बारह बरस का वनवास पूरा हो चुका था, और अब वह तेरहवाँ बरस सामने खड़ा था जिसे बिता पाना परम कठिन प्रतिज्ञा थी, क्योंकि इस एक वर्ष में पाण्डवों को अज्ञातवास (बिना पहचाने हुए छिपकर रहना) करना था। यदि इस अवधि में दुर्योधन के लोग उन्हें पहचान लेते, तो फिर बारह वर्ष का वनवास दोहराना पड़ता। जनमेजय ने पूछा कि उनके वे महान पूर्वज, दुर्योधन के भय से व्याकुल, विराट की नगरी में किस प्रकार बिना पहचाने दिन काट सके, और शोक से पीड़ित, अपने पतियों के प्रति समर्पित, सदा ईश्वर की आराधना करती हुई द्रौपदी ने वहाँ अनजान रहकर अपने दिन कैसे बिताए। वैशम्पायन जी कहते हैं, सुनिए, हे राजन, यह वही कथा है जिसमें धर्म के देवता से वर पाकर युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ मत्स्यराज विराट की सेवा में छद्म-वेश धरकर प्रविष्ट हुए, और जिसमें द्रौपदी पर कुदृष्टि डालने वाला बलवान कीचक भीम के हाथों अपने अन्त को प्राप्त हुआ।
अज्ञातवास की योजना और भाइयों के छद्म-वेश
धर्मराज युधिष्ठिर ने, जो धर्म के देवता के पुत्र थे, अपने छोटे भाइयों को एक साथ बुलाकर कहा कि राज्य से निर्वासित होकर हमने बारह वर्ष बिता दिए हैं, अब यह तेरहवाँ वर्ष, जिसे काटना अत्यन्त कठिन है, आ पहुँचा है। उन्होंने अर्जुन से कहा कि कोई ऐसा स्थान चुना जाए जहाँ हम अपने शत्रुओं से बिना पहचाने हुए रह सकें।
अर्जुन ने उत्तर दिया कि धर्म के वर के बल पर ही वे लोगों के बीच बिना पहचाने हुए विचर सकेंगे, फिर भी निवास के लिए उन्होंने कुछ रमणीय और एकान्त स्थानों के नाम गिनाए। कुरुओं के राज्य को घेरे हुए अनेक सुन्दर और अन्न से भरे देश थे, जैसे पंचाल, चेदि, मत्स्य, सूरसेन, पट्टच्चर, दशार्ण, नवराष्ट्र, मल्ल, साल्व, युगन्धर, सौराष्ट्र, अवन्ति और विशाल कुन्तिराष्ट्र। उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा कि इनमें से किसे चुना जाए और यह वर्ष कहाँ बिताया जाए।
युधिष्ठिर ने कहा कि उस सर्वव्यापी प्रभु ने जो कहा है वह अवश्य सत्य होगा। परामर्श करके किसी रमणीय, मंगलमय और निर्भय प्रदेश को चुनना चाहिए। मत्स्यों के राजा वृद्ध विराट धर्मात्मा, बलशाली, दानशील और सबके प्रिय हैं, और पाण्डवों के प्रति स्नेह रखते हैं। उन्होंने निश्चय किया कि विराट की नगरी में ही, उनकी सेवा में प्रविष्ट होकर, यह वर्ष बिताया जाएगा। फिर उन्होंने भाइयों से पूछा कि कौन किस रूप में मत्स्यराज के सामने प्रस्तुत होगा।
अर्जुन ने पूछा कि स्वयं युधिष्ठिर विराट के राज्य में कौन-सी सेवा ग्रहण करेंगे। आप मृदु हैं, दानशील हैं, विनयी हैं, धर्मात्मा हैं और प्रतिज्ञा के पक्के हैं, तो विपत्ति में पड़े हुए आप कैसे रहेंगे, क्योंकि राजा को साधारण मनुष्य की भाँति कष्ट सहना पड़ेगा।
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि वे ब्राह्मण कंक के नाम से, पासों के खेल में निपुण और खेल के प्रेमी के रूप में, उस उच्च-आत्मा राजा के सभासद बनेंगे। हाथीदाँत के नीले, पीले, लाल और श्वेत रंग के सुन्दर मोहरों को बिछात पर चलाते हुए, काले और लाल पासों के फेंकने से वे राजा का मनोरंजन करेंगे। और यदि राजा पूछेंगे तो वे कहेंगे कि पहले मैं युधिष्ठिर का घनिष्ठ मित्र था। फिर उन्होंने भीम से पूछा कि वे कौन-सा कार्य करेंगे।
भीम ने कहा कि वे विराट के सामने वल्लभ नाम के रसोइए के रूप में जाएँगे। वे पाक-कला में कुशल हैं, राजा के लिए ऐसे व्यंजन बनाएँगे कि पहले के सब कुशल रसोइए मात खा जाएँ। वे लकड़ी के भारी बोझ ढोएँगे, बलवान हाथियों और सांडों को वश में करेंगे, और यदि कोई मल्ल उनसे लड़ने आएगा तो वे उसे जीतेंगे, पर किसी का प्राण नहीं लेंगे, केवल इस ढंग से गिराएँगे कि वह मारा न जाए। पूछने पर वे कहेंगे कि पहले मैं युधिष्ठिर का मल्ल और रसोइया था।
समझने की कुंजी (पारिभाषिक): सैरन्ध्री वह दासी होती है जो दूसरे के घर में रहकर सेवा करती है, परन्तु अपने भोजन और वस्त्र की स्वतन्त्रता रखती है, अर्थात किसी की क्रीतदासी नहीं होती। सूत-पुत्र का अर्थ है सूत जाति में जन्मा व्यक्ति, जो परम्परा में सारथि और स्तुति-गायक का कार्य करता है। योजन एक दूरी का माप है, लगभग आठ से तेरह किलोमीटर के समतुल्य।
अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी के वेश
युधिष्ठिर ने अर्जुन की प्रशंसा करते हुए, उसे श्वेत अश्वों से जुते रथ वाला, गाण्डीव का धारी, खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त करने वाला और इन्द्र के लोक में पाँच वर्ष रहकर समस्त दिव्य अस्त्रों की विद्या प्राप्त करने वाला बताया। फिर पूछा कि ऐसा वीर कौन-सा कार्य करेगा।
अर्जुन ने उत्तर दिया कि वे स्वयं को तीसरे लिंग का, नपुंसक रूप का, घोषित करेंगे, क्योंकि भुजाओं पर प्रत्यंचा के चिह्नों को छिपाना कठिन है। वे अपनी दोनों कलाइयों को चूड़ियों से ढकेंगे, कानों में कुण्डल, कलाइयों में शंख की चूड़ियाँ पहनेंगे और सिर से एक चोटी लटकाएँगे। बृहन्नला नाम धारण करके, स्त्री-रूप में रहते हुए वे राजा और अन्तःपुर की स्त्रियों को कथाएँ सुनाकर, गायन, नृत्य और अनेक वाद्यों की शिक्षा देकर प्रसन्न रखेंगे। पूछने पर कहेंगे कि वे युधिष्ठिर के महल में द्रौपदी की परिचारिका थे।
युधिष्ठिर ने नकुल से पूछा कि कोमल और सुन्दर रूप वाले वे क्या करेंगे। नकुल ने कहा कि वे ग्रन्थिक नाम से विराट के अश्वों के रक्षक बनेंगे, क्योंकि उन्हें अश्वों के पालन और प्रशिक्षण का पूर्ण ज्ञान है, और उनके हाथों में बछड़े और घोड़ियाँ तक वश में हो जाती हैं।
सहदेव ने कहा कि वे विराट की गायों के रक्षक बनेंगे, क्योंकि वे गायों के दुहने, उनके स्वभाव को वश में करने, और शुभ लक्षणों वाले बैलों को पहचानने में निपुण हैं। तन्तिपाल नाम से वे अपना कार्य कुशलता से करेंगे।
तब युधिष्ठिर ने द्रौपदी की चिन्ता प्रकट की, कि यह उनकी प्रिय पत्नी है, उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय, माता के समान पूजनीय और बड़ी बहन के समान आदरणीय। द्रुपद की यह कन्या, जो किसी प्रकार के परिश्रम-कार्य से अपरिचित है, कोमल और युवती राजकुमारी है, अपने पतियों के प्रति समर्पित, कैसे रहेगी।
द्रौपदी ने उत्तर दिया कि सैरन्ध्री नाम की एक श्रेणी होती है जो दूसरों की सेवा में जाती है, यद्यपि सम्मानित स्त्रियाँ ऐसा नहीं करतीं। वे स्वयं को केश-सज्जा में कुशल सैरन्ध्री के रूप में प्रस्तुत करेंगी, राजा की पत्नी सुदेष्णा की सेवा करेंगी, और पूछने पर कहेंगी कि वे युधिष्ठिर के घर में द्रौपदी की परिचारिका थीं।
युधिष्ठिर ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि वे सद्कुल में जन्मी, सती और सदा सद्व्रतों में लगी हैं, इसलिए उन्हें ऐसा आचरण करना चाहिए कि दुष्ट हृदय वाले पापी पुरुष उनकी ओर देखकर प्रसन्न न हों।

