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सैरन्ध्री ने रानी से तेरह दिन माँगे थे, और सुदेष्णा ने, जो उन्हें विदा करना चाहती थीं पर गन्धर्वों के भय से कुछ कह न सकीं, वे दिन दे दिए। इन्हीं दिनों नृत्यशाला की उस रात की कथा विराटनगर की सीमा लाँघकर मत्स्य देश की सड़कों पर निकल पड़ी, और जैसे हर कथा चलते चलते बदलती है, वैसे यह भी बदली। जिन्होंने कीचक को जीते जी कभी न देखा था, वे भी अब उन्हें अपने युग का अद्वितीय वीर कहने लगे, और उसी साँस में यह भी जोड़ देते कि राजा का रसोइया बल्लव भी कोई कम बली नहीं, मानो दोनों नाम एक ही तराजू के पलड़े हों। जिस बात पर सबका मत एक था, वह थी मृत्यु का कारण। कीचक पुरुषों को सताने वाले और पराई स्त्रियों पर हाथ डालने वाले थे, और इसी पाप का दण्ड गन्धर्वों ने उन्हें दिया। जनपद से जनपद तक उस अजेय सेनापति की यही कहानी कही गई, और वही कहानी थके हुए यात्रियों के मुँह से उत्तर की ओर चलकर हस्तिनापुर की राजसभा तक जा पहुँची।
गुप्तचरों का खाली हाथ लौटना
लाने वाले थे दुर्योधन के गुप्तचर। बारहवाँ वर्ष बीतते ही दुर्योधन ने उन्हें देशों की सूची और खोज की विधि समझाकर चारों दिशाओं में भेजा था, और उन्होंने वह सब किया जो कहा गया था। गाँव, नगर और राज्य छान डाले, सूची का हर देश बताई हुई रीति से परखा, और जब लौटे तो उनके पास एक ही ऐसी खबर थी जिसे वे इतनी लम्बी यात्रा के योग्य मानते थे। उन्होंने राजा को सभा में बैठा पाया। द्रोण वहाँ थे, कर्ण थे, कृप थे, भीष्म थे, दुर्योधन के भाई उनके चारों ओर बैठे थे, और उनके साथ पश्चिम से आए अतिथि भी थे, त्रिगर्त देश के रथी, जिनके राजा के पास उस ऋतु में हस्तिनापुर आने का अपना ही कारण था।
गुप्तचरों ने दुर्योधन से कुछ भी नहीं छिपाया, क्योंकि छिपाने को उनके पास अपनी विफलता के सिवा कुछ था ही नहीं। “हमने इस खोज में बड़ी सावधानी बरती है,” उन्होंने कहा। “उस समूचे वन को, हिरणों से भरे सूने विस्तारों को, तरह तरह के पेड़ों और लताओं के झुरमुटों को, गुँथी हुई लकड़ियों के कुंजों को और घनी झाड़ियों को हमने छान लिया, पर वह राह न मिली जिससे पृथा के पुत्र उस वन से बाहर गए। वहाँ और अन्यत्र उनके पदचिह्न ढूँढ़े। पर्वतों की चोटियाँ देखीं, दुर्गम स्थान देखे, राज्य पर राज्य, भरे पूरे जनपद, छावनियाँ और नगर, सब देख लिए। पाण्डु के पुत्रों का कहीं कोई चिह्न न मिला। हमें तो ऐसा लगता है कि वे कोई निशान छोड़े बिना ही नष्ट हो गए। उन वीरों के पीछे हम कुछ दूर चले और फिर राह खो बैठी, और अब वे कहाँ रहते हैं, यह हम नहीं जानते। तब कुछ समय हम उनके सारथियों के पीछे लगे, और उस खोज को तो हमने अन्त तक पहुँचाया। सारथी द्वारका पहुँचे, और पृथा के पुत्र उनके साथ न थे। यादवों के उस नगर में न पाण्डु के पुत्र हैं, न सती कृष्णा। न उनकी राह मिली, न उनका ठिकाना। आपको प्रणाम। वे सदा के लिए चले गए।”
फिर आई वह बात जिसे वे भेंट की तरह सँभालकर लाए थे। “पाण्डु के पुत्रों के स्वभाव को हम कुछ जानते हैं और उनके पराक्रम के किस्से भी कुछ सुने हैं, और हम आपसे पूछते हैं कि उनकी खोज में अब आगे क्या किया जाए। पर यह भी सुन लीजिए, क्योंकि यह मीठी बात है और आपके लिए शुभ है। मत्स्यराज की सेना के सेनापति, वही दुष्टात्मा कीचक, जिन्होंने अपने पूरे बल से त्रिगर्तों को बार बार हराया और उनके कितने ही वीरों को मारा, अपने सब भाइयों सहित धरती पर पड़े हैं। अदृश्य गन्धर्वों ने उन्हें रात के पहर में मार डाला। अपने शत्रुओं की यह दुर्दशा सुनकर हमें बड़ा सन्तोष हुआ और हम वही खबर आपके लिए लाए हैं। अब आज्ञा दीजिए कि आगे क्या हो।”
सभा में बैठे त्रिगर्तों ने वह नाम गुप्तचरों के वाक्य पूरा करने से पहले ही सुन लिया था। उनके लिए उस पूरे विवरण में एक ही बात थी, और उसका पाण्डवों से कोई सम्बन्ध न था।
सार: कीचक-वध की कथा मत्स्य देश में इस रूप में फैलती है कि पराई स्त्रियों पर हाथ डालने वाले को गन्धर्वों ने दण्ड दिया। दुर्योधन के गुप्तचर वन, पर्वत, नगर और छावनियाँ छानकर हस्तिनापुर लौटते हैं और द्रोण, कर्ण, कृप, भीष्म, भाइयों और अतिथि त्रिगर्तों के सामने बताते हैं कि पाण्डवों का कोई चिह्न नहीं, उनके सारथी अकेले द्वारका पहुँचे, और त्रिगर्तों को कुचलने वाले कीचक रात में अपने भाइयों सहित मारे गए।
कौरवों की मन्त्रणा: कर्ण, दुःशासन, द्रोण, भीष्म और कृप
दुर्योधन बहुत देर तक उस खबर को मन ही मन तौलते रहे, और जब बोले तो पूरी सभा से बोले। “कार्यों की गति को ठीक ठीक जान लेना बड़ा कठिन है,” उन्होंने कहा। “इसलिए आप सब विचार कीजिए कि पाण्डु के पुत्र कहाँ गए। इस तेरहवें वर्ष का, जिसे उन्हें हमसे छिपकर बिताना है, अधिकांश भाग बीत चुका है, और जो शेष है वह बहुत थोड़ा है। यदि वे सत्य के व्रती इतना शेष समय भी छिपे रह गए, तो उनकी प्रतिज्ञा पूरी हो जाएगी। तब वे लौटेंगे, कनपटियों से मद बहाते गजराजों की तरह, या घोर विष वाले सर्पों की तरह। क्रोध से भरे वे कौरवों को कठोर दण्ड देंगे, इसमें सन्देह नहीं। इसलिए समय रहते ऐसा यत्न कीजिए कि समय की मर्यादा जानने वाले और इस समय कष्टप्रद छद्मवेश में रह रहे पाण्डु-पुत्रों को अपना क्रोध पीकर फिर वन में लौटना पड़े। ऐसा उपाय खोजिए जिससे इस राज्य से कलह और चिन्ता के सब कारण दूर हो जाएँ और यह शान्त, शत्रुहीन और अपनी एक बालिश्त भूमि भी न खोने वाला बना रहे।”
पहले कर्ण बोले। “दूसरे गुप्तचर भेजिए,” उन्होंने कहा, “इनसे अधिक कुशल और चतुर, जो काम को अन्त तक पहुँचाना जानते हों। वे अभी निकलें, अच्छे छद्मवेश में, समृद्ध राज्यों और भरे पूरे जनपदों में घूमें। विद्वानों की सभाओं में और देश के रमणीय आश्रमों में झाँकें, राजभवनों के भीतरी कक्षों में, देवालयों और तीर्थों में, खानों में और हर दूसरे प्रदेश में। पाण्डु के पुत्र वेश बदलकर रह रहे हैं, इसलिए उन्हें ढूँढ़ने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे कुशल गुप्तचर लगाए जाएँ जो काम के प्रति समर्पित हों, स्वयं भी वेश बदले हों और जिन्हें ढूँढ़ना है उन्हें भली भाँति पहचानते हों। नदियों के तट, पुण्यक्षेत्र, गाँव और नगर, तपस्वियों के आश्रम, रमणीय पर्वत और पर्वतों की गुफाएँ, सब छान डालिए।”
कर्ण के बाद दुःशासन बोले, राजा के ठीक बाद जन्मे भाई, जिनका मन सबसे सहज राजा के मन के साथ चलता था। “केवल उन्हीं गुप्तचरों को भेजिए जिन पर हमें भरोसा है, और इस बार उन्हें निकलने से पहले ही पारितोषिक दे दीजिए। कर्ण ने जो कहा वह हमें पूरी तरह स्वीकार है। गुप्तचर बताई हुई रीति से, जनपद से जनपद तक, नियम के अनुसार खोज करें। पर हमारा तो यह विश्वास है कि न पाण्डवों की ली हुई राह मिलेगी, न उनका ठिकाना, न उनका काम। हो सकता है वे बहुत गहरे छिपे हों। हो सकता है समुद्र पार कर गए हों। हो सकता है अपने बल और साहस के घमण्ड में जंगली पशुओं के ग्रास बन गए हों, या कोई असाधारण विपत्ति उन पर टूटी हो और वे सदा के लिए नष्ट हो गए हों। इसलिए मन से चिन्ता निकाल दीजिए और अपनी शक्ति के अनुसार जो करना चाहें, कीजिए।”
द्रोण ने दोनों युवकों को सुना, और जब बोले तो उसी विवेक से बोले जिसके लिए पूरी सभा उन्हें जानती थी। “पाण्डु के पुत्रों जैसे पुरुष न नष्ट होते हैं, न पराजित,” उन्होंने कहा। “वे शूर हैं, हर विद्या में कुशल हैं, बुद्धिमान हैं, जितेन्द्रिय हैं, धर्मात्मा और कृतज्ञ हैं, और धर्मात्मा युधिष्ठिर की आज्ञा में रहते हैं। वे ऐसे बड़े भाई के पीछे चलते हैं जो नीति, धर्म और अर्थ के निष्कर्ष जानते हैं, जो उनसे पिता की तरह बँधे हैं, जो धर्म पर टिके और सत्य में अडिग हैं, जो किसी को चोट नहीं पहुँचाते और जो स्वयं भी अपने छोटे भाइयों की बात मानते हैं। ऐसे भाई के प्रति समर्पित पुरुष इस तरह नहीं मरते। नीति जानने वाले युधिष्ठिर अपने ऐसे आज्ञाकारी, समर्पित और महात्मा भाइयों का वैभव क्यों न लौटा सकेंगे? इसीलिए वे इतनी सावधानी से अपने अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे पुरुष कभी नष्ट नहीं होते। हमारी बुद्धि यही देखती है। इसलिए भली भाँति और शीघ्र विचार करके वह कीजिए जो अब करना चाहिए। और यह भी अभी तय कर लीजिए कि जीवन के हर प्रयोजन में अपने मन को वश में रखने वाले पाण्डु के पुत्र लौटकर कहाँ रहेंगे। वे वीर हैं, निष्पाप हैं, तपस्या से उन्होंने पुण्य कमाया है, और अज्ञातवास की अवधि में उन्हें ढूँढ़ना कठिन है। युधिष्ठिर बुद्धिमान, धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ, नीति के ज्ञाता, पवित्र, पुण्यात्मा और अपार तेज वाले हैं, और वे अपनी दृष्टि मात्र से शत्रुओं को भस्म कर सकते हैं। यह सब जानकर जो उचित हो, कीजिए। उन्हें एक बार और ढूँढ़ा जाए, और इस बार ब्राह्मणों, चारणों, सिद्ध तपस्वियों और ऐसे ही लोगों को भेजा जाए जो उन वीरों को देखकर पहचान सकें।”
