प्रश्न और प्रारम्भ
The Question · श्लोक 1 से 8
राज्याभिषेक हो चुका। सब लड़ाइयाँ पीछे छूट गईं, सीता लौट आईं, अयोध्या फिर से अपनी रौनक में है। एकान्त में लक्ष्मण भाई के पाँव दबा रहे हैं, बातचीत शान्त है। तभी हिचकते हुए वे वह प्रश्न पूछ बैठते हैं जो चौदह बरस से उनके भीतर सुलग रहा था।

पहले महादेव पार्वती को यह कथा सुनाते हैं। वे कहते हैं कि रघुकुल के श्रेष्ठ राम ने जगत के मंगल का मंगलमय रूप धारण कर के उत्तम रामायण-कीर्ति रची, और जैसे श्रेष्ठ राजर्षि चलते आए थे, वैसे ही उस पुरातन आचरण का पालन किया। यह जो कथा अब खुलने वाली है, वह किसी साधारण घड़ी की नहीं, उसी पवित्र परम्परा की कड़ी है।
श्लोक 1 · कथा का आरम्भ
ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना विधाय रामायणकीर्तिमुत्तमाम्।
चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो राजर्षिवर्यैरभिसेवितं यथा ॥1॥
फिर महादेव बताते हैं कि उदार बुद्धि वाले सौमित्र, यानी लक्ष्मण के पूछने पर राम ने अनेक शुभ पुरातन कथाएँ कहीं। उन्हीं में प्रमादी राजा नृग की कथा भी आई, जो ब्राह्मण के शाप से तिर्यक् योनि को, यानी पशु-जन्म को प्राप्त हुए। ये कथाएँ यों ही नहीं आतीं, हर एक के पीछे कोई गहरा बोध छिपा रहता है।
श्लोक 2 · पुरातन कथाएँ
सौमित्रिणा पृष्ट उदारबुद्धिना रामः कथाः प्राह पुरातनीः शुभाः।
राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो द्विजस्य तिर्यक्त्वमथाह राघवः ॥2॥
अब वह क्षण आता है जिसकी प्रतीक्षा थी। किसी एकान्त में, जब राम विराजमान थे और उनके चरण-कमल लक्ष्मी से सेवित थे, तब शुद्ध भाव को प्राप्त सौमित्र ने भक्ति से प्रणाम किया और बड़ी विनय के साथ बोले। यही वह घड़ी है, न दरबार, न कोई और, बस दो भाई और एक भीतर सुलगता प्रश्न।
श्लोक 3 · एकान्त का क्षण
कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं रामं रमालालितपादपङ्कजम्।
सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत् ॥3॥
और तब लक्ष्मण अपना मन खोल देते हैं, पर पहले स्तुति से। वे कहते हैं, आप तो सब देहधारियों के शुद्ध बोध-स्वरूप हैं, स्वयं आत्मा हैं, सबके अधीश्वर हैं, और निराकार हैं। हे महामते, जिनकी ज्ञान-दृष्टि खुल गई है और जो आपके चरण-कमलों के भृंग बन कर सत्संग में लगे रहते हैं, उन्हीं को आप इस रूप में प्रतीत होते हैं। यह कोई साधारण जिज्ञासा नहीं, यह शरणागत की पुकार का प्रारम्भ है।
श्लोक 4 · लक्ष्मण की स्तुति
त्वं शुद्धबोधोऽसि हि सर्वदेहिनामात्मास्यधीशोऽसि निराकृतिः स्वयम्।
प्रतीयसे ज्ञानदृशां महामते पादाब्जभृङ्गाहितसङ्गसङ्गिनाम् ॥4॥
अब लक्ष्मण सीधे शरण की बात पर आ जाते हैं। वे कहते हैं, हे प्रभो, हम आपके उन चरण-कमलों की शरण में हैं, जो संसार से पार उतारने वाले हैं और योगियों के ध्याए हुए हैं। आप हमें ऐसा उपदेश दीजिए कि हम इस अथाह अज्ञान-सागर को सहज ही, सुख से तर जाएँ। यही पूरी राम गीता की धुरी है, शरणागति और तरने की प्रार्थना। यहाँ केवल सुनना नहीं, सौंप देना मुख्य बात है।
श्लोक 5 · शरणागति
अहं प्रपन्नोऽस्मि पदाम्बुजं प्रभो भवापवर्गं तव योगिभावितम्।
यथाञ्जसाज्ञानमपारवारिधिं सुखं तरिष्यामि तथानुशाधि माम् ॥5॥
लक्ष्मण का यह सारा वचन सुन कर शरणागतों की पीड़ा हरने वाले, प्रसन्न-बुद्धि राम बोलने को होते हैं। वे क्षिति-पालों के आभूषण हैं, यानी राजाओं में शिरोमणि, और जो उपदेश देने जा रहे हैं वह श्रुति-सम्मत है। उसका प्रयोजन एक ही है, अज्ञान के अन्धकार को शान्त करने वाला विज्ञान, यानी अनुभव-सिद्ध बोध जगाना।
श्लोक 6 · राम उत्तर देने को होते हैं
श्रुत्वाथ सौमित्रवचोऽखिलं तदा प्राह प्रपन्नार्तिहरः प्रसन्नधीः।
विज्ञानमज्ञानतमःप्रशान्तये श्रुतिप्रपन्नं क्षितिपालभूषणः ॥6॥
अब राम उपदेश का पहला सूत्र रखते हैं। वे कहते हैं, सबसे पहले मनुष्य अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार बताए गए कर्म करे, इससे उसका मन शुद्ध हो जाता है। उस पूर्व-साधन को इस तरह पूरा कर के, और जिसने साधन-सम्पत्ति पा ली है, वह आत्म-लाभ के लिए किसी सद्गुरु की शरण में जाए। बात कर्म छोड़ने की नहीं, कर्म से मन को माँज कर सद्गुरु तक पहुँचने की है।
श्लोक 7 · पहला तत्त्व
आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताः क्रियाः कृत्वा समासादितशुद्धमानसः।
समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः समाश्रयेत्सद्गुरुमात्मलब्धये ॥7॥
और इसी पर राम खण्ड का समापन करते हैं, मानो आगे की पूरी गीता का बीज यहीं बो देते हों। वे कहते हैं, आदर के साथ की गई क्रिया ही श्री और रोग दोनों का हेतु बनती है। उससे प्रिय और अप्रिय, दोनों अनुभव उपजते हैं और राग बढ़ता है। फिर धर्म और अधर्म, फिर उन्हीं से यह शरीर, और शरीर से फिर क्रिया। यों संसार चक्र की तरह घूमता ही रहता है। इसी चक्र को तोड़ने का मार्ग आगे खुलेगा।
श्लोक 8 · संसार-चक्र
क्रिया श्रीरोद्भवहेतुरादृता प्रियाप्रियौ तौ भवतः सुरागिणः।
धर्मेतरौ तत्र पुनः शरीरकम् पुनः क्रिया चक्रवदीर्यते भवः ॥8॥