समझने की कुंजी (वंश और नाम): पाँचों भाई जिन छद्म-नामों से अपने लिए परस्पर पहचान रखेंगे वे थे जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्वल। उनके सेवा-नाम थे कंक (युधिष्ठिर), वल्लभ (भीम), बृहन्नला (अर्जुन), ग्रन्थिक (नकुल), तन्तिपाल अथवा अरिष्टनेमि (सहदेव) और मालिनी अथवा सैरन्ध्री (द्रौपदी)।
पुरोहित का प्रस्थान और धौम्य का उपदेश
युधिष्ठिर ने व्यवस्था की कि उनके पुरोहित सारथियों और रसोइयों के साथ द्रुपद के यहाँ जाकर अग्निहोत्र की अग्नियों को बनाए रखें, और इन्द्रसेन आदि खाली रथ लेकर शीघ्र द्वारवती को जाएँ। द्रौपदी की दासियाँ पंचालों के पास चली जाएँ, और सब यह कहें कि हम नहीं जानते कि पाण्डव हमें द्वैतवन के सरोवर पर छोड़कर कहाँ गए।

तब पाण्डवों ने धौम्य से परामर्श किया। धौम्य ने कहा कि राजा के साथ रहना कठिन है, इसलिए उन्होंने राजकुल में निर्दोष रूप से रहने की रीति बतायी। एक देवस्वरूप राजा सब मन्त्रों से पवित्र महान अग्नि के समान होता है। द्वार पर अनुमति पाकर ही राजा के सामने जाना चाहिए। राजगुप्त बातों से सम्पर्क न रखे, किसी ऐसे आसन की इच्छा न करे जिसपर दूसरा भी दृष्टि रखता हो, राजा के रथ, शय्या, आसन, वाहन या हाथी पर स्वयं को प्रिय समझकर न चढ़े। बिना पूछे राजा को सलाह न दे, समय पर नमस्कार करके मौन और आदर से बैठे, क्योंकि राजा बकवादी से रुष्ट होते हैं।
उन्होंने और भी कहा कि राजा की पत्नी, अन्तःपुर के निवासियों, और राजा के द्वेषपात्रों से मैत्री न रखे। छोटे से छोटा कार्य भी राजा के ज्ञान में रहकर करे। चाहे कोई कितने ही ऊँचे पद पर पहुँचे, जब तक न पूछा या आदेश दिया जाए, तब तक स्वयं को जन्म से अन्धा समझे। राजा से क्रोध, अभिमान और प्रमाद त्यागकर व्यवहार करे। जो लाभकर और प्रिय हो वह कहे, पर जो लाभकर हो किन्तु प्रिय न हो उसे भी, अप्रियता के बावजूद, कह दे। राजा के सामने अधर, भुजा और जंघा को न हिलाए, धीरे बोले, हास्यास्पद वस्तु पर भी पागल की तरह जोर से न हँसे, केवल हलकी मुस्कान दिखाए। राजा के दिए वस्त्र, आभूषण और रथ सदा प्रयोग करे, इससे कृपा मिलती है। इस प्रकार आचरण करते हुए यह वर्ष बिताएँ।
युधिष्ठिर ने धौम्य को धन्यवाद देकर कहा कि माता कुन्ती और महाबुद्धिमान विदुर को छोड़कर ऐसा उपदेश और कोई न देता। धौम्य ने विधिपूर्वक प्रस्थान के संस्कार किए, अग्नियाँ प्रज्वलित करके मन्त्रों के साथ पाण्डवों की समृद्धि और सफलता के लिए आहुतियाँ दीं, और छहों यज्ञसेनी (द्रौपदी) को आगे रखकर निकल पड़े।
सार: अज्ञातवास के तेरहवें वर्ष के लिए पाण्डवों ने मत्स्यराज विराट की नगरी चुनी, और प्रत्येक ने अपने स्वभाव और कौशल के अनुरूप एक छद्म-वेश तय किया। धौम्य ने राजसेवा का सूक्ष्म आचार-शास्त्र समझाया, जो छिपकर रहने की इस कठिन वर्ष-भर की प्रतिज्ञा का व्यावहारिक कवच था।
शमी वृक्ष पर अस्त्रों का गोपन और दुर्गा-स्तुति
तलवारें कमर में बाँधकर, गोह के चमड़े के अंगुलित्राण और विविध अस्त्रों से सज्जित वे वीर यमुना की दिशा में बढ़े। पंचालों को दाहिने और दशार्णों को बाएँ छोड़ते हुए, यक्रिल्लोम और सूरसेन को पार करके, वे दाढ़ी बढ़ाए, तलवार लिए, अपने को बहेलिया बताते हुए मत्स्य की सीमा में प्रविष्ट हुए। थकी हुई द्रौपदी को अर्जुन ने उठाकर ले चला और नगर के निकट उतार दिया।

नगर में प्रवेश से पहले युधिष्ठिर ने पूछा कि अस्त्र कहाँ रखें, क्योंकि अस्त्रों सहित प्रवेश करने पर नगरवासी भयभीत होंगे, और गाण्डीव सबको ज्ञात है, अतः लोग शीघ्र पहचान लेंगे। अर्जुन ने एक श्मशान के समीप, दुर्गम शिखर के पास खड़े एक विशाल शमी वृक्ष को दिखाया, जिसकी विशाल शाखाएँ फैली हुई थीं और जिसपर चढ़ना कठिन था। उन्होंने उसी वृक्ष पर अस्त्र रखने का सुझाव दिया।
तब उन्होंने अपने धनुषों की प्रत्यंचाएँ उतारीं, गाण्डीव की भी, जिसकी टंकार मेघ-गर्जन या पर्वत के फटने जैसी थी, और युधिष्ठिर ने उस धनुष की डोरी खोली जिससे उन्होंने कुरुक्षेत्र की रक्षा की थी। नकुल वृक्ष पर चढ़े और सब धनुष, तलवारें, तरकश और तीक्ष्ण बाण उन शाखाओं पर बाँध दिए जहाँ न टूटें और न वर्षा पहुँचे। फिर उन्होंने वृक्ष पर एक शव टाँग दिया, ताकि सड़ांध की गन्ध पाकर लोग कहें कि यहाँ कोई मृत शरीर है और दूर से ही वृक्ष को छोड़ दें। गड़रियों और गोपालों के पूछने पर उन्होंने कहा कि यह उनकी एक सौ अस्सी वर्ष की माता का शव है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों की प्रथा के अनुसार टाँगा है।

विराट की रमणीय नगरी की ओर जाते हुए युधिष्ठिर ने मन ही मन दिव्य दुर्गा की स्तुति की, जो विश्व की परम देवी हैं, यशोदा के गर्भ से जन्मी, नारायण के वर से सुशोभित, नन्द के कुल में प्रकट, समृद्धि की दात्री, कंस की भयदात्री और असुरों की विनाशिनी हैं। उन्होंने उस देवी को नमस्कार किया जो कंस के पटकने पर आकाश में उठ गई थीं, जो वासुदेव की बहन हैं, जो खड्ग और ढाल धारण करती हैं, और जो विपत्ति में पुकारने वाले को कीचड़ में फँसी गाय की भाँति उद्धार करती हैं। उन्होंने उन्हें जया और विजया कहकर युद्ध में विजय की याचना की, और इस संकट की घड़ी में वर माँगा। उन्होंने उन्हें कीर्ति, श्री, स्थिरता, सफलता, पत्नी, सन्तान, ज्ञान और बुद्धि के रूप में पुकारा, और महिषासुर की संहारिणी के रूप में नमन किया।
स्तुति से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और बोलीं कि उनकी कृपा से कौरवों की पंक्तियों को परास्त और संहार करके युधिष्ठिर को युद्ध में विजय मिलेगी, और वे फिर समस्त पृथ्वी पर शासन करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी कृपा से न कुरुओं के गुप्तचर और न मत्स्य देश के निवासी, जब तक वे विराट की नगरी में रहेंगे तब तक उन्हें पहचान सकेंगे। यह कहकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गईं।
समझने की कुंजी (स्थान): शमी एक काँटेदार वृक्ष है जिसे क्षत्रिय परम्परा में पूज्य माना जाता है। पाण्डवों का अस्त्र छिपाने के लिए शमी को चुनना संयोग नहीं, क्योंकि विजय-यात्रा से पूर्व शमी की पूजा की प्रथा थी। द्वैतवन वह वन-सरोवर है जहाँ से पाण्डव अज्ञातवास के लिए चले।
युधिष्ठिर और भीम का विराट की सभा में प्रवेश

सोने और नीलमणि से जड़े पासों को वस्त्र में बाँधकर, बगल में दबाए, युधिष्ठिर सर्वप्रथम उस समय सभा में आए जब विराट अपने दरबार में विराजमान थे। बादलों में छिपे चन्द्रमा या राख से ढकी अग्नि के समान दीप्तिमान उस पुरुष को देखकर विराट ने अपने सभासदों, ब्राह्मणों, सारथियों और वैश्यों से पूछा कि यह कौन है जो राजा के समान है, जिसके पास न दास हैं न रथ न हाथी, फिर भी जो इन्द्र के समान शोभित है।
युधिष्ठिर ने विराट के सामने आकर कहा कि वे एक ब्राह्मण हैं जो अपना सब कुछ खोकर जीविका के लिए आए हैं, और राजा की आज्ञा में रहना चाहते हैं। प्रसन्न होकर विराट ने स्वागत किया और पूछा कि वे किस राजा के राज्य से आए, उनका नाम, कुल और ज्ञान क्या है।
युधिष्ठिर ने कहा कि उनका नाम कंक है, वे वैयाघ्र नामक कुल के ब्राह्मण हैं, पासे फेंकने में निपुण हैं और पहले युधिष्ठिर के मित्र थे। विराट ने कहा कि वे जो वर चाहें वह देंगे, और कंक मत्स्य देश पर शासन करें, क्योंकि वे देवता के समान हैं। युधिष्ठिर ने प्रार्थना की कि वे पासों के कारण किसी नीच व्यक्ति से विवाद में न पड़ें, और उनसे हारा हुआ व्यक्ति जीते हुए धन को न रख पाए। विराट ने यह वर दिया, उन्हें अपने समान राज्य का स्वामी घोषित किया, अपना मित्र बनाया और कहा कि उनके लिए सब द्वार खुले रहेंगे।

