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अध्याय 2 (अविरोध) · ब्रह्म सूत्र

ब्रह्म सूत्र · अध्याय 2

अविरोध

वेदान्त के सिद्धान्त में कहीं कोई आन्तरिक विरोध नहीं · 4 पाद, ~159 सूत्र

पढ़ने का समय: लगभग 2 घंटे

इस अध्याय का प्रयोजन

प्रथम अध्याय (समन्वय) में बादरायण ने यह सिद्ध किया कि सम्पूर्ण उपनिषदों का तात्पर्य एक ही ब्रह्म में मिलता है। द्वितीय अध्याय में वे उस सिद्धान्त की दो प्रकार से रक्षा करते हैं।

पहली रक्षा भीतर की है। वेदान्त के सिद्धान्त में कोई आन्तरिक विरोध नहीं रहता। ब्रह्म का निमित्त और उपादान, दोनों कारण होना, जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध, तथा सृष्टि की लीला, यह सब परस्पर संगत बैठता है।

दूसरी रक्षा बाहर की ओर है। सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत और भागवत, इन प्रतिपक्षी दर्शनों के आक्षेपों का शास्त्रोचित खण्डन यहाँ होता है।

पादों का क्रम इस प्रकार है। प्रथम पाद अपने सिद्धान्त की निर्विरोधता पर है। द्वितीय पाद पूरा प्रतिपक्षी दर्शनों के खण्डन पर। तृतीय पाद पंचभूतों तथा जीव की उत्पत्ति पर। और चतुर्थ पाद इन्द्रियों एवं प्राण के निरूपण पर।

पाद 1 · अद्वैत सिद्धान्त की निर्विरोधता

आरम्भ के तेरह सूत्र प्रथम अध्याय में उठे आक्षेपों का अनुसन्धान करते हैं। फिर कारण और कार्य की अनन्यता का मूल सिद्धान्त आता है (2.1.14-20)। तदुपरान्त जीव और ब्रह्म का भेद-प्रश्न (2.1.21-23)। फिर ब्रह्म किस रीति से स्वयं ही विकार को प्राप्त होता है, यह विचार (2.1.24-29)। और अन्त में जगत् की विषमता का वैदिक समाधान (2.1.33-36)।

2.1.1-2.1.2

स्मृत्यनवकाश अधिकरण: सांख्य-स्मृति का निरास

2.1.1स्मृत्यनवकाश-दोष-प्रसङ्ग इति चेन्न अन्य-स्मृत्यनवकाश-दोष-प्रसङ्गात् ॥
2.1.2इतरेषां चानुपलब्धेः ॥

अध्याय का आरम्भ। पूर्वपक्षी सांख्यवादी कहता है, प्रथम अध्याय में आपने प्रधान का खण्डन कर दिया, परन्तु कपिल मुनि की सांख्य-स्मृति प्रमाणभूत शास्त्र है। उसको अवकाश देना आवश्यक है, और प्रधान को कारण न मानने से उस स्मृति को कोई अवकाश नहीं रहता।

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.1 में, यदि आपकी सांख्य-स्मृति को अवकाश देंगे तो मनु-स्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति और गीता जैसी अन्य स्मृतियों को अवकाश न मिलने का दोष आ जाएगा, क्योंकि वे स्मृतियाँ इसका विरोध करती हैं। प्रमाण तो श्रुति है, स्मृति नहीं। सूत्र 2.1.2 में, अन्य प्रमाणों से भी प्रधान की उपलब्धि नहीं होती।

शंकर का आशय यह है कि जहाँ दो स्मृतियाँ विरुद्ध बात कहती हों, वहाँ निर्णायक श्रुति ही है। श्रुति मूल प्रमाण है, स्मृति उसकी अनुगामिनी। जो स्मृति श्रुति के अनुकूल हो, वही ग्राह्य।

संगति यह अधिकरण प्रथम अध्याय के ईक्षत्यधिकरण (1.1.5-11) का अनुसन्धान है।

2.1.3

योग-प्रत्युक्ति अधिकरण: योग-स्मृति का निरास

2.1.3एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥

पतञ्जलि के योगशास्त्र में भी प्रकृति को ही मूल कारण माना गया है। बादरायण कहते हैं, पूर्व सूत्र की युक्ति योग पर भी लागू होती है। “एतेन योगः प्रत्युक्तः,” इसी से योग-स्मृति का भी निरास हो जाता है।

यहाँ “योग” से अभिप्राय पतञ्जलि के योगदर्शन से है, साधारण ध्यानाभ्यास से नहीं। पतञ्जलि ने भी अपनी प्रकृति को अचेतन ही माना है, सांख्य की ही अनुगामी रीति में।

संगति पतञ्जलि योग सूत्र, विशेषतः प्रथम पाद का ईश्वर-प्रणिधान वाला प्रकरण। पतञ्जलि ईश्वर को स्वीकार तो करते हैं, किन्तु उसे प्रकृति का कारण नहीं मानते। बादरायण का खण्डन इसी पक्ष पर है।

2.1.4-2.1.11

विलक्षण अधिकरण: कारण और कार्य भिन्न नहीं

2.1.4न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥
2.1.5दृश्यते तु ॥
2.1.6अभिमानि-व्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥
2.1.7दृश्यते च ॥
2.1.8असदिति चेन्न प्रतिषेध-मात्रत्वात् ॥
2.1.9अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥
2.1.10न तु दृष्टान्त-भावात् ॥
2.1.11स्व-पक्ष-दोषाच्च ॥

सांख्य का आक्षेप है, ब्रह्म चेतन है और जगत् अचेतन। दोनों स्वभाव से विलक्षण हैं। एक चेतन कारण से अचेतन जगत् कैसे निकलेगा?

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.4 में, श्रुति के “तज्जलान्” (छान्दोग्य 3.14.1) वचन से ही यह सिद्ध है कि चेतन से ही यह प्रकट होता है। सूत्र 2.1.5 में, लोक में भी ऐसा देखा जाता है, जैसे चेतन पुरुष से केश और नख जैसे अचेतन पदार्थ उत्पन्न होते हैं। सूत्र 2.1.6 में, जहाँ देवता या अभिमानी का व्यपदेश है, वहाँ विशेष और अनुगति से तात्पर्य समझ में आता है। सूत्र 2.1.7 में, ऐसा भी लोक में दीखता है। सूत्र 2.1.8 में, कोई कहे जगत् असत् है, तो बादरायण निषेध करते हैं, “असत्” शब्द केवल प्रतिषेध-मात्र है, अधिष्ठान से पृथक् सत्ता का निषेध करने की भाषा है। सूत्र 2.1.9 में, प्रलय के समय भी विरोध नहीं रहता। सूत्र 2.1.10 में, दृष्टान्त के बल पर ही यह समझ बनती है। सूत्र 2.1.11 में, स्वपक्ष अर्थात् सांख्य में ही दोष का प्रसंग आता है, क्योंकि सांख्य के मत में भी प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध सिद्ध नहीं हो पाता।

