अध्याय 2 (अविरोध) · ब्रह्म सूत्र

ब्रह्म सूत्र · अध्याय 2

अविरोध

वेदान्त-position में कोई आंतरिक विरोध नहीं · 4 पाद, ~159 सूत्र

पढ़ने का समय: लगभग 2 घंटे

इस अध्याय का काम

अध्याय 1 में बादरायण ने establish किया कि सब-उपनिषद् Brahman पर ही convergent हैं। अध्याय 2 में वो दो-तरह की defence करते हैं।

एकinternal-consistency: वेदान्त-position में कोई आंतरिक विरोध नहीं। ब्रह्म-as-दोनों-कारण (निमित्त + उपादान), जीव-Brahman-संबंध, leelaa-वाद, सब logically-consistent।

दोexternal-defence: रival-darshanas (सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत, भागवत) के objections का formal-refutation।

पाद-वार: पाद 1 internal-consistency पर। पाद 2 पूरा rival-schools-refutation। पाद 3 elements-and-jiva-origin पर। पाद 4 इन्द्रिय-प्राण-वर्णन।

पाद 1 · अद्वैत-position की internal-consistency

पहले 13 सूत्र अध्याय 1 की objections का follow-up हैं। फिर “कारण-कार्य-अनन्यता” का foundational-doctrine (2.1.14-20)। फिर जीव-Brahman-distinction (2.1.21-23)। फिर ब्रह्म-self-modification की question (2.1.24-29)। और अंत में problem of evil का Vedic-जवाब (2.1.33-36)।

2.1.1-2.1.2

स्मृति-अनवकाश अधिकरण: सांख्य-स्मृति का refutation

2.1.1स्मृत्यनवकाश-दोष-प्रसङ्ग इति चेन्न अन्य-स्मृत्यनवकाश-दोष-प्रसङ्गात् ॥
2.1.2इतरेषां चानुपलब्धेः ॥

अध्याय 2 का प्रारम्भ। पूर्व-पक्ष (सांख्य-वादी): अध्याय 1 में आपने सांख्य-प्रधान को refute कर दिया, परन्तु कपिल-मुनि की सांख्य-स्मृति वैध-शास्त्र है। उसको अवकाश (place) देना आवश्यक है, और प्रधान को कारण न मानने से उसका अवकाश नहीं रहता।

बादरायण: 2.1.1 आपकी सांख्य-स्मृति को अवकाश देंगे, तो अन्य-स्मृतियों (मनु-स्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति, गीता) को अवकाश-नहीं वाला दोष आएगा। दोनों स्मृतियाँ contradict करती हैं। हम श्रुति को pramana मानते हैं, स्मृति को नहीं। 2.1.2 अन्य प्रमाणों से भी प्रधान की उपलब्धि नहीं।

दिल्ली में आज: एक legal-analogy useful है। यदि दो clients का कोर्ट-केस में contradictory-वाक्य हो, तो कोर्ट दोनों को नहीं सुनती। एक primary-source (श्रुति) को मानती है, स्मृति को secondary। बादरायण यही doing कर रहे हैं।

संगति: यह अध्याय 1 के “ईक्षत्यधिकरण” (1.1.5-11) का follow-up है।

2.1.3

योग-प्रत्युक्ति अधिकरण: योग-स्मृति का refutation

2.1.3एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥

पतञ्जलि-योग-शास्त्र में भी “प्रकृति” को primal-cause माना गया है। बादरायण कहते हैं, पिछले सूत्र की logic योग पर भी apply होती है, “एतेन योगः प्रत्युक्तः,” इसी से योग-स्मृति का refutation।

यहाँ “योग” से पतञ्जलि-योग-दर्शन की reference है, न कि सामान्य meditation-practice की। पतञ्जलि ने भी अपनी प्रकृति को “अचेतन” माना है, सांख्य की follower-line में।

संगति: पतञ्जलि योग सूत्रparticularly पाद 1 का “ईश्वर-प्रणिधान” वाला section। पतञ्जलि ईश्वर मानते हैं, मगर ईश्वर को प्रकृति-cause नहीं मानते। बादरायण का refutation इसी aspect पर है।

2.1.4-2.1.11

विलक्षण-अधिकरण: कारण-कार्य भिन्न नहीं

2.1.4न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥
2.1.5दृश्यते तु ॥
2.1.6अभिमानि-व्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥
2.1.7दृश्यते च ॥
2.1.8असदिति चेन्न प्रतिषेध-मात्रत्वात् ॥
2.1.9अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥
2.1.10न तु दृष्टान्त-भावात् ॥
2.1.11स्व-पक्ष-दोषाच्च ॥

सांख्य-objection: ब्रह्म चेतन है, जगत् अचेतन। दोनों “विलक्षण” (different in nature)। एक चेतन source से अचेतन-जगत् कैसे निकलेगा?

बादरायण के सिलसिले-वार जवाब: 2.1.4 श्रुति के “तज्जलान्” (छान्दोग्य 3.14.1) से ही “तथात्व” स्पष्ट है। 2.1.5 लोक में भी देखा जाता है, जैसे बाल-नख-पुरुष से निकलते हैं, चेतन-स्रोत से अचेतन-effect। 2.1.6 जब “देवता” या “अभिमानी” का व्यपदेश है, तो विशेष-अनुगति से समझ बनती है। 2.1.7 ऐसा हम लोक में भी देखते हैं। 2.1.8 कोई कहे जगत् “असत्” (non-existent) है, बादरायण मना करते हैं, “असत्” तो सिर्फ़ “प्रतिषेध-मात्र” है, यानी अधिष्ठान-rejection की language। 2.1.9 अपीति (dissolution) के समय भी विरोध नहीं। 2.1.10 दृष्टान्त-भाव से समझ in सकती है। 2.1.11 स्व-पक्ष (सांख्य) में ही दोष-prasanga, क्योंकि सांख्य-system में भी प्रकृति-पुरुष का relation explain नहीं हो पाता।

संगति: श्वेताश्वतर 4.10 (“मायां तु प्रकृतिं विद्यात्,” मगर माया-cause ब्रह्म), तैत्तिरीय 2.1 (आत्मनः from आकाश, आकाश से सब निकले)।