तब भीम सिंह की लीलामयी चाल से, हाथ में कलछी और चम्मच तथा एक निष्कलंक काली तलवार लिए, काले वस्त्र पहने, सूर्य के समान दीप्तिमान आए। विराट ने पूछा कि सिंह के समान कन्धों वाला यह सुन्दर युवक कौन है, जो गन्धर्वराज या स्वयं पुरन्दर सा प्रतीत होता है। भीम ने कहा कि वे वल्लभ नामक रसोइए हैं, व्यंजन बनाने में कुशल, और राजा उन्हें रसोई में नियुक्त करें। विराट ने कहा कि उन्हें विश्वास नहीं होता कि पकाना उनका कार्य है, क्योंकि वे राजा से लगते हैं। भीम ने कहा कि वे रसोइए और सेवक हैं, साथ ही मल्ल भी, जो सिंहों और हाथियों से लड़कर राजा का मनोरंजन करेंगे। विराट ने उन्हें रसोई का अध्यक्ष नियुक्त किया।
द्रौपदी का सुदेष्णा की सेवा में और शेष भाइयों का प्रवेश
अपने काले, कोमल, लम्बे केशों को घुँघराले सिरों सहित एक गाँठदार चोटी में बाँधकर, दाहिने कन्धे पर डालकर, वस्त्र से छिपाकर, द्रौपदी मलिन परन्तु बहुमूल्य काले वस्त्र में सैरन्ध्री के वेश में इधर-उधर विचरने लगीं। केकय-राज की पुत्री, विराट की प्रिय रानी सुदेष्णा ने उन्हें छत से देखा और पूछा कि वे कौन हैं और क्या चाहती हैं। द्रौपदी ने कहा कि वे सैरन्ध्री हैं और जो उन्हें रखेगा उसी की सेवा करेंगी।

सुदेष्णा ने उनके अद्भुत सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए संदेह किया कि वे कोई यक्षी, देवी, गन्धर्वी या अप्सरा होंगी, और पूछा कि वे सत्य कहें कि वे कौन हैं। द्रौपदी ने उत्तर दिया कि वे न देवी हैं न गन्धर्वी न यक्षी न राक्षसी, अपितु सैरन्ध्री श्रेणी की दासी हैं, जो केश सँवारना, सुगन्धित उबटन कूटना और चमेली, कमल, नीलकमल तथा चम्पक की मालाएँ गूँथना जानती हैं। पहले उन्होंने कृष्ण की प्रिय रानी सत्यभामा और पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी की सेवा की थी, और द्रौपदी उन्हें मालिनी कहती थीं।
सुदेष्णा ने कहा कि वे उन्हें अपने सिर पर बैठातीं, पर भय यह है कि राजा स्वयं उनकी ओर आकर्षित हो जाएँगे, क्योंकि उनके अलौकिक सौन्दर्य को देखकर कोई पुरुष नहीं बच सकता। द्रौपदी ने आश्वस्त किया कि न विराट न कोई और उन्हें पा सकेगा, क्योंकि उनके पाँच युवा पति, जो गन्धर्व और एक अत्यन्त शक्तिशाली गन्धर्वराज के पुत्र हैं, सदा गुप्त रूप से उनकी रक्षा करते हैं। जो भी उन्हें साधारण स्त्री की तरह पाना चाहेगा, वह उसी रात मृत्यु को प्राप्त होगा। उनकी शर्त थी कि उन्हें किसी का जूठा भोजन न छूना पड़े और किसी के पाँव न धोने पड़ें। सुदेष्णा ने यह शर्त मानकर उन्हें रख लिया।

फिर गोपाल के वेश में, ग्वालों की बोली बोलते हुए, सहदेव विराट की गोशाला में आए और स्वयं को अरिष्टनेमि नामक वैश्य बताया, जो पहले पाण्डवों की सेवा में गोपाल था। उन्होंने कहा कि वे दस योजन के भीतर रहने वाली सब गायों का भूत, वर्तमान और भविष्य जानते हैं, और उन शुभ-लक्षण बैलों को पहचान सकते हैं जिनके मूत्र की गन्ध से बाँझ भी गर्भवती हो जाए। विराट ने अपनी एक लाख गायें उन्हें सौंप दीं।
तब प्राचीर के द्वार पर एक विशालकाय और अत्यन्त सुन्दर व्यक्ति आया, जो स्त्रियों के आभूषणों से सज्जित, बड़े कुण्डल और सोने से मढ़ी शंख-चूड़ियाँ पहने, गज की चाल से चलता हुआ धरती को कँपाता प्रतीत होता था। विराट ने कहा कि यह तो देवता-सा बलवान है, ऐसा व्यक्ति नपुंसक नहीं हो सकता, और उसे अपना पुत्र बनने या मत्स्य देश पर शासन करने का प्रस्ताव दिया। अर्जुन ने कहा कि वे गाते, नाचते और वाद्य बजाते हैं, उन्हें राजकुमारी उत्तरा को नृत्य सिखाने में नियुक्त किया जाए, और वे बृहन्नला हैं। विराट ने स्त्रियों से परीक्षा कराकर, उनके नपुंसकत्व को स्थायी जानकर, उन्हें कन्या के कक्ष में भेज दिया, जहाँ अर्जुन ने उत्तरा, उसकी सखियों और परिचारिकाओं को गायन-वादन सिखाना आरम्भ किया।

अन्त में नकुल आए और स्वयं को घोड़ों का प्रशिक्षक बताया। उन्होंने कहा कि वे घोड़ों के स्वभाव, उन्हें साधने की कला और रोगों के उपचार को जानते हैं, और उनके हाथों में कोई पशु दुर्बल या रुग्ण नहीं होता। लोग उन्हें ग्रन्थिक कहते हैं। विराट ने अपने सब घोड़े, अश्वपाल और सारथि उनके अधीन कर दिए।
एक उप-कथा: द्रौपदी ने अपने पतियों को गन्धर्व बताया, और यह केवल चतुराई का बहाना नहीं था। उनकी शर्तों में, कि जूठन न छुएँ और किसी के पाँव न धोएँ, मूल कथा अज्ञातवास के संकट में भी एक रानी की मर्यादा की रक्षा का प्रयत्न दिखाती है। यही गन्धर्व-कथा आगे कीचक को भी चेतावनी बनी, यद्यपि उसने उसे अनसुना कर दिया।
सार: छहों एक-एक करके विराट की सभा और सेवा में प्रविष्ट हुए, और किसी ने उन्हें पहचाना नहीं। प्रत्येक राजा का प्रिय बन गया, और द्रौपदी ने सुदेष्णा के अन्तःपुर में रहकर अपनी मर्यादा-रक्षा की शर्तें मनवायीं। बाहर से यह सेवकों का जीवन था, भीतर यह उन वीरों की प्रतिज्ञा-बद्ध तपस्या थी।
समय-पालन और ब्रह्मा-महोत्सव में भीम का मल्ल-युद्ध
इस प्रकार छिपकर रहते हुए वे पाण्डव विराट की सेवा करते रहे। युधिष्ठिर सभासद के रूप में राजा और सबको प्रिय हो गए, पासों के रहस्य में निपुण होकर उन्होंने सबको अपनी इच्छा से खेल खिलाया, और जीते हुए धन को गुप्त रूप से भाइयों में उचित अनुपात में बाँटते रहे। भीम राजा से प्राप्त माँस और व्यंजन युधिष्ठिर को मूल्य पर बेचते, अर्जुन अन्तःपुर में अर्जित पुराने वस्त्रों का धन बाँटते, सहदेव दूध, दही और घी देते, और नकुल अश्वों के प्रबन्धन से मिला धन बाँटते। दीन दशा में द्रौपदी इन सब भाइयों की देखभाल करतीं और अनजान बनी रहतीं। इस प्रकार वे माता के गर्भ में पुनः लौट आने जैसे, दृष्टि से ओझल, विराट की राजधानी में रहते रहे।

