रणभूमि की धूल अभी बैठी भी न थी कि दानवराज शंखचूड ने रत्नमय आभूषणों से दमकते हुए सिर झुकाया, भगवान् शंकर को प्रणाम किया, और अपने मन्त्रियों के साथ रथ पर जा चढ़ा। उधर वटवृक्ष की छाया में भगवान् शंकर भगवती काली और पुत्र कार्तिकेय के साथ विराजमान थे; उन्होंने अपनी सेना और देवताओं को उसी क्षण युद्ध की आज्ञा दे दी, और देखते-ही-देखते आकाश शस्त्रों की चमक से भर उठा।
फिर तो प्रलय-सा संग्राम छिड़ गया। महेन्द्र वृषपर्वा से भिड़े, सूर्यदेव विप्रचित्ति से, चन्द्रमा दम्भ से और यमराज संहार नामक दानव से; ग्यारहों रुद्र ग्यारह भयंकर दानवों से जूझ पड़े, और नन्दीश्वर आदि गण दानवगणों से। कुमार कार्तिकेय ने दानवों की सेना का ऐसा घोर संहार मचाया कि अक्षौहिणियाँ धूल में मिल गईं। किन्तु उस समर का केन्द्र बनीं भगवती भद्रकाली। उन्होंने मन्त्रपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाया, तो शंखचूड ने अपने ब्रह्मास्त्र से उसे शान्त कर दिया; उन्होंने दिव्यास्त्र छोड़ा, राजा ने उसे भी अपने अस्त्रजाल में नष्ट कर दिया; उन्होंने योजनभर लम्बी शक्ति फेंकी, तो उसके सैकड़ों टुकड़े हो गए। तब कुपित होकर देवी ने मन्त्रपूत पाशुपतास्त्र उठा लिया।
ठीक उसी क्षण आकाशवाणी हुई, “इस महान् आत्मावाले राजा की मृत्यु पाशुपतास्त्र से नहीं होगी। जब तक यह भगवान् श्रीहरि के मन्त्र का कवच अपने गले में धारण किए रहेगा, और जब तक इसकी साध्वी पत्नी का सतीत्व अखण्ड रहेगा, तब तक जरा और मृत्यु इस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं।” यह सुनकर भद्रकाली ने वह अस्त्र नहीं चलाया। भूख से आतुर होकर वे लीलापूर्वक करोड़ों दानवों को निगलने लगीं, और जब शंखचूड को निगलने के लिए वेग से बढ़ीं, तब उस दानव ने अपने तीक्ष्ण दिव्यास्त्र से उन्हें रोक दिया। देवी ने मुष्टि के प्रहार से उसका रथ चूर-चूर कर दिया, सारथि को मार गिराया, और प्रलयाग्नि-सी त्रिशूल चला दी; किन्तु शंखचूड ने उसे अपने बायें हाथ से लीला-सहज ढंग से थाम लिया।
सौ वर्ष का युद्ध और एक वृद्ध ब्राह्मण
अब स्वयं भगवान् शंकर संग्राम-भूमि में उतरे। शंखचूड ने उन्हें देखते ही विमान से नीचे आकर, परम भक्ति से पृथ्वी पर मस्तक टेककर दण्डवत् प्रणाम किया, फिर रथ पर चढ़, कवच धारणकर अपना दुर्वह धनुष उठा लिया। शिव और शंखचूड का वह युद्ध पूरे सौ वर्ष तक चलता रहा; न कोई जीतता था, न कोई हारता था। कभी शस्त्र रखकर शिव अपने वृषभ पर विश्राम करने लगते, तो कभी दानव अपने रथ पर।
इसी बीच एक अत्यन्त आतुर, तृषित वृद्ध ब्राह्मण रणभूमि में आ पहुँचा और दानवेश्वर से बोला, “हे राजेन्द्र! इस ब्राह्मण को भिक्षा दीजिए। इस समय आप समस्त सम्पदाओं के दाता हैं; पहले इस निरीह, वृद्ध और प्यासे ब्राह्मण को देने की सत्य-प्रतिज्ञा कीजिए, तब मैं अपनी अभिलाषा कहूँगा।” प्रसन्न मुखवाले शंखचूड ने कहा, “हाँ, ठीक है।” तब उस ब्राह्मणरूपधारी श्रीहरि ने अत्यन्त माया के साथ कहा, “हमें आपका कवच चाहिए।”