तब भरतवंश के पितामह बोले, शान्तनु के पुत्र भीष्म, जो वेदों को जानते थे, देश और काल की मर्यादा जानते थे और धर्म का हर कर्तव्य जानते थे। पहले उन्होंने आचार्य के वचनों की सराहना की, फिर ऐसी बातें कहीं जो केवल सज्जन कहते हैं और केवल सज्जन सराहते हैं, ऐसे निष्पक्ष वचन जिन्हें विद्वान पूजते, और उनके हर शब्द से झलकता था कि उनका हृदय किस ओर है। “द्रोण ने जो कहा है, वह हमें स्वीकार है,” उन्होंने आरम्भ किया। “यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं। उन वीरों पर हर शुभ लक्षण है। वे पुण्य व्रत रखते हैं, वेद जानते हैं, अपने नियमों के पक्के हैं, विद्याओं में पारंगत हैं, बड़ों की सलाह मानते हैं, सत्य पर टिके हैं, समय की मर्यादा जानते हैं, दी हुई प्रतिज्ञा निभा रहे हैं, आचरण में शुद्ध हैं, क्षत्रिय-धर्म पर चलते हैं, केशव की आज्ञा में रहते हैं, महात्मा और महाबली हैं, और बुद्धिमानों का सौंपा भार उठाते हैं। ऐसे पुरुष विपत्ति में कभी नहीं मुरझाते। पाण्डु के पुत्र इस समय धर्म के वश छिपे हुए हैं और अपने तेज से इस समय को निश्चय ही पार कर जाएँगे। हमारा मन यही निष्कर्ष निकालता है। इसलिए पाण्डु के पुत्रों के विषय में हम जो भी करें, उसमें हम ईमानदार मन्त्रणा के पक्ष में हैं। गुप्तचरों से उन्हें अभी पकड़वाना किसी बुद्धिमान की नीति नहीं हो सकती। उनके विषय में क्या करना चाहिए, यह हम बुद्धि से विचार करके बताएँगे, और यह जान लीजिए कि हम जो कहेंगे उसमें आपके प्रति द्वेष लेशमात्र नहीं।”
अपना मत देने से पहले उन्होंने मन्त्रणा का धर्म बताया। “हम जैसे लोगों को बेईमान को ऐसी सलाह कभी नहीं देनी चाहिए, क्योंकि हम जैसी सलाह देते हैं वह ईमानदारों के लिए होती है, और बुरी सलाह तो किसी भी दशा में नहीं देनी चाहिए। जो सत्य का व्रती है और बड़ों की बात मानता है, जो बुद्धिमान है, वह सभा के बीच बोलते हुए हर दशा में सत्य ही बोले, यदि उसे धर्म चाहिए। इसलिए हम कहते हैं कि अपने वनवास के इस तेरहवें वर्ष में धर्मराज युधिष्ठिर कहाँ रहते हैं, इस प्रश्न पर हमारा मत यहाँ बैठे सबसे अलग है। जिस नगर या जिस देश में राजा युधिष्ठिर रहते हैं, उसके शासक पर कोई विपत्ति नहीं आ सकती। जिस देश में राजा युधिष्ठिर रहते हैं, वहाँ के लोग दानी, उदार, विनम्र और लज्जाशील होंगे। वे मधुरभाषी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, प्रसन्न, स्वस्थ, शुद्धाचारी और अपने काम में निपुण होंगे। जहाँ युधिष्ठिर हैं, वहाँ के लोग न ईर्ष्यालु हो सकते हैं, न द्वेषी, न घमण्डी, न अभिमानी। हर कोई अपने धर्म पर टिका होगा। जहाँ युधिष्ठिर रहते हैं, वहाँ चारों ओर वेद-मन्त्र गूँजते हैं, यज्ञ होते हैं, पूर्णाहुतियाँ सदा दी जाती हैं और ब्राह्मणों को दान खुले हाथ मिलता है। वहाँ मेघ भरपूर बरसते हैं, फसलें अच्छी होती हैं और देश को कोई भय नहीं रहता। वहाँ धान दानों से खाली नहीं होता, फल रस से खाली नहीं होते, मालाएँ सुगन्ध से खाली नहीं होतीं और लोगों की बातचीत मीठे शब्दों से भरी रहती है। जहाँ राजा युधिष्ठिर रहते हैं, वहाँ हवा सुहावनी बहती है, लोगों की सभाएँ मैत्री से भरी होती हैं और भय का कोई कारण नहीं होता। वहाँ गायें बहुत होती हैं, और उनमें कोई दुबली या दुर्बल नहीं, और दूध, दही और मक्खन सब स्वादिष्ट और पुष्टिकर होते हैं। वहाँ हर अन्न पोषण से भरा और हर भोजन स्वाद से भरा होता है, और रस, स्पर्श, गन्ध और शब्द, सब उत्तम गुणों से युक्त होते हैं। वहाँ के दृश्य आँख को सुख देते हैं, और वहाँ के ब्राह्मण धर्मात्मा और अपने कर्तव्यों में स्थिर होते हैं।”
वे उसी धारा में कहते गए, मानो वह देश उनकी आँखों के सामने हो। “जिस देश में पाण्डु के पुत्रों ने अपने वनवास के इस तेरहवें वर्ष का डेरा डाला है, वहाँ की प्रजा सन्तुष्ट और प्रसन्न है, शुद्धाचारी है और हर तरह के क्लेश से मुक्त है। वे देवताओं और अतिथियों के भक्त हैं और पूरे मन से उनकी सेवा करते हैं, दान के प्रेमी हैं, तेज से भरे हैं और सनातन धर्म पर चलते हैं। जहाँ राजा युधिष्ठिर रहते हैं, वहाँ के लोग हर बुराई त्यागकर केवल भला चाहते हैं। वे यज्ञ और पवित्र व्रत रखते हैं, वाणी के असत्य से घृणा करते हैं, उनका हृदय धर्म की ओर झुकता है, उनके व्रत उन्हें प्रिय हैं और वे सदा पुण्य कमाने में लगे रहते हैं। जिन पृथापुत्र में बुद्धि और दान, परम शान्ति और निस्सन्देह क्षमा, लज्जा और श्री, यश और महान तेज, और सब प्राणियों के प्रति प्रेम है, वे अब छिप गए हैं तो उन्हें ब्राह्मण भी नहीं ढूँढ़ सकते, साधारण लोगों की तो बात ही क्या। बुद्धिमान युधिष्ठिर ऐसे ही लक्षणों वाले किसी प्रदेश में गहरे छद्मवेश में रह रहे हैं जैसा हमने बताया। उनके उत्तम जीवन के विषय में इससे अधिक कहने का साहस हम नहीं करते। इन सब बातों पर विचार कीजिए, और यदि हम पर कुछ भी श्रद्धा हो, तो जो हितकर लगे वह बिना विलम्ब कीजिए।”
भीष्म ने जो देश खींचकर दिखाया था, सभा में किसी ने उसका नाम नहीं लिया। त्रिगर्त ऐसे राज्य से आए थे जिसके पड़ोसी ने अभी अभी रात के अँधेरे में अपना सेनापति गन्धर्वों के हाथों खोया था, और किसी ने उस बात को उस देश के चित्र के पास नहीं रखा जहाँ कोई विपत्ति आ ही नहीं सकती।
वृद्धों में अन्त में शरद्वान के पुत्र कृप बोले। “वृद्ध भीष्म ने पाण्डवों के विषय में जो कहा है वह युक्तिसंगत है, अवसर के अनुकूल है, धर्म और अर्थ दोनों से मेल खाता है, सुनने में प्रिय है, तर्क से भरा है और उनके योग्य है। हम जो जोड़ना चाहते हैं, वह भी सुनिए। उन्होंने कौन सी राह ली और वे कहाँ रहते हैं, यह आपको गुप्तचरों से जानना चाहिए, और वह नीति अपनानी चाहिए जिससे आपका कल्याण हो। जिसे अपना हित प्रिय है, वह साधारण शत्रु की भी उपेक्षा न करे, फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या, जो युद्ध में हर शस्त्र के पूर्ण स्वामी हैं। जब वन में गए और अब गहरे छद्मवेश में दिन काट रहे महात्मा पाण्डवों के फिर प्रकट होने का समय आए, तब आपको अपने राज्य में और दूसरे राजाओं के राज्यों में अपना बल तौल लेना चाहिए। पाण्डवों का लौटना निस्सन्देह निकट है। प्रतिज्ञा की अवधि पूरी होते ही यशस्वी और महाबली पृथापुत्र तेज से उफनते हुए यहाँ आएँगे। इसलिए उनसे लाभकारी सन्धि करने के लिए सुदृढ़ नीति अपनाइए, और सेना बढ़ाने तथा कोष भरने में लग जाइए। यह सब आँककर अपने सब मित्रों के सामने, दुर्बल और प्रबल दोनों के सामने, अपना बल तौलिए। अपनी सेना में कौन समर्थ है, कौन दुर्बल, कौन उदासीन, कौन अनुरक्त और कौन विरक्त, यह जानकर ही हमें शत्रु से युद्ध करना चाहिए या सन्धि। साम, भेद, दण्ड, दान, उपहार और उचित व्यवहार, इन उपायों से काम लीजिए। शत्रुओं पर आक्रमण कीजिए, दुर्बलों को बल से वश में कीजिए और मित्रों तथा सैनिकों को मीठी वाणी से अपना बनाइए। इन उपायों से जब आपकी सेना सुदृढ़ हो जाए और कोष भर जाए, तब पूरी सफलता आपकी होगी। तब आप किसी भी प्रबल शत्रु से लड़ सकेंगे जो सामने आए, पाण्डु के उन पुत्रों की तो बात ही क्या, जिनके पास न अपनी सेना है, न अपने वाहन। यह सब अपने वर्ण की मर्यादा के अनुसार कीजिए, और समय आने पर स्थायी सुख आपका होगा।”
सार: दुर्योधन सभा से कहते हैं कि तेरहवें वर्ष का अधिकांश बीत चुका है और पाण्डवों को अवधि पूरी होने से पहले ढूँढ़ना होगा, नहीं तो वे क्रोध में लौटेंगे। कर्ण छद्मवेश में और कुशल गुप्तचर हर सभा, राजभवन, तीर्थ, नदी-तट और गुफा में भेजना चाहते हैं; दुःशासन सहमत होकर भी अनुमान लगाते हैं कि भाई छिपे हैं, समुद्र पार हैं, पशुओं का ग्रास बने या मर गए; द्रोण उत्तर देते हैं कि ऐसे पुरुष नष्ट नहीं होते, केवल अपनी घड़ी की प्रतीक्षा में हैं, और उन्हें पहचानने वाले ब्राह्मणों और तपस्वियों को भेजने को कहते हैं। भीष्म कहते हैं कि सभा में बुद्धिमान केवल सत्य बोले, गुप्तचर भेजने से मना करते हैं और जिस देश में युधिष्ठिर होंगे उसे उसकी वर्षा, फसल, स्वादिष्ट दूध और प्रजा के धर्म से पहचानने को कहते हैं; कोई राज्य का नाम नहीं लेता। कृप समापन करते हैं: कोई शत्रु छोटा नहीं, उनकी राह ढूँढ़िए, मित्र, सेना और कोष गिनिए, और तब बल के साथ सन्धि या युद्ध कीजिए।
सुशर्मा की योजना: एक दिन के अन्तर पर दो आक्रमण
