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बदरीवन में देवर्षि नारद फिर एक जिज्ञासा लेकर आए। पृथ्वी पर बहने वाली, पापों को धो देने वाली वह पावन गंगा पहले-पहल कहाँ से प्रकट हुईं, वे ब्रह्मा के कमण्डलु में कैसे पहुँचीं, और शिव तथा नारायण की प्रिया किस भाँति बनीं, यही वे श्रीनारायण से सुनना चाहते थे। श्रीनारायण बोले, “सुनिए नारद, यह कथा अत्यन्त गुप्त और दुर्लभ है। द्रवरूपिणी वे गंगा प्राचीन काल में गोलोक में थीं, और राधा तथा श्रीकृष्ण के अंश से ही प्रकट हुई थीं।”
गोलोक की रासमण्डली और शिव का गान
एक बार कार्तिक की पूर्णिमा पर गोलोक में राधा-महोत्सव मनाया जा रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण राधा की विधिवत् पूजा करके रासमण्डल में विराजमान थे; ब्रह्मा आदि देवता और शौनक आदि ऋषि प्रसन्नचित्त होकर वहीं स्थित थे। तभी संगीत सुनाने के लिए देवी सरस्वती वीणा लेकर मनोहर स्वरों में गाने लगीं। प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें रत्नों का हार दिया, शिव ने अखिल ब्रह्माण्ड में दुर्लभ एक मणि, श्रीकृष्ण ने कौस्तुभ, राधा ने अमूल्य रत्नों का हार, नारायण ने मनोहर माला और लक्ष्मी ने स्वर्ण-कुण्डल भेंट किए; मूलप्रकृति ईश्वरी ने दुर्लभ ब्रह्मभक्ति, धर्म ने धर्मबुद्धि और विपुल यश, अग्नि ने अग्नि-सा पवित्र वस्त्र तथा पवन ने मणि-नूपुर दिए।
इसी बीच ब्रह्मा की प्रेरणा से भगवान् शंकर रास के उल्लास को बढ़ाने वाला श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मधुर गीत गाने लगे। उस गान को सुनते ही सभी देवता ऐसे सम्मोहित हो गए मानो चित्र में खिंची पुतलियाँ हों। बड़ी कठिनाई से जब उन्हें चेतना लौटी, तो उन्होंने देखा कि रासमण्डल का सारा स्थल जलमय हो गया है और वहाँ राधा तथा श्रीकृष्ण कहीं नहीं हैं। सब गोप, गोपियाँ और देवता ऊँचे स्वर से विलाप करने लगे। ध्यान से ब्रह्मा ने जाना कि श्रीकृष्ण स्वयं राधा के साथ मिलकर द्रवमय हो गए हैं। तब ब्रह्मा और सब देवताओं ने परमेश्वर की स्तुति करके यही वर माँगा कि प्रभु उन्हें अपना रूप दिखाएँ। तब एक अशरीरी वाणी गूँजी, “मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण हूँ और यह राधा मेरी शक्तिस्वरूपा हैं; हम दोनों ने ही यह जलमय विग्रह धारण किया है।” उस वाणी ने ब्रह्मा से कहा कि वे जगद्गुरु शिव को एक गुप्त तन्त्रशास्त्र रचने की आज्ञा दें, जिससे जीव मन्त्रों के प्रभाव से उनके धाम को पा सकें; हजारों में कोई एक पुण्यात्मा मिले तो उसी पर वह मन्त्र प्रकट हो, और सृष्टि सूनी न हो, इसलिए ब्रह्मा सात्त्विक आदि पाँच प्रकार के जीव रचें। यदि शिव देवसभा में यह दृढ़ प्रतिज्ञा करें, तो प्रभु के रूप का शीघ्र प्रत्यक्ष दर्शन होगा। गंगाजल हाथ में लेकर शिव ने विष्णुमाया के मन्त्र-समूहों से युक्त तन्त्रशास्त्र रचने की प्रतिज्ञा की, और कहा कि जो गंगाजल हाथ में लेकर झूठी प्रतिज्ञा करता है, वह ब्रह्मा की आयु पर्यन्त कालसूत्र नरक में रहता है; और तत्क्षण श्रीकृष्ण राधा के साथ पुनः प्रकट हो गए। राधा और श्रीकृष्ण के उसी द्रवरूप से जो गंगा उपजीं, वे भोग और मोक्ष दोनों देने वाली हुईं, और श्रीकृष्ण ने उन्हें स्थान-स्थान पर स्थापित किया।