संगति श्वेताश्वतर 4.10 (“मायां तु प्रकृतिं विद्यात्”), जहाँ माया का अधिष्ठान ब्रह्म ही है, तथा तैत्तिरीय 2.1, जहाँ आत्मा से आकाश और आकाश से सब उत्पन्न होता है।

2.1.12

तर्क-अप्रतिष्ठान अधिकरण: तर्क की सीमा

2.1.12तर्काप्रतिष्ठानादपि अन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्ष-प्रसङ्गः ॥

पूर्वपक्ष कहता है, हम केवल तर्क से ही ब्रह्म को कारण सिद्ध कर लेंगे, श्रुति की क्या आवश्यकता? बादरायण उत्तर देते हैं, केवल तर्क का आश्रय लेने में दोष है, “तर्क-अप्रतिष्ठान।” तर्क अनिश्चित रहता है। हर तार्किक कथन के प्रति एक प्रतितर्क सम्भव है। केवल तर्क पर निर्भर रहेंगे तो “अनिर्मोक्ष-प्रसंग,” अर्थात् मुक्ति का कोई निश्चित मार्ग ही स्थिर न होगा।

इसी कारण वेदान्त में परम प्रमाण श्रुति है, तर्क गौण। यही बादरायण की प्रमाण-विषयक स्थिति है। तर्क का कार्य श्रुति-अर्थ के पोषण तक सीमित है, स्वतन्त्र प्रमाण के रूप में नहीं।

2.1.13-2.1.20

अनन्यत्व अधिकरण: कारण और कार्य की अभिन्नता

2.1.13एतेन शिष्टापरिग्रहाऽपि व्याख्याताः ॥
2.1.14भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत्स्याल्लोकवत् ॥
2.1.15तदनन्यत्वमारम्भण-शब्दादिभ्यः ॥
2.1.16भावे चोपलब्धेः ॥
2.1.17सत्त्वाच्चावरस्य ॥
2.1.18असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्य-शेषात् ॥
2.1.19युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥
2.1.20पटवच्च ॥

यह सम्पूर्ण अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकरण है। बादरायण घोषित करते हैं, कारण और कार्य अनन्य हैं, परस्पर अभिन्न। यही अद्वैत सिद्धान्त की नींव है।

सूत्र 2.1.13 में, पूर्वोक्त युक्ति से शिष्ट-अपरिग्रह वाला आक्षेप भी खण्डित हो जाता है। सूत्र 2.1.14 में, कोई कहे कि जीव का भोक्तृत्व ब्रह्म पर भी लागू होगा यदि वे अविभक्त हों, तो उत्तर है, समुद्र और तरंग के समान लोक में भी अभेद के भीतर भेद देखा जाता है। सूत्र 2.1.15 में, “तदनन्यत्व,” अर्थात् कार्य उसी कारण से अनन्य है, यह “आरम्भण” शब्द से सिद्ध होता है (छान्दोग्य 6.1.4, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्”)। यह दिखाता है कि वास्तव में सब कारण-स्वरूप (मिट्टी) ही है, कार्य (घड़ा) केवल नाम-रूप का विकार है।

सूत्र 2.1.16 में, कार्य की उपलब्धि कारण के सद्भाव में ही होती है। सूत्र 2.1.17 में, अवर अर्थात् पश्चात् होने वाले कार्य की सत्ता पूर्व कारण में पहले से रहती है। सूत्र 2.1.18 में, कोई कहे “असत्” का भी व्यपदेश है (तैत्तिरीय 2.7, “असद्वा इदम् अग्र आसीत्”), तो बादरायण कहते हैं, यह “धर्मान्तर” अर्थात् नाम-रूप से रहित अवस्था का वर्णन है, और वाक्य-शेष से यह स्पष्ट है। सूत्र 2.1.19 में, युक्ति और अन्य श्रुति-वचन से भी यही सिद्ध है। सूत्र 2.1.20 में, जैसे वस्त्र में केवल धागे ही हैं, वैसे ही ब्रह्म में ही जगत् है।

संगति छान्दोग्य उपनिषद् 6.1.4-7, जहाँ “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” तथा मिट्टी और घड़े के दृष्टान्त से ही समस्त अद्वैत सिद्धान्त प्रकट होता है।

2.1.21-2.1.23

इतर-व्यपदेश अधिकरण: जीव और ब्रह्म का भेद-प्रश्न

2.1.21इतर-व्यपदेशाद्धिता-करणादि-दोष-प्रसक्तिः ॥
2.1.22अधिकं तु भेद-निर्देशात् ॥
2.1.23अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥

पूर्वपक्ष कहता है, यदि कारण और कार्य अनन्य हैं, तो ब्रह्म और जीव भी अनन्य हुए। तब जीव का दुःख ब्रह्म का भी दुःख होगा, और ब्रह्म जीव का हितकारी नहीं रह जाएगा।

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.22 में, “अधिकं तु,” ब्रह्म जीव से अधिक है, उपनिषदों में भेद का निर्देश स्पष्ट है। ब्रह्म सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ है, जीव परिच्छिन्न। सूत्र 2.1.23 में, जैसे पत्थर आदि के भीतर के सूक्ष्म अंशों को पत्थर का सम्पूर्ण गुण प्राप्त नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म और जीव का भेद उपाधि की दृष्टि से बना रहता है।

शंकर का सिद्धान्त यहाँ यह है, स्वरूप से जीव और ब्रह्म एक हैं, उपाधि से भिन्न। यह स्थल आगे के इस सिद्धान्त का मूल है कि जीव और ब्रह्म स्वरूपतः एक हैं, फिर भी व्यवहार में भिन्न प्रतीत होते हैं।

2.1.24-2.1.25

क्षीरवत् अधिकरण: ब्रह्म स्वयं किस रीति से विकार को प्राप्त होता है

2.1.24उपसंहार-दर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥
2.1.25देवादिवदपि लोके ॥

पूर्वपक्ष कहता है, यदि ब्रह्म स्वयं ही जगत् बनता है, तो उसे साधनों की आवश्यकता होगी, जैसे कुम्हार को मिट्टी, चाक और लाठी चाहिए। ब्रह्म के पास ये साधन कहाँ?