तीन मास बीतने पर, चौथे मास में, मत्स्य देश में दिव्य ब्रह्मा के सम्मान में महोत्सव आया, जिसमें हजारों मल्ल चारों दिशाओं से आए, विशाल शरीर और महान पराक्रम वाले, कालखंज नामक दैत्यों के समान। उनमें एक मल्ल औरों से ऊँचा था जिसने सबको ललकारा, और कोई उसके सामने जाने का साहस न कर सका। तब विराट ने अपने रसोइए को उससे लड़ाया। राजा की आज्ञा का खुला उल्लंघन न कर सकने के कारण भीम ने अनिच्छा से मन बनाया, राजा को प्रणाम करके विशाल अखाड़े में प्रवेश किया, और जीमूत नामक उस मल्ल को, जो वृत्र असुर के समान था, द्वन्द्व के लिए ललकारा।
दोनों साठ-साठ वर्ष के मतवाले हाथियों जैसे विशालकाय थे। उनके बीच वज्र के पर्वत-वक्ष पर गिरने जैसा भयानक मल्ल-युद्ध हुआ। वे मुट्ठियों से एक-दूसरे पर प्रहार करते, दूर फेंकते, भूमि पर दबाते, फिर उठकर भुजाओं में भींचते, घुटनों और सिर से टकराते, और दर्शकों के असीम आनन्द के बीच बिना शस्त्र के, केवल भुजबल और मनोबल से लड़ते रहे। अन्त में बलवान भीम ने उस गरजते मल्ल को भुजाओं से पकड़ा, जैसे सिंह हाथी को पकड़ता है, ऊपर उठाकर सौ बार घुमाया जब तक वह अचेत न हो गया, और फिर भूमि पर पटककर उसे मार डाला।

जीमूत के मारे जाने पर विराट और उनके मित्र अत्यन्त प्रसन्न हुए, और राजा ने वल्लभ को कुबेर की उदारता से पुरस्कृत किया। अनेक मल्लों और बलवान पुरुषों को मारकर भीम ने राजा को प्रसन्न किया, और जब कोई उनसे लड़ने को न बचा, तो राजा ने उन्हें सिंहों, बाघों और हाथियों से लड़ाया, और अन्तःपुर की स्त्रियों के मनोरंजन के लिए भी। यह देखकर सब वीरों का कष्ट जानने वाली द्रौपदी निरन्तर निःश्वास भरती रहीं।
सार: समय-पालन पर्व में पाण्डव परस्पर सहायता करते हुए, गुप्त रूप से अपनी कमाई बाँटते हुए दिन काटते रहे। ब्रह्मा-महोत्सव में भीम का जीमूत-वध उनके बल का पहला सार्वजनिक प्रकाश था, जिसने राजा को प्रसन्न किया, पर द्रौपदी के लिए हर ऐसा प्रदर्शन वीरों की दुर्दशा की एक और चुभन था।
कीचक-वध पर्व का आरम्भ और कीचक की कुदृष्टि
इस छद्म-वेश में रहते हुए उन वीरों ने मत्स्य की नगरी में दस मास बिता दिए। यद्यपि वे स्वयं सेवा कराने योग्य थीं, यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी सुदेष्णा की सेवा करती हुई अत्यन्त दुःख में दिन काट रही थीं। वर्ष समाप्त होने को था, तभी विराट की सेना का सेनापति, बलवान कीचक, जो रानी सुदेष्णा का भाई था, द्रुपद की पुत्री पर दृष्टि डाल बैठा। देवकन्या के समान तेजस्विनी, धरती पर देवी की भाँति चलती उस स्त्री को देखकर कीचक काम के बाणों से बिंध गया और उन्हें पाने की इच्छा करने लगा।

काम की ज्वाला से जलता हुआ वह अपनी बहन सुदेष्णा के पास आया और मुस्कुराते हुए बोला कि यह सुन्दरी, जो उसने पहले विराट के महल में कभी नहीं देखी, उसे नई मदिरा की सुगन्ध के समान उन्मत्त कर रही है। उसने पूछा कि यह देवी-सी कान्ति वाली स्त्री कौन है और किसकी है, और कहा कि ऐसी स्त्री सुदेष्णा की सेवा के योग्य नहीं, अपितु उसे चाहिए कि वह कीचक के सोने के आभूषणों, हाथियों, घोड़ों और रथों से भरे महल पर राज्य करे।
सुदेष्णा से परामर्श करके कीचक द्रौपदी के पास गया और मीठे स्वर में, वन में सिंहनी से बात करते गीदड़ की भाँति, बोला कि वे कौन और किसकी हैं, और कहाँ से विराट की नगरी में आई हैं। उसने उनके अप्रतिम सौन्दर्य की लम्बी प्रशंसा की, उन्हें लक्ष्मी, भूति, ह्री, श्री, कीर्ति, कान्ति और रति के समान बताया, और कहा कि उनके मुख की कान्ति देखकर कौन काम के वश में न होगा। उसने कहा कि वह अपनी सब पुरानी पत्नियों को त्यागकर उन्हें अपनी दासी बना देगा और स्वयं उनका दास बनकर रहेगा, और प्रार्थना की कि वे उसकी काम-ज्वाला को बुझाएँ और उससे मिलें।
द्रौपदी ने उत्तर दिया कि वे एक नीच कुल की दासी हैं, केश सँवारने जैसे तुच्छ कार्य में लगी हैं, और कीचक ऐसी की कामना करके स्वयं को अयोग्य सम्मान दे रहा है। फिर वे दूसरों की विवाहिता पत्नी हैं, इसलिए कीचक का यह आचरण उचित नहीं। उन्होंने उसे धर्म का उपदेश स्मरण कराया कि पुरुष को केवल अपनी विवाहिता पत्नी में ही प्रेम लेना चाहिए, और काम के वश में पापी पुरुष या तो घोर अपयश या भयानक विपत्ति को प्राप्त होते हैं।
कीचक ने व्यभिचार के अनेक दोषों को जानते हुए भी, काम के वश में, द्रौपदी से कहा कि वे उसे, जो उनके कारण मन्मथ के वश में है, इस प्रकार न ठुकराएँ, अन्यथा उन्हें पीछे पछताना पड़ेगा। उसने कहा कि वही इस समस्त राज्य का वास्तविक स्वामी है, उसी पर निर्भर रहकर प्रजा जीती है, और तेज, पराक्रम, सौन्दर्य और भोग में उसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं। द्रौपदी ने डाँटते हुए कहा कि वह मूर्खता न करे और अपना प्राण न गँवाए, क्योंकि वे अपने पाँच पतियों से रक्षित हैं, जिनके पति गन्धर्व हैं, जो क्रुद्ध होकर उसे मार डालेंगे। उन्होंने उसे एक मूर्ख बालक के समान बताया जो समुद्र के एक तट पर खड़ा होकर दूसरे तट तक तैरने की सोचता है, और पूछा कि क्या उसमें इतनी भी बुद्धि नहीं कि वह अपना भला और अपने प्राणों की रक्षा देखे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): मन्मथ और काम दोनों प्रेम के देवता के नाम हैं, जिन्हें पुष्प-बाणों का धारी कहा जाता है। मूल कथा में कीचक का काम-वर्णन विस्तृत है, परन्तु यहाँ उसका सार यही है कि वह धर्म और परिणाम दोनों जानता हुआ भी काम के वश में अन्धा हो गया। यह महाभारत की वह नैतिक जटिलता है कि पाप करने वाला अनजान नहीं, अपितु जानबूझकर मार्ग से भटकता है।
सुदेष्णा का छल और कीचक के यहाँ द्रौपदी
राजकुमारी द्वारा ठुकराए जाने पर, उन्मत्त काम और मर्यादा-हीनता से, कीचक ने सुदेष्णा से कहा कि वह कोई ऐसा उपाय करे जिससे उसकी सैरन्ध्री उसकी बाँहों में आ जाए, अन्यथा वह उत्कट इच्छा से मर जाएगा। उसकी विलाप-भरी प्रार्थनाएँ सुनकर सुदेष्णा को दया आई, और उसने कीचक के प्रयोजन और कृष्णा की व्याकुलता दोनों पर विचार करके सूत-पुत्र से कहा कि वह किसी उत्सव के अवसर पर उसके लिए भोजन और मदिरा तैयार करे, और वह सैरन्ध्री को मदिरा लाने के बहाने उसके पास भेज देगी, जहाँ वह एकान्त में उसे अपनी इच्छानुसार मना ले।
कीचक ने राजा के योग्य मदिरा और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कराए। तब सुदेष्णा ने, जैसा कीचक ने समझाया था, सैरन्ध्री से कहा कि वह उठे और कीचक के घर से मदिरा ले आए, क्योंकि उसे प्यास लगी है। द्रौपदी ने कहा कि वे कीचक के कक्ष में नहीं जा सकतीं, क्योंकि रानी स्वयं जानती हैं कि वह कितना निर्लज्ज है, और वे अपने पतियों के प्रति विश्वासघात करके उसके महल में कामुक जीवन नहीं जी सकतीं। उन्होंने वह शर्त स्मरण करायी जो उन्होंने घर में प्रवेश से पूर्व रखी थी, और कहा कि कीचक उन्हें देखकर अपमानित करेगा, इसलिए रानी किसी और दासी को भेजे।
सुदेष्णा ने कहा कि उसके भेजने पर, उसके घर से, कीचक उन्हें हानि नहीं पहुँचाएगा, और एक ढक्कनदार स्वर्ण-पात्र उन्हें थमा दिया। भय और अश्रुओं से भरी द्रौपदी ने देवताओं की रक्षा की प्रार्थना की और कीचक के घर की ओर चलीं। उन्होंने मन ही मन सत्य का आश्रय लेकर कहा कि जैसे वे अपने पतियों के अतिरिक्त किसी और पुरुष को नहीं जानतीं, उसी सत्य के बल पर कीचक उन्हें वश में न कर पाए, चाहे वे उसके सामने ही क्यों न जाएँ।