उस सभा के अतिथियों में त्रिगर्तराज सुशर्मा बैठे थे, अनगिनत रथों के स्वामी, जिन्होंने युद्ध पर युद्ध हारे थे। मत्स्य सेना के सेनापति सूत कीचक ने मत्स्यों और शाल्वों को साथ लेकर उन्हें बार बार हराया था, जब चाहा उनके देश पर धावा बोला था, और एक बार तो उन्हें उनके कुटुम्बियों समेत बलपूर्वक दबा दिया था। सुशर्मा ने वृद्धों की बातें उस धैर्य से सुनी थीं जो किसी दूसरी ही बातचीत की प्रतीक्षा में बैठे आदमी का होता है, और उन्होंने समझ लिया कि उनकी घड़ी आ गई। बोलते हुए उन्होंने तिरछी नज़र से कर्ण की ओर देखा, और सम्बोधन दुर्योधन को किया। “हमारे राज्य पर मत्स्यराज ने कितनी ही बार बलपूर्वक चढ़ाई की है,” उन्होंने कहा। “उस राजा के सेनापति थे महाबली कीचक। कुटिल, क्रोधी और दुष्टात्मा, पराक्रम में संसार भर में प्रसिद्ध, कर्मों में पापी और अत्यन्त क्रूर, और अब उन्हें गन्धर्वों ने मार डाला है। कीचक के मरने से राजा विराट का गर्व और आश्रय दोनों जाते रहे, और हमारा अनुमान है कि उनका साहस भी जाता रहेगा। हमारा मत है कि अब उनके राज्य पर चढ़ाई की जाए, यदि आपको, यशस्वी कर्ण को और सब कौरवों को यह रुचे। जो हुआ है वह हमारे लिए सौभाग्य है। चलिए, विराट के अन्न से भरे राज्य पर चलें। हम उनके रत्न और हर तरह का धन ले लेंगे, और उनके गाँव और राज्य आपस में बाँट लेंगे। या बलपूर्वक उनके नगर पर टूट पड़ें और हर नस्ल की उनकी उत्तम गायें हजारों की संख्या में हाँक लाएँ। कौरव और त्रिगर्त अपनी सेनाएँ मिलाकर उनके गोधन को झुण्ड के झुण्ड उठा लें। या मिलकर उनकी शक्ति ऐसी तोड़ें कि वे सन्धि की भीख माँगें। या उनकी पूरी सेना नष्ट करके मत्स्य देश को अधीन कर लें। न्याय से उन्हें वश में कर लेने के बाद हम अपने राज्य में सुख से रहेंगे, और आपकी शक्ति भी निस्सन्देह बढ़ेगी।”
कर्ण ने तुरन्त बात उठा ली। “सुशर्मा ने ठीक कहा है,” उन्होंने राजा से कहा। “अवसर अनुकूल है और लाभ का वचन देता है। इसलिए यदि आपको रुचे, तो अपनी सेना को व्यूह में सजाएँ, टुकड़ियों में बाँटें और शीघ्र निकल पड़ें। या इस अभियान का प्रबन्ध वैसे हो जैसा कृप, आचार्य द्रोण और कुरुओं के बुद्धिमान वृद्ध पितामह उचित समझें। आपस में मन्त्रणा करके हम शीघ्र अपने लक्ष्य की ओर चलें। पाण्डु के पुत्रों से हमें क्या लेना देना, जो धन, बल और पराक्रम तीनों से रीते हैं? या तो वे सदा के लिए लुप्त हो गए या यम के घर पहुँच गए। हम निश्चिन्त होकर विराट के नगर चलेंगे और उनकी गायें और दूसरा धन लूट लेंगे।”
दुर्योधन ने सूर्यपुत्र की सलाह मान ली और दुःशासन की ओर मुड़े, जो उनके ठीक बाद जन्मे थे और सदा उनकी इच्छा के अनुसार चलते थे। “वृद्धों से मन्त्रणा करके बिना विलम्ब सेना सजाइए। हम सब कौरवों के साथ नियत स्थान पर चलेंगे। महारथी राजा सुशर्मा वाहनों और पशुओं समेत पर्याप्त सेना लेकर त्रिगर्तों के साथ मत्स्य देश की ओर निकलें। और सुशर्मा पहले जाएँ, अपना इरादा पूरी सावधानी से छिपाकर। हम उनके पीछे, एक दिन बाद, सुगठित व्यूह में मत्स्यराज के समृद्ध देश की ओर चलेंगे। त्रिगर्त अचानक विराट के नगर पर टूट पड़ें, ग्वालों पर जा पड़ें और गायों का वह अपार धन छीन लें। हम दो टुकड़ियों में बढ़कर शुभ लक्षणों वाली हजारों उत्तम गायें हाँक लाएँगे।”
यही तय हुआ। त्रिगर्त योद्धा अपनी भयानक पैदल सेना के साथ अग्निकोण की ओर, पूर्व और दक्षिण के बीच, विराट से उनकी गायों के लिए युद्ध ठानने चले, और सुशर्मा कृष्ण पक्ष की सप्तमी को गायें छीनने निकले। उसके अगले दिन, अष्टमी को, कौरवों ने अपनी पूरी सेना के साथ हजारों गायें छीननी शुरू कीं।
सार: कीचक से बार बार अपमानित त्रिगर्तराज सुशर्मा दुर्योधन के सामने प्रस्ताव रखते हैं कि सेनापति के मरते ही विराट के राज्य पर चढ़ाई की जाए और उनके रत्न, गाँव और गोधन छीन लिए जाएँ। कर्ण यह कहकर सहमत होते हैं कि पाण्डव निर्धन हैं, लुप्त हैं या मर चुके, और दुर्योधन दुःशासन से प्रबन्ध करवाते हैं: त्रिगर्त पहले और चुपचाप धावा बोलें, कौरव एक दिन बाद दो टुकड़ियों में पीछे आएँ। त्रिगर्त अग्निकोण की ओर कूच करके कृष्ण पक्ष की सप्तमी को गायें छीनना आरम्भ करते हैं, कौरव अष्टमी को।
विराट की रण-सज्जा और चार सेवकों को रथ
तब तक पाण्डु के पुत्र वह कर चुके थे जिसके लिए वे विराट के नगर आए थे। राजा की सेवा में रहकर, उनकी सुन्दर राजधानी में छद्मवेश में दिन काटकर, उन्होंने अज्ञातवास की प्रतिज्ञा की अवधि पूरी कर ली थी। कीचक की मृत्यु के बाद से राजा उन पर जितना टिके थे, उतना वे स्वयं भी न जानते थे। तेरहवें वर्ष के अन्त में ही सुशर्मा ने विराट की हजारों गायें छीनीं, और गोधन छिनते ही एक ग्वाला पूरे वेग से नगर में आया और उसने अपने राजा को सिंहासन पर बैठा पाया, बुद्धिमान मन्त्रियों और कुण्डल तथा बाजूबन्द पहने वीर योद्धाओं के बीच, और उन्हीं के बीच उनकी सेवा करने वाले पाण्डु के चारों पुत्र। ग्वाले ने प्रणाम किया। “त्रिगर्तों ने हमें युद्ध में हराकर अपमानित किया है,” उसने कहा। “वे आपकी गायें सैकड़ों और हजारों की संख्या में हाँके लिए जा रहे हैं, हमारे साथियों समेत। शीघ्र उनके पीछे जाइए और उन्हें लौटा लाइए। देखिए, वे आपके हाथ से निकल न जाएँ।”
विराट ने मत्स्य सेना को युद्ध के लिए सजाया, रथ, हाथी, घोड़े, पैदल और ध्वजाएँ, और उनके घर के राजा और राजकुमार कवच पहनने गए। हर एक ने वीरों के योग्य चमकता कवच अंग अंग पर यथास्थान बाँधा। राजा के प्रिय भाई शतानीक ने हीरे और लोहे का कवच पहना जिस पर तपाया हुआ सोना जड़ा था। शतानीक के ठीक बाद जन्मे मदिराक्ष ने सोने की पत्तियों से मढ़ा सुदृढ़ कवच पहना जिसे कोई शस्त्र भेद न सकता था। राजा का अपना कवच अभेद्य था, और उस पर सूर्य की तरह चमकती सौ फूलियाँ, सौ भँवर, सौ बिन्दु और सौ नेत्रों के आकार के चिह्न बने थे, और नीचे से ऊपर तक सुगन्धित कमलों की सौ आकृतियाँ पंक्ति में जड़ी थीं। सूर्यदत्त का कवच सूर्य सा उज्ज्वल और पीठ पर सोने से मढ़ा था। राजा के ज्येष्ठ पुत्र शंख ने तपाए इस्पात का अभेद्य कवच पहना जिस पर सोने के सौ नेत्र बने थे। इस तरह मत्स्य देश के देवतुल्य योद्धाओं ने सैकड़ों की संख्या में कवच बाँधे, शस्त्र उठाए और कवच पहने श्वेत घोड़े अपने उत्तम रथों में जोते। सोने से सजे और सूर्य या चन्द्र सा दमकते राजा के रथ पर मत्स्यों की यशस्वी ध्वजा चढ़ी, और दूसरे क्षत्रियों ने भी अपने अपने रथों पर सोने की ध्वजाएँ फहराईं, हर एक पर अपना चिह्न।
तब राजा अपने ठीक बाद जन्मे भाई शतानीक की ओर मुड़े। “कंक, बल्लव, तन्तिपाल और ग्रन्थिक युद्ध करेंगे, हमें ऐसा लगता है, और इसमें कोई सन्देह नहीं। उन्हें ध्वजा लगे रथ दीजिए, उन्हें ऐसे सुन्दर कवच पहनने दीजिए जो भेदने में कठिन और पहनने में सहज हों, और उन्हें शस्त्र भी दीजिए। ऐसे योद्धाओं जैसे शरीर और गजराज की सूँड़ जैसी भुजाएँ देखकर हम अपने मन को यह मनवा ही नहीं सकते कि ये लड़ न सकेंगे।” शतानीक ने उसी क्षण आज्ञा दी, और युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव के लिए रथ तैयार हुए। जिन सारथियों ने यह काम किया वे प्रसन्न मन से और अपनी स्वामिभक्ति को ध्यान में रखकर जुटे, और चारों ने राजा के दिए सुन्दर कवच पहने, अच्छे घोड़ों वाले रथों पर चढ़े और प्रसन्न मन से विराट के पीछे पीछे निकल पड़े। बृहन्नला नगर में स्त्रियों के बीच रह गईं। चारों भाई सोने से सजे रथों पर एक साथ निकले, वही चार जो कभी अपनी ध्वजाओं के नीचे निकला करते थे, और उस सेना में सबको यह अपने सभासद, रसोइए, ग्वाले और अश्वपाल पर राजा की उदारता भर लगी।
उनके पीछे हाथी थे, भयानक रूप वाले मतवाले गज, पूरे साठ वर्ष के, सुडौल दाँतों और फटी कनपटियों वाले, जिनके गालों से मद बहता था और जो इसी कारण बरसते बादलों जैसे लगते थे, युद्ध में कुशल प्रशिक्षित सवारों से लदे, और वे चलते पहाड़ों की तरह राजा के पीछे चले। राजा के पीछे चलने वाले मत्स्य देश के प्रधान योद्धाओं के पास आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ हजार घोड़े थे, और गायों के खुरों के चिह्न देखती हुई वह सेना चलते हुए बड़ी सुन्दर लगती थी। कड़े शस्त्रों वाले सैनिकों से भरी, हाथियों, घोड़ों और रथों से लदी विराट की वह सेना उसी राह पर शोभा के साथ बढ़ी जिस राह से त्रिगर्त गए थे।
सार: तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर एक ग्वाला त्रिगर्तों के धावे की खबर लाता है, और विराट कवच बाँधते हैं: शतानीक, मदिराक्ष, सौ सूर्यों वाले कवच में स्वयं राजा, सूर्यदत्त और ज्येष्ठ पुत्र शंख। राजा के कहने पर शतानीक उन चार सेवकों को रथ, कवच और शस्त्र देते हैं जिन्हें राजा ने योद्धा पहचाना है, कंक, बल्लव, तन्तिपाल और ग्रन्थिक, और युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव राजा के पीछे निकलते हैं, बृहन्नला नगर में रह जाती हैं। आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ हजार घोड़े खुरों के चिह्नों के पीछे चलते हैं।
विराट बन्दी हुए
दोपहर ढलने पर मत्स्यों ने त्रिगर्तों को जा पकड़ा। दोनों सेनाएँ व्यूह में थीं और दोनों क्रोध में, और हर एक को दूसरे का राजा चाहिए था। उन्होंने सिंहनाद किया, और दोनों ओर से पहले हाथी आगे बढ़े, जिन्हें कुशल सवार अंकुश और नुकीले डण्डों से हाँक रहे थे। सूर्य के नीचे उतरते जो युद्ध छिड़ा, पैदल से पैदल, घुड़सवार से घुड़सवार, रथ से रथ और हाथी से हाथी, वह देवों और असुरों के पुराने संग्राम जैसा था, रोंगटे खड़े कर देने वाला और यमराज की प्रजा बढ़ाने के लिए पर्याप्त। पंक्तियाँ काटती और मारती हुई भिड़ीं तो धूल इतनी घनी उठी कि कुछ सूझता न था, और पक्षी उसके बोझ से हवा छोड़कर धरती पर गिरने लगे। सूर्य बाणों के बादल के पीछे छिप गया और आकाश ऐसा चमकने लगा मानो जुगनुओं से भर गया हो। योद्धा सोने की पीठ वाले धनुष एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलते और दाएँ बाएँ बाण चलाते हुए एक दूसरे को गिराते रहे। तलवारें और कुल्हाड़ियाँ, भाले, बरछे और लोहे के मुद्गर चल पड़े, और उन महाबाहु योद्धाओं ने एक दूसरे पर जो कुछ था सब झोंक दिया, फिर भी कोई पक्ष दूसरे पर भारी न पड़ सका।
