बदरीवन की शान्त छाया में देवर्षि नारद हाथ जोड़े बैठे थे और उनके सम्मुख विराजमान थे भगवान् श्रीनारायण। नारद के मन में जिज्ञासा उठी कि यह भूमण्डल कैसा है, इसके द्वीप और वर्ष किस भाँति सजे हैं। श्रीनारायण मन्द-मन्द मुसकराए और बोले, “सुनिए देवर्षि, देवताओं ने इस सम्पूर्ण भूमण्डल का जैसा विस्तार रचा है, वह मैं संक्षेप में आपसे कहता हूँ।”
बहुत पहले की बात है। स्वायम्भुव मनु के पुत्र महाराज प्रियव्रत ने देखा कि सूर्य जब पृथ्वी के एक ही भाग में चमकते हैं तो दूसरा भाग अन्धकार में डूब जाता है। यह सोचकर कि उनके शासन में पृथ्वी पर अँधेरा कैसा, वे सूर्य के समान तेजवाले रथ पर चढ़े और लोक को प्रकाशित करते हुए पृथ्वी की सात प्रदक्षिणाएँ कीं। उनके रथ के पहिये जहाँ-जहाँ धँसे, वे लीकें लोकहित के लिए सात समुद्र बन गईं, और बीच के स्थल सात द्वीपों के रूप में उभर आए। जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप; इन सबको घेरे खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, दही और शुद्ध जल के सात समुद्र लहराने लगे। प्रत्येक द्वीप अपने से पहले वाले से दुगुना बड़ा। इन्हीं सात द्वीपों को अपने सात पुत्रों में बाँटकर प्रियव्रत विवेकी होकर योग के मार्ग पर चल पड़े।
कमल की कर्णिका पर सोने का सुमेरु
इन सबमें पहला जम्बूद्वीप खारे समुद्र से घिरा है, एक लाख योजन के विस्तार वाला, ठीक कमल की भाँति गोल। इसके भीतर नौ वर्ष हैं, जो आठ विशाल पर्वतों से भली-भाँति बँटे हुए हैं। और इसके ठीक बीचोंबीच, कमल की कर्णिका के समान, सुवर्णमय सुमेरु पर्वतराज खड़ा है। यह एक लाख योजन ऊँचा है; इसका शिखर बत्तीस हजार योजन में फैला है और मूल सोलह हजार योजन पृथ्वी पर तथा उतना ही भीतर धँसा हुआ है। इसी सुमेरु को घेरे हुए जो चौकोर वर्ष है, वही इलावृत कहलाता है।
सीमा के पर्वत और सुमेरु के चरण
इलावृत के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगवान नामक तीन पर्वत रम्यक, हिरण्मय और कुरु वर्षों की सीमा बाँधते हैं। दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमालय, हरिवर्ष, किंपुरुष और भारतवर्ष की मर्यादा हैं। पश्चिम में माल्यवान् और पूर्व में गन्धमादन पर्वत केतुमाल और भद्राश्व वर्षों की सीमा निश्चित करते हैं। सुमेरु के चारों चरणों के समान मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्श्व और कुमुद नामक चार पर्वत, प्रत्येक दस हजार योजन ऊँचे, उसे चारों दिशाओं में सहारा दिए खड़े हैं। इन चारों पर ध्वजा के समान चार विशाल वृक्ष शोभित हैं; मन्दर पर आम, मेरुमन्दर पर जामुन, सुपार्श्व पर कदम्ब और कुमुद पर बरगद, प्रत्येक ग्यारह सौ योजन ऊँचा। इन्हीं पर्वतों पर दूध, मधु, ईख के रस और मीठे जल से भरे चार सरोवर और नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राज तथा सर्वभद्र नामक चार दिव्य उपवन हैं, जहाँ देवगण सुन्दरियों के साथ स्वच्छन्द विहार करते हैं।
चार वृक्ष, चार धाराएँ, चार देवियाँ
अब उन वृक्षों से बहती धाराओं की सुनिए। मन्दराचल के उस ऊँचे आम्रवृक्ष के फल गिरकर फूटते हैं, तो उनके लाल और स्वादिष्ट रस से ‘अरुणोदा’ नदी बन जाती है, जो इलावृत के पूर्व भाग में बहती है; उसी पर्वत पर पापनाशिनी भगवती अरुणा विराजती हैं, जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्त कल्याण और आरोग्य पा लेते हैं। मेरुमन्दर से हाथी के समान विशाल जम्बू-फल फूटते हैं और उनके रस से ‘जम्बू’ नदी दक्षिण की ओर बहती है; इसके स्वाद से सन्तुष्ट भगवती जम्ब्वादिनी कहलाती हैं। इसी नदी के तट की मिट्टी रस से सिंचकर, सूर्य और वायु के संस्पर्श से जाम्बूनद नामक सुवर्ण बन जाती है, जिससे देवताओं और विद्याधरों की स्त्रियों के आभूषण बनते हैं। सुपार्श्व पर्वत के महाकदम्ब की कोटरों से पाँच मधुधाराएँ फूटती हैं और पश्चिम की