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.24 में, “क्षीरवत्,” जैसे दूध स्वयं ही दही बन जाता है, किसी बाहरी कारण के बिना, वैसे ही ब्रह्म स्वयं विकार को प्राप्त होता है। सूत्र 2.1.25 में, “देवादिवत्,” देवताओं आदि के विषय में भी स्वयं से रचना के दृष्टान्त लोक में देखे जाते हैं।

संगति छान्दोग्य 6.2.3, “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय,” ब्रह्म ने स्वयं ही संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ।

2.1.26-2.1.29

कृत्स्न-प्रसक्ति अधिकरण: क्या समस्त ब्रह्म ही विकार को प्राप्त हो जाता है

2.1.26कृत्स्न-प्रसक्तिर्निरवयवत्व-शब्द-कोपो वा ॥
2.1.27श्रुतेस्तु शब्द-मूलत्वात् ॥
2.1.28आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥
2.1.29स्व-पक्ष-दोषाच्च ॥

पूर्वपक्ष कहता है, यदि ब्रह्म जगत् बनता है, तो क्या समस्त ब्रह्म ही विकार को प्राप्त हो गया, या केवल अंश? यदि समस्त, तो ब्रह्म शेष नहीं रहा। यदि अंश, तो ब्रह्म अवयवी अर्थात् भागों वाला हुआ, जो उपनिषद् के “निरवयव” वचन का विरोध करता है।

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.26 में दोनों ही पक्ष दोषयुक्त प्रतीत होते हैं, यह स्वीकार है। सूत्र 2.1.27 में, श्रुति शब्द-मूल है, और श्रुति यही कहती है, अतः हम केवल तर्क के बल पर इसका निर्णय नहीं करते। सूत्र 2.1.28 में, “आत्मनि चैवं विचित्राः,” आत्मा में ही ये सब विचित्र रचनाएँ बिना अवयव-भेद के बैठ जाती हैं, जैसे स्वप्न में बिना पृथक् उपादान के नाना सृष्टि। सूत्र 2.1.29 में, स्वपक्ष में भी यही दोष आता है, अतः यह आक्षेप एकपक्षीय नहीं रहता।

शंकर का विवर्तवाद यहाँ अन्तर्निहित है, ब्रह्म वास्तव में रूपान्तरित नहीं होता, यह सब नाम-रूप की प्रतीति है, मिट्टी के घड़े में मिट्टी ज्यों की त्यों रहती है।

2.1.30-2.1.31

सर्वोपेत अधिकरण: ब्रह्म की शक्ति सर्वव्यापिनी है

2.1.30सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥
2.1.31विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ॥

पूर्वपक्ष कहता है, ब्रह्म के पास इन्द्रिय आदि साधन नहीं हैं, तो वह जगत् कैसे बनाएगा? बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.30 में, ब्रह्म “सर्वोपेत” है, समस्त शक्तियों से युक्त। सूत्र 2.1.31 में, कोई कहे कि ब्रह्म “विकरण” अर्थात् इन्द्रिय-रहित है, तो उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है।

2.1.32-2.1.33

प्रयोजनत्व अधिकरण: ब्रह्म का प्रयोजन क्या है

2.1.32न प्रयोजनत्त्वात् ॥
2.1.33लोकवत्तु लीला-कैवल्यम् ॥

पूर्वपक्ष कहता है, हर क्रिया का कोई प्रयोजन होता है। ब्रह्म ने किस प्रयोजन से जगत् बनाया? यदि कोई कामना है, तो ब्रह्म पूर्ण नहीं रहा। और यदि कोई प्रयोजन ही नहीं, तो वह जगत् क्यों बनाएगा?

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.32 में, ब्रह्म की प्रवृत्ति किसी प्रयोजन से नहीं होती, वह आप्तकाम है। सूत्र 2.1.33 में, “लोकवत् तु लीला-कैवल्यम्,” जैसे लोक में परिपूर्ण और तृप्त पुरुष केवल क्रीड़ा के लिए क्रीड़ा करता है, बिना किसी प्रयोजन के, वैसे ही ब्रह्म की सृष्टि एक लीला है।

यही लीलावाद का मूल है। सृष्टि पूर्णता का स्वाभाविक प्रकाश है, अभाव की पूर्ति का प्रयत्न नहीं।

संगति सौन्दर्य लहरी श्लोक 1, “शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्।” शिव और शक्ति की लीला से ही सब प्रकट होता है।

2.1.34-2.1.36

वैषम्य-नैर्घृण्य अधिकरण: ब्रह्म पर विषमता और निष्ठुरता का दोष

2.1.34वैषम्य-नैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥
2.1.35कर्माविभागादिति चेन्न अनादित्वात् ॥
2.1.36उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥

सबसे मार्मिक आक्षेप यहाँ आता है। कोई सुखी जन्म लेता है, कोई दुःखी, कोई धनवान, कोई निर्धन। यदि ब्रह्म ही सबका कारण है, तो उस पर विषमता और निष्ठुरता का दोष आता है।

बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.1.34 में, ब्रह्म “सापेक्ष” है, अर्थात् जीवों के पूर्वकर्मों की अपेक्षा रखता है। ब्रह्म तटस्थ है, प्रत्येक जीव अपने कर्म के अनुसार फल पाता है, यह श्रुति भी दिखाती है। सूत्र 2.1.35 में, कोई कहे कि प्रथम सृष्टि में तो कर्म थे ही नहीं, तो बादरायण कहते हैं, संसार अनादि है, हर सृष्टि से पूर्व की सृष्टि के कर्म विद्यमान थे। सूत्र 2.1.36 में, श्रुति और स्मृति दोनों इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं।

इस प्रकार कर्म-व्यवस्था से ब्रह्म पर विषमता का दोष नहीं आता। अनादि कर्म ही सुख-दुःख की विषमता का हेतु है, ब्रह्म केवल कर्म के अनुसार फल देने वाला है।

संगति भगवद् गीता अध्याय 9 (“समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः”) तथा कठ 1.2.23 (“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः”)।

2.1.37-2.1.38

सर्व-धर्म-उपपत्ति अधिकरण: उपसंहार

2.1.37सर्व-धर्म-उपपत्तेश्च ॥
2.1.38सर्व-धर्म-उपपत्तेश्च ॥

यह प्रथम पाद का उपसंहार है। सूत्र 2.1.37 में, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता और न्यायशीलता, ये समस्त धर्म ब्रह्म में सुसंगत रूप से बैठ जाते हैं। सूत्र 2.1.38 में, श्रुति का भी यही सिद्धान्त है।

पाद 2 · प्रतिपक्षी दर्शनों का खण्डन

इस पाद का सम्पूर्ण कार्य वाद-विवाद का है। बादरायण सांख्य, वैशेषिक, बौद्धों की दो शाखाएँ, जैन, पाशुपत तथा भागवत-पाञ्चरात्र, इन सब दर्शनों के मूल पक्षों का युक्तिपूर्वक खण्डन करते हैं। यहाँ हर दर्शन एक अधिकरण-समूह के रूप में प्रस्तुत है। ध्यान रहे, यहाँ श्रुति-प्रमाण की चर्चा नहीं, केवल युक्ति से इन मतों की अन्तर्विरोध दिखायी जाती है।

2.2.1-2.2.10

सांख्य-रचना-अनुपपत्ति अधिकरण: अचेतन प्रधान रचना कैसे करेगा

2.2.1रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥
2.2.2प्रवृत्तेश्च ॥
2.2.3पयो-अम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥
2.2.4व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ॥
2.2.5अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥
2.2.6अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥
2.2.7पुरुषाश्मवदितिचेत् तथापि ॥
2.2.8अङ्गित्वानुपपत्तेः ॥
2.2.9अन्यथानुमितौ च ज्ञ-शक्ति-वियोगात् ॥
2.2.10विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥

पाद का आरम्भ। यह समस्त प्रतिपक्षी दर्शनों के विरुद्ध स्थापना है। पहले सांख्य का खण्डन।

सांख्य का दावा है, प्रकृति अर्थात् प्रधान अचेतन होते हुए भी त्रिगुणात्मक है, और तीनों गुणों के वैषम्य से ही जगत् की रचना होती है।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.1 में, “रचना-अनुपपत्ति,” इतनी सुसम्बद्ध रचना अचेतन प्रधान से सिद्ध नहीं होती, अनुमान से प्रधान को कारण मानना नहीं बनता। सूत्र 2.2.2 में, जगत् में जो प्रयोजनयुक्त प्रवृत्ति दीखती है, वह अचेतन प्रधान से सम्भव नहीं। सूत्र 2.2.3 में, कोई कहे जैसे दूध और जल स्वतः परिणाम पाते हैं, तो वहाँ भी अधिष्ठाता चेतन की अपेक्षा रहती ही है। सूत्र 2.2.4 में, बिना चेतन कारण के त्रिगुण का साम्य स्वयं टूटता ही नहीं।

सूत्र 2.2.5 में, अन्यत्र कहीं भी ऐसी सोद्देश्य रचना अचेतन से होती नहीं देखी जाती, तृण आदि का दृष्टान्त भी यहाँ नहीं लगता। सूत्र 2.2.6 में, यदि स्वीकार भी कर लें, तो भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। सूत्र 2.2.7 में, कोई कहे जैसे लोहचुम्बक के समीप लोहा चलता है, या अन्धे और पंगु के दृष्टान्त से, तो वहाँ भी ज्ञान-शक्ति वाला कारण अपेक्षित है। सूत्र 2.2.8 में, प्रधान का अंगित्व सिद्ध नहीं होता। सूत्र 2.2.9 में, अन्य प्रकार से अनुमान करने पर ज्ञान-शक्ति का वियोग हो जाता है। सूत्र 2.2.10 में, आपके मत में परस्पर विरोध है, अतः वह असंगत है।

2.2.11-2.2.17

वैशेषिक-खण्डन: परमाणुओं से जगत् नहीं बनता

2.2.11महद्दीर्घवद्धा ह्रस्व-परिमण्डलाभ्याम् ॥
2.2.12उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥
2.2.13समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥
2.2.14नित्यमेव च भावात् ॥
2.2.15रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥
2.2.16उभयथा च दोषात् ॥
2.2.17अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥

कणाद ऋषि के वैशेषिक दर्शन का मत है, जगत् परमाणुओं से बना है। दो परमाणु मिलकर “द्व्यणुक,” तीन द्व्यणुक मिलकर “त्र्यणुक,” इसी प्रकार बढ़ते-बढ़ते दृश्य पदार्थ बनते हैं।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.11 में, परमाणुओं के संयोग में जब प्रत्येक अणु ह्रस्व और परिमण्डल अर्थात् सूक्ष्म और गोल है, तो उससे महत् और दीर्घ अर्थात् स्थूल और लम्बा पदार्थ बनना सम्भव नहीं, परिमाण के गुण मेल नहीं खाते। सूत्र 2.2.12 में, परमाणुओं में आरम्भ में गति कैसे आएगी, उसका कोई कारण नहीं, अतः कर्म का अभाव है। सूत्र 2.2.13 में, “समवाय” सम्बन्ध मानने से अनवस्था-दोष आता है। सूत्र 2.2.14 में, परमाणु यदि नित्य हैं तो जगत् भी नित्य रहेगा, फिर सृष्टि-प्रलय कैसे? सूत्र 2.2.15 में, परमाणुओं में रूप आदि गुण मानेंगे तो विपर्यय अर्थात् उनकी अनित्यता सिद्ध हो जाएगी, क्योंकि रूपवान पदार्थ अनित्य देखे जाते हैं। सूत्र 2.2.16 में, दोनों ही प्रकार से दोष आता है। सूत्र 2.2.17 में, इस मत को शिष्टजनों ने स्वीकार नहीं किया, अतः यह अत्यन्त अनपेक्षणीय है।

2.2.18-2.2.27

बौद्ध-सर्वास्तिवाद-खण्डन: सब कुछ क्षणिक है

2.2.18समुदायोभय-हेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥
2.2.19इतरेतर-प्रत्ययत्वादिति चेन्नौत्पत्ति-मात्र-निमित्तत्वात् ॥
2.2.20उत्तरोत्पादे च पूर्व-निरोधात् ॥
2.2.21असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥
2.2.22प्रतिसङ्ख्या-प्रतिसङ्ख्या-निरोधाप्राप्तिः अविच्छेदात् ॥
2.2.23उभयथा च दोषात् ॥
2.2.24आकाशे चाविशेषात् ॥
2.2.25अनुस्मृतेश्च ॥
2.2.26नासतोऽदृष्टत्वात् ॥
2.2.27उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥

बौद्धों के सर्वास्तिवाद अर्थात् वैभाषिक और सौत्रान्तिक मत का सिद्धान्त है, सब कुछ क्षणिक है, हर क्षण सब नया है, उत्पाद और निरोध का अविच्छिन्न प्रवाह। और अनात्मवाद, अर्थात् स्थायी आत्मा है ही नहीं।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.18 में, यदि घटक क्षणिक हैं तो उनका “समुदाय” कैसे बनेगा, क्योंकि मिलने से पूर्व ही वे नष्ट हो जाते हैं। सूत्र 2.2.19 में, “इतरेतर-प्रत्ययत्व” अर्थात् प्रतीत्यसमुत्पाद पर उत्तर है, यह केवल एक के बाद दूसरे की उत्पत्ति का निमित्त-मात्र बताता है, सत्ता का सम्बन्ध नहीं। सूत्र 2.2.20 में, अगला उत्पन्न होने से पूर्व ही पिछला निरुद्ध हो जाता है, तो नया किस कारण से उपजेगा। सूत्र 2.2.21 में, यदि दोनों एक साथ हों तो “यौगपद्य” का दोष आता है, और यदि न हों तो प्रतिज्ञा का उपरोध। सूत्र 2.2.22 से 2.2.25 में निरोध की व्यवस्था और आकाश के विवेचन में असंगति दिखायी जाती है। सूत्र 2.2.26 और 2.2.27 में, आत्मा के निषेध पर भी “अनुस्मृति” अर्थात् स्मरण काम करता है, और स्मरण के लिए स्थायी अनुभोक्ता आवश्यक है, जो क्षणिकता का खण्डन कर देता है।

2.2.28-2.2.32

विज्ञानवाद-खण्डन: सब कुछ केवल चेतना है

2.2.28नाभाव उपलब्धेः ॥
2.2.29वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥
2.2.30न भावोऽनुपलब्धेः ॥
2.2.31क्षणिकत्वाच्च ॥
2.2.32सर्वथानुपपत्तेश्च ॥