उस असहाय स्त्री ने क्षण भर सूर्य की आराधना की। सूर्य ने उसकी सब प्रार्थना पर विचार करके एक राक्षस को आदेश दिया कि वह अदृश्य रहकर उनकी रक्षा करे, और उस समय से वह राक्षस सब परिस्थितियों में उस निर्दोष स्त्री के साथ रहने लगा। भयभीत मृगी-सी कृष्णा को अपने सामने देखकर सूत अपने आसन से उठ खड़ा हुआ, और उसे वह आनन्द हुआ जो दूसरे तट तक जाने की इच्छा रखने वाले को नौका पाकर होता है।
कीचक का धावा, द्रौपदी का सभा में अपमान
कीचक ने स्वागत करते हुए कहा कि बीती रात उसके लिए मंगलमय दिन लाई है, क्योंकि आज उसे यह स्त्री अपने घर की स्वामिनी के रूप में मिली है। उसने सोने की मालाएँ, शंख, कुण्डल, माणिक्य, रेशमी वस्त्र और मृगचर्म लाने का प्रस्ताव रखा, और एक उत्तम शय्या दिखाकर मधु-पुष्प की मदिरा साथ पीने को कहा।
द्रौपदी ने कहा कि उन्हें रानी ने मदिरा लाने भेजा है, इसलिए वह शीघ्र मदिरा दे, क्योंकि रानी अत्यन्त प्यासी है। कीचक ने कहा कि रानी जो चाहती है उसे और लोग ले जाएँगे, और यह कहकर उसने द्रौपदी की दाहिनी भुजा पकड़ ली। तब द्रौपदी ने कहा कि जैसे वे इन्द्रियों के उन्माद से कभी, मन से भी, अपने पतियों के प्रति अनुगता नहीं हुईं, उसी सत्य के बल पर वे उस नीच को घसीटा हुआ और शक्तिहीन भूमि पर पड़ा हुआ देखेंगी।

भागती हुई द्रौपदी को कीचक ने ऊपरी वस्त्र के छोर से पकड़ लिया। बलपूर्वक पकड़ी जाने पर, क्रोध से काँपती और तेज़ साँस लेती उस सुन्दरी ने उसे भूमि पर पटक दिया, और वह पापी जड़ से कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़ा। फिर वे रक्षा के लिए उस दरबार की ओर दौड़ीं जहाँ युधिष्ठिर बैठे थे। पूरे वेग से दौड़ती द्रौपदी को कीचक ने केशों से पकड़ा, राजा के सामने ही भूमि पर गिराकर लात मार दी। तभी सूर्य द्वारा नियुक्त राक्षस ने कीचक को पवन के समान बल से धक्का दिया, और वह उखड़े वृक्ष की भाँति अचेत होकर गिर पड़ा।
वहीं बैठे युधिष्ठिर और भीमसेन ने कीचक द्वारा कृष्णा पर किए गए इस अत्याचार को क्रोध-भरी आँखों से देखा। भीम ने कीचक के विनाश की इच्छा से दाँत पीसे, उनका ललाट पसीने और भयानक रेखाओं से भर गया, आँखों से मानो धुआँ निकलने लगा, और वे क्रोध में वेग से उठ खड़े होने को थे। तब, पहचाने जाने के भय से, युधिष्ठिर ने अपने अँगूठे दबाकर भीम को रोका, और कहा कि हे रसोइए, यदि आपको ईंधन के लिए वृक्ष चाहिए तो बाहर जाकर वृक्ष काट लाइए।

रोती हुई द्रौपदी दरबार के द्वार पर आकर, अपने उदास पतियों को देखकर, फिर भी प्रतिज्ञा के कारण वेश बनाए रखती हुई, जलती आँखों से मत्स्यराज से बोलीं कि एक सूत-पुत्र ने आज उन वीरों की प्रिय पत्नी को लात मारी है जिनका शत्रु चार राज्यों की दूरी पर भी चैन से नहीं सो सकता, जो सत्यनिष्ठ हैं, ब्राह्मणों के भक्त हैं, और जो धर्म के बन्धन में न बँधे होते तो इस सम्पूर्ण संसार का संहार कर सकते। उन्होंने पूछा कि वे शक्तिशाली वीर आज कहाँ हैं जो याचकों को भी रक्षा देते रहे हैं, और क्यों वे आज नपुंसकों की भाँति अपनी प्रिय और सती पत्नी का अपमान चुपचाप सह रहे हैं। उन्होंने विराट को भी डाँटा कि वे राजा के समान नहीं, अपितु डाकू के समान आचरण कर रहे हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति में ही उनका अपमान हुआ।
विराट ने कहा कि उन्होंने यह विवाद अपनी आँखों से न देखा, इसलिए सच्चा कारण न जानकर वे न्याय कैसे करें। सब बातें जानकर सभासदों ने कृष्णा की प्रशंसा की और कीचक की निन्दा की। युधिष्ठिर का ललाट क्रोध से पसीने से भर गया, और उन्होंने उस राजकुमारी, अपनी प्रिय पत्नी से कहा कि वे यहाँ न रुकें, सुदेष्णा के कक्ष में लौट जाएँ। उन्होंने कहा कि वीरों की पत्नियाँ अपने पतियों के लिए कष्ट सहती हैं, और उनके गन्धर्व पति, सूर्य के समान तेजस्वी, इसे अपने क्रोध प्रकट करने का अवसर नहीं समझते, अन्यथा वे आ जाते। उन्होंने यह भी कहा कि वे अभिनेत्री की भाँति रोकर मत्स्य के दरबार में पासों के खेल में विघ्न डाल रही हैं।
द्रौपदी ने उत्तर दिया कि जिनकी वे विवाहिता पत्नी हैं वे अत्यन्त दयालु हैं, परन्तु उनमें ज्येष्ठ पासों के व्यसन में लगा है, इसलिए वे सब उत्पीड़न के योग्य हो गए हैं। फिर बिखरे केशों और क्रोध से लाल आँखों के साथ वे सुदेष्णा के कक्ष की ओर दौड़ीं। सुदेष्णा के पूछने पर उन्होंने बताया कि मदिरा लाने जाने पर कीचक ने राजा के सामने ही उन्हें मारा। सुदेष्णा ने कहा कि यदि वे चाहें तो वह कीचक को मरवा देगी, पर द्रौपदी ने कहा कि जिन्हें उसने ठेस पहुँचाई है वे ही उसे मारेंगे, और यह स्पष्ट है कि वह आज ही यमलोक जाएगा।
सार: कीचक का द्रौपदी पर बल-प्रयोग और राजसभा में लात मारना अज्ञातवास की वह कगार थी जहाँ धर्म और प्रतिज्ञा आमने-सामने आ खड़े हुए। युधिष्ठिर का भीम को रोकना और द्रौपदी को कठोर शब्द कहना नीतिगत विवशता थी, क्रूरता नहीं। यहाँ महाभारत किसी को निर्दोष नहीं छोड़ता, युधिष्ठिर का व्यसन भी द्रौपदी की भर्त्सना में खुलकर सामने आता है।
द्रौपदी का भीम के पास जाना और अपना शोक कहना
अपमानित द्रौपदी ने स्नान किया, शरीर और वस्त्र जल से धोए, और रोते हुए सोचने लगीं कि क्या करें और कहाँ जाएँ। तभी उन्हें भीम का स्मरण हुआ, और उन्होंने मन में कहा कि भीम के अतिरिक्त और कोई इस कार्य को सिद्ध नहीं कर सकता। रात्रि में उठकर वे रसोई के कक्ष की ओर गईं और भीम से बोलीं कि वे कैसे सो रहे हैं जब उनका वह शत्रु, विराट की सेना का सेनापति, अब भी जीवित है। उन्होंने उन्हें सिंह को जगाती सिंहनी की भाँति, लता की भाँति विशाल साल वृक्ष को घेरते हुए जगाया।
भीम उठ बैठे और पूछा कि वे इतनी शीघ्रता से क्यों आईं, उनका रंग उड़ा हुआ और मुख दुर्बल और पीला क्यों है, और उन्हें सब कुछ विस्तार से बताएँ, चाहे वह सुखकर हो या दुखकर, क्योंकि वही उन्हें बार-बार संकट से उबारते हैं। द्रौपदी ने कहा कि जिसकी पत्नी युधिष्ठिर हों, उसका शोक कौन-सा नहीं। उन्होंने स्मरण कराया कि कैसे प्रातिकामी ने उन्हें दासी कहकर सभा में घसीटा था, कैसे वन में सैन्धव (जयद्रथ) ने उन्हें अपमानित किया था, और अब मत्स्यराज के सामने कीचक ने उन्हें लात मारी।
उन्होंने उस ज्येष्ठ भ्राता की निन्दा की जो निन्दनीय पासों के व्यसन में लगा रहा, जिसके कारण उन पर यह दुःख आया। उन्होंने इन्द्रप्रस्थ के युधिष्ठिर का वैभव स्मरण कराया, जहाँ हजारों राजा उनकी पूजा करते थे, हजारों दासियाँ अतिथियों को भोजन कराती थीं, हजारों स्नातकों और यतियों का भरण-पोषण होता था, और वही युधिष्ठिर अब मत्स्य के दरबार में पासे फेंकने वाला कंक बनकर रहता है।
द्रौपदी ने भीम की दशा पर भी शोक प्रकट किया, कि ऐसा वीर अब विराट का रसोइया वल्लभ कहलाता है, हाथियों और सिंहों से लड़ता है, और अन्तःपुर की स्त्रियाँ हँसती हैं। उन्होंने बताया कि कैकेयी (कैकेय-राजकन्या सुदेष्णा) यह सोचती है कि सैरन्ध्री और वल्लभ एक-दूसरे के प्रेमी हैं, और इसी से उन्हें ताने देती है। फिर उन्होंने अर्जुन की दशा पर विलाप किया, जो एक रथ पर देवताओं और मनुष्यों को जीतने वाला, अब विराट की पुत्री का नृत्य-गुरु बृहन्नला है, कुण्डल और शंख-चूड़ियाँ पहने, चोटी बाँधे स्त्रियों के बीच रहता है। उन्होंने सहदेव की दशा पर भी शोक किया, जो गोपाल बनकर गायों की देखभाल करता और रात को बछड़े के चर्म पर सोता है, और नकुल की, जो अश्वों का प्रशिक्षक बनकर राजा के सामने घोड़े दौड़ाता है।
द्रौपदी ने अपनी दशा भी कही, कि उस जुआरी के कारण वे सुदेष्णा की आज्ञा में सैरन्ध्री बनकर रहती हैं, अपने हाथों से उबटन कूटती हैं, जो हाथ कभी इतने कठोर न थे, अब घट्ठों से भरे हैं। यह कहकर उन्होंने अपने घट्ठे पड़े हाथ दिखाए। उन्होंने कहा कि जो कभी कुन्ती के अतिरिक्त किसी के लिए उबटन नहीं कूटती थीं, वे अब दूसरों के लिए चन्दन घिसती हैं और विराट के डर में रहती हैं।