कवच, माया और त्रिशूल
वचन से बँधे राजा ने क्षणभर भी न सोचा; अपना कवच उतारकर दे दिया, और श्रीहरि ने उसे ले लिया। फिर वे शंखचूड का ही रूप धरकर उसकी पत्नी तुलसी के पास जा पहुँचे और माया से उस साध्वी के सतीत्व को भंग कर दिया। ठीक उसी घड़ी शंकर ने श्रीहरि का दिया हुआ वह त्रिशूल हाथ में लिया, जो ग्रीष्म के मध्याह्न-सूर्य और प्रलयाग्नि की शिखा के समान तेजवान् था, किसी से भी रोका न जा सकनेवाला, और उसे शंखचूड पर फेंक दिया।
अब सारा रहस्य राजा की समझ में आ गया। उसने अपना धनुष त्याग दिया, बुद्धिपूर्वक योगासन लगाया, और भक्ति के साथ श्रीकृष्ण के चरणकमलों का ध्यान करने लगा। वह त्रिशूल कुछ देर चक्कर काटकर उस पर आ गिरा और रथ सहित उसे भस्म कर गया। तत्क्षण शंखचूड ने किशोर अवस्थावाले दिव्य गोप का वेष धारण किया, हाथ में मुरली ली, और गोलोक से आए रत्नमय विमान पर, करोड़ों गोपों से घिरकर गोलोक चला गया। वहाँ वृन्दावन के रासमण्डल में विराजमान श्रीकृष्ण और राधा के चरणकमलों में उसने मस्तक झुकाया; उस सुदामा गोप को देखकर दोनों के मुख खिल उठे और उन्होंने बड़े प्रेम से उसे अपनी गोद में बैठा लिया। शंखचूड की हड्डियों से शंख की जाति उत्पन्न हुई, जिसका जल तीर्थजल के समान पवित्र माना गया, और जहाँ शंख का नाद होता है वहाँ लक्ष्मी स्थिर होकर निवास करती हैं। दानव को मारकर शिव अपने गणों के साथ शिवलोक लौट गए, देवताओं ने अपना राज्य फिर पा लिया, और आकाश से उन पर पुष्प-वृष्टि होने लगी।
ठगी गई तुलसी का शाप
उधर शंखचूड के रूप में श्रीहरि ने तुलसी के द्वार पर दुन्दुभि बजवाई और जयकार लगवाकर उस सुन्दरी को यह जताया कि उसका पति विजयी होकर लौट आया है। साध्वी तुलसी परम आनन्दित होकर खिड़की से राजमार्ग की ओर देखने लगी; ब्राह्मणों को दान दिया, मंगलाचार कराया, और अपने कान्तिमान् पति को सामने पाकर उसका चरण धोया, प्रणाम किया, और भावविह्वल होकर रो पड़ी। किन्तु जब वे उसके साथ विहार करने लगे, तब उस सती ने अपने मन में सब कुछ भाँप लिया और पूछ बैठी, “आप कौन हैं? आपने छल से मेरा सतीत्व नष्ट किया है; इसलिए मैं आपको शाप देती हूँ।”
शाप के भय से भगवान् ने लीलापूर्वक अपना मनोहर विष्णुरूप प्रकट कर दिया। नवीन मेघ-सा श्याम वर्ण, शरत्कालीन कमल-से नेत्र, पीताम्बर और रत्नमय आभूषणों से सजे उस सनातन देवाधिदेव को सामने देखकर तुलसी क्षणभर मूर्च्छित हो गई। चेतना लौटी तो शोक से भरकर बोली, “हे नाथ! आप पाषाण के समान हैं, आप में दया नहीं। आपने छल से मेरा धर्म नष्ट किया और मेरे स्वामी को मार डाला। आप पाषाण-हृदय और दयाहीन हैं; इसलिए, हे देव, आप इसी क्षण इस लोक में पाषाणरूप हो जाइए। जो आपको साधु कहते हैं, वे भ्रम में पड़े हैं। दूसरे का हित साधने के लिए आपने अपने ही भक्त को क्यों मार डाला?” यह कहकर वह बार-बार विलाप करने लगी।