बौद्धों के विज्ञानवाद अर्थात् योगाचार मत का सिद्धान्त है, बाह्य जगत् है ही नहीं, सब कुछ केवल विज्ञान अर्थात् चित्त की वृत्ति है।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.28 में, बाह्य पदार्थ का अभाव नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। सूत्र 2.2.29 में, “वैधर्म्य,” जाग्रत और स्वप्न के अनुभवों में स्पष्ट भेद है, स्वप्न जागने पर बाधित हो जाता है, जाग्रत अनुभव बाधित नहीं होता। सूत्र 2.2.30 में, बाह्य विषय के बिना ज्ञान का अस्तित्व ही उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि ज्ञान सदा किसी विषय का होता है। सूत्र 2.2.31 में, क्षणिकत्व का दोष पहले ही दिखाया जा चुका है। सूत्र 2.2.32 में, यह मत हर प्रकार से असंगत सिद्ध होता है।

2.2.33-2.2.36

जैन-खण्डन: सप्तभंगी नय

2.2.33नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥
2.2.34एवं चात्माकार्त्स्न्यम् ॥
2.2.35न च पर्यायादप्यविरोधः विकारादिभ्यः ॥
2.2.36अन्त्यावस्थितेश्चोभय-नित्यत्वाद-विशेषात् ॥

जैन दर्शन का “सप्तभंगी नय” हर वस्तु को सात प्रकार से देखता है। एक ही वस्तु के विषय में कहा जाता है, वह है भी और नहीं भी।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.33 में, एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध धर्म एक साथ सम्भव नहीं। सूत्र 2.2.34 में, इस मत से आत्मा की अकार्त्स्न्य अर्थात् अपूर्णता सिद्ध होती है, क्योंकि जैन आत्मा देह-परिमाण मानने से उसकी व्यापकता नष्ट हो जाती है। सूत्र 2.2.35 में, “पर्याय” अर्थात् क्रमिक परिणाम मानने पर भी विकार आदि के कारण विरोध दूर नहीं होता। सूत्र 2.2.36 में, अन्तिम अवस्था में आत्मा का परिमाण मानने से दोनों ही अवस्थाओं की नित्यता माननी पड़ेगी, और तब कोई विशेष सिद्धि नहीं होती।

2.2.37-2.2.41

पाशुपत-खण्डन: ईश्वर केवल निमित्त कारण नहीं

2.2.37पत्युरसामञ्जस्यात् ॥
2.2.38सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥
2.2.39अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥
2.2.40करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥
2.2.41अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥

पाशुपत दर्शन का मत है, “पति” अर्थात् ईश्वर केवल निमित्त कारण है, उपादान नहीं। प्रकृति अर्थात् “पशु” उससे पृथक् स्वतन्त्र पदार्थ है।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.37 में, इस “पति” की कल्पना में असंगति है। सूत्र 2.2.38 में, ईश्वर और प्रकृति का सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता। सूत्र 2.2.39 में, ईश्वर का अधिष्ठातृत्व भी सिद्ध नहीं होता। सूत्र 2.2.40 में, कोई कहे ईश्वर शरीर आदि करणों के द्वारा कार्य करता है, तो उसे भोग आदि भी प्राप्त होंगे, और ईश्वरत्व नष्ट हो जाएगा। सूत्र 2.2.41 में, इस प्रकार ईश्वर या तो अन्तवान अर्थात् परिच्छिन्न होगा, या असर्वज्ञ।

वेदान्त का सिद्धान्त इससे भिन्न है। ब्रह्म केवल निमित्त नहीं, अपितु निमित्त और उपादान दोनों कारण है, सृष्टि का कर्ता भी और उसका मूल द्रव्य भी।

2.2.42-2.2.45

भागवत-पाञ्चरात्र-खण्डन: चतुर्व्यूह सिद्धान्त

2.2.42उत्पत्त्यसम्भवात् ॥
2.2.43न च कर्तुः करणम् ॥
2.2.44विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥
2.2.45विप्रतिषेधाच्च ॥

भागवत-पाञ्चरात्र मत में वासुदेव से संकर्षण, संकर्षण से प्रद्युम्न, और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध, यह चतुर्व्यूह की उत्पत्ति मानी जाती है।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.2.42 में, संकर्षण आदि की उत्पत्ति सम्भव नहीं, क्योंकि वे जीवस्वरूप हैं और आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती। सूत्र 2.2.43 में, कर्ता से करण की उत्पत्ति नहीं बनती। सूत्र 2.2.44 में, कोई कहे ये ज्ञान आदि ऐश्वर्य के अंश हैं, तो इतने अंश में उपनिषद् से विरोध नहीं। सूत्र 2.2.45 में, इस व्यूह-व्यवस्था में परस्पर विरोध है।

संगति शंकर के मत में भी विष्णु ब्रह्मरूप से स्वीकृत हैं, यह खण्डन केवल पाञ्चरात्र की व्यूह-कल्पना की तार्किक असंगति पर है, भगवद्भक्ति पर नहीं।

पाद 3 · पंचभूत और जीव की उत्पत्ति

आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, ये सब क्रमशः ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं। यह तैत्तिरीय 2.1.1 का मूल क्रम है। तदुपरान्त जीव की अनुत्पत्ति, जीव का ज्ञानस्वभाव, जीव का कर्तृत्व, और जीव का ब्रह्म का अंश होना, इनका निरूपण है।

2.3.1-2.3.7

आकाश-उत्पत्ति अधिकरण: आकाश का मूल ब्रह्म है

2.3.1न वियदश्रुतेः ॥
2.3.2अस्ति तु ॥
2.3.3गौण्यसम्भवात् ॥
2.3.4शब्दाच्च ॥
2.3.5स्याच्चैकस्य ब्रह्म-शब्दवत् ॥
2.3.6प्रतिज्ञा-हानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥
2.3.7यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥

पाद का आरम्भ। यहाँ बादरायण आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, इन तत्त्वों की ब्रह्म से उत्पत्ति का विचार करते हैं।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.3.1 में पूर्वपक्ष कहता है, आकाश ब्रह्म से उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि कहीं श्रुति में इसका श्रवण नहीं। सूत्र 2.3.2 में, “अस्ति तु,” किन्तु आकाश की उत्पत्ति है ही। सूत्र 2.3.3 में, “गौण्यसम्भव,” यदि कहीं आकाश को नित्य कहा गया है तो वह गौण अर्थ में है। सूत्र 2.3.4 में, “शब्दात्,” तैत्तिरीय 2.1.1 साक्षात् कहता है, “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।” सूत्र 2.3.5 में, यह एक ही ब्रह्म का वचन है, जैसे “ब्रह्म” शब्द एक ही अर्थ रखता है। सूत्र 2.3.6 में, अन्यथा “एकविज्ञानेन सर्वविज्ञान” की प्रतिज्ञा की हानि होगी। सूत्र 2.3.7 में, “यावद्विकारम्,” जब तक विकार है तब तक विभाग है, लोक के समान।

संगति तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1.1, जहाँ ब्रह्म से पंचभूतों की उत्पत्ति का क्रम वर्णित है।