शोक सुनाते हुए कृष्णा चुपचाप रोने लगीं और भीम पर दृष्टि डालकर बोलीं कि निश्चय ही पूर्वजन्म में उनका देवताओं के प्रति कोई भारी अपराध रहा होगा, जो अभागी होकर भी वे जीवित हैं, जब उन्हें मर जाना चाहिए था। तब भीम ने अपनी पत्नी के घट्ठे पड़े कोमल हाथों से अपना मुख ढककर रोना आरम्भ किया, और उनके हाथ अपने हाथों में लेकर बहुत आँसू बहाए।
एक उप-कथा: द्रौपदी के लम्बे विलाप में महाभारत की वह स्मृति-शृंखला है जो इस अपमान को अकेली घटना नहीं रहने देती। प्रातिकामी का सभा में घसीटना, जयद्रथ का वन में हरण, और अब कीचक की लात, ये तीनों एक ही पीड़ा की कड़ियाँ हैं। और इन सबकी जड़ में युधिष्ठिर का पासों का व्यसन है, जिसे द्रौपदी छिपाती नहीं, खुलकर कहती हैं। यही व्यास की कथा की निर्ममता है।
भीम का सान्त्वना-वचन और कीचक-वध की योजना
भीम ने भुजबल और अर्जुन के गाण्डीव को धिक्कारते हुए कहा कि द्रौपदी के पहले लाल रहने वाले हाथ अब घट्ठों से भर गए। उन्होंने कहा कि वे विराट के दरबार में ही संहार कर देते, पर कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर ने उन्हें दृष्टि से रोक दिया, और जब कीचक ने उन्हें लात मारी तब उन्होंने मत्स्यों के समूल नाश का संकल्प किया था, पर युधिष्ठिर के संकेत को समझकर चुप रहे। उन्होंने कहा कि राज्य से वंचित रहना, कुरुओं का संहार न कर पाना, और दुर्योधन, कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन के सिर न ले पाना, ये कण्टक उनके हृदय में बिंधे हैं।
भीम ने द्रौपदी से प्रार्थना की कि वे धर्म का बलिदान न करें, अपना क्रोध शान्त करें, क्योंकि यदि युधिष्ठिर ऐसी भर्त्सना सुनेंगे तो प्राण त्याग देंगे, और यदि अर्जुन और जुड़वाँ भाई सुनेंगे तो वे भी जीवन त्याग देंगे, और तब वे स्वयं भी जीवित न रह सकेंगे। उन्होंने उन सती और पतिव्रता स्त्रियों के दृष्टान्त दिए जिन्होंने पतियों का अनुगमन किया, जैसे शर्याति-पुत्री सुकन्या ने च्यवन का, इन्द्रसेना ने हजार वर्ष के पति का, जनक-पुत्री सीता ने राम का, लोपामुद्रा ने अगस्त्य का, और सावित्री ने सत्यवान का। उन्होंने कहा कि वे भी ऐसी ही सद्गुणी हैं, और बस आधे मास का और समय बिता दें, तेरहवाँ वर्ष पूरा होते ही वे फिर रानी बनेंगी।
द्रौपदी ने कहा कि वे युधिष्ठिर की निन्दा नहीं करतीं, बीती बातों में कोई लाभ नहीं, और भीम शीघ्र इस घड़ी के कार्य की ओर बढ़ें। उन्होंने बताया कि कीचक निरन्तर उन्हें स्वयं को पत्नी बनाने को कहता है, और गन्धर्वों से भय न मानकर कहता है कि वह लाख गन्धर्वों को भी युद्ध में मार डालेगा। उन्होंने कीचक के दुराचार का वर्णन किया, कि वह कामी, अधर्मी, दूसरों का धन छीनने वाला, राजा और रानी का प्रिय है, और यदि उसने फिर देखा तो उन पर अत्याचार करेगा, जिसके बाद वे प्राण त्याग देंगी। उन्होंने स्मरण कराया कि भीम ने ही उन्हें जटासुर से बचाया था और भाइयों सहित जयद्रथ को परास्त किया था, इसलिए अब इस दुष्ट को भी मारें, और उसे पत्थर पर पटके घड़े की भाँति चूर कर दें। उन्होंने कहा कि यदि कल का सूर्य कीचक पर किरणें डालेगा तो वे विष पीकर मर जाएँगी, क्योंकि वे कीचक के वश में कभी न होंगी।
यह कहकर कृष्णा भीम के वक्ष में मुख छिपाकर रोने लगीं। भीम ने उन्हें आलिंगन में लेकर सान्त्वना दी, गम्भीर और सार्थक वचनों से समझाया, और उनका अश्रु-भीगा मुख अपने हाथों से पोंछा। कीचक का स्मरण करते और होंठ चाटते हुए, क्रोध से भरे भीम ने कहा कि वे जैसा कहती हैं वैसा ही करेंगे, और कीचक को उसके सब मित्रों सहित मार डालेंगे। उन्होंने योजना बतायी कि मत्स्यराज ने जो नृत्य-शाला बनवाई है, जहाँ दिन में लड़कियाँ नृत्य करती हैं और रात को घर लौट जाती हैं, वहीं एक उत्तम काठ की शय्या है, और वहीं वे कीचक को उसके मृत पूर्वजों के दर्शन कराएँगे। उन्होंने कहा कि द्रौपदी कीचक से बात ऐसे करें कि कोई और न देखे।
नृत्य-शाला में कीचक का संकेत-मिलन और भीम का प्रतीक्षा-व्यूह
रात बीतने पर कीचक प्रातः द्रौपदी के पास आया और बोला कि उसने उन्हें राजा के सामने गिराकर लात मारी, और वे रक्षा न पा सकीं, क्योंकि विराट नाम-मात्र का राजा है और सेना का स्वामी होने से वही मत्स्यों का असली स्वामी है। उसने उन्हें सौ निष्क, सौ दास-दासियाँ और खच्चरों से जुते रथ देने का प्रलोभन दिया। द्रौपदी ने उत्तर दिया कि उसकी शर्त यह है कि उसके मित्र और भाई इस मिलन को न जानें, क्योंकि वे उन तेजस्वी गन्धर्वों से डरती हैं, और इस शर्त पर वे उसके पास आएँगी।
कीचक ने यह स्वीकार किया और कहा कि वह अकेला ही उनके मिलन-स्थल पर आएगा, ताकि सूर्य के समान तेजस्वी गन्धर्व जान न पाएँ। द्रौपदी ने कहा कि वह अँधेरा होने पर मत्स्यराज की उस नृत्य-शाला में आए, जहाँ दिन में लड़कियाँ नाचती हैं और रात को घर चली जाती हैं, क्योंकि गन्धर्व उस स्थान को नहीं जानते।

