ-अर्जन (धन कमाने) में रति कैसे?”

सन्दर्भअष्टावक्र की teaching का एक angle यह भी है। ज्ञान recognize करने के बाद भी, पुरानी आदतें चल सकती हैं। जैसे dream से जगने के बाद भी कुछ देर तक dream के traces बचे रहते हैं। पर वो “real” थोड़े ही हैं।

पाठक के लिए“अर्थ-अर्जन” यानी sense-pursuits। ज्ञान आ जाए, फिर भी मन कभी पैसे की तरफ़, कभी प्रशंसा की तरफ़ खींचता है। अष्टावक्र चौंकाते हैं, “अरे, तू तो जानता है, फिर यह क्या?” यह scolding नहीं, recognition की याद-दिलाई है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥
ātmājñānād aho prītir viṣaya-bhrama-gocare
śukter ajñānato lobho yathā rajata-vibhrame

अर्थ“आत्म-अज्ञान से ही विषयों के भ्रम-क्षेत्र में प्रीति होती है। जैसे सीप का अज्ञान होने पर चाँदी के भ्रम में लोभ होता है।”

सन्दर्भसीप-चाँदी का metaphor। सीप दूर से चमकती है, लगता है चाँदी पड़ी है। दौड़ कर लेने जाते हैं। मगर लेने पर पता चलता है, सीप थी। बस। मगर तब तक “लालच” तो हो ही गयी। ठीक वैसे ही, जब तक आत्मा का ज्ञान नहीं, विषयों पर “लालच” होती रहती है।

पाठक के लिएएक important point। प्रीति (attraction) ख़ुद-ब-ख़ुद कम नहीं होती। बस “मैं कौन हूँ” का answer बदलने से प्रीति का base ख़त्म हो जाता है। दौड़ अपने आप रुकती है।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥
viśvaṁ sphurati yatredaṁ taraṅgā iva sāgare
so’ham asmīti vijñāya kiṁ dīna iva dhāvasi

अर्थ“जिसमें यह विश्व लहरों की तरह समुद्र में स्फुरित होता है, ‘वही मैं हूँ’ यह जान कर भी, दीन की तरह क्यों दौड़ता है?”

सन्दर्भ“दीन इव धावसि”, “दीन की तरह दौड़ता है”। यह अष्टावक्र की काटने वाली phrase है। जनक राजा है, फिर भी दीन क्यों? क्योंकि कुछ “चाहिए”। चाह जब तक है, चाहे जो भी हो, इन्सान दीन है। यहाँ तक कि “मुक्ति” की चाह भी।

पाठक के लिए“मैं ही समुद्र हूँ”। यह realize होते ही, लहरें “पराई” नहीं रहतीं। हर अच्छी-बुरी situation आपका ही form है। फिर कहीं “जाने” की क्या ज़रूरत?

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥
śrutvāpi śuddha-caitanyam ātmānam atisundaram
upasthe’tyanta-saṁsakto mālinyam adhigacchati

अर्थ“शुद्ध चैतन्य, अति-सुन्दर आत्मा को सुनकर भी, जो शरीर के निचले हिस्से में अत्यन्त आसक्त रहता है, वो मलिनता को प्राप्त होता है।”

सन्दर्भ“उपस्थ” यानी genitals, sexual attachment। अष्टावक्र direct हैं, कोई sugar-coating नहीं। ज्ञान सुनने के बाद भी अगर sexual attachment dominate करता है, तो “मलिनता” यानी consciousness का muddiness आता है। ज्ञान की clarity खो जाती है।

पाठक के लिएयह श्लोक celibacy का mandate नहीं। यह attachment की warning है। sex की समस्या नहीं, उससे “बँधे” होने की समस्या है। जो काम होना है हो, मगर “मैं इस से बँधा हूँ” यह मान्यता न रहे।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
sarva-bhūteṣu cātmānaṁ sarva-bhūtāni cātmani
muner jānata āścaryaṁ mamatvam anuvartate

अर्थ“सब प्राणियों में आत्मा को, और सब प्राणियों को आत्मा में, जानने वाले मुनि का अहंकार (ममत्व) चलते रहना, यह आश्चर्य है।”

सन्दर्भ“आश्चर्य” शब्द फिर आया। प्रकरण 2 में जनक की voice से, अब अष्टावक्र की voice से। मगर tone अलग है। जनक का आश्चर्य recognition का था, अष्टावक्र का आश्चर्य residue का है। “इतना जान कर भी ममत्व? यह कैसे?”

