श्री राम गीता · खण्ड 1
प्रश्न और प्रारम्भ
The Question · श्लोक 1 से 8
राज्याभिषेक हो चुका। लक्ष्मण भाई के पाँव दबा रहे हैं। बातचीत शान्त। तभी लक्ष्मण पूछते हैं वो प्रश्न जो उन्हें 14 साल से अन्दर खा रहा था।
श्लोक 1 · सेटिंग
कदाचित् रामचन्द्रस्य पादौ संवाहयन् मुदा।
उवाच लक्ष्मणो भक्त्या प्राञ्जलिः प्रणतो ह्रिया॥
kadācit rāmacandrasya pādau saṁvāhayan mudā
uvāca lakṣmaṇo bhaktyā prāñjaliḥ praṇato hriyā
अर्थएक बार रामचन्द्र के पाँव सुख से दबाते हुए, लक्ष्मण ने भक्ति से, हाथ जोड़ कर, झुक कर, संकोच से कहा।
सन्दर्भscene-setting। यह intimate है। बड़े भाई और छोटे भाई। कोई दरबार नहीं, कोई हनुमान नहीं, बस दोनों। और लक्ष्मण “ह्रिया” यानी “हिचक से” बोलते हैं। मतलब ये प्रश्न लम्बे समय से था।
श्लोक 2 · लक्ष्मण का प्रश्न
लक्ष्मण उवाच
रामेण मुनिवेषाय कथिता ब्रह्मसंहिता।
तां श्रोतुमिच्छाम्यनघ कथयस्व ममाधुना॥
rāmeṇa muni-veṣāya kathitā brahma-saṁhitā
tāṁ śrotum icchāmy anagha kathayasva mamādhunā
अर्थ“राम, मुनियों को आपने ब्रह्म-संहिता का उपदेश दिया था। उसे सुनना चाहता हूँ। मुझे अभी कहिए।”
सन्दर्भलक्ष्मण reference करते हैं उस उपदेश को जो राम ने मुनियों को दिया था। वो कैसा उपदेश था? वैसा ही, जो अब मिलेगा।
श्लोक 3 · राम का स्वागत
श्री राम उवाच
शृणु तात प्रवक्ष्यामि ब्रह्मविद्यां सुदुर्लभाम्।
यां श्रुत्वा यतयो धीरा तरन्ति भवसागरम्॥
śṛṇu tāta pravakṣyāmi brahma-vidyāṁ sudurlabhām
yāṁ śrutvā yatayo dhīrā taranti bhava-sāgaram
अर्थ“सुन, बेटा, मैं ब्रह्म-विद्या कहता हूँ, जो दुर्लभ है। जिसे सुन कर धीर यति संसार-सागर तरते हैं।”
सन्दर्भ“दुर्लभ”। राम भी कहते हैं यह उपदेश दुर्लभ है। हर एक के लिए नहीं। यानी “सुनने” से ज़्यादा “ग्रहण” की बात।
श्लोक 4 · पहला तत्त्व
सर्वकर्माण्यसंगेन कुर्वतो ज्ञानवादिनः।
विद्ययोदितमार्गेण न दोषो विद्यते क्वचित्॥
sarva-karmāṇy asaṅgena kurvato jñāna-vādinaḥ
vidyayoditamārgeṇa na doṣo vidyate kvacit
अर्थ“असंग रह कर सब कर्म करते ज्ञानवादी को, विद्या के द्वारा उदित मार्ग में, कोई दोष नहीं।”
सन्दर्भराम का पहला practical point। कर्म छोड़ना नहीं। “असंग” रह कर करना। यानी detachment के साथ engagement।
श्लोक 5 · केन्द्र की बात
ज्ञानेन हीनः सर्वकर्मा बहुदुःखो भवेन्नरः।
नैव कर्मात्र मोक्षाय ज्ञानमेव परं मतम्॥
jñānena hīnaḥ sarva-karmā bahu-duḥkho bhaven naraḥ
naiva karmātra mokṣāya jñānam eva paraṁ matam
अर्थ“ज्ञान के बिना, सब कर्म करते भी, मनुष्य बहुत दुःख वाला होता है। यहाँ कर्म से मोक्ष नहीं, बल्कि ज्ञान ही परम।”
सन्दर्भराम-गीता का thesis statement। कर्म-काण्ड से मोक्ष नहीं, ज्ञान से। यह वेदान्त की core position है।
श्लोक 6 · विवेक
कर्माकर्म-विकर्माणि वेद-वादैस्तु निर्मिताः।
देहात्म-बुद्धयैवैते सम्भवन्ति न चान्यथा॥
karmākarma-vikarmāṇi veda-vādais tu nirmitāḥ
dehātma-buddhayaivaite sambhavanti na cānyathā
अर्थ“कर्म, अकर्म, विकर्म, ये वेद-वादों से बने हैं। यह सब देह-आत्म-बुद्धि से सम्भव होते हैं, अन्यथा नहीं।”
सन्दर्भradical statement। राम कहते हैं, “कर्म” आदि categories का base “मैं देह हूँ” का thought है। जब वो thought गया, यह categories भी।
श्लोक 7 · पहचान का प्रश्न
देहेन्द्रिय-प्राण-मनो-धियो ह्यहं ममेति च।
मतिर्मूढस्य न प्राज्ञस्यात्मानमवबुध्यतः॥
dehendriya-prāṇa-mano-dhiyo hy ahaṁ mameti ca
matir mūḍhasya na prājñasyātmānam avabudhyataḥ
अर्थ“देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि में ‘मैं’, ‘मेरा’ की बुद्धि मूढ़ की है, आत्मा को जानने वाले प्राज्ञ की नहीं।”
सन्दर्भपाँच levels। हर एक पर हम “मैं” लगा देते हैं। मगर ज्ञानी जानता है, “मैं” इन सबके पीछे है।
श्लोक 8 · आगे का संकेत
आत्मा शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि सच्चिदानन्द-रूपकः।
एतस्मादन्यद् अज्ञेयं मायया दृश्यते जगत्॥
ātmā śuddho’si buddho’si sac-cid-ānanda-rūpakaḥ
etasmād anyad ajñeyaṁ māyayā dṛśyate jagat
अर्थ“आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, सत्-चित्-आनन्द-रूप। इससे भिन्न जो दिखता है, माया से दिखता है, जानने योग्य नहीं।”
सन्दर्भखण्ड 1 का closing। पूरी राम-गीता का seed यहाँ planted। आत्मा शुद्ध है। बाक़ी सब माया। आगे elaborate होगा।
॥ प्रश्न और प्रारम्भ ॥