उस कामी कीचक को आधा दिन एक मास जैसा लम्बा लगा। यह न जानते हुए कि सैरन्ध्री का रूप धरकर स्वयं मृत्यु आई है, वह घर लौटकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उबटन, मालाओं और आभूषणों से अपने शरीर को सजाने लगा। अपने सौन्दर्य को सदा के लिए खोने वाले कीचक की कान्ति बुझने को तैयार दीपक की लौ की भाँति बढ़ती-सी प्रतीत हुई।
इधर द्रौपदी रसोई में भीम के पास आकर बोलीं कि उन्होंने कीचक को समझा दिया है कि उनका मिलन नृत्य-शाला में होगा, और वह अकेला रात को उस सूनी शाला में आएगा, इसलिए वे वहीं उसका प्राण लें। उन्होंने कहा कि कीचक अभिमान से गन्धर्वों की अवहेलना करता है, अतः भीम उसे यमुना से कालिय नाग को उठाने वाले कृष्ण की भाँति उठाएँ, और अपने तथा अपने कुल के सम्मान की रक्षा करें।
भीम ने कहा कि इस शुभ समाचार से उन्हें वैसा ही आनन्द हुआ जैसा हिडिम्ब को मारकर हुआ था, और उन्होंने सत्य, भाइयों और धर्म की शपथ ली कि वे कीचक को वैसे ही मारेंगे जैसे देवराज इन्द्र ने वृत्र को मारा था। द्रौपदी ने अनुरोध किया कि वे अपनी पहले से दी हुई प्रतिज्ञा न तोड़ें, इसलिए कीचक को गुप्त रूप से मारें। भीम ने आश्वस्त किया कि वे आज ही रात के अँधकार में, औरों से अनजान, कीचक का सिर हाथी के बेल-फल को कुचलने की भाँति चूर कर देंगे।
रात को सर्वप्रथम उस संकेत-स्थल पर पहुँचकर भीम वेश छिपाए बैठ गए, और मृग की प्रतीक्षा में सिंह की भाँति कीचक की राह देखने लगे। कीचक अपने को इच्छानुसार सजाकर, पांचाली से मिलने की आशा में, निश्चित समय पर नृत्य-शाला में आया। गहन अन्धकार से भरे उस कक्ष में प्रवेश करते ही वह दुष्ट उस भीम के पास जा पहुँचा जो थोड़ी देर पहले आकर एक कोने में प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे कीट जलती अग्नि की ओर या क्षुद्र प्राणी सिंह की ओर बढ़ता है, वैसे ही कीचक काम के वश में, कृष्णा के अपमान के स्मरण से जलते उस भीम के पास, मानो सूत की मृत्यु के पास, पहुँचा।
कीचक-वध
शय्या में पड़े भीम के पास आकर, काम और हर्ष से भरा कीचक मुस्कुराते हुए बोला कि उसने पहले ही उन्हें अनेक धन, सौ दासियाँ, सुन्दर वस्त्र और एक अन्तःपुर-युक्त भवन दे दिया है, और स्त्रियाँ उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करने लगी हैं। भीम ने उत्तर दिया कि यह अच्छा है कि वह सुन्दर है और अपनी प्रशंसा करता है, पर इससे पूर्व उसने ऐसा सुखद स्पर्श कभी नहीं पाया होगा।

यह कहकर भीम सहसा उठ खड़े हुए और हँसते हुए बोले कि आज उसकी बहन उसे भूमि पर घसीटा हुआ देखेगी, जैसे पर्वत-सा विशाल हाथी सिंह द्वारा घसीटा जाता है, और जब वह मारा जाएगा तो सैरन्ध्री और वे, उसके पति, शान्ति से रहेंगे। यह कहकर भीम ने कीचक को मालाओं से सजे केशों से पकड़ लिया। कीचक ने अपने केश छुड़ाकर भीम की भुजाएँ पकड़ लीं, और दोनों के बीच, मानो वसन्त में मादा हाथी के लिए लड़ते दो हाथियों या वानर-वीर बालि और सुग्रीव के बीच, हाथों से हाथापाई होने लगी।
दोनों समान रूप से उन्मत्त और विजय के इच्छुक थे, पाँच फणों वाले सर्पों के समान भुजाएँ उठाकर वे नखों और दाँतों से क्रोध में भरकर भिड़ गए। बलवान कीचक के वेग से भी भीम एक पग न डिगे। एक-दूसरे को आलिंगन में बाँधते, घसीटते, दो बैलों की भाँति वे लड़ते रहे। दोनों ने एक-दूसरे को पटका, घुटनों से प्रहार किए, और उनकी भुजाओं की टक्कर बाँस के फटने जैसी आवाज़ करती रही।
तब वृकोदर ने कीचक को बल से कक्ष के भीतर पटका और आँधी के वृक्ष को झकझोरने की भाँति उसे फेंकने लगे। आक्रमण से कीचक दुर्बल और काँपने लगा, फिर भी पूरी शक्ति से भीम को खींचता रहा, और घुटनों से प्रहार करके उसने भीम को भूमि पर ला गिराया। भीम मूसल हाथ में लिए यम की भाँति तुरन्त उठ खड़े हुए। आधी रात को उस सूने स्थान में वे एक-दूसरे को ललकारते हुए भिड़े रहे, और उनकी गर्जना से वह दृढ़ भवन भी क्षण-क्षण काँपता रहा।
भीम ने वक्ष पर थप्पड़ मारा, पर कीचक एक पग न हटा, फिर वह क्षण भर में भीम की उस मार से, जो धरती पर असह्य थी, दुर्बल पड़ गया। उसे क्षीण होता देख भीम ने बलपूर्वक उसे अपने वक्ष की ओर खींचा और दबाने लगे। क्रोध में बार-बार साँस लेते हुए उस विजयी वीर ने कीचक को केशों से पकड़ा, और बड़े पशु को मारकर भूखे बाघ की भाँति गरजने लगे। उसे अत्यन्त थका हुआ देखकर वृकोदर ने उसे भुजाओं से, जैसे रस्सी से पशु को बाँधते हैं, जकड़ लिया।
फिर भीम अचेत कीचक को बहुत देर तक घुमाते रहे, जो टूटे तुरही की भाँति भयानक स्वर करता रहा। कृष्णा का क्रोध शान्त करने के लिए वृकोदर ने अपनी भुजाओं से उसका गला पकड़कर दबाना आरम्भ किया, और घुटनों से उस अधम की कमर पर प्रहार करके, जिसके सब अंग चूर हो चुके थे और जिसकी पलकें मुँद गई थीं, उसे पशु की भाँति मार डाला। कीचक को निश्चल देखकर भीम ने उसे भूमि पर लुढ़काया और कहा कि इस दुष्ट को, जो उनकी पत्नी को दूषित करना चाहता था, सैरन्ध्री के पार्श्व के इस काँटे को मारकर, वे अपने भाइयों के ऋण से उऋण और पूर्ण शान्ति को प्राप्त हुए।

फिर क्रोध से लाल आँखों वाले भीम ने पुनः उस पर आक्रमण किया, और उसके हाथ, पैर, गर्दन और सिर को उसी के शरीर में इस प्रकार ठूँस दिया कि वह आकारहीन मांस-पिण्ड बन गया, जैसे पिनाक-धारी (शिव) ने यज्ञ-रूपी मृग को निराकार कर दिया था। सब अंग कुचलकर, उसे मांस के गोले में बदलकर, बलवान भीमसेन ने उसे कृष्णा को दिखाया और कहा कि वे आकर देखें कि उस कामी दुष्ट की क्या दशा हुई।
एक मशाल जलाकर कीचक का शरीर दिखाते हुए भीम ने द्रौपदी से कहा कि जो भी उन-सी सद्गुणी स्त्री की कामना करेगा, वह इसी कीचक की भाँति मारा जाएगा। यह कठिन और कृष्णा को अत्यन्त प्रिय कार्य पूरा करके, अपना क्रोध शान्त करके, भीम कृष्णा से विदा लेकर शीघ्र रसोई में लौट गए। द्रौपदी ने भी, कीचक को मरवाकर, अपना शोक दूर किया और परम आनन्द अनुभव किया। उन्होंने नृत्य-शाला के रक्षकों से कहा कि वे आकर देखें कि दूसरों की पत्नियों पर अत्याचार करने वाला कीचक उनके गन्धर्व पतियों द्वारा मारा गया पड़ा है।
हाथों में मशालें लिए हजारों रक्षक वहाँ आए और रक्त से सने, हाथ-पैर रहित कीचक के शव को देखकर शोक और विस्मय से भर गए, और पूछने लगे कि उसकी गर्दन और पैर कहाँ हैं। उन्होंने निश्चय किया कि उसे किसी गन्धर्व ने मारा है।
समझने की कुंजी (संख्या और संकेत): भीम ने कीचक को अंग-प्रत्यंग चूर करके मांस-पिण्ड बना दिया, यह इसलिए कि उसकी मृत्यु गन्धर्व-कृत प्रतीत हो और अज्ञातवास की प्रतिज्ञा न टूटे। यही कारण है कि सब उसे अमानवीय, अर्थात गन्धर्व का कार्य, मानते हैं। निष्क उस काल की एक स्वर्ण-मुद्रा थी, सौ निष्क का प्रलोभन आज की भारी सम्पदा के समतुल्य समझा जा सकता है।
उपकीचकों का संकल्प और भीम के हाथों एक सौ पाँच का अन्त
तब कीचक के सब सम्बन्धी वहाँ आए, उसे घेरकर विलाप करने लगे, और अंग-भंग किए हुए, जल से सूखी भूमि पर खींचे कछुए की भाँति पड़े उसे देखकर भय से रोमांचित हो उठे। इन्द्र द्वारा मारे गए दानव की भाँति सर्वांग कुचले उस कीचक को अन्त्येष्टि के लिए बाहर ले जाते हुए, उन्होंने पास ही एक स्तम्भ के सहारे खड़ी निर्दोष कृष्णा को देख लिया।
सब कीचकगण (जिन्हें उपकीचक कहा जाता है) चिल्लाए कि इस व्यभिचारिणी स्त्री को मार डाला जाए जिसके लिए कीचक ने प्राण गँवाए, अथवा इसे उसी के साथ जला दिया जाए, क्योंकि उन्हें उस मृत सूत-पुत्र के लिए जो भी प्रिय हो वही करना है। उन्होंने विराट से प्रार्थना की कि सैरन्ध्री को कीचक के साथ जलाने की अनुमति दें। सूतों के पराक्रम को भली-भाँति जानते हुए विराट ने यह अनुमति दे दी।
तब कीचकगण भयभीत और स्तम्भित कृष्णा को बलपूर्वक पकड़कर, बाँधकर, अर्थी पर रखकर श्मशान की ओर चल पड़े। इस प्रकार बलात ले जाई जाती निर्दोष कृष्णा ने अपने पतियों की सहायता के लिए पुकारा, कि जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्वल उनकी पुकार सुनें, क्योंकि सूत उन्हें ले जा रहे हैं, और वे तेजस्वी गन्धर्व, जिनके रथों की घरघराहट और धनुष की टंकार मेघ-गर्जन सी है, उनकी पुकार सुनें।
कृष्णा के इन शोक-वचनों को सुनते ही भीम बिना क्षण भर सोचे शय्या से उठ खड़े हुए और बोले कि उन्होंने सैरन्ध्री के वचन सुन लिए हैं, अब उन्हें सूतों से कोई भय नहीं। फिर अपना शरीर बढ़ाते हुए, सावधानी से वेश बदलकर, वे एक गलत द्वार से महल के बाहर निकले, वृक्ष के सहारे दीवार लाँघकर श्मशान की ओर दौड़े जहाँ कीचकगण गए थे।
चिता-स्थल की ओर बढ़ते हुए उन्होंने ताड़ के समान ऊँचा, विशाल कन्धों और सूखे शिखर वाला एक बड़ा वृक्ष देखा। दस व्याम (एक भुजा-फैलाव का माप) लम्बे उस वृक्ष को हाथी की भाँति उखाड़कर, शाखाओं और तने सहित कन्धे पर रखकर, मूसल हाथ में लिए यम की भाँति वे सूतों की ओर झपटे। उनके वेग से बरगद, पीपल और किंशुक के वृक्ष धराशायी होकर ढेर हो गए।