2.3.8

मातरिश्वा अधिकरण: वायु

2.3.8एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥

पूर्व अधिकरण की युक्ति वायु पर भी लागू होती है। “मातरिश्वा” अर्थात् वायु, यह उसका प्राचीन वैदिक नाम है। वायु भी आकाश से और अन्ततः ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है।

2.3.9

सत् से सत् की उत्पत्ति नहीं अधिकरण

2.3.9असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥

पूर्वपक्ष कहता है, क्या स्वयं ब्रह्म भी किसी से उत्पन्न हुआ? बादरायण कहते हैं, “असम्भव,” ब्रह्म की उत्पत्ति असम्भव है, क्योंकि ब्रह्म साक्षात् सत् है, और सत् की किसी पूर्व कारण से उत्पत्ति नहीं बनती।

यह ब्रह्म के स्वयं-सिद्ध, अनुत्पन्न होने का प्रमाण है। ब्रह्म अपना ही आधार है।

2.3.10

तेजः अधिकरण: अग्नि भी ब्रह्म से

2.3.10तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥

“तेजः” अर्थात् अग्नि-तत्त्व। उपनिषद् सीधा कहती है, “तस्मादेव वायोरग्निः” (तैत्तिरीय 2.1.1), उसी वायु से अग्नि उत्पन्न हुई।

2.3.11

आपः अधिकरण: जल

2.3.11आपः ॥

जल भी अग्नि से उत्पन्न होता है, और अन्तिम मूल ब्रह्म ही है।

2.3.12

पृथिवी अधिकरण: पृथ्वी

2.3.12पृथिव्यधिकार-रूप-शब्दान्तरादिभ्यः ॥

पृथ्वी भी इसी क्रम में जल से उत्पन्न होती है। पंचभूतों का क्रम इस प्रकार है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, और जल से पृथ्वी। यही तैत्तिरीय का मूल वचन है।

2.3.13

ब्रह्म समस्त क्रम में कारण अधिकरण

2.3.13तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॥

प्रत्येक चरण पर ब्रह्म के “अभिध्यान” अर्थात् संकल्प से ही सृष्टि प्रवृत्त होती है। समस्त क्रम में ब्रह्म ही अधिष्ठानभूत द्रव्य है।

2.3.14

क्रम-विपर्यय अधिकरण: प्रलय का क्रम उल्टा

2.3.14विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥

सृष्टि का क्रम आकाश से पृथ्वी तक है, और प्रलय का क्रम इससे उल्टा, पृथ्वी से आकाश तक। जो भूत पीछे उत्पन्न हुआ, वही प्रलय में पहले अपने कारण में लीन होता है। यह स्वाभाविक सुसंगति है।

2.3.15

मन और इन्द्रिय का क्रम अधिकरण

2.3.15अन्तरा विज्ञान-मनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥

पूर्वपक्ष कहता है, विज्ञान और मन भी इसी भूत-क्रम के बीच आते हैं? बादरायण कहते हैं, “अविशेष,” इनकी अलग गणना से कोई भेद नहीं पड़ता, ये भी अपने उपादान-भूतों के साथ ही उत्पन्न होते हैं।

2.3.16-2.3.17

जीव-उत्पत्ति-निषेध अधिकरण: जीव अनुत्पन्न है

2.3.16चराचर-व्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तः तद्भाव-भावित्वात् ॥
2.3.17नात्मा अश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥

जीवात्मा उत्पन्न नहीं होता। सूत्र 2.3.16 में, जो जन्म-मरण का व्यपदेश दीखता है, वह “चराचर-व्यपाश्रय” अर्थात् देह से सम्बद्ध है, और गौण है। सूत्र 2.3.17 में, श्रुति में आत्मा की उत्पत्ति का कथन नहीं है, अपितु उसके नित्यत्व का वचन है।

संगति भगवद् गीता 2.20, “न जायते म्रियते वा कदाचित्,” आत्मा न जन्म लेती है न मरती है।

2.3.18

ज्ञ अधिकरण: जीव चेतन है

2.3.18ज्ञोऽत एव ॥

जीव “ज्ञ” अर्थात् ज्ञाता है, चेतन-स्वभाव है। यह वैशेषिक के मत का खण्डन है, जो आत्मा को स्वभाव से अचेतन मानते हैं और चेतना को आत्मा और मन के संयोग का गुण कहते हैं।

2.3.19

युक्ति अधिकरण

2.3.19युक्तेश्च ॥

युक्ति से भी जीव का चेतन-स्वभाव सिद्ध होता है।

2.3.20-2.3.21

उत्क्रान्ति-गति अधिकरण: मरण के समय

2.3.20उत्क्रान्ति-गत्यागतीनाम् ॥
2.3.21स्वात्मना चोत्तरयोः ॥

मरण के समय “उत्क्रान्ति” अर्थात् देह से निकलना, “गति” अर्थात् परलोक को जाना, और “आगति” अर्थात् लौट आना, यह सब जीव में घटित होता है, ऐसा उपनिषद् वर्णन करते हैं। गति और आगति में जीव अपने ही स्वरूप से जाता और लौटता है।

संगति छान्दोग्य 5.10 (पंचाग्निविद्या) तथा बृहदारण्यक 4.4 (मरण-काल का वर्णन)।

2.3.22-2.3.29

जीव का परिमाण अधिकरण: अणु या व्यापक

2.3.22नाणुरतत् श्रुतेरिति चेन्न इतराधिकारात् ॥
2.3.23स्व-शब्दोन्मानाभ्यां च ॥
2.3.24अविरोधश्चन्दनवत् ॥
2.3.25अवस्थिति-वैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृद्धि हि ॥
2.3.26गुणाद्वाऽऽलोकवत् ॥
2.3.27व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ॥
2.3.28पृथगुपदेशात् ॥
2.3.29तद्गुण-सारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥

जीव का परिमाण क्या है, अणु अर्थात् सूक्ष्म, या व्यापक? यह एक पुराना विवाद है। शंकर का सिद्धान्त यह है, स्वरूप से जीव व्यापक और ब्रह्म-अभिन्न है, परन्तु उपाधि की दृष्टि से अणुवत् प्रतीत होता है।

बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.3.22 में, “तत्त्वमसि” आदि जो ब्रह्म-ऐक्य के वचन हैं वे “इतर-अधिकार” अर्थात् मुक्त जीव के प्रसंग में हैं, बद्ध जीव अणुवत् कहा गया है। सूत्र 2.3.23 में, श्रुति-शब्द और परिमाण के उपमान, दोनों से अणुत्व जाना जाता है। सूत्र 2.3.24 में, “चन्दनवत्,” जैसे चन्दन का लेप शरीर के एक भाग पर लगता है पर उसकी शीतलता समस्त देह में अनुभव होती है, वैसे ही जीव एक स्थान पर रहकर भी अपने गुण चैतन्य से समस्त देह में व्याप्त होता है। सूत्र 2.3.25 से 2.3.29 में इस विषय की अनेक उप-आक्षेपों का समाधान है।