2.1.12

तर्क-अप्रतिष्ठान अधिकरण: तर्क की limits

2.1.12तर्काप्रतिष्ठानादपि अन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्ष-प्रसङ्गः ॥

पूर्व-पक्ष: हम तर्क से ही ब्रह्म-कारण को define कर लेंगे, श्रुति की आवश्यकता क्या? बादरायण: तर्क-only का तरीक़ा में दिक़्क़त है, “तर्क-अप्रतिष्ठान।” तर्क “unsettled” है। हर तार्किक statement के लिए एक counter-तर्क संभव है। मात्र तर्क पर भरोसा करेंगे तो “अनिर्मोक्ष-प्रसङ्ग,” यानी मुक्ति का कोई settled-path नहीं बनेगा।

इसी कारण वेदान्त-paramount-pramana श्रुति है, तर्क secondary। यह बादरायण की epistemic-स्थिति।

दिल्ली में आज: science के साथ एक similar issue है, हर theory अंत में experimental evidence से confirm की जाती है, pure logic से नहीं। तर्क की limit अध्यात्म में और भी sharp है।

2.1.13-2.1.20

अनन्यत्व अधिकरण: कारण-कार्य की अभिन्नता

2.1.13एतेन शिष्टापरिग्रहाऽपि व्याख्याताः ॥
2.1.14भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत्स्याल्लोकवत् ॥
2.1.15तदनन्यत्वमारम्भण-शब्दादिभ्यः ॥
2.1.16भावे चोपलब्धेः ॥
2.1.17सत्त्वाच्चावरस्य ॥
2.1.18असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्य-शेषात् ॥
2.1.19युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥
2.1.20पटवच्च ॥

यह पूरे अध्याय का सबसे important अधिकरण है। बादरायण declare करते हैं: कारण और कार्य “अनन्य” (non-different) हैं। यह अद्वैत-position की foundation है।

2.1.13 पिछली logic से शिष्ट-aparigraha (uncultured-people) वाली objection भी refuted। 2.1.14 कोई कहे जीव-भोक्तृत्व ब्रह्म पर भी apply हो जाएगा,अविभाग जैसे “लोक में” (समुद्र-तरंग) देखा जाता है, अंतर-but-non-different। 2.1.15 “तदनन्यत्व,” अर्थात् “उसी की अनन्यता,” “आरम्भण” शब्द से (छान्दोग्य 6.1.4, “वाचारम्भणं विकारो नाम-धेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्”), यह दिखाता है कि सब-कुछ कारण (मिट्टी) ही है, कार्य (घड़े) सिर्फ़ नाम-रूप-modifications हैं।

2.1.16 भाव (existence) से ही उपलब्धि होती है। 2.1.17 अवर (later, यानी effect) का भी सत्त्व पहले-cause में होता है। 2.1.18 कोई कहे “असत्” व्यपदेश भी है (तैत्तिरीय 2.7, “असद्वा इदम् अग्र आसीत्”), बादरायण: यह “धर्मान्तर” (नाम-रूप-rahit-state) describe कर रहा है, “वाक्य-शेष” से clear। 2.1.19 “युक्ति” + अन्य-शब्द-evidence (पटवत्). 2.1.20 कपड़े (पट) में जैसे धागे ही हैं, ब्रह्म में जगत्।

संगति: छान्दोग्य उपनिषद् 6.1.4-7, जहाँ “वाचारम्भणं विकारो नाम-धेयं,” मिट्टी-घड़ा-example से ही पूरी अद्वैत-position आती है।

2.1.21-2.1.23

इतर-व्यपदेश अधिकरण: जीव-ब्रह्म-भेद का problem

2.1.21इतर-व्यपदेशाद्धिता-करणादि-दोष-प्रसक्तिः ॥
2.1.22अधिकं तु भेद-निर्देशात् ॥
2.1.23अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥

पूर्व-पक्ष: यदि कारण-कार्य अनन्य हैं, तो ब्रह्म और जीव भी अनन्य। जीव-दुख ब्रह्म-दुख भी होंगे! ब्रह्म “हित-कारण” नहीं रहेगा।

बादरायण: 2.1.22 “अधिकं तु,” ब्रह्म जीव से “अधिक” है, उपनिषद् में भेद-निर्देश साफ़। ब्रह्म omnipresent, omniscient, omnipotent; जीव सीमित। 2.1.23 जैसे “अश्म-आदि” (पत्थर), उसके अंदर के atoms को पत्थर के “गुण” प्राप्त नहीं होते, उसी तरह ब्रह्म-जीव-अंतर बना रहता है।

यह passage बाद के “जीव-Brahman one but not identical” doctrine का foundation है। शंकर: स्वरूप-तः एक, उपाधि-तः भिन्न।

2.1.24-2.1.25

क्षीर-वत् अधिकरण: ब्रह्म कैसे self-modifies

2.1.24उपसंहार-दर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥
2.1.25देवादिवदपि लोके ॥

पूर्व-पक्ष: यदि ब्रह्म खुद ही जगत् बनता है, तो उसे “tools” (साधन) चाहिए, जैसे कुम्हार को मिट्टी + चाक + लाठी। ब्रह्म के पास ये कैसे?

बादरायण: 2.1.24 “क्षीरवत्,” जैसे दूध स्वयं ही दही बन जाता है, बिना external-cause के, ब्रह्म self-modifying है। 2.1.25 “देव-आदि-वत्,” देवताओं के case में भी self-creation के examples देखे जाते हैं।

संगति: छान्दोग्य 6.2.3 “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय,” ब्रह्म ने स्वयं चिंतन किया।

2.1.26-2.1.29

कृत्स्न-प्रसक्ति अधिकरण: ब्रह्म पूरा transform हो जाता है?