क्रोधित सिंह की भाँति आते उस गन्धर्व को देखकर सब सूत भय से काँपते और व्याकुल हो उठे, और एक-दूसरे से कहने लगे कि उठे वृक्ष को हाथ में लिए क्रोधित बलवान गन्धर्व आ रहा है, इसलिए जिस सैरन्ध्री से यह संकट उत्पन्न हुआ उसे मुक्त कर दें। भीम द्वारा उखाड़ा वृक्ष देखकर उन्होंने द्रौपदी को छोड़ दिया और साँस रोके नगर की ओर भागे। भागते हुए उन एक सौ पाँच सूतों को भीम ने उसी वृक्ष से, वज्र-धारी इन्द्र के दानवों को मारने की भाँति, यमलोक पहुँचा दिया।
द्रौपदी को बन्धन से मुक्त करके भीम ने उन्हें सान्त्वना दी और कहा कि जो बिना कारण उन्हें सताते हैं वे इसी प्रकार मारे जाते हैं, अब उन्हें कोई भय नहीं, वे नगर लौट जाएँ, और भीम स्वयं किसी और मार्ग से विराट की रसोई में चले जाएँगे। इस प्रकार एक सौ पाँच उपकीचक मारे गए, और उनके शव आँधी के बाद उखड़े वृक्षों से भरे महान वन की भाँति भूमि पर पड़े रहे। पहले मारे गए सेनापति कीचक सहित मारे गए सूतों की संख्या एक सौ छह हुई। यह अद्भुत पराक्रम देखकर एकत्र स्त्री-पुरुष विस्मय से भर गए, और सबकी वाणी रुक गई।
सार: कीचक का वध केवल एक अपराधी का अन्त नहीं था, अपितु उसके पूरे कुल का संकट बन गया, क्योंकि उपकीचकों ने निर्दोष द्रौपदी को उसी चिता पर जलाने का संकल्प किया, और विराट ने भी सूतों के बल के भय से मौन सम्मति दे दी। भीम ने एक ही वृक्ष से एक सौ पाँच को मारकर द्रौपदी को बचाया। मारे गए सूत एक सौ छह हुए, और यह पराक्रम मानवीय सीमा के परे, गन्धर्व-कृत माना गया।
नगर का भय, द्रौपदी का लौटना और गुप्त संवाद
सूतों को मारा गया देखकर नगरवासी राजा के पास गए और बताया कि सब बलवान सूत-पुत्र गन्धर्वों द्वारा मारे गए, वज्र से चीरे पर्वत-शिखरों की भाँति पड़े हैं, और मुक्त हुई सैरन्ध्री नगर में लौट रही है। उन्होंने भय प्रकट किया कि सैरन्ध्री के आने से सम्पूर्ण राज्य संकट में पड़ सकता है, क्योंकि वह अत्यन्त सुन्दर है, गन्धर्व अत्यन्त बलवान हैं, और पुरुष स्वभावतः कामुक होते हैं। उन्होंने प्रार्थना की कि राजा ऐसा उपाय करें कि सैरन्ध्री के साथ हुए अन्याय के कारण राज्य का विनाश न हो।
विराट ने आदेश दिया कि सब कीचकों की अन्त्येष्टि एक ही धधकती चिता पर, रत्नों और सुगन्धित द्रव्यों सहित कर दी जाए। भयभीत राजा ने रानी सुदेष्णा से कहा कि जब सैरन्ध्री लौटे तो वह उससे कहे कि वह जहाँ चाहे चली जाए, क्योंकि राजा गन्धर्वों से मिली पराजय से भयभीत है, और वह स्वयं गन्धर्वों के रक्षित होने के कारण यह बात उससे प्रत्यक्ष कहने का साहस नहीं करता, इसलिए स्त्री के द्वारा कहलवा रहा है।

भीमसेन द्वारा मुक्त की गई कृष्णा अपने अंग और वस्त्र जल में धोकर, बाघ से डरी मृगी की भाँति नगर की ओर चलीं। उन्हें देखकर गन्धर्वों के भय से भीत नगरवासी सब दिशाओं में भागे, और कुछ ने तो आँखें ही मूँद लीं। रसोई के द्वार पर पांचाली ने भीमसेन को विशालकाय मतवाले हाथी की भाँति खड़े देखा, और विस्मय से फैली आँखों से, केवल उन दोनों को समझ आने वाले शब्दों में कहा कि वे उस गन्धर्व-राज को प्रणाम करती हैं जिसने उन्हें बचाया। भीम ने उन्हीं संकेत-शब्दों में उत्तर दिया।
फिर उन्होंने नृत्य-शाला में अर्जुन को विराट की पुत्रियों को नृत्य सिखाते देखा। अर्जुन के साथ निकलकर सब कन्याएँ कृष्णा के पास आईं और कहा कि सौभाग्य से वे संकट से मुक्त होकर सकुशल लौटीं, और सौभाग्य से वे सूत मारे गए जिन्होंने निर्दोष होने पर भी उन्हें सताया। बृहन्नला ने पूछा कि वे कैसे मुक्त हुईं और वे पापी कैसे मारे गए। सैरन्ध्री ने कहा कि कन्याओं के कक्ष में सुख से दिन बिताने वाली बृहन्नला को सैरन्ध्री की दशा से क्या प्रयोजन। बृहन्नला ने उत्तर दिया कि बृहन्नला के भी अपने अनुपम दुःख हैं, और जब वे दुःख में हैं तो उनके साथ रहने वाला कौन उसे अनुभव न करेगा, यद्यपि कोई दूसरे का हृदय पूरी तरह नहीं पढ़ सकता।
तब द्रौपदी उन कन्याओं के साथ राजभवन में सुदेष्णा के पास गईं। राजा की आज्ञा से रानी ने कहा कि वे जहाँ चाहें शीघ्र चली जाएँ, क्योंकि राजा गन्धर्वों से मिली इस पराजय से भयभीत है। सैरन्ध्री ने प्रार्थना की कि राजा उन्हें केवल तेरह दिन और रहने दें, इसके बाद गन्धर्व उन्हें ले जाएँगे और विराट का हित करेंगे, जिससे राजा को अपने मित्रों सहित बड़ा लाभ होगा।
समझने की कुंजी (अवधारणा): द्रौपदी का तेरह दिन और रहने माँगना संयोग नहीं, क्योंकि अज्ञातवास का तेरहवाँ वर्ष पूरा होने में अब इतना ही समय शेष था। गन्धर्व-कथा यहाँ कवच की भाँति काम करती रही, और इसी आड़ में पाण्डव अन्तिम दिनों को सुरक्षित बिता सके।
सार: कीचक-वध से नगर में गन्धर्वों का भय फैल गया, और राजा ने द्रौपदी को विदा करना चाहा, पर वे केवल कुछ ही दिन और माँगकर अज्ञातवास के अन्त तक टिकी रहीं। बृहन्नला (अर्जुन) के साथ का गुप्त संवाद दिखाता है कि एक ही छत के नीचे रहते हुए भी ये वीर अपनी पीड़ा को कितना छिपाए रहे। कीचक की कुदृष्टि का अन्त हो चुका था, पर पाण्डवों की प्रतिज्ञा का अन्तिम और गहरे-से-गहरा नाजुक पड़ाव अभी शेष था।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), विराट पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।