2.3.30-2.3.32

जीव-गुण-धर्म अधिकरण

2.3.30यावदात्म-भावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥
2.3.31पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्ति-योगात् ॥
2.3.32नित्योपलब्ध्यनुपलब्धि-प्रसङ्गोऽन्यतर-नियमो वाऽन्यथा ॥

सूत्र 2.3.30 में, “यावदात्म-भावित्व,” जीव के साथ उपाधि अर्थात् देह और इन्द्रियाँ जब तक संसार है तब तक रहती हैं, अतः कोई दोष नहीं। सूत्र 2.3.31 में, “पुंस्त्वादिवत्,” जैसे पुरुषत्व आदि गुण सत्ता में रहते हुए भी यथासमय अभिव्यक्त होते हैं, वैसे ही जीव के गुण। सूत्र 2.3.32 में, कोई कहे चैतन्य की सदा उपलब्धि या सदा अनुपलब्धि का प्रसंग आएगा, तो उत्तर है, यह “अन्यतर-नियम” से व्यवस्थित है।

2.3.33-2.3.39

कर्ता अधिकरण: जीव कर्ता है

2.3.33कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥
2.3.34विहारोपदेशात् ॥
2.3.35उपादानात् ॥
2.3.36व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देश-विपर्ययः ॥
2.3.37उपलब्धिवदनियमः ॥
2.3.38शक्ति-विपर्ययात् ॥
2.3.39समाध्यभावाछ ॥

जीव कर्ता है, अर्थात् अपने कर्मों का करने वाला। बादरायण क्रमशः उत्तर देते हैं। सूत्र 2.3.33 में, शास्त्र अर्थात् विधि-निषेध का अर्थ तभी बनता है जब कोई कर्ता हो। सूत्र 2.3.34 में, “विहार” अर्थात् व्यवहार का उपदेश इसी पर निर्भर है। सूत्र 2.3.35 में, “उपादान,” साधनों का ग्रहण कर्ता ही करता है। सूत्र 2.3.36 में, क्रिया में जीव का कर्ता-रूप से व्यपदेश है। सूत्र 2.3.37 में, उपलब्धि की भाँति यह नियत नहीं। सूत्र 2.3.38 में, शक्ति के भेद से। सूत्र 2.3.39 में, ध्यान और समाधि का विधान भी इसी कर्तृत्व के कारण सम्भव होता है।

2.3.40

तक्ष अधिकरण

2.3.40यथा च तक्षोभयथा ॥

बढ़ई के दृष्टान्त से, जैसे बढ़ई के पास उपकरण भी हैं और स्वयं उसके अपने अंग भी, और वह दोनों से कार्य करता है, वैसे ही जीव अपने करणों के सहित कर्म का कर्ता है।

2.3.41-2.3.42

पराधीन अधिकरण: जीव की कर्तृशक्ति ब्रह्म के अधीन

2.3.41परात्तु तच्छ्रुतेः ॥
2.3.42कृत-प्रयत्नोपेक्षस्तु विहित-प्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥

जीव कर्ता है, किन्तु “पर” अर्थात् ब्रह्म के अधीन। सूत्र 2.3.41 में, “परात्,” जीव को कर्तृत्व का अधिकार ब्रह्म से प्राप्त होता है, ऐसा श्रुति कहती है। सूत्र 2.3.42 में, “कृत-प्रयत्न-उपेक्ष,” ब्रह्म जीव के किए हुए प्रयत्न और कर्म की अपेक्षा रखकर उसी अनुसार फल देता है। इसी से विहित और प्रतिषिद्ध कर्म की व्यवस्था सार्थक रहती है।

2.3.43-2.3.50

अंश अधिकरण: जीव ब्रह्म का अंश है

2.3.43अंशो नाना-व्यपदेशादन्यथा चापि दाश-कितवादित्वमधीयत एके ॥
2.3.44मन्त्र-वर्णात् ॥
2.3.45अपि स्मर्यते ॥
2.3.46प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥
2.3.47स्मरन्ति च ॥
2.3.48अनुज्ञा-परिहारौ देह-सम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॥
2.3.49असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥
2.3.50आभास एव च ॥

जीव ब्रह्म का अंश है। सूत्र 2.3.43 में, श्रुति में कहीं भेद और कहीं अभेद का वचन मिलता है, इसका समाधान “अंश” शब्द से होता है। कुछ शाखाएँ जीव को “दाश” अर्थात् मछुआरा या “कितव” अर्थात् जुआरी भी कहती हैं, यह उपाधि के प्रसंग में।

सूत्र 2.3.44 में, “मन्त्र-वर्ण” से (पुरुषसूक्त, “पादोऽस्य विश्वा भूतानि”), समस्त जगत् ब्रह्म का एक चरण-मात्र है। सूत्र 2.3.45 में, स्मृति से भी यह पुष्ट होता है (गीता 15.7, “ममैवांशो जीवलोके”)। सूत्र 2.3.46 में, परन्तु ब्रह्म इस प्रकार जीव के दुःख से लिप्त नहीं होता, जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल के विकार से सूर्य को नहीं छूता। सूत्र 2.3.47 में, यही अन्य स्मृतियाँ भी कहती हैं। सूत्र 2.3.48 में, विधि और निषेध का व्यवहार देह-सम्बन्ध के कारण है, जैसे आग और ज्योति आदि में। सूत्र 2.3.49 में, इस कारण जीवों के सुख-दुःख का परस्पर मिश्रण नहीं होता। सूत्र 2.3.50 में, जीव ब्रह्म का “आभास” अर्थात् प्रतिबिम्ब है, जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब।

संगति भगवद् गीता 15.7, “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।”

2.3.51-2.3.53

अदृष्ट-नियम अधिकरण: उपसंहार

2.3.51अदृष्टानियमात् ॥
2.3.52अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥
2.3.53प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥

प्रत्येक जीव का अनुभव उसके अपने अदृष्ट अर्थात् कर्म-संचय से नियमित होता है। सूत्र 2.3.51 में, अदृष्ट का नियम। सूत्र 2.3.52 में, संकल्प आदि में भी ऐसा ही। सूत्र 2.3.53 में, स्थान के भेद से जीवों में भेद नहीं आता, क्योंकि सब ब्रह्म में अन्तर्भूत हैं।

पाद 4 · इन्द्रियाँ और प्राण

ग्यारह इन्द्रियाँ, अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन, तथा मुख्य प्राण, ये सब ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं। पाँच वृत्तियाँ हैं, प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। प्रत्येक इन्द्रिय की अधिष्ठात्री देवता है। और त्रिवृत्करण का सिद्धान्त। यह पाद अपेक्षाकृत छोटा है।

2.4.1-2.4.4

प्राण-उत्पत्ति अधिकरण: इन्द्रियों का मूल

2.4.1तथा प्राणाः ॥
2.4.2गौण्यसम्भवात् ॥
2.4.3प्रतिज्ञानुपरोधाच्च ॥
2.4.4तत्प्राक्श्रुतेश्च ॥