राधा का रोष
उस जलरूपा गंगा की अधिष्ठात्री देवी ने एक अनुपम, नवयौवना रूप धारण किया और लज्जावश वस्त्र से मुँह ढककर श्रीकृष्ण के पास आ बैठीं। हर्ष से भरी वे अपलक नेत्रों से प्रभु के मुख-सौन्दर्य का पान करने लगीं, यहाँ तक कि उनके रूप में वे प्रायः चेतनारहित-सी हो गईं। इसी बीच तीस करोड़ गोपियों के साथ राधिका वहाँ आ पहुँचीं। रोष के कारण उनका मुख और नेत्र लाल कमल-से हो रहे थे, ओष्ठ काँप रहे थे। श्रीकृष्ण आदरपूर्वक उठ खड़े हुए और मुसकराते हुए मधुर वचन कहने लगे। भयभीत गंगा ने भी उठकर राधा की स्तुति की और अति विनम्रता से कुशल पूछा; पर उनका कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गए थे। अन्ततः ध्यान के द्वारा वे श्रीकृष्ण के चरणकमल की शरण में चली गईं। अपने हृदयकमल पर स्थित उन गंगा को देखकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अभय दे दिया, और सर्वेश्वर का वर पाकर गंगा का चित्त शान्त हो गया।
राधा का उपालम्भ
तब शान्त तथा विनम्र स्वभाव वाली राधा मुसकराकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण से बोलीं, “हे प्राणेश! पास बैठकर तिरछी दृष्टि से आपका मुख निहारती यह कामनायुक्त सुन्दरी कौन है? मेरे जीवित रहते गोलोक में ऐसी दुराचारिणी स्त्री कैसे आ गई, और आप भी बार-बार हँसकर उसकी ओर देख रहे हैं? कोमल स्वभाव वाली स्त्री-जाति होने के कारण प्रेमवश मैं आपको क्षमा कर रही हूँ; हे लम्पट व्रजेश्वर! अपनी इस प्रेयसी को लेकर आप अभी गोलोक से चले जाइए, अन्यथा आपका भला न होगा।” फिर राधा ने पुराने प्रसंग याद दिलाए। एक बार चन्दनवन में विरजा के साथ श्रीकृष्ण को देखकर उन्होंने सखियों के कहने पर क्षमा किया था; पर राधा की आहट पाते ही श्रीकृष्ण छिप गए और विरजा देह त्यागकर करोड़ योजन चौड़ी नदी बन गईं; फिर जब श्रीकृष्ण “विरजे! विरजे!” पुकारकर रोए, तो वे जल से प्रकट हुईं, श्रीकृष्ण ने उनमें अपना तेज स्थापित किया, और समय पाकर उनसे सात समुद्र उत्पन्न हुए। इसी भाँति चम्पकवन में शोभा नामक गोपी देह छोड़कर चन्द्रमण्डल में समा गईं और उनके तेज को श्रीकृष्ण ने रत्नों, स्वर्ण तथा अनेक वस्तुओं में बाँट दिया; वृन्दावन में प्रभा नामक गोपी सूर्यमण्डल में चली गईं; रासमण्डल में शान्ति नामक गोपी देह त्यागकर श्रीकृष्ण में ही लीन हो गईं; और क्षमा के प्रसंग में राधा ने श्रीकृष्ण का पीताम्बर, मुरली, वनमाला, कौस्तुभ और रत्नकुण्डल ले लिए थे, जो सखियों के अनुरोध पर लौटाए, और लज्जा तथा पाप से श्रीकृष्ण श्यामवर्ण हो गए, तब क्षमा लज्जावश देह त्यागकर पृथ्वी में समा गईं। इन चारों प्रसंगों में श्रीकृष्ण रो-रोकर उनका तेज और गुण जगह-जगह बाँटते रहे।
जल का लोप और देवों की पुकार
