अध्याय 3 (साधन) · ब्रह्म सूत्र

ब्रह्म सूत्र · अध्याय 3

साधन

ब्रह्म-realization का साधन · 4 पाद, ~190 सूत्र, सबसे लम्बा अध्याय

पढ़ने का समय: लगभग 2.5 घंटे

इस अध्याय का काम

अध्याय 3 “साधन” है, यानी “means to realization।” यह बादरायण की text का सबसे लम्बा अध्याय है, 190 सूत्र।

पाद 1 मरते-समय जीव के साथ क्या जाता है, transmigration-mechanism (पञ्चाग्नि-विद्या), अनुशय-वाला कर्म-शेष, सात-नरक की कथा, और “रेतः-योग” (नया जन्म कैसे)।

पाद 2 Brahman-as-सगुण-vs-निर्गुण, स्वप्न-state, सुषुप्ति-state, मूर्छित-state, सूर्य-water-reflection-image जैसे अद्वैत-illustrations, और कर्म-फल कौन देता है।

पाद 3 सबसे लम्बा पाद (68 सूत्र), उपनिषद्-विद्याओं का distinctness-vs-unity discussion। यह very-technical Vedantic-debate है।

पाद 4 मुख्य-question: विद्या (Brahman-knowledge) कर्म-काण्ड का अंग है या independent-purushartha? आश्रम-कर्म-रोल। संन्यास-अधिकार। आपद्-धर्म। मुक्ति-फल-अनियम।

पाद 1 · मरते-समय जीव की journey

पञ्चाग्नि-विद्या (छान्दोग्य 5.3-10) का formal-exposition। जीव कैसे “रंहति” (तेज़ी-से जाता) “त्र्यात्मक-सूक्ष्म-शरीर” के साथ, कर्म-शेष कैसे carry होते हैं, सात-नरकों का mention, और रेतः-योग के through नया-जन्म।

3.1.1-3.1.7

तदन्तर-प्रतिपत्ति अधिकरण: मरते-समय जीव के साथ क्या जाता है

3.1.1तदन्तर-प्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्न-निरूपणाभ्याम् ॥
3.1.2त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥
3.1.3प्राण-गतेश्च ॥
3.1.4अग्न्यादि-गति-श्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॥
3.1.5प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥
3.1.6अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥
3.1.7भाक्तं वाऽनात्म-वित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॥

अध्याय 3 शुरू। पहला बड़ा topic, जीव के मरते समय का transition। छान्दोग्य 5.10 का “पञ्चाग्नि-विद्या” इसका base है, जहाँ ब्रह्मा ने पूछा “मरने के बाद जीव कहाँ जाता है?” और याज्ञवल्क्य ने पाँच-अग्नियों का explanation दिया।

3.1.1 “तदन्तर-प्रतिपत्ति,” यानी देह-छोड़ने और नया-देह-पाने के बीच का transition। जीव “रंहति” (तेज़ी से जाता है), “सम्परिष्वक्त” (आवृत्त, घिरा हुआ) “भूत-सूक्ष्म” तत्त्वों से। यह सूक्ष्म-शरीर ही next जन्म में नया-स्थूल-शरीर का “seed” बनेगा।

3.1.2 “त्र्यात्मक,” यानी तीन-तत्त्व (तेजः, आपः, अन्न) से बना सूक्ष्म-शरीर। 3.1.3 प्राण-गति इसी सूक्ष्म-शरीर के साथ। 3.1.4 कोई कहे अग्नि-आदि भी “गति” करते हैं, बादरायण: “भाक्त” (secondary) sense में। 3.1.5 पहले-अग्नि में sutra-mention नहीं, परन्तु इसी से explanation। 3.1.6 इष्ट-आदि-कर्म करने वालों की prateeti। 3.1.7 भाक्तत्व, क्योंकि वे अनात्म-वित्त।

दिल्ली में आज: यह “rebirth-mechanism” का formal-Vedic-explanation है।एक specific subtle-body-transition है।

संगति: छान्दोग्य 5.3-10 (पञ्चाग्नि-विद्या)। बृहदारण्यक 4.4.1-6 (मरते-समय का वर्णन)।

3.1.8-3.1.11

कृत-अत्यय अधिकरण: कर्म ख़त्म होने पर क्या

3.1.8कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्ट-स्मृतिभ्याम् ॥
3.1.9यथेतमनेवं च ॥
3.1.10चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजनिः ॥
3.1.11आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥

जीव अपने पुण्य-कर्म-फल भोग कर स्वर्ग में रहता है। पर वो “अनन्त” नहीं। पुण्य-कर्म ख़त्म होने पर क्या होता है?

