ज्ञान बनाम कर्म
श्लोक 9 से 16
लक्ष्मण ने पूछा था कि मुक्ति का सीधा रास्ता कौन-सा है। राम यहाँ एक ही बात पर अड़ जाते हैं, कि कर्म बाँधता है और ज्ञान खोलता है, और इसी मोड़ पर वेदान्त पूर्व-मीमांसा से अलग हो जाता है।

राम पहले उस जड़ की ओर इशारा करते हैं जिस पर पूरा बन्धन खड़ा है। अज्ञान ही सबका मूल कारण है, और शास्त्र का सारा विधान उसी अज्ञान को मिटाने के लिए है। उस नाश में विद्या ही कुशल है, कर्म नहीं, क्योंकि कर्म तो अज्ञान से ही जन्मता है और उसी का विरोधी ठहरता है। राम कहते हैं कि अगर अज्ञान न मिटे और राग क्षीण न हो, तो वही कर्म दोषयुक्त हो उठता है, और उससे फिर वही संसार लौट आता है, बिना रोके। इसीलिए बुद्धिमान को ज्ञान का ही विचार करना चाहिए।
विद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी न कर्म तज्जं सविरोधमीरितम् ॥9॥
ततः पुनः संसृतिरप्यवारिता तस्माद्बुधो ज्ञानविचारवान्भवेत् ॥10॥
अब राम वह आपत्ति सामने रखते हैं जो पूर्व-मीमांसा की ओर से उठती है। कोई कहता है कि वेद ने तो क्रिया का भी आदेश दिया है, जैसे विद्या को पुरुषार्थ का साधन कहा, वैसे ही प्राणी के लिए कर्तव्य भी ठहराया, और वही कर्म विद्या की सहायता में आ जाता है। श्रुति ने कर्म न करने में भी दोष कहा है, इसलिए मुमुक्षु को यह कर्म सदा करना ही चाहिए। पर राम इसका उत्तर देते हैं कि विद्या तो स्वतन्त्र है, अपना निश्चित कार्य स्वयं करने वाली, उसे मन से भी किसी की अपेक्षा नहीं।
कर्तव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता विद्यासहायत्वमुपैति सा पुनः ॥11॥
ननु स्वतन्त्रा ध्रुवकार्यकारिणी विद्य न किञ्चिन्मनसाप्यपेक्षते ॥12॥
यहाँ राम विरोधी का तर्क और गहरा करते हैं, फिर उसे काट देते हैं। जैसे यज्ञ अपने-आप में सत्य कार्य होते हुए भी और कई कारकों की अपेक्षा रखता है, वैसे ही कोई कहता है कि विद्या भी विधि से प्रकाशित कर्मों के साथ मिल कर ही मुक्ति देती है। पर राम कहते हैं कि ऐसा कहने वाले बस तर्क के वादी हैं, और वह बात भी असत् है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष अनुभव से ही टकराती है। कर्म तो देह के अभिमान से बढ़ता है, और विद्या उसी अहंकार के मिटने से सिद्ध होती है। दोनों एक साथ कैसे चलें।
तथैव विद्या विधितः प्रकाशितैर्विशिष्यते कर्मभिरेव मुक्तये ॥13॥
देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया विद्या गताहङ्कृतितः प्रसिध्द्यति ॥14॥
अंत में राम वह निष्कर्ष देते हैं जिस पर पूरा खण्ड टिकता है। शुद्ध विज्ञान के प्रकाश से दीप्त जो आत्मवृत्ति है, उसे ही अन्तिम वृत्ति कहा जाता है, वही सबसे आख़िरी सीढ़ी है। कर्म तो अपने सब कारकों के साथ उठता है, और विद्या उन्हीं समस्त कारकों को मिटा देती है। इसलिए सुधी पुरुष को कार्य को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए, क्योंकि विद्या के विरोध के कारण कर्म और ज्ञान का समुच्चय हो ही नहीं सकता। ऐसा साधक सदा आत्मा के अनुसन्धान में लगा रहे, इन्द्रियों की सारी वृत्तियों के विषय से परे।
उदेति कर्माखिलकारकादिभिर्निहन्ति विद्याखिलकारकादिकम् ॥15॥
आत्मानुसन्धानपरायणः सदा निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिगोचरः ॥16॥