पाद का आरम्भ। यहाँ “प्राण” शब्द से ग्यारह इन्द्रियाँ, अर्थात् पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन, तथा एक मुख्य प्राण समझा जाता है।

सूत्र 2.4.1 में, आकाश आदि की भाँति प्राण अर्थात् इन्द्रियाँ भी ब्रह्म से उत्पन्न होती हैं। सूत्र 2.4.2 में, कोई इन्हें नित्य कहे, तो वह गौण अर्थ में है, अथवा कारण में पहले से सत्तावान होने के कारण। सूत्र 2.4.3 में, इससे “एकविज्ञानेन सर्वविज्ञान” की प्रतिज्ञा का अनुरोध बना रहता है। सूत्र 2.4.4 में, पूर्व उद्धृत श्रुति से भी यही सिद्ध है।

2.4.5

वाक्-इन्द्रिय अधिकरण

2.4.5तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥

वाक्-इन्द्रिय भी ब्रह्म से, अग्नि के माध्यम से उत्पन्न होती है। “तत्-पूर्वकत्व,” अर्थात् कारण की पूर्वता से।

2.4.6

सप्त-प्राण अधिकरण

2.4.6सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥

मुण्डक 2.1.8 में “सप्त प्राण” कहे गए हैं, अर्थात् सात इन्द्रियाँ। शेष इन्द्रियाँ इसी में अन्तर्भूत समझी जाती हैं।

2.4.7

हस्तादि अधिकरण: कर्मेन्द्रियाँ

2.4.7हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥

हाथ, पैर, वाक्, गुदा और उपस्थ, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये भी ब्रह्म से ही उत्पन्न होती हैं।

2.4.8

अणुत्व अधिकरण: इन्द्रियाँ सूक्ष्म

2.4.8अणवश्च ॥

इन्द्रियाँ “अणु” अर्थात् सूक्ष्म हैं, सूक्ष्म-शरीर का अंग।

2.4.9

श्रेष्ठ-प्राण अधिकरण: मुख्य प्राण

2.4.9श्रेष्ठश्च ॥

मुख्य प्राण अर्थात् प्राणवायु “श्रेष्ठ” है, समस्त इन्द्रियों का अधिनायक। यह भी ब्रह्म से उत्पन्न होता है।

2.4.10-2.4.12

मुख्य प्राण और वायु अधिकरण

2.4.10न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥
2.4.11चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥
2.4.12अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥

पूर्वपक्ष कहता है, मुख्य प्राण वस्तुतः वायु-तत्त्व ही है, फिर इसका पृथक् उपदेश क्यों? बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.4.10 में, उपनिषद् में इसका वायु से पृथक् उपदेश है। सूत्र 2.4.11 में, चक्षु आदि की भाँति, साथ-साथ उल्लिखित होने से यह वायु से अभिन्न नहीं हो जाता। सूत्र 2.4.12 में, “अकरणत्व,” मुख्य प्राण कोई इन्द्रिय नहीं, अतः कोई दोष नहीं।

2.4.13-2.4.14

पञ्च-वृत्ति अधिकरण: पाँच वृत्तियाँ

2.4.13पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॥
2.4.14अणुश्च ॥

मुख्य प्राण की पाँच वृत्तियाँ हैं, प्राण अर्थात् श्वास का ग्रहण, अपान अर्थात् मल-निष्कासन, समान अर्थात् पाचन, उदान अर्थात् ऊर्ध्वगमन, और व्यान अर्थात् सर्वशरीर-संचरण। सूत्र 2.4.14 में ये भी “अणु” अर्थात् सूक्ष्म कही गई हैं।

2.4.15-2.4.16

ज्योति-आदि-अधिष्ठान अधिकरण: अधिष्ठात्री देवता

2.4.15ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥
2.4.16प्राणवता शब्दात् ॥

प्रत्येक इन्द्रिय की एक अधिष्ठात्री देवता है, जैसे नेत्र की सूर्य, श्रोत्र की दिशाएँ, मन की चन्द्र, और वाक् की अग्नि। सूत्र 2.4.16 में, इन्द्रियाँ “प्राणवान” जीव के साथ ही इस देवता-सम्बन्ध से युक्त होती हैं, ऐसा श्रुति-वचन से जाना जाता है।

2.4.17

नित्यत्व अधिकरण

2.4.17तस्य च नितयत्वात् ॥

मुख्य प्राण का नित्यत्व, ब्रह्म के आश्रित रहने के कारण।

2.4.18-2.4.20

इन्द्रियाँ पृथक् अधिकरण

2.4.18त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥
2.4.19भेद-श्रुतेः ॥
2.4.20वैलक्षण्याच्च ॥

पूर्वपक्ष कहता है, समस्त इन्द्रियाँ मुख्य प्राण का ही विकार हैं। बादरायण उत्तर देते हैं। सूत्र 2.4.18 में, ये “इन्द्रियाणि” अर्थात् मुख्य प्राण से पृथक् हैं। सूत्र 2.4.19 में, श्रुति में इनका भेद से कथन है। सूत्र 2.4.20 में, “वैलक्षण्य,” कार्यों में स्पष्ट भेद है।

2.4.21-2.4.22

त्रिवृत्करण अधिकरण: तीन भूतों का मिश्रण

2.4.21संज्ञा-मूर्ति-क्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥
2.4.22मांसादि भौमं यथा-शब्दमितरयोश्च ॥

छान्दोग्य 6.3 से 6.5 में “त्रिवृत्करण” का सिद्धान्त है, तेज, जल और अन्न, इन तीनों के मिश्रण से ही सब पदार्थ बनते हैं। सूत्र 2.4.21 में, “संज्ञा-मूर्ति-क्लृप्ति,” नाम और रूप की रचना इसी से होती है। सूत्र 2.4.22 में, मांस आदि पृथिवी-प्रधान भाग से बनते हैं, और शेष पदार्थों के लिए भी श्रुति-वचन के अनुसार यही नियम लागू है।

2.4.23

वैशेष्य अधिकरण: उपसंहार

2.4.23वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥

अध्याय का उपसंहार, जहाँ पद की द्विरुक्ति अध्याय की समाप्ति को सूचित करती है। “वैशेष्यात्,” विशेष धर्म के कारण ही इन्द्रियों आदि का पृथक् कथन है, और “तद्वादः तद्वादः,” इसी सिद्धान्त की पुनः पुष्टि की जाती है।

अब आगे तृतीय अध्याय (साधन) का प्रारम्भ होगा, जहाँ ब्रह्म-साक्षात्कार का साधन क्या है, इसका विचार किया जाएगा।

साथ में पढ़ें

स्रोत: मूल देवनागरी सूत्र-पाठ sanskritdocuments.org से। व्याख्या शंकराचार्य के शारीरक-भाष्य के अनुसार।

परम्परा: ब्रह्म सूत्र अध्याय 2 (अविरोध), बादरायण व्यास, अद्वैत वेदान्त।

अधिकार: मूल संस्कृत पाठ सार्वजनिक है। हिन्दी व्याख्या lulla.net, CC BY-NC 4.0।

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