धूल में कटे सिर लुढ़क रहे थे, कुछ सुन्दर नाक वाले, कुछ जिनके ऊपर के होंठ गहरे चिरे थे, कुछ जो अब भी कुण्डल पहने थे, कुछ जो सँवारे हुए बालों के बीच से फटे थे। रणभूमि क्षत्रियों के बाणों से कटे अंगों से भर गई जो शाल के तनों की तरह पड़े थे, और उस पर कुण्डल पहने सिर और चन्दन लगी भुजाएँ बिखरी थीं जो साँपों की देह सी लगती थीं, और अपने भयानक ढंग से वह भूमि सुन्दर भी थी। धूल रक्त से सन गई। लोग खड़े खड़े मूर्छित हो गए। मनुष्यता, मित्रता और नाते की सुध के बिना युद्ध चलता रहा, और बाणों की वर्षा से जिनकी उड़ान और दृष्टि दोनों रुक गई थीं, वे गिद्ध नीचे उतरकर धरती पर चलने लगे। फिर भी कोई पक्ष दूसरे को तोड़ न सका। शतानीक ने पूरे सौ योद्धा मारे और विशालाक्ष कहलाने वाले मदिराक्ष ने पूरे चार सौ, और दोनों त्रिगर्त सेना के हृदय में जा घुसे, जहाँ लड़ाई इतनी पास की हो गई कि लोग एक दूसरे के बाल पकड़ते और नाखूनों से नोचते थे। जहाँ त्रिगर्तों के रथ इकट्ठे थे, वहाँ उन्होंने अपना धावा मोड़ा। स्वयं विराट ने, आगे सूर्यदत्त और पीछे मदिराक्ष को लेकर, उस युद्ध में पाँच सौ रथ, आठ सौ घोड़े और पाँच महारथी नष्ट किए, रथ से जो भी कौशल दिखाया जा सकता था सब दिखाया, और अन्त में सोने के रथ पर बैठे त्रिगर्तराज के सामने जा पहुँचे। दोनों गोशाला में भिड़ते साँड़ों की तरह गरजकर एक दूसरे पर झपटे। सुशर्मा ने मत्स्यराज को रथ से रथ के द्वन्द्व की चुनौती दी, और दोनों बरसते बादलों की तरह भिड़ गए, हर शस्त्र में निपुण, दोनों क्रोध में, तलवार, भाले, गदा और पैने बाण लिए रणभूमि में घूमते हुए। विराट ने सुशर्मा को दस बाणों से और उनके चारों घोड़ों में से हर एक को पाँच बाणों से बींधा। मारना जानने वाले सुशर्मा ने मत्स्यराज को पचास बाणों से बींधा। तब उनके बीच धूल इतनी उठी कि दोनों राजाओं के सैनिक अपने पराए में भेद न कर सके।
धूल के साथ अँधेरा उतर आया, और दोनों सेनाएँ अपना व्यूह तोड़े बिना कुछ देर को थम गईं। फिर चन्द्रमा निकला, अँधेरा छँटा, और क्षत्रियों के हृदय हर्ष से भरे, और जब सब कुछ फिर दिखने लगा तो युद्ध दोबारा छिड़ा और ऐसा चला कि कोई किसी को पहचान न सकता था। सुशर्मा और उनके छोटे भाई अपने सब रथों को पीछे लेकर मत्स्यराज की ओर बढ़े। दोनों राजभाई हाथों में गदा लेकर रथों से उतरे और शत्रु के रथों पर दौड़ पड़े, और पंक्तियाँ गदाओं, तलवारों, खड्गों, परशुओं और पैने भालों से भिड़ गईं। अपने तेज से सुशर्मा ने मत्स्यों की पूरी सेना को कुचलकर तोड़ दिया, और तब वे स्वयं विराट पर गए। दोनों भाइयों ने मिलकर राजा के दोनों घोड़े और सारथी मार डाले, पीठ की रक्षा करने वाले सैनिकों को काट डाला, और जब राजा रथ के बिना धरती पर खड़े रह गए तो उन्हें जीवित पकड़ लिया। सुशर्मा ने उन्हें ऐसे पीड़ा दी जैसे कोई कामी पुरुष किसी असहाय कन्या को देता है, उन्हें अपने रथ पर डाला और रणभूमि से बाहर निकल गए। राजा के छिन जाने और त्रिगर्तों के दबाव में मत्स्य टूटकर चारों दिशाओं में भागे।
युधिष्ठिर ने उन्हें भागते देखा, और उन्होंने भीम से कहा। “मत्स्यराज को त्रिगर्त पकड़ ले गए हैं। उन्हें छुड़ाइए, ताकि वे शत्रु के वश में न पड़ें। हम विराट के नगर में सुख से रहे हैं और वहाँ हमारी हर इच्छा पूरी हुई है। राजा को छुड़ाकर वह ऋण चुकाना आपका काम है।”
“आपकी आज्ञा से हम उन्हें छुड़ाएँगे,” भीम ने कहा। “देखिए, केवल अपनी भुजाओं के बल पर आज हम इस शत्रु का क्या करते हैं। आप भाइयों के साथ एक ओर खड़े होकर हमारा पराक्रम देखिए। हम गदा जैसे तने वाले इस विशाल वृक्ष को उखाड़ेंगे और इसी से उन्हें खदेड़ देंगे।”
उनकी आँखें पहले से उस वृक्ष पर थीं, और वे उसे मतवाले हाथी की तरह देख रहे थे। युधिष्ठिर ने वह दृष्टि देखी और उन्हें रोका। “भीम, ऐसा दुस्साहस न कीजिए। वृक्ष को खड़ा रहने दीजिए। इस वृक्ष से आप अपने अमानुषी पराक्रम न दिखाइए, क्योंकि यदि दिखाएँगे तो लोग आपको पहचान लेंगे और कहेंगे, यह भीम हैं। कोई मानुषी शस्त्र लीजिए, धनुष-बाण, या भाला, या तलवार, या परशु। मनुष्यों के काम का कोई शस्त्र लेकर राजा को छुड़ाइए, और किसी को यह जानने का साधन न दीजिए कि आप वास्तव में कौन हैं। नकुल और सहदेव बलवान हैं, वे आपके पहियों की रक्षा करेंगे। तीनों मिलकर लड़िए और मत्स्यराज को छुड़ा लाइए।”
सार: मत्स्य दोपहर ढलने पर त्रिगर्तों को जा पकड़ते हैं और सूर्यास्त से अँधेरे तक लड़ते हैं, कोई पक्ष भारी नहीं पड़ता; शतानीक और मदिराक्ष शत्रु के हृदय में घुसते हैं, और विराट पाँच सौ रथ नष्ट करके सुशर्मा से तब तक द्वन्द्व करते हैं जब तक धूल उन्हें अपनों की आँखों से ओझल न कर दे। चन्द्रोदय पर सुशर्मा और उनके छोटे भाई गदा लेकर पैदल आते हैं, विराट के घोड़े और सारथी मारते हैं और उन्हें जीवित अपने रथ पर उठा ले जाते हैं, और मत्स्य भागते हैं। युधिष्ठिर विराट के नगर में बिताए वर्ष का ऋण चुकाने भीम को भेजते हैं और वृक्ष उखाड़ने से रोकते हैं: केवल मानुषी शस्त्र, पहियों पर नकुल-सहदेव, ताकि कोई कह न सके, यह भीम हैं।
भीम ने सुशर्मा को केश पकड़कर गिराया
भीम ने एक अच्छा धनुष उठाया, उससे जल भरे बादल की वर्षा सी घनी बाण-धारा छोड़ी, और सुशर्मा की ओर बढ़े। चलते चलते उन्होंने विराट को पुकारा, ताकि राजा जान लें कि वे आ गए हैं, और फिर त्रिगर्तराज पर गरजे, “ठहरिए! ठहरिए! देखिए, कैसा पराक्रम आता है, यह युद्ध जो अब सिर पर है!” सुशर्मा ने पीछे मुड़कर देखा तो अपने पीछे साक्षात यम जैसा कोई था जो उन्हें रुकने को गरज रहा था, और उन्होंने परिस्थिति तौली, धनुष उठाया और भाइयों के साथ उसका सामना करने को मुड़े। पलक झपकते भीम ने उन रथों को तोड़ दिया जो उन्हें रोकने आए थे, और फिर विराट की आँखों के सामने रथ, हाथी, घोड़े, घुड़सवार और भयंकर धनुर्धर सैकड़ों और हजारों की संख्या में गिरने लगे, और त्रिगर्तों की पैदल सेना उनकी गदा के नीचे मरने लगी। सुशर्मा यह देखकर सोचने लगे कि उनके भाई तो उस विशाल सेना के बीच कहीं मारे जा चुके होंगे, और क्या उनकी सेना पूरी की पूरी मिट जाने वाली है। उन्होंने प्रत्यंचा कान तक खींची और बिना रुके बाण चलाए। मत्स्य योद्धाओं ने पाण्डवों को रथों पर धावा बोलते देखा तो घोड़े हाँककर लौट आए और त्रिगर्तों को पीसने के लिए बाण बरसाने लगे, और विराट के पुत्र ने क्रोध में अद्भुत पराक्रम दिखाया। युधिष्ठिर ने शत्रु के एक हजार योद्धा मारे। भीम ने सात हजार को यम का घर दिखाया। नकुल ने अपने बाणों से सात सौ को वहाँ भेजा, और सहदेव ने युधिष्ठिर की आज्ञा से तीन सौ शूरवीरों का संहार किया।
तब स्वयं युधिष्ठिर शस्त्र उठाए सुशर्मा पर झपटे और उन्हें बाणों की बौछार से ढँक दिया। क्रोध में सुशर्मा ने उन्हें नौ बाणों से और उनके चारों घोड़ों में से हर एक को चार बाणों से बींधा। भीम वेग से आए, सुशर्मा के घोड़े कुचल डाले, उनकी पीठ की रक्षा करने वालों को मारा और उनके सारथी को खींचकर रथ से धरती पर पटक दिया। विराट के पहियों की रक्षा करने वाले मदिराक्ष ने त्रिगर्तराज को बिना सारथी के रथ पर बैठा देखा और सहायता को दौड़े, और विराट, जो क्षण भर पहले उसी रथ पर बन्दी थे, सुशर्मा की ही गदा हाथ में लेकर उससे कूद पड़े और उसके स्वामी के पीछे दौड़े। वे वृद्ध थे, पर गदा हाथ में लिए वे रणभूमि में भरपूर जवान की तरह चले। भागते त्रिगर्त के पीछे भीम ने आवाज़ दी, “रुकिए, राजकुमार! यह भागना उचित नहीं! ऐसे पराक्रम से आपने गायें बलपूर्वक हाँकने का विचार कैसे किया था? और अपने अनुचर को छोड़कर शत्रुओं के बीच इस तरह कैसे ढीले पड़ गए?” अनगिनत रथों के स्वामी सुशर्मा ने पलटकर “ठहरिए! ठहरिए!” कहा और अचानक मुड़कर उन पर टूट पड़े। भीम अपने रथ से उस तरह कूदे जैसे केवल वही कूद सकते थे, सुशर्मा के प्राण लेने के इरादे से पूरे धैर्य के साथ आगे बढ़े, और उन पर ऐसे झपटे जैसे सिंह किसी छोटे हिरण पर झपटता है। उन्होंने सुशर्मा के बाल पकड़े, क्रोध में उन्हें ऊपर उठाया और धरती पर दे मारा, और जब वे पीड़ा से चीखते पड़े थे तो भीम ने उनके सिर पर लात मारी, उनकी छाती पर घुटना रखा और तब तक पीटा जब तक वे अचेत न हो गए। अपने राजा को रथ के बिना पकड़ा देखकर त्रिगर्तों की पूरी सेना घबराई, टूटी और भागी। लज्जाशील, व्रतधारी और अपनी भुजाओं के बल पर भरोसा रखने वाले पाण्डु के पुत्रों ने सुशर्मा को हराकर गायें और बाकी धन लौटा लिया था और विराट की चिन्ता उतार दी थी, और वे राजा के सामने एक साथ खड़े थे।