2.1.26कृत्स्न-प्रसक्तिर्निरवयवत्व-शब्द-कोपो वा ॥
2.1.27श्रुतेस्तु शब्द-मूलत्वात् ॥
2.1.28आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥
2.1.29स्व-पक्ष-दोषाच्च ॥

पूर्व-पक्ष: यदि ब्रह्म जगत्-बनता है, तो पूरा ब्रह्म transform हो गया? या आंशिक? अगर पूरा, ब्रह्म finished। अगर आंशिक, ब्रह्म “अवयवी” (parts-वाला), जो उपनिषद् के “निरवयव” से contradict करता है।

बादरायण: 2.1.26 “देव-आदि-वत्,” देवताओं के case में भी ऐसा देखा जाता है (एक देव कई रूप ले सकते हैं)। 2.1.27 दोनों options में problem है, मानते हैं, परन्तु… 2.1.28 श्रुति “शब्द-मूल” है, और श्रुति यह कहती है। हम तर्क-only पर नहीं चलेंगे। 2.1.29 “आत्मनि चैवं विचित्राः,” आत्मा में ही ये सब विचित्र-conceptions बैठती हैं।

शंकराचार्य की “विवर्त-वाद” position यहाँ implicit है: ब्रह्म actually transform नहीं होता, यह सब “नाम-रूप-appearance” है।

2.1.30-2.1.31

सर्व-उपेत अधिकरण: ब्रह्म-शक्ति universal

2.1.30सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥
2.1.31विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ॥

पूर्व-पक्ष: ब्रह्म के पास “साधन” (इन्द्रिय,तो जगत् कैसे बनाएगा? बादरायण: 2.1.30 ब्रह्म “सर्व-उपेत” है, सब-शक्तियों-सहित। 2.1.31 कोई कहे ब्रह्म “विकरण” (बिना-इन्द्रिय) है, मगर पहले explanation में बता दिया गया है।

2.1.32-2.1.33

प्रयोजनत्व अधिकरण: ब्रह्म का प्रयोजन क्या

2.1.32न प्रयोजनत्त्वात् ॥
2.1.33लोकवत्तु लीला-कैवल्यम् ॥

पूर्व-पक्ष: सब actions का कोई “प्रयोजन” (motive) होता है। ब्रह्म का जगत्-निर्माण किस-प्रयोजन से? यदि कोई desire है, तो ब्रह्म पूर्ण नहीं।तो वह जगत् क्यों बनाएगा?

बादरायण: 2.1.32 ब्रह्म “अप्रयोजनात्,” बिना-प्रयोजन है। 2.1.33 “लोकवत् तु लीला-कैवल्यम्,” जैसे लोक में राजा या समृद्ध-व्यक्ति बिना-प्रयोजन के sport खेलते हैं, वैसे ही ब्रह्म-सृष्टि एक “लीला” है।

यह “लीला-वाद” का foundation है।एक overflow-of-fullness है। दिल्ली में आज: एक artist अपनी चित्रकारी सिर्फ़ “fun” के लिए करता है, कोई “use” नहीं। ब्रह्म-creation भी ऐसा ही।

संगति: सौन्दर्य लहरी श्लोक 1, “शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्।” शिव-शक्ति की लीला से सब बनता है।

2.1.34-2.1.36

वैषम्य-नैर्घृण्य अधिकरण: ब्रह्म unfair क्यों

2.1.34वैषम्य-नैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥
2.1.35कर्माविभागादिति चेन्न अनादित्वात् ॥
2.1.36उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥

सबसे painful objection: कोई इंसान ख़ुश पैदा होता है, कोई दुखी; कोई धनी, कोई गरीब। यदि ब्रह्म सब-कारण है, तो ब्रह्म “वैषम्य” (unfairness) और “नैर्घृण्य” (cruelty) से चार्ज होता है।

बादरायण: 2.1.34 ब्रह्म “सापेक्ष” है, यानी जीवों के पूर्व-कर्म-dependent। ब्रह्म एक neutral-judge है, हर जीव अपने कर्मानुसार result पाता है। 2.1.35 कोई कहे, “पहली सृष्टि में तो कर्म थे ही नहीं,” बादरायण: संसार “अनादि” (beginning-less) है, हर सृष्टि से पहले-वाली सृष्टि के कर्म थे। 2.1.36 श्रुति-स्मृति दोनों इसी position को confirm करते हैं।

दिल्ली में आज: यह “थियोडिसी” (problem of evil) का Vedic answer है।कर्म-system unfair-looking results देता है। अनादि-कर्म-सिद्धान्त से ब्रह्म exonerated है।

संगति: भगवद् गीता अध्याय 4 (विषमोऽहं न च मे द्वेष्योऽस्ति)। और कठ 1.2.23 (नायमात्मा प्रवचनेन)।

2.1.37-2.1.38

सर्व-धर्म-उपपत्ति अधिकरण: closing

2.1.37सर्व-धर्म-उपपत्तेश्च ॥
2.1.38सर्व-धर्म-उपपत्तेश्च ॥

पाद 1 का closing। बादरायण: 2.1.37 सब-धर्म (omnipresence, omniscience, omnipotence, fairness, freedom-from-attachment) ब्रह्म पर apply होते हैं। 2.1.38 श्रुति का यही position है।

पाद 2 · पाँच rival-schools का refutation

इस पाद की पूरी function dialectical है। बादरायण सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध-दो-शाखाएँ, जैन, पाशुपत, और भागवत-पाञ्चरात्र, इन सब-schools के foundational-claims को logically refute करते हैं। हम हर-school को एक adhikarana-cluster के रूप में present करते हैं।

2.2.1-2.2.10

सांख्य-रचना-अनुपपत्ति अधिकरण: अचेतन-प्रधान कैसे design करेगा

2.2.1रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥
2.2.2प्रवृत्तेश्च ॥
2.2.3पयो-अम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥
2.2.4व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ॥
2.2.5अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥
2.2.6अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥
2.2.7पुरुषाश्मवदितिचेत् तथापि ॥
2.2.8अङ्गित्वानुपपत्तेः ॥
2.2.9अन्यथानुमितौ च ज्ञ-शक्ति-वियोगात् ॥
2.2.10विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥

पाद 2 शुरू। यह सब-दर्शनों के विरुद्ध defensive-स्थापन है। बादरायण पाँच rival schools को refute करते हैं: सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध-दो-शाखाएँ, जैन, पाशुपत-शैव, और भागवत-पाञ्चरात्र। पहले सांख्य।

सांख्य-दावा: प्रकृति (प्रधान) अचेतन है, मगर “tri-गुणात्मक” है, और tri-गुण-imbalance से ही जगत् rachit होता है।