पाठक के लिए“ममत्व”, “मेरापन”। यह सबसे गहरा है। ज्ञान सुनो, पढ़ो, मानो, फिर भी “मेरी कार, मेरा घर, मेरा बेटा, मेरी इज़्ज़त” चलता रहता है। यह subtle work है, बीसों साल का। पर recognition की पहली flash से शुरुआत होती है।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥
āsthitaḥ paramādvaitaṁ mokṣārthe’pi vyavasthitaḥ
āścaryaṁ kāma-vaśa-go vikalaḥ keli-śikṣayā

अर्थ“परम अद्वैत में स्थित, मोक्ष के अर्थ में लगा हुआ, और फिर भी काम के वश में हो कर, खेल-तमाशे की शिक्षा से विचलित, यह आश्चर्य है।”

सन्दर्भ“केलि-शिक्षा” से distract होना। साधक अद्वैत समझे, मोक्ष का pursuit करे, मगर बीच में game, gossip, entertainment, यह तो चलता ही है। अष्टावक्र इस contradiction को point करते हैं।

पाठक के लिएआज के context में: हम spiritual texts पढ़ते हैं, podcasts सुनते हैं, और फिर social media पर 2 घंटे बिता देते हैं। अष्टावक्र मुस्कुरा कर कहेंगे, “आश्चर्य”।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥
udbhūtaṁ jñāna-durmitram avadhāryāti-durbalaḥ
āścaryaṁ kāmam ākāṅkṣet kālam antam anuśritaḥ

अर्थ“काम (इच्छा) को ज्ञान का बड़ा शत्रु जान कर, अति-दुर्बल हो कर भी, अन्त-काल के निकट हो कर भी, उसी काम को चाहना, यह आश्चर्य है।”

सन्दर्भ“अन्त-काल”। बुढ़ापे की बात है। शरीर कमज़ोर है, मृत्यु पास है, फिर भी इच्छाएँ। यह सबसे painful contradiction है। और अष्टावक्र इसे “आश्चर्य” कह कर थोड़ा सा हँसी से भी देखते हैं।

पाठक के लिएयह श्लोक सब उम्र के साधकों के लिए है। जवानी में इच्छाएँ “natural” लगती हैं। बुढ़ापे में वही इच्छाएँ “embarrassing”। पर इच्छाएँ बदलती नहीं, बस energy बदलती है। मूल समस्या वही है।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥
ihāmutra viraktasya nityānitya-vivekinaḥ
āścaryaṁ mokṣa-kāmasya mokṣād eva vibhīṣikā

अर्थ“इस लोक और पर-लोक से विरक्त, नित्य-अनित्य का विवेक करने वाले, मोक्ष चाहने वाले को, मोक्ष से ही डर लगना, यह आश्चर्य है।”

सन्दर्भयह subtle है। साधक मोक्ष चाहता है, मगर मोक्ष की definition पर डरता है। “अगर सब छूट गया, तो ‘मैं’ क्या?” यह fear सबसे आख़िरी है। सब कुछ छोड़ने के बाद, “छोड़ने वाला” भी छूटना है। यह बात पर मन रुकता है।

पाठक के लिएहर साधक यहाँ रुकता है। ध्यान में जब “मैं” disappear होने लगता है, panic आती है। “कहीं मैं ख़त्म तो नहीं हो जाऊँगा?” अष्टावक्र कहते हैं, यह डर ही आख़िरी obstacle है।

श्लोक 9
अष्टावक्र उवाच
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥
dhīras tu bhojyamāno’pi pīḍyamāno’pi sarvadā
ātmānaṁ kevalaṁ paśyan na tuṣyati na kupyati

अर्थ“मगर धीर पुरुष, चाहे खाया जा रहा हो, चाहे पीड़ित हो, सदा सिर्फ़ आत्मा को देखता है, न तुष्ट होता है, न क्रोधित।”

सन्दर्भयहाँ अष्टावक्र angle बदलते हैं। पहले criticism थी (“आश्चर्य है कि…”), अब description है (“धीर ऐसा होता है”)। दो extremes में एक ही equanimity। चाहे prosperity हो, चाहे persecution, धीर का base नहीं हिलता।

पाठक के लिए“भोज्यमान” का literal अर्थ है “खाया जा रहा”, यानी consumed। प्रशंसा, सुख, सब “खाते” हैं। और “पीड़्यमान” यानी tortured। दोनों situation में same response, यह धीर का mark है।

श्लोक 10
अष्टावक्र उवाच
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥
ceṣṭamānaṁ śarīraṁ svaṁ paśyaty anya-śarīravat
saṁstave cāpi nindāyāṁ kathaṁ kṣubhyet mahāśayaḥ

अर्थ“अपने काम करते शरीर को वो दूसरे के शरीर की तरह देखता है। प्रशंसा हो या निन्दा, महाशय कैसे क्षुब्ध हो?”