भीम ने अपने बन्दी को देखा। “दुष्ट कर्मों वाला यह नीच हमसे जीवित बचकर निकलने के योग्य नहीं,” उन्होंने कहा। “पर हम करें भी क्या? राजा इतने दयालु हैं!” धूल में अचेत पड़े सुशर्मा की गर्दन पकड़कर उन्होंने उन्हें कसकर बाँधा, अपने रथ पर डाला और रणभूमि के बीच खड़े युधिष्ठिर के पास ले जाकर राजा को दिखाया। युधिष्ठिर ने त्रिगर्त को उस दशा में देखा और मुस्कुराकर रणभूमि के उस आभूषण से कहा, “इस अधम को छोड़ दीजिए।”
भीम पहले सुशर्मा की ओर मुड़े। “नीच, यदि जीना चाहते हैं तो हमारी बात सुनिए। आपको हर राजसभा में और मनुष्यों की हर सभा में कहना होगा, हम दास हैं। इसी शर्त पर हम आपको प्राण देते हैं। पराजित के लिए यही नियम है।”
“यदि आप हमें कुछ भी मानते हैं,” उनके बड़े भाई ने स्नेह से कहा, “तो इस दुष्ट को छोड़ दीजिए। यह राजा विराट का दास तो हो ही चुका है।” और वे सुशर्मा की ओर मुड़े। “आप मुक्त हैं। स्वतन्त्र पुरुष की तरह जाइए, और फिर कभी ऐसा न कीजिएगा।”
सार: भीम धनुष लेकर सुशर्मा को युद्ध में लौटने पर विवश करते हैं, उनके रथ और पैदल सेना तोड़ते हैं, और भाइयों की गिनती युधिष्ठिर के एक हजार, भीम के सात हजार, नकुल के सात सौ और सहदेव के तीन सौ तक पहुँचती है। भीम सुशर्मा के घोड़े मारकर सारथी को खींच गिराते हैं, विराट अपने बन्दीकर्ता के रथ से उन्हीं की गदा लेकर कूदते हैं, और भीम भागते त्रिगर्तराज को बाल पकड़कर पटकते, सिर पर लात मारते और छाती पर घुटना रखते हैं; त्रिगर्त भागते हैं और गायें लौट आती हैं। भीम उन्हें बाँधकर हर सभा में स्वयं को दास कहने का वचन लेते हैं, और युधिष्ठिर मुस्कुराकर एक चेतावनी के साथ उन्हें छोड़ देते हैं।
विराट का कंक को राज्य सौंपने का प्रस्ताव
सुशर्मा ने लज्जा से सिर झुका लिया। भीम के डाले बन्धन से छूटकर वे विराट के पास गए, राजा को प्रणाम किया और विदा ली, और पाण्डु के पुत्र, जिन्होंने शत्रुओं को मारा था और त्रिगर्तराज को जाने दिया था, वह रात रणभूमि में ही सुख से काटते रहे, चारों ओर गायें और कोई ऐसा नहीं जो बता सके कि वे कौन हैं। विराट ने कुन्ती के पुत्रों को धन और हर तरह के सम्मान से सत्कृत किया, क्योंकि उन्होंने जो किया था वह मनुष्य के बल से परे था। “हमारे ये सब रत्न अब जितने हमारे हैं उतने ही आपके,” उन्होंने कहा। “यहाँ सुख से रहिए और जो रुचे वह कीजिए। हम आपको आभूषणों से सजी कन्याएँ, भरपूर धन और जो कुछ और आप चाहें, देंगे। आपके पराक्रम ने आज हमें संकट से निकाला है, और हम विजयी होकर यहाँ खड़े हैं। आप सब मत्स्यों के स्वामी बनिए।”
भाइयों ने हाथ जोड़े और एक के बाद एक उत्तर दिया, पहले युधिष्ठिर ने। “आप जो कहते हैं उससे हम प्रसन्न हैं। हमें सबसे बड़ा सन्तोष इस बात का है कि आज आप शत्रुओं से मुक्त हो गए।” विराट फिर युधिष्ठिर की ओर मुड़े, उस सभासद की ओर जो एक वर्ष पहले ब्राह्मण के वेश में उनकी सभा में आया था। “आइए। हम आपका मत्स्य देश के राजा के रूप में अभिषेक करेंगे, और आपको वे वस्तुएँ देंगे जो धरती पर दुर्लभ हैं और जिन्हें मनुष्य चाहते हैं, क्योंकि आप हमारे पास जो कुछ है उस सबके अधिकारी हैं। व्याघ्रपद गोत्र के विप्रवर, हम आपको रत्न, गायें, सोना, माणिक और मोती देंगे। हम आपको प्रणाम करते हैं। आपके ही कारण आज हम अपने पुत्रों और राज्य का मुँह फिर देख रहे हैं। हम संकट में थे और विनाश सिर पर था, और आपके पराक्रम से ही हम शत्रु के अधीन नहीं हुए।”
युधिष्ठिर ने मत्स्यराज को उत्तर दिया। “आपने जो मनोहर बातें कही हैं उनसे हम प्रसन्न हैं। आप सदा सुखी रहें, और हर प्राणी के प्रति सदा दया का व्यवहार करें। अब आपकी आज्ञा से दूत शीघ्र नगर जाएँ, हमारे मित्रों को यह शुभ समाचार दें और आपकी विजय की घोषणा करें।” उन्होंने बस इतना ही माँगा, और राजा ने आज्ञा दी। “नगर जाकर युद्ध में हमारी विजय की घोषणा कीजिए। कन्याएँ और गणिकाएँ श्रृंगार करके हर तरह के बाजों के साथ नगर से बाहर आएँ।” दूतों ने आज्ञा सिर पर रखी, प्रसन्न मन से चले, रात भर घोड़े दौड़ाए, और सूर्योदय होते होते वे राजधानी के द्वारों पर राजा की विजय की घोषणा कर रहे थे।
सार: लज्जित और मुक्त सुशर्मा विराट को प्रणाम करके चले जाते हैं, और पाण्डव रणभूमि में ही रात बिताते हैं। विराट अपने सभासद कंक को रत्न, कन्याएँ और धन, फिर मत्स्य देश का राज्य ही देने को कहते हैं और उन्हें व्याघ्रपद गोत्र का विप्रवर कहकर प्रणाम करते हैं; युधिष्ठिर केवल यह माँगते हैं कि दूत विजय का समाचार नगर ले जाएँ, और वे सूर्योदय तक द्वारों पर उसकी घोषणा कर देते हैं।
उत्तर दिशा की गायों का हरण और उत्तर की डींग
जिस समय मत्स्यराज दक्षिण में अपनी गायों के लिए त्रिगर्तों के पीछे गए हुए थे, उसी समय दुर्योधन अपने मन्त्रियों के साथ दूसरी ओर से उनके राज्य में घुसे, ठीक योजना के अनुसार। भीष्म और द्रोण उनके साथ थे, और कर्ण, और श्रेष्ठ शस्त्रों के ज्ञाता कृप, और अश्वत्थामा, और सुबल के पुत्र शकुनि, और दुःशासन, और विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, दुर्मुख और दुःसह, और उनके सिवा और भी कितने महारथी। वे मत्स्य देश पर टूट पड़े, विराट के ग्वालों को खदेड़ा और रथों के विशाल समूह से झुण्डों को चारों ओर से घेरकर बलपूर्वक गायें हाँक लीं, पूरी साठ हजार। उस भयानक मारपीट में ग्वाले पिटे, और उनका आर्तनाद दूर तक सुनाई दिया। उनका मुखिया डरा हुआ एक रथ पर चढ़ा और विलाप करता हुआ नगर की ओर चला। राजधानी में पहुँचकर वह सीधे राजभवन गया, झटपट उतरा और जो हुआ था वह सुनाने भीतर गया, और वहाँ उसे मिले विराट के मानी पुत्र भूमिंजय, वे राजकुमार जिन्हें सब उत्तर कहते थे और जिन्हें सूना नगर सँभालने के लिए छोड़ा गया था।
ग्वाले ने राजकीय गायों के छिनने की पूरी बात उन्हें बताई। “कौरव साठ हजार गायें हाँके लिए जा रहे हैं,” उसने कहा। “उठिए, राजकुमार, और अपनी गायें लौटा लाइए, क्योंकि इस राज्य का यश बढ़ाने वाले आप ही हैं। यदि राज्य का भला चाहते हैं तो स्वयं निकलिए और एक क्षण न गँवाइए। मत्स्यराज आपको सूने नगर में छोड़ गए हैं। वे सभा में आपकी बड़ाई करते हैं। कहते हैं, हमारा पुत्र हमारे बराबर है, वीर है, हमारे वंश का आधार है, बाण और हर शस्त्र में निपुण योद्धा है, और साहस उसका कभी साथ नहीं छोड़ता। उन नरेश के वचन सच हों! गोधन के स्वामियों में श्रेष्ठ, कौरवों को हराकर गायें लौटा लाइए, और अपने बाणों के भीषण तेज से उनकी सेना भस्म कर दीजिए। जैसे झुण्ड का नायक गजराज दूसरे झुण्ड पर टूटता है, वैसे अपने धनुष से छूटे सोने के पंख वाले सीधे बाणों से उनकी पंक्तियाँ चीर दीजिए। आपका धनुष तो वीणा है। उसके दोनों सिरे हाथीदाँत की खूँटियाँ हैं, प्रत्यंचा उसका मुख्य तार, दण्ड उसकी ऊँगलियों की पटरी, और उससे छूटे बाण उसके स्वर। शत्रुओं के बीच मीठे स्वर वाली वह वीणा बजाइए। आपके चाँदी से उजले घोड़े रथ में जुतें और सोने के सिंह वाली ध्वजा उस पर चढ़े। आपकी बलवान भुजाओं से छूटे सोने के पंख वाले पैने बाण उन राजाओं की राह रोकें और सूर्य को ढँक दें। जैसे वज्रधारी ने असुरों को हराया, वैसे युद्ध में सब कौरवों को हराकर महान यश के साथ इस नगर में लौटिए। मत्स्यराज के पुत्र, इस राज्य के एकमात्र आश्रय आप हैं, जैसे धर्मात्मा योद्धाओं में श्रेष्ठ अर्जुन पाण्डु के पुत्रों के आश्रय हैं। जो अर्जुन अपने भाइयों के लिए हैं, वही आप इस देश के हर निवासी के लिए हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हम इस राज्य की प्रजा का रक्षक आप में है।”
यह सब उसने स्त्रियों की उपस्थिति में कहा, ऐसे शब्दों में जिनसे साहस जगे, और अन्तःपुर में बैठे राजकुमार ने उस साहस को अपना मानकर अपनी ही बड़ाई शुरू कर दी। “धनुष पर हमारी पकड़ पक्की है,” उत्तर ने कहा, “और हम आज ही गायों के पीछे निकल पड़ते, यदि घोड़ों में कुशल कोई हमारा सारथी होता। पर हम ऐसे किसी आदमी को नहीं जानते जो हमारा सारथी बन सके। अभी ढूँढ़िए, क्योंकि हम चलने को तैयार हैं। हमारा अपना सारथी उस महायुद्ध में मारा गया जो दिन पर दिन पूरा एक मास चला, या कम से कम अट्ठाईस रातें। घोड़ों को समझने वाला कोई दूसरा आदमी मिलते ही हम अपनी ध्वजा ऊँची उठाकर निकल पड़ेंगे। हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी उस सेना के बीच घुसकर हम गायें लौटा लाएँगे, और उन कौरवों को हरा देंगे जो बल में कमज़ोर और शस्त्रों में कच्चे हैं। दानवों को डराने वाले दूसरे वज्रधारी की तरह हम इसी क्षण गायें लौटा लाएँगे, और दुर्योधन, भीष्म, कर्ण, कृप, पुत्र समेत द्रोण और युद्ध के लिए जुटे बाकी महाधनुर्धर जान लेंगे कि डर किसे कहते हैं। कोई सामने न पाकर कौरव गायें हाँके जा रहे हैं। जब हम वहाँ थे ही नहीं तो क्या करते? आज जुटे हुए कौरव हमारा पराक्रम देखेंगे, और आपस में कहेंगे, क्या यह स्वयं अर्जुन हैं जो हमसे लड़ रहे हैं?”