3.1.8 “कृतात्यय,” कर्म-समाप्ति। तब जीव “अनुशयवान्,” यानी कुछ-कर्म बच जाते हैं (जो भोगे नहीं गए), उन्हीं के साथ नया जन्म। 3.1.9 “यथेतम् अनेवं च,” जिस-तरह से आया था (श्रद्धा, यज्ञ-तत्त्व) उससे उल्टे-क्रम से लौटता है, और नया-जन्म होता है। 3.1.10 कार्ष्णाजनि का view: “चरण” शब्द उपलक्षण-अर्थ में। 3.1.11 इस-explanation में “आनर्थक्य” नहीं, क्योंकि अनुशय पर depend।

3.1.12-3.1.21

अनिष्ट-कारी अधिकरण: bad-karma वाले

3.1.12सुकृत-दुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥
3.1.13अनिष्टादि-कारिणामपि च श्रुतम् ॥
3.1.14संयमने त्वनुभूयेतरेषाम् आरोहावरोहौ तद्गति-दर्शनात् ॥
3.1.15स्मरन्ति च ॥
3.1.16अपि सप्त ॥
3.1.17तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥
3.1.18विद्या-कर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥
3.1.19न तृतीये तथोपलब्धेः ॥
3.1.20स्मर्यतेऽपि च लोके ॥
3.1.21दर्शनाच्च ॥

जो पुण्य-कर्म नहीं करते (अनिष्ट-कारी), वो कहाँ जाते हैं?

3.1.12 बादरि-आचार्य: सिर्फ़ “सुकृत-दुष्कृत” (पुण्य-पाप) ही उत्थान-पतन के कारण। 3.1.13 श्रुति में अनिष्ट-कारी का भी mention। 3.1.14 “संयमन” (यम-नियंत्रण) के दौरान अनुभव, और “इतर” (दूसरों के लिए) उत्थान-अवरोह। 3.1.15 स्मृति-भी confirm। 3.1.16 “सप्त-नरक” (7 hells)। 3.1.17 तद्-व्यापार से अविरोध। 3.1.18 “विद्या-कर्म” का prakaran। 3.1.19 तीसरे-स्थान (देव-योनि-पितृ-योनि-के-अलावा) में नहीं। 3.1.20-21 लोक-स्मृति और दर्शन।

दिल्ली में आज: punishment-system के साथ बहुत-Cultures का एक common-theme। Vedic-system में यह systematic है।

3.1.22-3.1.27

तत्साभाव्य अधिकरण: jiva का अगला-शरीर

3.1.22तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ॥
3.1.23स्मरणाच्च ॥
3.1.24तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥
3.1.25नातिचिरेण विशेषात् ॥
3.1.26अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥
3.1.27अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥

3.1.22 तीसरे-स्थान में जो “संशोक-ज” (शोक-जन्य) entities हैं, उन्हें शब्द से “अवरोध।” 3.1.23 स्मृति। 3.1.24 “तत्-साभाव्यापत्ति,” next-शरीर पिछले-कर्म के nature का बन जाता है। 3.1.25 “अति-चिर” नहीं, बहुत-देर नहीं रहता। 3.1.26 “अन्य-अधिष्ठितेषु,” ऐसे-शरीरों में पहले-तरह abhilapa। 3.1.27 कोई कहे “अशुद्ध” (impure) यह transition, बादरायण: शब्द-pramana से, no problem।

3.1.28-3.1.29

रेतः-योग अधिकरण: नया-शरीर कैसे बनता

3.1.28रेतः सिग्योगोऽथ ॥
3.1.29योनेः शरीरम् ॥

3.1.28 “रेतः-सिक्-योग,” reproduction-cycle के through जीव entry करता है। 3.1.29 “योनेः शरीरम्,” माँ-योनि से शरीर। यानी पंच-अग्नि के through (माँ-योनि = आख़िरी-fire), नया-शरीर अंगीकार।

संगति: छान्दोग्य 5.10.6, “इह स्त्री वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिर्ज्वालो यदन्तःकरोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः।” यह पञ्चाग्नि का final-fire।

पाद 2 · Brahman-as-सगुण-निर्गुण और चेतना-states

स्वप्न को “माया-मात्र” बताना, सुषुप्ति-as-Brahman-merge, सूर्य-reflection-analogy से अद्वैत-illustration, और कर्म-फल-दाता-as-Brahman का बादरायण-position।

3.2.1-3.2.6

स्वप्न-अधिकरण: स्वप्न-state में जीव

3.2.1द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥
3.2.2निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥
3.2.3माया-मात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्त-स्वरूपत्वात् ॥
3.2.4सूचकश्च हि श्रुतेः आचक्षते च तद्विदः ॥
3.2.5पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्ध-विपर्ययौ ॥
3.2.6देह-योगाद्वासोऽपि ॥

पाद 2 शुरू। पहले स्वप्न-state पर discussion। बृहदारण्यक 4.3 का “स्वप्न-वर्णन” इसका base है।

3.2.1 “द्युभ्व-आदि-आयतन,” जीव स्वप्न में अपने-अंदर ही “दूसरी-दुनिया” create करता है, जैसे जागते-समय में बाहर। 3.2.2 कुछ शाखाओं में जीव को “निर्माता” कहा गया है, पुत्र-आदि भी create करता है (स्वप्न में)। 3.2.3 बादरायण: यह “माया-मात्र,” इसमें complete-realization नहीं। यह very-important सूत्र है, यहीं “माया” शब्द first time आता है।