बादरायण के दशवीं-objection: 2.2.1 “रचना-अनुपपत्ति,” रचना यानी design। एक complex की संरचना अचेतन-from कैसे आएगा? यह बहुत contemporary argument है, “intelligent design vs random chance” debate जैसा। 2.2.2 “प्रवृत्ति,” जगत् में observed-purposeful-activity अचेतन-प्रधान से नहीं हो सकती। 2.2.3 “पयो-अम्बुवत्,” कोई कहे जैसे दूध-पानी मिल कर बच्चे को pose करते हैं, यह automatic है। बादरायण: तब भी एक conscious-कारण needed। 2.2.4 “व्यतिरेक-अनवस्थिति,” tri-गुण-balance बिना-cause के टूटता ही नहीं।

2.2.5 “अन्यत्र-अभावात्,” कहीं और ऐसा अचेतन की संरचना देखा नहीं। 2.2.6 “अभ्युपगमे अपि,” यदि स्वीकार भी कर लें, तो अर्थ-अभाव। 2.2.7 “पुरुष-अश्मवत्,” कोई कहे जैसे magnet लोहे को खींचता है (पुरुष-धातु, अंध-लंगड़ा-example), बादरायण: तब भी ज्ञ-शक्ति-cause चाहिए। 2.2.8 “अंगित्व-अनुपपत्ति,” प्रकृति के “अंग” प्रत्येक purpose-fit करते हैं, यह अचेतन-from impossible। 2.2.9 अन्य-तरीक़े से anumana भी fail। 2.2.10 आपके system में internal-contradictions हैं।

दिल्ली में आज: सांख्य-debate आज भी materialism vs spirituality के form में चलती है। बादरायण का “design needs designer” argument आज भी दार्शनिक-debate में present है।

2.2.11-2.2.17

वैशेषिक-refutation: परमाणु से जगत् नहीं

2.2.11महद्दीर्घवद्धा ह्रस्व-परिमण्डलाभ्याम् ॥
2.2.12उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥
2.2.13समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥
2.2.14नित्यमेव च भावात् ॥
2.2.15रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥
2.2.16उभयथा च दोषात् ॥
2.2.17अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥

वैशेषिक-दर्शन (कणाद-ऋषि): जगत् “परमाणु” (atoms) से बना है। दो परमाणु combine हो कर “ह्रस्व” (small), तीन “त्र्यणुक” (triad), इसी तरह बढ़ते-बढ़ते दिखाई-देने वाली चीज़ें।

2.2.11 “महद्-दीर्घवद्धा ह्रस्व-परिमण्डलाभ्याम्,” जब परमाणु combine होते हैं, “ह्रस्व” और “परिमण्डल” (छोटा और गोल) से “महत्” और “दीर्घ” (बड़ा और लम्बा) नहीं बन सकता, साइज़-properties match नहीं। 2.2.12 परमाणुओं में motion कैसे शुरू हो? बादरायण: कोई cause नहीं, तो motion-impossible। 2.2.13 “समवाय” (inherence-relation) infinite-regress लाता है, अनवस्थिति-दोष। 2.2.14 परमाणु “नित्य” हैं, तो जगत् भी “नित्य” होंगे, transformations कैसे? 2.2.15 परमाणुओं में “रूप” आदि गुण मानेंगे, तो विपर्यय भी आ जाएगा। 2.2.16 दोनों ways problem। 2.2.17 “अपरिग्रह,” वेद का इसका कोई समर्थन नहीं।

दिल्ली में आज: modern physics में भी atoms जगत्-substrate हैं, मगर modern atomic theory वैशेषिक से अलग है (atoms decomposable हैं, fields fundamental हैं)। बादरायण के objections बहुत ancient हैं, मगर system-internal logical-issues पर हैं।

2.2.18-2.2.27

बौद्ध-सर्वास्तिवाद-refutation: सब-कुछ क्षणिक

2.2.18समुदायोभय-हेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥
2.2.19इतरेतर-प्रत्ययत्वादिति चेन्नौत्पत्ति-मात्र-निमित्तत्वात् ॥
2.2.20उत्तरोत्पादे च पूर्व-निरोधात् ॥
2.2.21असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥
2.2.22प्रतिसङ्ख्या-प्रतिसङ्ख्या-निरोधाप्राप्तिः अविच्छेदात् ॥
2.2.23उभयथा च दोषात् ॥
2.2.24आकाशे चाविशेषात् ॥
2.2.25अनुस्मृतेश्च ॥
2.2.26नासतोऽदृष्टत्वात् ॥
2.2.27उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥

बौद्ध-सर्वास्तिवाद (वैभाषिक-सौत्रान्तिक): सब-कुछ “क्षणिक” है, हर pal सब-कुछ नया है, “उत्पाद-व्यय-स्थिति” का continuous-flow। और “अनात्मा-वाद,” स्थायी-आत्मा नहीं।

बादरायण के objections बहुत-स्पष्ट हैं। 2.2.18 “समुदाय” (collection) कैसे बनेगा यदि components क्षणिक हैं? Components meet होने से पहले ही ख़त्म। 2.2.19 “इतरेतर-प्रत्ययत्व” (dependent-origination) पर बादरायण: यह सिर्फ़ “उत्पत्ति-मात्र-निमित्तत्व” का indication है, asti-वाक्य नहीं। 2.2.20 अगला उत्पन्न होने से पहले पिछला निरोध हो जाता है, तो नया कैसे? 2.2.21 दोनों one-समय हो रहे, तो “यौगपद्य” problem। 2.2.22-25 निरोध-cycle का explanation impossible। 2.2.26-27 आत्मा-denial के बावजूद “अनुस्मृति” (memory) काम करती है, यह क्षणिकता-impossible-कर देती है।

दिल्ली में आज: बौद्ध-position आज भी major दार्शनिक-position है। बादरायण-debate में दोनों के अपने merits हैं। शंकर अद्वैत-vedanta को बौद्ध-शून्यवाद से “उच्च” मानते हैं, मगर बौद्ध-दार्शनिक-precision को acknowledge करते हैं।

2.2.28-2.2.32

विज्ञान-वाद-refutation: सब-कुछ चेतना

2.2.28नाभाव उपलब्धेः ॥
2.2.29वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥
2.2.30न भावोऽनुपलब्धेः ॥
2.2.31क्षणिकत्वाच्च ॥
2.2.32सर्वथानुपपत्तेश्च ॥