अर्जुन ने यह सब सुना, और इसमें जो कुछ था वह सब समझा। थोड़ी देर बाद वे प्रसन्न मन से एकान्त में अपनी प्रिय पत्नी के पास गए, पांचालों की कृष्णा के पास, द्रुपद की उस तन्वंगी पुत्री के पास जो यज्ञ की अग्नि से जन्मी थी, सत्य और सरलता की मूर्ति थी और अपने पतियों के हित में सदा सजग रहती थी। “हमारे कहने से एक काम कीजिए,” उन्होंने कहा। “अभी उत्तर के पास जाइए और उनसे कहिए, यह बृहन्नला पहले पाण्डुपुत्र अर्जुन की कुशल और दृढ़ सारथी रह चुकी हैं। बड़े बड़े युद्धों में परखी हुई हैं, और आपका रथ हाँकेंगी।”
राजकुमार अब भी स्त्रियों के बीच बार बार अर्जुन का नाम अपनी नाप की तरह लिए जा रहे थे, और पांचाली विभत्सु के उन उल्लेखों को चुपचाप सह न सकीं। वे स्त्रियों के बीच से उठकर, एक दासी के योग्य संकोच के साथ, आगे आईं और धीमी आवाज़ में राजकुमार से बोलीं। “वह सुन्दर युवक जो विशाल गजराज सा लगता है और बृहन्नला के नाम से जाना जाता है, पहले अर्जुन का सारथी रह चुका है। वह उन यशस्वी योद्धा का शिष्य है, और धनुष में किसी से कम नहीं। जब हम पाण्डवों के यहाँ रहती थीं, तब हमने उसे देखा था। जिस दिन अग्नि ने खाण्डव वन को जलाया, उस दिन अर्जुन के उत्तम घोड़ों की रास उसी के हाथ में थी, और उसी को सारथी बनाकर पार्थ ने खाण्डवप्रस्थ में हर प्राणी को जीता था। उसके बराबर का कोई सारथी नहीं।”
उत्तर ने दासी की ओर देखा, और फिर नृत्यशाला की दिशा में। “सैरन्ध्री, आप इस युवक को जानती हैं। नपुंसक वेश वाला यह जो है या नहीं है, वह आप जानती हैं। पर हम स्वयं बृहन्नला से यह नहीं कह सकते कि हमारे घोड़ों की रास थामिए।”
“वीर, बृहन्नला आपकी छोटी बहन की बात मानेंगी,” द्रौपदी ने कहा, “उस सुन्दर कटि वाली कन्या की। इसमें सन्देह नहीं। और यदि वे आपका रथ हाँकने को राज़ी हुईं, तो आप निश्चय ही कौरवों को हराकर और गायें छुड़ाकर लौटेंगे।” सैरन्ध्री ने राजकुमार को बिना माँगे माँगने की राह दे दी थी, और उन्होंने वह राह ले ली। “आप स्वयं जाइए, निर्दोष अंगों वाली,” उन्होंने अपनी बहन से कहा, “और बृहन्नला को यहाँ ले आइए।” भाई की भेजी राजकुमारी तेज़ी से उस नृत्यशाला की ओर चलीं जहाँ पाण्डु के महाबाहु पुत्र छद्मवेश में रहते थे।
सार: विराट के दक्षिण में होने पर दुर्योधन और पूरा कौरव नेतृत्व, भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, शकुनि और भाई, उत्तर दिशा के झुण्डों को घेरकर साठ हजार गायें हाँक ले जाते हैं। प्रधान ग्वाला राजकुमार भूमिंजय के पास दौड़ता है, जिन्हें सब उत्तर कहते हैं, और ऐसे भाषण से उन्हें निकलने को उकसाता है जो उनके धनुष को वीणा और उन्हें मत्स्यों का अर्जुन बना देता है। स्त्रियों के बीच उत्तर डींग मारते हैं कि सारथी मिल जाए तो वे आज ही कौरवों को खदेड़ दें, क्योंकि उनका अपना सारथी अट्ठाईस रातों के युद्ध में मारा गया, और कौरव उन्हें अर्जुन समझेंगे; अर्जुन चुपके से द्रौपदी से कहते हैं कि वे बृहन्नला को खाण्डव के पुराने सारथी के रूप में बताएँ, वे बताती हैं, और नपुंसक से स्वयं माँगने में संकोच करने वाले राजकुमार अपनी बहन को उन्हें बुलाने भेजते हैं।
उत्तरा का अनुरोध, कवच का परिहास और गुड़ियों के वस्त्र
राजकुमारी वैसे ही गईं जैसे भाई ने कहा था, क्योंकि भाई की बात उन्होंने सदा मानी थी। गले में सोने की माला और सिर पर मोरपंख का श्रृंगार, कमर पर मोतियों की करधनी और ततैया सी पतली कटि, अंग अंग में लावण्य, लक्ष्मी की सी आभा और हल्की मुड़ी हुई पलकें, वे नृत्यशाला की ओर ऐसे गईं जैसे बिजली काले बादलों के ढेर की ओर दौड़ती है। चमकते दाँतों और पतली कमर वाली वह निर्दोष कन्या, माला पहने और रत्न सी दमकती, पृथा के पुत्र को ऐसे ढूँढ़ने गई जैसे हथिनी अपने गजराज को ढूँढ़ती है, और उस प्रसिद्ध और सबकी लाड़ली राजकुमारी ने चिन्ता से भरी बड़ी बड़ी आँखों के साथ अर्जुन को प्रणाम किया। उन्होंने उस तरह पूछा जैसे कोई गुरु अपनी प्रिय शिष्या से पूछता है कि वह किसलिए आई है। “सोने की माला वाली, आप यहाँ कैसे? मृगनयनी, इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं? और सुन्दरी, आपका मुख इतना उदास क्यों है? सब जल्दी बताइए।” वे उनकी सखी थीं, वे उन्हें उस दशा में भी देखकर प्रसन्न हुए, और यह प्रश्न उन्होंने हँसते हुए पूछा।
वे अपनी सखियों के बीच खड़ी रहीं, राजकुमारी के योग्य संकोच के साथ, और उन्होंने बात कही। “बृहन्नला, इस राज्य की गायें कौरव हाँके लिए जा रहे हैं, और हमारे भैया उन्हें हराने धनुष लेकर निकल रहे हैं। थोड़े ही दिन हुए, उनका सारथी युद्ध में मारा गया, और अब कोई उसके बराबर का नहीं जो भैया का रथ हाँके। वे सारथी ढूँढ़ ही रहे थे कि सैरन्ध्री ने घोड़ों में आपके कौशल की बात उनसे कही। आप पहले अर्जुन की प्रिय सारथी थीं, और आपके ही साथ पाण्डवों में श्रेष्ठ उस वीर ने अकेले पूरी पृथ्वी जीती थी। इसलिए हमारे भैया का रथ हाँकिए। अब तक तो कौरव हमारी गायें बहुत दूर ले जा चुके होंगे। हम यह आपसे प्रेम से माँग रही हैं, और यदि आप हमारी बात न मानेंगी तो हम प्राण त्याग देंगी।”
इस पर अपार पराक्रम वाले शत्रुदमन राजकुमार के पास गए, और बड़ी आँखों वाली राजकुमारी उनके पीछे ऐसे चलीं जैसे हथिनी अपने बच्चे के पीछे चलती है, और वे आगे आगे मद टपकाते हाथी की तेज़ चाल से चले। राजकुमार ने उन्हें दूर से आते देखा और पहुँचने से पहले ही बोल पड़े। “आपको सारथी बनाकर कुन्ती के पुत्र धनंजय ने खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया और सारा संसार जीता! सैरन्ध्री ने हमें आपके बारे में बताया है। वे पाण्डवों को जानती हैं। इसलिए बृहन्नला, जैसे उनकी रास थामी थी वैसे हमारे घोड़ों की रास थामिए, क्योंकि हम कौरवों से लड़कर अपनी गायें लौटाना चाहते हैं। आप अर्जुन की प्रिय सारथी थीं, और आपके साथ पाण्डवों में श्रेष्ठ उस वीर ने अकेले पूरी पृथ्वी जीती थी!”
बृहन्नला ने नृत्य सिखाने वाली की आवाज़ में राजकुमार को उत्तर दिया। “रणभूमि में रथ हाँकने की सामर्थ्य हममें कहाँ? गीत हो, नृत्य हो, बाजे हों या ऐसा ही कुछ और, तो उससे हम आपका मन बहला सकती हैं, पर सारथी के काम का कौशल हममें कहाँ?”