इतना कहकर राधा उस लज्जित गंगा से कुछ कहने ही वाली थीं कि योगबल से सारा रहस्य जानकर गंगा सभा के बीच अन्तर्धान होकर अपने जल में समा गईं। तब राधा ने योग से जाना कि जलरूपा गंगा तो सर्वत्र फैली हैं, और उन्होंने अंजलि में भरकर उस जल को पी जाना आरम्भ किया। भयभीत गंगा तुरन्त श्रीकृष्ण के चरणकमल में प्रवेश कर उनकी शरण में चली गईं। राधा ने गोलोक, वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक आदि सब स्थानों में गंगा को खोजा, पर वे कहीं न मिलीं। उधर सर्वत्र जल का अभाव हो गया; सूखा कीचड़ और मरे हुए जलचरों से भरा गोला दिखने लगा। तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव, धर्म, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, मुनि और सिद्ध सब कण्ठ सूखे हुए गोलोक पहुँचे और श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे। श्रीकृष्ण बोले, “आप सब गंगा को ले जाने आए हैं, किन्तु वे तो भयभीत होकर मेरे चरणों में शरणागत हैं; मैं इन्हें अवश्य आपको दूँगा, पर पहले आप उन्हें भयमुक्त कीजिए।” तब ब्रह्मा ने मस्तक झुकाकर राधा की स्तुति की और कहा, “हे अम्बिके! शिव के गान से मुग्ध आपके और श्रीकृष्ण के द्रवरूप से यह गंगा प्रकट हुई हैं; ये तो आपकी ही प्रिय पुत्री के समान हैं। ये आपका मन्त्र लेकर आपकी पूजा करें। वैकुण्ठपति श्रीहरि इन्हें पति रूप में मिलेंगे, और जब ये अपनी एक कला से भूमण्डल पर जाएँगी, तब लवणसमुद्र भी इनके पति बनेंगे।” राधा मुसकराकर सब मान गईं। तब श्रीकृष्ण के चरण के अँगूठे के नख के अग्रभाग से गंगा बाहर निकलीं और सबके बीच शान्त होकर स्थित हुईं। ब्रह्मा ने कुछ जल अपने कमण्डलु में रख लिया और शिव ने कुछ अपने मस्तक पर धारण कर लिया। फिर ब्रह्मा ने गंगा को राधिका-मन्त्र देकर राधा की विधिवत् पूजा कराई।
वैकुण्ठ और धरती पर अवतरण
पूजा करके गंगा नारायण के साथ वैकुण्ठ चलीं। वहाँ ब्रह्मा ने भी पहुँचकर श्रीहरि से निवेदन किया कि शुद्धसत्त्वस्वरूपा गंगा उन्हें छोड़ किसी को पति नहीं चुनना चाहतीं, स्वयं आई कन्या को न अपनाने वाले पुरुष से महालक्ष्मी रूठ जाती हैं, और प्रकृति से परे निर्गुण तो केवल श्रीहरि हैं; वे इन्हें गन्धर्व-विवाह से ग्रहण करें। ब्रह्मा के गंगा को सौंपकर चले जाने पर श्रीहरि ने गन्धर्व-विवाह की विधि से उनका पुष्प-चन्दन-चर्चित हाथ पकड़कर उन्हें पत्नी रूप में ग्रहण किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ विहार करने लगे। इस प्रकार गंगा को मिलाकर श्रीहरि की तीन पत्नियाँ हुईं, और आगे तुलसी के साथ चार। पहली रति-क्रीड़ा के अतिशय सुख से गंगा मूर्च्छित हो गईं; यह देखकर लक्ष्मी के बार-बार रोकने पर भी सरस्वती सदा उनसे ईर्ष्या करती रहीं, यद्यपि गंगा ने उनसे कभी ईर्ष्या न की, और अन्ततः विष्णुप्रिया गंगा ने कुपित होकर सरस्वती को भारतवर्ष में जाने का शाप दे दिया। उसी सरस्वती के शाप से, तथा भगवान् की आज्ञा और राजा भगीरथ की तपस्या से, कालान्तर में वे गंगा भारतवर्ष में उतरीं। भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के, कपिल मुनि के शाप से जलकर भस्म हुए, साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए एक लाख वर्ष तप करके श्रीकृष्ण का दर्शन पाया था; उन्हीं की आज्ञा से गंगा धरती पर आईं, और उनके स्पर्श से छुई वायु के लगते ही सगर के पुत्र वैकुण्ठ चले गए। भगीरथ के द्वारा लाई जाने के कारण वे भागीरथी कहलाईं। जो गंगा विष्णु के चरणकमल से निकलीं, वे विष्णुपदी नाम से विख्यात हुईं, और आज भी संसार के पापों को धोती हुई तीनों लोकों में पावन धारा बनकर बहती हैं।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)