बौद्ध-विज्ञानवाद (योगाचार): external-world नहीं, सब-कुछ “विज्ञान” (consciousness-only)। दिल्ली में कोई कह दे “आप भी मेरे मन का product है,” यही position।

क्योंकि “उपलब्धि” है, अनुभव-direct है। 2.2.29 “वैधर्म्य,” स्वप्न और जागृत अनुभवों में clear difference है। स्वप्न को awakening-दौरान reject कर देते हैं, मगर awake-experience को कभी नहीं। 2.2.30 “भाव-अनुपलब्धि,” बिना external-world के subject-object-distinction कैसे? 2.2.31 क्षणिक-तर्क पहले से refuted। 2.2.32 “सर्वथा-अनुपपत्ति,” every-way impossible।

संगति: यह बौद्ध-position वस्तुतः अद्वैत-vedanta के बहुत-क़रीब है। शंकराचार्य को “प्रच्छन्न-बौद्ध” भी कहा गया है। मगर अद्वैत-Brahman वस्तुतः-सत्य है, बौद्ध-शून्य nihilist। यह difference foundational है।

2.2.33-2.2.36

जैन-refutation: सप्त-भङ्गी-नय

2.2.33नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥
2.2.34एवं चात्माकार्त्स्न्यम् ॥
2.2.35न च पर्यायादप्यविरोधः विकारादिभ्यः ॥
2.2.36अन्त्यावस्थितेश्चोभय-नित्यत्वाद-विशेषात् ॥

जैन-दर्शन: “सप्त-भङ्गी-नय,” हर statement seven-ways viewed। एक चीज़ “हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती।” यह relativistic-position।

बादरायण: 2.2.33 एक object में contradictory-properties simultaneously impossible (law of non-contradiction)। 2.2.34 जीव की “आकार्त्स्न्य” (पूर्णता-loss), जैन-जीव deha-स्थित होने से उसकी विभु-properties लुप्त। 2.2.35 “पर्याय” (modification) से भी विरोध नहीं हटता। 2.2.36 अन्त्य-state में दोनों-नित्यत्व, यह विशेष-कुछ नहीं देता।

2.2.37-2.2.41

पाशुपत-refutation: ईश्वर “अधिष्ठान” है, “कर्ता” नहीं

2.2.37पत्युरसामञ्जस्यात् ॥
2.2.38सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥
2.2.39अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥
2.2.40करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥
2.2.41अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥

पाशुपत-दर्शन (शैव-दार्शनिक-school): “पति” (शिव) सिर्फ़ “निमित्त-कारण” है, “उपादान” नहीं। प्रकृति (पशु) separate-substance है।

बादरायण: 2.2.37 “पति-असामञ्जस्य,” इस-position में internal-inconsistencies। 2.2.38 शिव-प्रकृति-संबंध explain नहीं। 2.2.39 “अधिष्ठान-अनुपपत्ति,” ईश्वर at-most अधिष्ठान-होंगे, कर्ता नहीं। 2.2.40 “करणवत्,” कोई कहे ईश्वर अपने-शरीर-अंग के through act करते हैं, बादरायण: तब उन्हें “भोग” (experience) भी होंगे, deity-status नष्ट। 2.2.41 ईश्वर “अन्तवत्” (limited) या “असर्वज्ञ” हो जाएगा।

दिल्ली में आज: यह वही debate है, “creator-only ईश्वर” (deistic-position) vs “creator-and-material ईश्वर” (अद्वैत-position)। बादरायण later-वाले को support करते हैं।

2.2.42-2.2.45

भागवत-पाञ्चरात्र-refutation: 4-व्यूह-system

2.2.42उत्पत्त्यसम्भवात् ॥
2.2.43न च कर्तुः करणम् ॥
2.2.44विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥
2.2.45विप्रतिषेधाच्च ॥

भागवत-पाञ्चरात्र (vaishnav-दार्शनिक-school): विष्णु से वासुदेव → संकर्षण → प्रद्युम्न → अनिरुद्ध, यह 4-व्यूह-system।

बादरायण: 2.2.42 “उत्पत्ति-असम्भव,” जीव के “व्यूह-उत्पत्ति” आत्मा-as-eternal के साथ contradict। 2.2.43 कर्ता-करण-distinction problem। 2.2.44 कोई कहे ये “विज्ञान-अंश” हैं, तब उपनिषद्-against नहीं। 2.2.45 system-internal-contradictions।

दिल्ली में आज: रामानुजाचार्य ने बाद में पाञ्चरात्र को विशिष्टाद्वैत-के-अनुकूल reinterpret किया, और अद्वैत-वेदान्त की परम्परा में भी “विष्णु-as-Brahman” accept है। यह refutation specifically-दार्शनिक-technical है।

पाद 3 · पाँच-तत्त्व और जीव की origins

आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सब Brahman-से क्रम-से। यह तैत्तिरीय 2.1.1 का foundational-sequence। फिर जीव-not-created, जीव-knower-स्वभाव, जीव-कर्ता, और जीव-as-amsha-of-Brahman का formal-वाक्य।

2.3.1-2.3.7

आकाश-उत्पत्ति अधिकरण: आकाश का origin Brahman

2.3.1न वियदश्रुतेः ॥
2.3.2अस्ति तु ॥
2.3.3गौण्यसम्भवात् ॥
2.3.4शब्दाच्च ॥
2.3.5स्याच्चैकस्य ब्रह्म-शब्दवत् ॥
2.3.6प्रतिज्ञा-हानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥
2.3.7यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥

पाद 3 का प्रारम्भ। यहाँ बादरायण विभिन्न तत्त्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) की Brahman-से-उत्पत्ति discuss करते हैं।