सन्दर्भ“अन्य-शरीर-वत्”, “दूसरे के शरीर की तरह”। यह key shift है। हम अपने शरीर को “मेरा” मानते हैं, इसलिए हर taunt लगता है। अगर शरीर “दूसरे का” लगे, तो taunt भी “दूसरे को” लगेगा। और निंदा-प्रशंसा शरीर पर ही होती है।

पाठक के लिएएक practice: कभी-कभी अपने शरीर को बाहर से देखिए, जैसे CCTV से। “वो आदमी चल रहा है, खा रहा है।” यह simple shift काफ़ी है। शरीर detach होने लगता है। फिर जब कोई बोलता है, “तुम्हारा कुछ बुरा हुआ”, आप पूछते हैं, “किसका?”

श्लोक 11
अष्टावक्र उवाच
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥
māyā-mātram idaṁ viśvaṁ paśyan vigata-kautukaḥ
api sannihite mṛtyau kathaṁ trasyati dhīra-dhīḥ

अर्थ“यह विश्व माया-मात्र है, यह देख कर कौतुक रहित हो कर, मृत्यु निकट आने पर भी, धीर-धी कैसे डरे?”

सन्दर्भ“विगत-कौतुक”, “जिसका कौतूहल चला गया”। बच्चे की तरह “ओह क्या हो रहा है!” वाला excitement नहीं। मगर dullness भी नहीं। बस एक settled witness-stance। और इस stance से मृत्यु भी एक event है, क्रिसिस नहीं।

पाठक के लिए“माया-मात्र” का मतलब “नहीं है” नहीं, “जैसा दिखता वैसा नहीं”। संसार real है, मगर permanent नहीं। हर experience आता है, चला जाता है। मृत्यु भी एक ऐसा ही event।

श्लोक 12
अष्टावक्र उवाच
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥
niḥspṛhaṁ mānasaṁ yasya nairāśye’pi mahātmanaḥ
tasyātma-jñāna-tṛptasya tulanā kena jāyate

अर्थ“जिसका मन निःस्पृह है, निराशा में भी, उस आत्म-ज्ञान से तृप्त महात्मा की तुलना किस से हो सकती है?”

सन्दर्भ“नैराश्ये अपि निःस्पृह”। निराशा में भी इच्छारहित। यह कमाल है। आम तौर पर निराशा गहरी इच्छा से आती है, “मुझे यह चाहिए था, नहीं मिला”। मगर ज्ञानी निराशा में भी settled है, क्योंकि इच्छा थी ही नहीं।

पाठक के लिए“तुलना केन जायते?”, “तुलना किस से हो?” यह rhetorical है। ज्ञानी की कोई तुलना नहीं। कोई scale नहीं जिस पर वो माप जाए। वो अपने आप में एक category है।

श्लोक 13
अष्टावक्र उवाच
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥
svabhāvād eva jānāno dṛśyam etan na kiñcana
idaṁ grāhyam idaṁ tyājyaṁ sa kiṁ paśyati dhīradhīḥ

अर्थ“स्वभाव से ही जानने वाला, यह दृश्य कुछ नहीं है यह जानने वाला धीर, ‘यह लेने योग्य है, यह छोड़ने योग्य’ किसे देखता है?”

सन्दर्भ“ग्राह्य-त्याज्य” का division ही ख़त्म। जब “मैं” चेतना है, और सब चेतना का खेल है, तो लेने-छोड़ने का scope कहाँ? जो आता है, उसे होने दो। जो जाता है, उसे जाने दो।

पाठक के लिएहमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा यही है, क्या रखूँ-क्या छोड़ूँ। यह श्लोक उस मन्थन से छुड़ाता है। जो आता है, सब आपका ही form है। न रखो, न छोड़ो, बस होने दो।

श्लोक 14
अष्टावक्र उवाच
अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥
antas tyakta-kaṣāyasya nirdvandvasya nirāśiṣaḥ
yadṛcchayāgato bhogo na duḥkhāya na tuṣṭaye

अर्थ“जिसने अन्दर से कषाय (attachment-stains) छोड़ दिए, जो निर्द्वन्द्व है, निराशीष है, उस के लिए अनायास आया भोग, न दुःख देता है, न तुष्टि।”

सन्दर्भ“यदृच्छया आगतो भोग”, अनायास आया भोग। ज्ञानी भोग reject नहीं करता, मगर pursue भी नहीं करता। जो ख़ुद आ गया, ले लेता है। फिर भी न खुशी, न दुःख, क्योंकि “मैं इसका भोक्ता हूँ” का sense नहीं।

पाठक के लिएप्रकरण 3 ख़त्म। यह प्रकरण साधक के सबसे common issue पर है, “ज्ञान सुना, फिर भी आदतें वैसी क्यों?” अष्टावक्र कहते हैं, ज्ञान deepen करो, आदतें अपने आप settle होंगी। force नहीं, recognition की steady reaffirmation।

॥ आत्मा-अद्वय ॥