गण्डकी, तुलसी और शालग्राम
तब करुणा के सागर श्रीहरि ने उसकी दशा देखकर नीतियुक्त वचनों से समझाया, “हे भद्रे! आपने भारत में रहकर बहुत समय तक मेरे लिए तप किया है, और शंखचूड ने भी आपको पाने के लिए दीर्घकाल तप किया था; पति-रूप में आपको पाकर उसने अपने तप का फल भोगा। अब आपके तप का फल देना उचित है। इस शरीर को छोड़कर दिव्य देह धारण कीजिए, और लक्ष्मी के समान होकर मेरे साथ आनन्द कीजिए। आपका यह शरीर गण्डकी नदी के रूप में प्रसिद्ध होगा, जो भारतवर्ष के मनुष्यों को उत्तम पुण्य देगी; आपके केश से उत्पन्न वृक्ष तुलसी नाम से विख्यात होगा, और तीनों लोकों की देवपूजा में समस्त पत्रों तथा पुष्पों में तुलसी ही प्रधान मानी जाएगी। स्वर्ग, मर्त्य, पाताल और गोलोक, सर्वत्र आप मेरे सन्निकट रहेंगी।”
“और मैं भी,” उन्होंने कहा, “आपके शाप से पाषाण बनकर भारतवर्ष में गण्डकी के तट पर निवास करूँगा। वहाँ रहनेवाले करोड़ों कीट अपने तीक्ष्ण दाँतों से उस शिला को काट-काटकर उसमें मेरे चक्र का चिह्न बनाएँगे।” जिस शिला में एक द्वार, चार चक्र और वनमाला की रेखा हो, वह लक्ष्मीनारायण कहलाएगी; कहीं वामन, कहीं श्रीधर, कहीं दामोदर, तो कहीं रघुनाथ; चक्रों की संख्या और चिह्नों के भेद से वही एक पाषाण अनेक नामोंवाला हो जाएगा। एक तुलसीदल जो सन्तोष श्रीहरि को देता है, वह सहस्रों अमृत-कलशों से भी दुर्लभ है, और मृत्यु के समय जिसके मुख में तुलसी-जल की एक बूँद पहुँच जाए, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक पा लेता है।
तुलसी के हृदय में अपने पति शंखचूड का शोक जानकर श्रीहरि ने और कहा, “जो एक बार भी किसी के साथ एकान्तवास कर लेता है, वियोग में दोनों को दुःख होता है; आप तो एक मन्वन्तर तक शंखचूड की भार्या रह चुकी हैं, अतः उसका वियोग आपको पीड़ा देगा ही।” इतना कहकर वे मौन हो गए। तब तुलसी अपना वह शरीर त्यागकर, दिव्य रूप धारणकर, लक्ष्मी की भाँति श्रीहरि के वक्षःस्थल पर सुशोभित होने लगी, और लक्ष्मीपति उसे साथ लेकर वैकुण्ठ चले गए। इस प्रकार लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी, ये चारों देवियाँ भगवान् श्रीहरि की पत्नियाँ हुईं। उसी क्षण तुलसी के शरीर से गण्डकी नदी प्रकट हुई, और भगवान् श्रीहरि उसी के तट पर मनुष्यों के लिए पुण्यप्रद शालग्राम बन गए।
यही तुलसी, शंखचूड और शालग्राम की कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी आती है, किन्तु यहाँ हमने श्रीमद्देवीभागवत का अपना ही वर्णन कहा है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)