2.3.1 कोई कहे “आकाश” Brahman से उत्पन्न नहीं, क्योंकि उपनिषद् में “नित्य” कहा गया है (पूर्व-पक्ष-position)। 2.3.2 “अस्ति तु,” परन्तु आकाश-उत्पत्ति है। 2.3.3 “गौण-असम्भव,” यदि “आकाश-नित्य” शब्द को मानेंगे, तो वो secondary-meaning में होंगे (कारण-सहित सब-वस्तुओं की appearance-तरह nityata)। 2.3.4 “शब्दात्,” तैत्तिरीय 2.1.1 directly कहता है “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।” 2.3.5 “एकस्य,” एक Brahman का ही, “ब्रह्म-शब्द-वत्,” इसी context में। 2.3.6 अन्यथा प्रतिज्ञा-हानि होगी। 2.3.7 “यावद्-विकारम्,” जब तक विकार है, विभाग है, “लोक-वत्,” लोक की तरह।

संगति: तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1.1, जहाँ पाँच-elements-from-Brahman का formal-sequence है।

2.3.8

मातरिश्वा-व्याख्या अधिकरण: वायु

2.3.8एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥

पिछले-तर्क की logic वायु पर भी apply। “मातरिश्वा” यानी वायु (an old Vedic-name)। Brahman-से ही।

2.3.9

सत्-से-असत् नहीं अधिकरण

2.3.9असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥

पूर्व-पक्ष: कोई कहे Brahman स्वयं भी उत्पन्न हुआ है। बादरायण: “असम्भव,क्योंकि Brahman “सत्” है, और सत् से सत् का उत्पाद-possible नहीं (cause-effect-different-substance)।

यह Brahman की self-existence का proof है। शंकर: Brahman स्व-योनि है।

2.3.10

तेजः अधिकरण: अग्नि भी Brahman से

2.3.10तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥

“तेजः” यानी अग्नि-element। उपनिषद् सीधा कहती है, “तस्मादेव वायोरग्निः” (तैत्तिरीय 2.1.1)।

2.3.11

आप: अधिकरण: जल

2.3.11आपः ॥

जल भी अग्नि से उत्पन्न, और final-source Brahman।

2.3.12

पृथिवी अधिकरण: पृथ्वी

2.3.12पृथिव्यधिकार-रूप-शब्दान्तरादिभ्यः ॥

पृथ्वी भी इसी-sequence में, जल से। पाँच-elements का sequence: आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथ्वी। यह तैत्तिरीय का मूल वाक्य।

दिल्ली में आज: यह “पाँच-तत्त्व” Hindu-system का base है। आयुर्वेद, हठ-योग, sankhya, सब इसी पाँच-element-framework पर चलते हैं।

2.3.13

ब्रह्म-कारण throughout अधिकरण

2.3.13तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॥

हर-link पर “अभिध्यान” (will) से active है। पूरे sequence में Brahman ही underlying-substance।

2.3.14

दिशा-विपर्यय अधिकरण: dissolution-order reverse

2.3.14विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥

सृष्टि का order आकाश→पृथ्वी, dissolution का order उल्टा, पृथ्वी→आकाश। यह natural-symmetry है। “एक last-out, first-in,” “last-in, first-out” rule।

2.3.15

मन-इन्द्रिय-क्रम अधिकरण

2.3.15अन्तरा विज्ञान-मनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥

पूर्व-पक्ष: विज्ञान-मन-वग़ैरह भी elements-sequence में हैं? बादरायण: “अविशेष,” बिना-distinction के एक-साथ। ये बिना-कर्म-pre-existing हैं।

2.3.16-2.3.17

जीव-उत्पत्ति-निषेध अधिकरण: जीव uncreated

2.3.16चराचर-व्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तः तद्भाव-भावित्वात् ॥
2.3.17नात्मा अश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥

जीव-आत्मा “उत्पन्न” नहीं होता। 2.3.16 जो “जन्म-मरण” व्यपदेश दिखता है, वह “चराचर-व्यपाश्रय,” देह से जुड़ा हुआ, “भाक्त” (secondary)। 2.3.17 श्रुति में जीव-उत्पत्ति का statement नहीं, बल्कि “नित्यत्व” का।

दिल्ली में आज: जीव-नित्यत्व ही “पुनर्जन्म” का foundation है। शरीर बदलते हैं, आत्मा नहीं।

संगति: भगवद् गीता 2.20, “न जायते म्रियते वा कदाचित्।”

2.3.18

ज्ञ-अधिकरण: जीव चेतन

2.3.18ज्ञोऽत एव ॥

जीव “ज्ञ” यानी “knower.” चेतन-स्वभाव है। यह वैशेषिक-position-against, जो आत्मा को “अचेतन” मानते हैं, और चेतना को आत्मा-शरीर-connection का product।

2.3.19

युक्ति-शास्त्र अधिकरण

2.3.19युक्तेश्च ॥

“युक्ति” (reasoning) से भी जीव-चेतन-स्वभाव confirm होता है।

2.3.20-2.3.21

उत्क्रान्ति-गति अधिकरण: मरते समय

2.3.20उत्क्रान्ति-गत्यागतीनाम् ॥
2.3.21स्वात्मना चोत्तरयोः ॥

मरते समय “उत्क्रान्ति” (निकलना), “गति” (जाना), “आगति” (लौटना), ये सब-process जीव-को apply होते हैं। यह उपनिषद्-वर्णन से। आगे जीव अपने-आप ही go-return करता है।

संगति: छान्दोग्य 5.10 (पाँच-fire-knowledge), बृहदारण्यक 4.4 (मरते-time-वर्णन)।

2.3.22-2.3.29

जीव का आकार अधिकरण: अणु vs व्यापक

2.3.22नाणुरतत् श्रुतेरिति चेन्न इतराधिकारात् ॥
2.3.23स्व-शब्दोन्मानाभ्यां च ॥
2.3.24अविरोधश्चन्दनवत् ॥
2.3.25अवस्थिति-वैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृद्धि हि ॥
2.3.26गुणाद्वाऽऽलोकवत् ॥
2.3.27व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ॥
2.3.28पृथगुपदेशात् ॥
2.3.29तद्गुण-सारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥

जीव का आकार क्या? “अणु” (atomic) या “व्यापक” (all-pervasive)? यह एक classic-debate है। शंकर का position: स्वरूप-से “व्यापक” (Brahman-identical), पर “उपाधि-तः” अणुवत् दिखता है।