“गायिका हों या नर्तकी, जो भी हों,” उत्तर ने कहा, “अभी हमारे रथ पर चढ़िए, हमारे उत्तम घोड़ों की रास थामिए, और समय न गँवाइए।”
पाण्डु के पुत्र कवच के बारे में वह सब जानते थे जो जाना जा सकता है, और उत्तर के सामने उन्होंने हँसी के लिए एक के बाद एक भूलें कीं। वे कवच को ऊपर उठाकर देह पर चढ़ाने लगे, और देखती हुई बड़ी आँखों वाली कन्याएँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। उत्तर ने देखा कि उनके सारथी को कवच पहनने का कुछ भी पता नहीं, तो बहुमूल्य कवच उन्होंने अपने हाथों बृहन्नला को पहनाया। फिर अपनी देह सूर्य सा चमकता उत्तम कवच बाँधा, सिंह वाली ध्वजा चढ़ाई, बृहन्नला को रास थमाई, और कितने ही बहुमूल्य धनुष और सुन्दर बाणों का बड़ा भण्डार रथ पर रखकर, नृत्य सिखाने वाली के हाँकते रथ पर, वीर निकल पड़े। रथ के चलने से पहले राजकुमारी और उनकी सखियाँ उसे घेरकर खड़ी हो गईं। “बृहन्नला,” उन्होंने कहा, “जब आप भीष्म और द्रोण के नेतृत्व में युद्ध के लिए जुटे कौरवों को हराकर लौटें, तो हमारी गुड़ियों के लिए तरह तरह के महीन वस्त्र लाइएगा!” पार्थ ने कन्याओं के उस झुण्ड को मुस्कुराकर, बादलों की गरज सी गहरी आवाज़ में उत्तर दिया। “यदि उत्तर युद्ध में उन महारथियों को हरा दें, तो हम निश्चय ही उत्तम और सुन्दर वस्त्र लाएँगे।”
इतना कहकर वीर ने घोड़े कौरव सेना और उसकी अनगिनत ध्वजाओं की ओर मोड़े। चलते समय बड़ी बूढ़ी स्त्रियों, कन्याओं और कठोर व्रत वाले ब्राह्मणों ने उत्तर को उत्तम रथ पर बृहन्नला के हाँकते और ऊपर फहराती बड़ी ध्वजा के नीचे बैठा देखा, और वे वीर को आशीष देने रथ की परिक्रमा करने लगे। स्त्रियों ने वही आशीष दिया जो सबसे पहले उनके मन में आया। “साँड़ की तरह चलने वाले अर्जुन ने बहुत पहले खाण्डव दहन के समय जो विजय पाई थी, वही विजय आज आपकी हो, बृहन्नला, जब आप राजकुमार उत्तर के साथ कौरवों से मिलें।”
सार: राजकुमारी काले बादल की ओर दौड़ती बिजली की तरह नृत्यशाला जाती हैं और बृहन्नला से कहती हैं कि यदि गुरु ने भैया का रथ हाँकने से मना किया तो वे प्राण दे देंगी। बृहन्नला कहती हैं कि गीत और नृत्य ही उनका सारा कौशल है, राजकुमार हठ करते हैं, अर्जुन हँसी के लिए कवच उलटा पहनते हैं और कन्याएँ तब तक हँसती हैं जब तक उत्तर अपने हाथों उन्हें कवच नहीं पहना देते, और कन्याएँ हारे हुए कौरवों से अपनी गुड़ियों के लिए महीन वस्त्र माँगती हैं, जिसका वचन अर्जुन मुस्कुराकर उत्तर की जीत की शर्त पर देते हैं। बूढ़ी स्त्रियाँ और ब्राह्मण रथ की परिक्रमा करके बृहन्नला को खाण्डव वाली अर्जुन की विजय का आशीष देते हैं।
उत्तर का पलायन और बृहन्नला का पीछा
नगर से बाहर निकलते ही विराट के निडर पुत्र ने अपने सारथी को आज्ञा दी। “जहाँ कौरव हैं वहाँ चलिए। विजय की खोज में यहाँ आए कौरवों को हम हराएँगे, उनसे अपनी गायें झटपट छुड़ाएँगे और राजधानी लौट जाएँगे।” पाण्डु के पुत्र ने घोड़े बढ़ाए, और सोने की मालाएँ पहने वे हवा से तेज़ घोड़े उस नरसिंह के हाँकने पर मानो आकाश में उड़ चले। थोड़ी ही दूर गए होंगे कि धनंजय और मत्स्यराज के पुत्र को कौरवों की सेना दिखी। वे नगर के बाहर श्मशान की ओर आए थे, और वहीं उन्हें कौरव व्यूह में सजे मिले, ऐसी सेना जो खुले समुद्र सी लगती थी, या आकाश में चलते अनगिनत पेड़ों के वन सी, और उसकी उठाई धूल आकाश तक जाकर हर प्राणी की आँख ढँक रही थी। विराट के पुत्र ने हाथियों, घोड़ों और रथों के उस समूह को देखा, जिसकी रक्षा कर्ण और दुर्योधन कर रहे थे, कृप और शान्तनु के पुत्र, महाधनुर्धर और बुद्धिमान द्रोण और द्रोण के पुत्र, और उनकी देह के रोंगटे खड़े हो गए और साहस उनसे निकल गया। “कौरवों से लड़ने का साहस हममें नहीं,” उन्होंने पार्थ से कहा। “देखिए, हमारे रोंगटे खड़े हैं। कौरवों की इस असंख्य सेना से हम नहीं लड़ सकते। यह वीरों से भरी है, बहुत उग्र है, और देवता भी इसे कठिनाई से हराएँ। भयानक धनुर्धरों और इतने घोड़ों, हाथियों, रथों, पैदलों और ध्वजाओं वाली भरतवंशियों की इस सेना में घुसने का साहस हममें नहीं। रणभूमि पर शत्रु को देखते ही हमारा मन डोल गया है। वहाँ द्रोण खड़े हैं, और भीष्म, और कृप, और कर्ण, और विविंशति, और अश्वत्थामा, और विकर्ण, और सोमदत्त के पुत्र, और बाह्लीक, और रथियों में श्रेष्ठ वीर राजा दुर्योधन, और कितने ही दूसरे श्रेष्ठ धनुर्धर, जिनमें हर एक युद्ध में निपुण है। हमारे रोंगटे खड़े हैं, और व्यूह में सजे इन प्रहार करने वाले कौरवों को देखते ही हम भय से मूर्छित हुए जाते हैं।”
वे नासमझ बालक थे, और जो उन्हें हाँक रहा था और अपना पराक्रम नृत्य सिखाने वाली की वेणी के नीचे छिपाए बैठा था, उसी के सामने वे अपने भाग्य का रोना रोते रहे। “हमारे पिता अपनी पूरी सेना लेकर त्रिगर्तों से लड़ने गए हैं और हमें सूने नगर में छोड़ गए हैं। हमारी सहायता को कोई सेना नहीं। हम अकेले हैं, अभी बालक हैं, शस्त्रों का अभ्यास हमने बहुत कम किया है, और शस्त्र में निपुण इन असंख्य योद्धाओं का सामना हम नहीं कर सकते। बृहन्नला, आगे बढ़ना बन्द कीजिए!”
“आप भय से इतने पीले क्यों पड़ गए हैं,” बृहन्नला ने उनसे पूछा, “और शत्रुओं का हर्ष क्यों बढ़ा रहे हैं? इस मैदान में अभी आपने कुछ किया ही नहीं। आपने ही हमें आज्ञा दी थी, हमें कौरवों की ओर ले चलिए, तो हम आपको वहीं ले चलेंगी, जहाँ वे सब ध्वजाएँ हैं। महाबाहु, हम आपको कौरवों के बीच ज़रूर ले जाएँगी, जो गायों के लिए ऐसे लड़ने को तैयार हैं जैसे गीध माँस के लिए, और हम ऐसा तब भी करतीं यदि हमें लगता कि वे किसी बहुत बड़े दाँव के लिए आए हैं, पूरी पृथ्वी के राज्य के लिए। चलते समय आपने स्त्रियों और पुरुषों सबके सामने अपने पुरुषार्थ की बात कही थी, तो अब युद्ध से क्यों हटते हैं? यदि आप गायों के बिना घर लौटे, तो वीर पुरुष, और स्त्रियाँ भी, जहाँ मिलेंगी वहाँ आप पर हँसेंगी। जहाँ तक हमारी बात है, सैरन्ध्री ने हमारे रथ हाँकने की इतनी बड़ाई की है कि गायें छुड़ाए बिना हम नगर नहीं लौट सकतीं। उनकी प्रशंसा और आपके शब्दों के कारण ही हम आई हैं। तो हम कौरवों से क्यों न लड़ें? आप शान्त रहिए।”
“कौरव मत्स्यों का सारा धन लूट लें,” उत्तर ने कहा। “बृहन्नला, स्त्री पुरुष हम पर हँसें। हमारी गायें जाएँ और नगर उजड़ जाए। हम पिता के सामने नंगे खड़े हों। फिर भी युद्ध की कोई ज़रूरत नहीं।” और इतना कहकर वे भयभीत राजकुमार, कुण्डल समेत, रथ से कूद पड़े, धनुष-बाण फेंक दिए और भाग चले, अपना मान और गर्व रथ के फर्श पर पीछे छोड़कर।
“वीरों की यह रीति नहीं,” बृहन्नला ने उनके पीछे पुकारा, “क्षत्रिय का रणभूमि से यों भागना। भय से भागने से युद्ध में मर जाना अच्छा है।” फिर कुन्ती के पुत्र धनंजय उस उत्तम रथ से उतरे और भागते राजकुमार के पीछे दौड़े, लम्बी वेणी और निर्मल लाल वस्त्र हवा में पीछे लहराते हुए। कौरवों के कुछ सैनिक, जिन्हें पता ही न था कि हवा में उड़ती वेणी के साथ दौड़ने वाला अर्जुन है, वह दृश्य देखकर ठहाका मारकर हँसे। पर जिन कौरवों ने उन्हें दौड़ते देखा, वे आपस में तर्क करने लगे। “यह कौन है, राख में छिपी आग की तरह वेश बदले हुए? आधा पुरुष लगता है, आधा स्त्री। रूप तो नपुंसक का है, पर दिखता अर्जुन जैसा है। वही सिर और गर्दन, वही गदाओं के जोड़े सी भुजाएँ, और वही चाल। यह धनंजय ही होंगे। जैसे देवताओं में इन्द्र, वैसे मनुष्यों में धनंजय। और कौन इस संसार में अकेला हमारे सामने आता? विराट अपने एक ही पुत्र को सूने नगर में छोड़ गए थे, और वह पुत्र बचपने में निकल आया है, जिसमें सच्ची वीरता कुछ नहीं। नगर से निकलने वाले उत्तर ही होंगे, और निस्सन्देह उन्होंने छद्मवेश में रह रहे पृथा के पुत्र अर्जुन को अपना सारथी बना लिया है। लगता है हमारी सेना देखकर वह घबराकर भागा है। और निस्सन्देह धनंजय उसे लौटा लाने के लिए उसके पीछे दौड़े हैं।” छद्मवेश में पाण्डु के पुत्र को देखकर कौरव यों अटकलें लगाते रहे, और कोई निश्चय न कर सके।
धनंजय ने सौ कदम के भीतर भागते उत्तर को जा पकड़ा और उनके बाल थाम लिए। अर्जुन की पकड़ में विराट के पुत्र घोर विपत्ति में पड़े आदमी की तरह दीन होकर विलाप करने लगे। “सुनिए, भली बृहन्नला, सुन्दर कटि वाली। रथ जल्दी मोड़िए। जो जीवित रहता है, उसे सौभाग्य मिलता है। हम आपको शुद्ध सोने की सौ मोहरें देंगे और सोने में जड़ी आठ चमकती वैडूर्य मणियाँ, और सोने की ध्वज-दण्ड वाला उत्तम घोड़ों से जुता एक रथ, और दस मतवाले हाथी। बृहन्नला, हमें छोड़ दीजिए।”