ओर बहती हैं; वहाँ भक्तों का काम सिद्ध करने वाली महादेवी धारेश्वरी वास करती हैं। और कुमुद पर्वत पर ‘शतबल’ नामक विशाल वट है, जिसकी शाखाओं से दूध, दही, मधु, घी, गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या और आभूषण तक की धाराएँ नीचे उत्तर दिशा की ओर बहती हैं; वहाँ देव और दानव दोनों से पूजित भगवती मीनाक्षी प्रतिष्ठित हैं। इन धाराओं का जल पीने वाले प्राणियों के शरीर पर न कभी झुर्रियाँ पड़ती हैं, न केश श्वेत होते हैं; वहाँ थकान, दुर्गन्ध, जरा, रोग, भय और मृत्यु का नाम भी नहीं, और जीवनभर सुख निरन्तर बढ़ता ही रहता है।
सुमेरु के शिखर पर ब्रह्मा की पुरी
सुमेरु के मूल को केसर की भाँति घेरे बीस और पर्वत हैं; शृण्वत, कुरंग, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, निषध, कपिल, शंख, वैदूर्य, हंस, ऋषभ, नाग और नारद उनमें प्रमुख हैं। सुमेरु स्वयं जठर, देवकूट, पवमान, पारियात्र, कैलास, करवीर, त्रिशृंग और मकर नामक आठ महापर्वतों से चारों ओर घिरा हुआ, सूर्य की भाँति सदा प्रकाशमान रहता है। और इसके शिखर पर, ठीक मध्य में, कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी की सुवर्णमयी चौकोर पुरी दस हजार योजन में फैली है। उसके चारों ओर लोकपालों की पुरियाँ दिशा और रूप के अनुसार बसी हैं; इन्द्र की अमरावती, अग्नि की तेजोवती, यम की संयमनी, वायु की श्रद्धावती और कुबेर की गन्धवती जैसी वे नौ पुरियाँ ढाई-ढाई हजार योजन में सजी हैं।
विष्णु के चरण से गंगा का उतरना
अब सुनिए, हे नारद, गंगा के अवतरण की कथा। यज्ञमूर्ति सर्वव्यापी भगवान् विष्णु के बाएँ पैर के अँगूठे के नख के आघात से ब्रह्माण्ड के ऊपरी भाग में एक छिद्र हो गया, और उसी छिद्र के बीच से गंगा प्रकट हुईं। सम्पूर्ण प्राणियों के पापों को धोने वाले जल से भरी वे गंगा संसार में साक्षात् विष्णुपदी नाम से विख्यात हुईं। हजार युगों का अत्यन्त दीर्घ समय बीतने पर, समस्त देवनदियों की स्वामिनी वे भगवती स्वर्ग के शिखर पर आकर रुक गईं; वह स्थान तीनों लोकों में विष्णुपद कहलाता है। यही वह स्थान है जहाँ उत्तानपाद के पुत्र परम पवित्र ध्रुव, भगवान् के चरणकमलों का पराग सिर पर धारण किए, आज भी अचल पद पर विराजमान हैं। उनकी महिमा जानने वाले सप्तर्षि भी वहीं रहकर उनकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, और सिर पर जटाजूट धारण किए सिद्धगण उस मोक्षस्वरूपिणी धारा में निरन्तर स्नान करते रहते हैं।
वहाँ से चलकर वे गंगा हजारों विमानों से भरे देवमार्ग पर उतरती हैं, चन्द्रमण्डल को आप्लावित करती हुई ब्रह्मलोक में पहुँचती हैं, और वहाँ चार भागों में बँटकर चार नामों से चारों दिशाओं में बह चलती हैं। पहली धारा ‘सीता’ ब्रह्मसदन से गन्धमादन के शिखर पर गिरकर भद्राश्ववर्ष के बीच से पूर्व दिशा में जाती है और खारे समुद्र में मिल जाती है। दूसरी ‘चक्षु’ माल्यवान् के शिखर से निकलकर अत्यन्त वेग से केतुमाल वर्ष होती हुई पश्चिम के सागर में समा जाती है। तीसरी पुण्यमयी ‘अलकनन्दा’ ब्रह्मलोक के दक्षिण से अनेक वनों और शिखरों को लाँघती हुई हेमकूट पर पहुँचती है, फिर भारतवर्ष में उतरकर दक्षिण समुद्र में मिलती है; इसमें स्नान के लिए चलने वाले मनुष्यों को पग-पग पर राजसूय और अश्वमेध का फल भी दुर्लभ नहीं रहता। और चौथी ‘भद्रा’ शृंगवान् से निकलकर उत्तर के कुरुप्रदेशों को तृप्त करती हुई समुद्र में जा मिलती है। इनके सिवा और भी बहुत-से नद-नदियाँ प्रत्येक वर्ष में हैं, जो प्रायः मेरु और मन्दर से ही निकले हैं। इन नौ वर्षों में केवल भारतवर्ष कर्मक्षेत्र कहा गया है; शेष आठ वर्ष तो स्वर्ग का शेष पुण्य भोगने के स्थान हैं। इतना कहकर श्रीनारायण क्षणभर मौन हो गए, और नारद उस भूमण्डल के चित्र को मन-ही-मन निहारते रह गए।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)