क्योंकि “तत्त्वमसि” type Brahman-identification, बादरायण: “इतर-अधिकार,” यह “अमुक्त-जीव” के context में है, “मुक्त-जीव” Brahman-identical है। 2.3.23 स्व-शब्द और उन्मान (measurement) दोनों से। 2.3.24 “चन्दन-वत्,” जैसे चन्दन का लेप शरीर के एक-भाग पर, मगर ठंडक पूरे शरीर को feel होती है, वैसे ही जीव-अणु पर एक-spot पर, मगर “गुणाद्” व्याप्ति। 2.3.25-29 अन्य अनेक sub-objections का जवाब।

दिल्ली में आज: यह metaphysical-issue है। अद्वैत-position में स्वरूप-से Brahman-identical, मगर “देह-attached state” में सीमित-दिखता है।

2.3.30-2.3.32

जीव-गुण-धर्म अधिकरण

2.3.30यावदात्म-भावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥
2.3.31पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्ति-योगात् ॥
2.3.32नित्योपलब्ध्यनुपलब्धि-प्रसङ्गोऽन्यतर-नियमो वाऽन्यथा ॥

2.3.30 “यावत्-आत्म-भावित्व,” जीव के साथ “उपाधि” (देह-इन्द्रिय) हमेशा हैं, इसी से कोई-दोष नहीं। 2.3.31 “पुंस्त्वादि-वत्,” जैसे पुरुष-स्त्री-गुण latent-होते हैं और age-specific-time पर abhivyakta, ऐसे ही जीव-गुण। 2.3.32 कोई कहे “हमेशा-उपलब्ध” या “कभी-नहीं” का problem, बादरायण: “अन्यतर-नियम” से।

2.3.33-2.3.39

कर्ता अधिकरण: जीव कर्ता

2.3.33कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥
2.3.34विहारोपदेशात् ॥
2.3.35उपादानात् ॥
2.3.36व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देश-विपर्ययः ॥
2.3.37उपलब्धिवदनियमः ॥
2.3.38शक्ति-विपर्ययात् ॥
2.3.39समाध्यभावाछ ॥

जीव “कर्ता” है, यानी अपने-कर्मों का author। बादरायण के सात evidence: 2.3.33 शास्त्र (कर्म-काण्ड) का sense ही तब है जब कर्ता हैं। 2.3.34 “विहार” (movement) का उपदेश। 2.3.35 “उपादान” (taking-on)। 2.3.36 क्रिया-में जीव का व्यपदेश। 2.3.37 उपलब्धि-वत् भी विभिन्न। 2.3.38 शक्ति-distinction। 2.3.39 ध्यान-समाधि possible इसी कारण।

2.3.40

लीला अधिकरण

2.3.40यथा च तक्षोभयथा ॥

“तक्ष” (carpenter) के example से, जैसे carpenter के पास “करण” (tools) और “अंग” (हाथ) दोनों हैं, ऐसे ही जीव कर्म-tools rakhता है।

2.3.41-2.3.42

पर-आधीन अधिकरण: जीव-कर्ता-शक्ति Brahman-dependent

2.3.41परात्तु तच्छ्रुतेः ॥
2.3.42कृत-प्रयत्नोपेक्षस्तु विहित-प्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥

जीव कर्ता है, मगर “पर” (Brahman) से। 2.3.41 “परात्,” Brahman से अधिकार। 2.3.42 “कृत-प्रयत्न-उपेक्ष,” यानी Brahman जीव के पूर्व-कर्म-prayatna को “watch” करता है, उसी अनुसार result देता है। यह “वैधा-कर्म” (vedic-prescribed) और “प्रतिषिद्ध-कर्म” (prohibited) के meaning को preserve करता है।

दिल्ली में आज: एक नमूना, जैसे एक employee अपने-काम के कर्ता है, मगर employer के guidelines-within। Brahman-जीव-relation analogous।

2.3.43-2.3.50

अंश-अधिकरण: जीव Brahman का अंश

2.3.43अंशो नाना-व्यपदेशादन्यथा चापि दाश-कितवादित्वमधीयत एके ॥
2.3.44मन्त्र-वर्णात् ॥
2.3.45अपि स्मर्यते ॥
2.3.46प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥
2.3.47स्मरन्ति च ॥
2.3.48अनुज्ञा-परिहारौ देह-सम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॥
2.3.49असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥
2.3.50आभास एव च ॥

जीव Brahman का “अंश” है। 2.3.43 श्रुति में “एक तरफ़ भेद, दूसरी तरफ़ अभेद” मिलता है, इसका explanation “अंश” है। कुछ शाखाओं में जीव को “दाश” (fisherman) या “कितव” (gambler) कहा गया है, यह “गुणत्व” के context में।

2.3.44 “मन्त्र-वर्ण” (पुरुष-सूक्त “पादोऽस्य विश्वा भूतानि”), जगत् Brahman-का-एक-चरण-मात्र। 2.3.45 स्मृति (गीता 15.7, “ममैवांशो जीवलोके”) से confirm। 2.3.46 “प्रकाश-वत्,मगर “प्रकाश-अंश” है, वैसे ही जीव-Brahman-अंश। 2.3.47 अन्य-स्मृति-references। 2.3.48 जीव के “अनुज्ञा-परिहार,” देह-सम्बन्ध के कारण। 2.3.49 “अव्यतिकर,” जीव-दुख Brahman-को-नहीं। 2.3.50 जीव “आभास” (reflection), जैसे आइने में सूर्य।

संगति: भगवद् गीता 15.7, “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।”

2.3.51-2.3.53

अदृष्ट-नियम अधिकरण: closing

2.3.51अदृष्टानियमात् ॥
2.3.52अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥
2.3.53प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥

जीव-अनुभव अदृष्ट (कर्म-समूह) से नियमित, हर जीव-specific। 2.3.51 अदृष्ट-निरयम। 2.3.52 “अभिसन्धि” (intention) में भी ऐसा। 2.3.53 स्थान-difference से difference नहीं, क्योंकि सब Brahman-अन्तर्भाव।

पाद 4 · इन्द्रियाँ और प्राण

11-इन्द्रियाँ (5-ज्ञान + 5-कर्म + मन) और मुख्य-प्राण, सब Brahman-से उत्पन्न। 5-वृत्तियाँ (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान)। हर-इन्द्रिय की अधिष्ठान-देवता। त्रिवृत्करण-doctrine। यह पाद relatively-shorter है।