नरव्याघ्र हँसे और उस राजकुमार को, जो आधा बेसुध था और अब भी मोल-भाव कर रहा था, घसीटकर रथ की ओर ले गए, और वहाँ उनसे बोले। “शत्रुदमन, यदि आप अपने को शत्रु से लड़ने के लिए तैयार नहीं कर पाते, तो आइए और घोड़ों की रास थामिए, और लड़ेंगे हम। हमारी भुजाओं की छाया में रथों के उस दुर्धर्ष व्यूह में घुसिए जिसे किसी ने नहीं तोड़ा और जिसकी रक्षा महाबली वीर कर रहे हैं। डरिए मत, आप क्षत्रिय हैं और राजकुमारों में श्रेष्ठ हैं। नरव्याघ्र शत्रुओं के बीच क्यों हार मानें? हम कौरवों से लड़ेंगे और गायें लौटा लाएँगे, और इसके लिए रथों के उस दुर्धर्ष और अभेद्य व्यूह में घुसेंगे। नरश्रेष्ठ, हमारे सारथी बनिए। कौरवों से हम लड़ेंगे।” कभी युद्ध न हारने वाले विभत्सु ने ऐसे शब्दों से विराट के पुत्र को कुछ देर ढाढ़स बँधाया, और फिर प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ उस वीर ने मूर्छित से, अनिच्छुक और डरे हुए राजकुमार को उठाकर रथ पर बिठा दिया।
सार: श्मशान के पास कौरव सेना समुद्र सी दिखती है, और उत्तर उसके हर महारथी का नाम गिनकर बृहन्नला से रुकने की विनती करते हैं, फिर कूदकर, धनुष फेंककर भाग जाते हैं। बृहन्नला उनके पीछे पुकारती हैं कि भागने से युद्ध में मरना अच्छा है, वेणी और लाल वस्त्र लहराते हुए उन्हें दौड़कर पकड़ती हैं, जबकि कौरव तर्क करते हैं कि यह आकृति नपुंसक है या अर्जुन, और सौ कदम के भीतर उनके बाल थाम लेती हैं। उत्तर छूटने के लिए सोना, आठ वैडूर्य मणियाँ, रथ और दस हाथी देने को कहते हैं; अर्जुन हँसकर उन्हें खींच लाते हैं और शर्त रखते हैं: राजकुमार रास थामेंगे, और नृत्य सिखाने वाली लड़ेगी।
कौरव-पक्ष के अपशकुन और कर्ण का सोलहवाँ अंश
भीष्म और द्रोण के नेतृत्व में कौरवों के महारथियों ने नपुंसक वेश वाली उस आकृति को भगोड़े को रथ पर चढ़ाकर शमी वृक्ष की ओर मुड़ते देखा, और उनके हृदय में यह भय बैठ गया कि आने वाला धनंजय है। द्रोण ने उनके उतरे हुए मन देखे, और कुछ और चीज़ें भी देखीं, और वे बोले। “हवाएँ उग्र और गर्म हैं और हमारे मुँह पर कंकड़ फेंक रही हैं। आकाश राख के रंग के अँधेरे से ढँका है। बादलों का रूप अजीब है, सूखे, जिनमें पानी नहीं। हमारे हर तरह के शस्त्र अपने आप म्यानों से बाहर आ रहे हैं। चारों ओर की आग से डरे गीदड़ भयानक चीत्कार कर रहे हैं। घोड़े आँसू बहा रहे हैं, और हमारी ध्वजाएँ बिना हिलाए काँप रही हैं। ऐसे लक्षणों के साथ बड़ा संकट सिर पर है। सावधान रहिए, अपनी रक्षा कीजिए और सेना को व्यूह में सजाइए। भारी संहार की प्रतीक्षा कीजिए, और गायों की अच्छी तरह रखवाली कीजिए। यह महाधनुर्धर, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ यह वीर, जो नपुंसक वेश में आया है, पृथा का पुत्र है। इसमें कोई सन्देह नहीं।” वे भीष्म की ओर मुड़े। “गंगापुत्र, यह किरीटी हैं, जिनका नाम एक वृक्ष पर है, पर्वतों के शत्रु इन्द्र के पुत्र, जिनकी ध्वजा पर लंका के उद्यानों का उजाड़ने वाला बैठता है, और वे स्त्री के वेश में आए हैं। वे आज हमें हराकर गायें ले जाएँगे। यह शत्रुदमन पृथा के वही वीर पुत्र हैं जिन्हें लोग सव्यसाची कहते हैं, और वे देवों और दानवों के मिलकर आने पर भी युद्ध से नहीं हटते। वन में उन्हें बड़ा क्लेश दिया गया है, और वे क्रोध में आए हैं। स्वयं इन्द्र ने उन्हें सिखाया है, और युद्ध में वे इन्द्र जैसे हैं। हमें आप कौरवों में कोई वीर नहीं दिखता जो उनका सामना कर सके। सुना है कि स्वयं भगवान महादेव किरात का वेश धरकर हिमालय पर इन्हीं पृथापुत्र से युद्ध में प्रसन्न हुए थे।”
कर्ण के लिए इतना बहुत था। “आप सदा फाल्गुन के गुण गाकर हमें नीचा दिखाते हैं,” उन्होंने कहा। “पर अर्जुन हमारी या दुर्योधन की पूरी सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं!”
दुर्योधन ने उसी सम्भावना को दूसरी ओर से देखा। “राधेय, यदि यह पार्थ हैं, तो हमारा काम तो पहले ही बन गया, क्योंकि पहचान लिए जाने पर पाण्डवों को फिर बारह वर्ष भटकना होगा। और यदि नपुंसक के वेश में यह कोई और है, तो हम शीघ्र ही उसे पैने बाणों से धरती पर सुला देंगे।” भीष्म, द्रोण, कृप और द्रोण के पुत्र, सबने उनकी इस बात के पौरुष की सराहना की।
सार: रथ के शमी वृक्ष की ओर मुड़ते ही द्रोण पहले अपशकुन पढ़ते हैं, कंकड़ फेंकती गर्म हवाएँ, सूखे बादल, म्यानों से सरकते शस्त्र, रोते घोड़े और काँपती ध्वजाएँ, और आने वाले को पार्थ कहते हैं, इन्द्र के शिष्य जिन्होंने कभी हिमालय पर युद्ध में महादेव को प्रसन्न किया था। कर्ण उपहास करते हैं कि अर्जुन उनकी या दुर्योधन की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं, और दुर्योधन कहते हैं कि यदि यह पार्थ हैं तो पाण्डवों पर बारह वर्ष का वनवास और चढ़ गया, और कोई और है तो वे उसे मार गिराएँगे; वृद्ध सराहते हैं।
शमी वृक्ष के नीचे
वे शमी वृक्ष तक पहुँचे, उसी वृक्ष तक जिस पर एक वर्ष पहले पाँच भाइयों ने वह सब छिपाया था जो वे किसी राजा की सेवा में साथ नहीं ले जा सकते थे, और पार्थ ने, जो विराट के पुत्र को नाप चुके थे और उन्हें बहुत सुकुमार और युद्ध में बिल्कुल अनाड़ी पा चुके थे, उन्हें आज्ञा दी। “उत्तर, हमारे कहने से झटपट इस वृक्ष पर रखे कुछ धनुष उतारिए। आपके ये धनुष हमारा बल नहीं सह सकते, न हमारा भारी बोझ जब हम घोड़ों और हाथियों को कुचलें, न हमारी भुजाओं का खिंचाव जब हम शत्रु को हराने चलें। इसलिए भूमिंजय, घने पत्तों वाले इस वृक्ष पर चढ़िए। इसमें वीर पाण्डु-पुत्रों के धनुष, बाण, ध्वजाएँ और उत्तम कवच बँधे हैं, युधिष्ठिर, भीम, विभत्सु और नकुल-सहदेव के। और वहीं है वह महातेजस्वी धनुष, अर्जुन का गाण्डीव, जो अकेला ही एक लाख धनुषों के बराबर है और जो राज्य की सीमाएँ बढ़ाता है। वह ताड़ के पेड़ जितना बड़ा है, सबसे बड़ा खिंचाव सहता है, सब शस्त्रों में सबसे बड़ा है और शत्रु को रोकता है। वह सुन्दर है, चिकना, चौड़ा, बिना गाँठ का, सोने से सजा, कड़ा और बनावट में सुन्दर, और सबसे भारी बोझ उठाता है। वहाँ रखे दूसरे धनुष भी, युधिष्ठिर के, भीम के, विभत्सु के और नकुल-सहदेव के, उतने ही बलवान और उतने ही सुदृढ़ हैं।”
उत्तर ने उस वृक्ष की ओर देखा, और पूरे नगर का उसके प्रति भय उनके चेहरे पर था। “हमने सुना है कि इस वृक्ष में एक शव बँधा है। जन्म से राजकुमार होकर हम उसे अपने हाथों से कैसे छुएँ? हम क्षत्रिय कुल में जन्मे हैं, एक महान राजा के पुत्र हैं, और मन्त्र और व्रत का पालन करते हैं। ऐसी वस्तु को छूना हमें शोभा नहीं देता। बृहन्नला, आप हमें शव से छुआकर मुर्दा ढोने वालों की तरह अपवित्र और अशुद्ध क्यों बनाना चाहती हैं?”
“राजेन्द्र, आप शुद्ध और पवित्र ही रहेंगे,” बृहन्नला ने कहा। “डरिए मत। इस वृक्ष में केवल धनुष हैं, शव कोई नहीं। आप मत्स्यराज के उत्तराधिकारी हैं और उच्च कुल में जन्मे हैं। राजकुमार, हम आपसे इतना निन्दनीय काम क्यों करवाएँगी?”
तब विराट के पुत्र, कुण्डल झुलाते हुए, रथ से उतरे और अनमने मन से शमी पर चढ़े, और शत्रुओं का संहार करने वाले धनंजय रथ पर ही रहे और ऊपर पुकारकर कहा कि वृक्ष की चोटी से वे धनुष जल्दी नीचे उतारें। राजकुमार ने पहले लपेटन काटी, फिर वे रस्सियाँ जिनसे गठरी बँधी थी, और उन्होंने गाण्डीव को वहाँ चार और धनुषों के साथ रखा देखा। आवरण से मुक्त होते ही सूर्य से दमकते उन धनुषों की आभा उगते ग्रहों की चमक से फूट निकली, और जब उन्होंने साँस लेते साँपों जैसी उनकी आकृतियाँ देखीं तो उन्हें भय ने जकड़ लिया और क्षण भर में उनकी पूरी देह के रोंगटे खड़े हो गए। उन बड़े और दमकते धनुषों पर हाथ रखे विराट के पुत्र ने अर्जुन से कहा।
सार: शमी वृक्ष पर अर्जुन उत्तर से कहते हैं कि राजकुमार के अपने धनुष उनका बल नहीं सह सकते और उन्हें पाँच भाइयों के शस्त्र उतारने ऊपर भेजते हैं, एक लाख धनुषों के बराबर और ताड़ जितने बड़े गाण्डीव का वर्णन करते हुए। उत्तर आपत्ति करते हैं कि वहाँ शव बँधा है और राजकुमार उसे नहीं छू सकता; बृहन्नला भरोसा दिलाती हैं कि वहाँ केवल धनुष हैं। वे अनमने चढ़ते हैं, लपेटन और रस्सियाँ काटते हैं, और गाण्डीव को चार और धनुषों के साथ पाते हैं, जो उगते ग्रहों से चमकते और साँस लेते साँपों से लगते हैं, और रोंगटे खड़े किए, धनुषों पर हाथ रखे वे अर्जुन को पुकारते हैं।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), विराट पर्व, कीचकवध उपपर्व के अन्त से गोहरण उपपर्व के आरम्भ तक, गांगुली के अनुवाद में खण्ड 25 से 41; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)