2.4.1-2.4.4

प्राण-उत्पत्ति अधिकरण: इन्द्रियों का origin

2.4.1तथा प्राणाः ॥
2.4.2गौण्यसम्भवात् ॥
2.4.3प्रतिज्ञानुपरोधाच्च ॥
2.4.4तत्प्राक्श्रुतेश्च ॥

पाद 4 का प्रारम्भ। यहाँ “प्राण” शब्द से 11-इन्द्रियाँ (5-कर्म, 5-ज्ञान, 1-मन) और एक “मुख्य-प्राण” समझा जाता है।

2.4.1 आकाश आदि की तरह, “प्राण” (इन्द्रियाँ) भी Brahman से उत्पन्न। 2.4.2 कोई कहे “नित्य” है, बादरायण: यह gauna (secondary) sense में, या कारण-में-already-presence। 2.4.3 प्रतिज्ञा का anuparodha। 2.4.4 “तत्-प्राक्-श्रुति,” पहले-cited श्रुति से।

2.4.5

वाच-इन्द्रिय अधिकरण

2.4.5तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥

वाक्-इन्द्रिय भी Brahman-से, अग्नि-from। “तत्-पूर्वकत्व,” cause-priority।

2.4.6

सप्त-प्राण अधिकरण

2.4.6सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥

मुण्डक 2.1.8 में “सप्त-प्राण” कहा गया है, सात-इन्द्रियाँ (5-ज्ञान + वाक् + मन)। बाक़ी इन्द्रियाँ implicit।

2.4.7

हस्त-आदि अधिकरण: कर्म-इन्द्रियाँ

2.4.7हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥

हाथ-पैर-वाक्-गुदा-उपस्थ, ये 5 कर्म-इन्द्रियाँ। ये भी Brahman-से।

2.4.8

अणुत्व अधिकरण: इन्द्रियाँ अणुवत्

2.4.8अणवश्च ॥

इन्द्रियाँ “अणु” यानी subtle। सूक्ष्म-शरीर-component।

2.4.9

श्रेष्ठ-प्राण अधिकरण: मुख्य-प्राण

2.4.9श्रेष्ठश्च ॥

“मुख्य-प्राण” यानी life-force (vayu-समूह) “श्रेष्ठ” है, सब-इन्द्रियों का leader। यह भी Brahman-से।

2.4.10-2.4.12

मुख्य-प्राण vs वायु अधिकरण

2.4.10न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥
2.4.11चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥
2.4.12अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥

पूर्व-पक्ष: मुख्य-प्राण actually वायु-element ही है, तो “पृथग्-उत्पत्ति” क्यों? बादरायण: 2.4.10 उपनिषद् में “पृथक्-उपदेश,” वायु से अलग। 2.4.11 चक्षु आदि की तरह, साथ-mention होने से एक नहीं। 2.4.12 “अकरणत्व,” मुख्य-प्राण कोई-इन्द्रिय नहीं, इसी कारण कोई-दोष नहीं।

2.4.13-2.4.14

पञ्च-वृत्ति अधिकरण: 5-वृत्तियाँ

2.4.13पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॥
2.4.14अणुश्च ॥

मुख्य-प्राण की 5-वृत्तियाँ: प्राण (inhalation), अपान (excretion), समान (digestion), उदान (rising), व्यान (circulation)। 2.4.14 ये भी “अणु,” subtle।

दिल्ली में आज: हठ-योग और प्राणायाम-practice में ये 5-vrittis foundational हैं।

2.4.15-2.4.16

ज्योति-आदि-अधिष्ठान अधिकरण: deities

2.4.15ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥
2.4.16प्राणवता शब्दात् ॥

हर इन्द्रिय की “अधिष्ठान-देवता” है, जैसे आँख-सूर्य, कान-दिशाएँ, मन-चन्द्र, वाक्-अग्नि। 2.4.16 इन्द्रियों के साथ “प्राणवत्” यह deity-दिशा-mediated relation।

दिल्ली में आज: यह Vedic-cosmology का part है, हर sense-organ macrocosm-microcosm correspondence।

2.4.17

नित्यत्व अधिकरण

2.4.17तस्य च नितयत्वात् ॥

मुख्य-प्राण का “नित्यत्व,” Brahman-attached, अमर।

2.4.18-2.4.20

इन्द्रियाँ separate अधिकरण

2.4.18त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥
2.4.19भेद-श्रुतेः ॥
2.4.20वैलक्षण्याच्च ॥

पूर्व-पक्ष: सब-इन्द्रियाँ “प्राण” का ही modification हैं। बादरायण: 2.4.18 ये “इन्द्रियाणि,” यानी separate, मुख्य-प्राण से। 2.4.19 श्रुति में “भेद-व्यपदेश।” 2.4.20 “वैलक्षण्य,” functions-में difference।

2.4.21-2.4.22

त्रिवृत्करण अधिकरण: 3-fold-mixing

2.4.21संज्ञा-मूर्ति-क्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥
2.4.22मांसादि भौमं यथा-शब्दमितरयोश्च ॥

छान्दोग्य 6.3-6.5 में “त्रिवृत्करण” का concept है, तेजः-आपः-अन्न तीनों mixing से सब-substances बनती हैं। 2.4.21 “संज्ञा-मूर्ति-क्लृप्ति,” नाम-रूप का formation इसी से। 2.4.22 मांस-आदि (food-derived) पृथिवी-form, अन्य-substances के लिए भी same-rule।

दिल्ली में आज: यह Vedic-proto-chemistry है। बादरायण की sophistication का स्तर देखिए, 5वीं-सदी ईसा-पूर्व में।

2.4.23

विशेषत्व अधिकरण: closing

2.4.23वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥

अध्याय 2 का closing-double-वाक्य। “विशेष्यात्,” यानी विशेषत्व से, “तद्-वादः तद्-वादः,” यानी इसी position को confirm करते हैं।

अब अध्याय 3 का प्रारम्भ होंगे, “साधन।” यानी Brahman-realisation का साधन क्या।

साथ में पढ़ें

स्रोत: देवनागरी Sanskrit text from sanskritdocuments.org।

परंपरा: ब्रह्म सूत्र अध्याय 2 (अविरोध)। बादरायण-व्यास।

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