3.2.4 “सूचक,” स्वप्न कभी “indicator” भी होते हैं (शुभ-अशुभ predictions), यह शास्त्र और तद्-विद् (knowers) कहते हैं। 3.2.5 “पर-अभिध्यान,” Brahman की shakti से ही जीव-बद्धावस्था और मुक्त-अवस्था। 3.2.6 “देह-योग-वास,” देह में रहते हुए।

दिल्ली में आज: स्वप्न-experience बहुत-philosophical है। हम “दूसरी-दुनिया” अंदर ही बनाते हैं, और कुछ-time वो “real” लगती है। उपनिषद् कहती है, जागृत-अवस्था भी एक “बड़ी-स्वप्न” है, जो ब्रह्म-realization से dissolve होती है।

संगति: बृहदारण्यक 4.3 (याज्ञवल्क्य-जनक संवाद on three-states)। माण्डूक्य उपनिषद् (4-states: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय)।

3.2.7-3.2.9

सुषुप्ति अधिकरण: deep-sleep में

3.2.7तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेः आत्मनि च ॥
3.2.8अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥
3.2.9स एव तु कर्मानुस्मृति-शब्द-विधिभ्यः ॥

सुषुप्ति-state में जीव कहाँ है?

3.2.7 श्रुति कहती है, “तद्-अभाव” (अनुभव-अभाव) “नाडियों में” होता है, या “आत्मा में।” Brahman-में-merge की state। 3.2.8 “अतः-प्रबोध,” इसी से जागना होता है। 3.2.9 “स एव तु,” जागने पर वही-जीव वापस, क्योंकि कर्म-अनुस्मृति-शब्द-विधि सब उसी पर apply।

दिल्ली में आज: deep-sleep हर रात होती है, मगर हम “नहीं” थे, फिर “वापस” आते हैं। यह “वापस-आना” का mechanism Brahman-merge-and-emerge की theory से explain होता है।

3.2.10

मुग्ध अधिकरण: मूर्छित-state

3.2.10मुग्धेऽर्ध-सम्पत्तिर्परिशेषात् ॥

“मुग्ध” यानी मूर्छित (faint, coma)। यह सुषुप्ति नहीं, मृत्यु नहीं, बीच का state। बादरायण: “अर्ध-सम्पत्ति,” half-merge, बाक़ी-options के elimination से।

3.2.11-3.2.21

उभय-लिङ्ग अधिकरण: Brahman सगुण भी निर्गुण भी

3.2.11न स्थानतोऽपि परस्योभय-लिङ्गं सर्वत्र हि ॥
3.2.12न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥
3.2.13अपि चैवमेके ॥
3.2.14अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥
3.2.15प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥
3.2.16आह च तन्मात्रम् ॥
3.2.17दर्शयति चाथोऽपि स्मर्यते ॥
3.2.18अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥
3.2.19अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥
3.2.20वृद्धि-ह्रास-भाक्त्वमन्तर्भावात् उभय-सामञ्जस्यादेवम् ॥
3.2.21दर्शनाच्च ॥

अद्वैत-vedanta का सबसे central debate। Brahman दो-तरह से describe होता है: “सगुण” (with-attributes) और “निर्गुण” (without-attributes)। दोनों में real कौन?

3.2.11 Brahman का “उभय-लिङ्ग” (both-attribute) सर्वत्र है, स्थान-tied नहीं। 3.2.12 “भेद” नहीं, क्योंकि हर-place “प्रत्येक” का “अ-तद्-वचन।” 3.2.13 कुछ शाखाएँ इसी-way पढ़ती हैं। 3.2.14 “अरूप-वत्,” वास्तव में Brahman रूप-रहित है, “तत्-प्रधानत्व,” यह primary। 3.2.15 “प्रकाश-वत्,” प्रकाश की तरह।

3.2.16 “तन्-मात्रम्,” वही-मात्र। 3.2.17 श्रुति + स्मृति दोनों यही कहती हैं। 3.2.18 “उपमा सूर्यकादिवत्,” जैसे सूर्य पानी में reflect होता है, multiple-दिखता है, मगर एक है। 3.2.19 “अम्बुवत् अग्रहणात्,” पानी की उपमा limited, क्योंकि Brahman पकड़ा नहीं जाता। 3.2.20 “वृद्धि-ह्रास-भाक्त्व,” water-reflection वाला बढ़ता-घटता है (lake-pond), Brahman नहीं। 3.2.21 श्रुति-दर्शन।

दिल्ली में आज: यह “सगुण-निर्गुण” debate हर भारतीय-spiritual की परम्परा में चलती है। शंकर: निर्गुण-Brahman वस्तुतः-सत्य, सगुण उपासना-के-लिए। रामानुज: सगुण actually-Brahman, निर्गुण उसका-aspect-मात्र। बादरायण कुछ-ambiguity रखते हैं।

3.2.22-3.2.30

अव्यक्त-Brahman अधिकरण

3.2.22प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥
3.2.23तदव्यक्तमाह हि ॥
3.2.24अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥
3.2.25प्रकाशवच्चावैशेष्यं ॥
3.2.26प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥
3.2.27अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥
3.2.28उभय-व्यपदेशात्तु अहि-कुण्डलवत् ॥
3.2.29प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥
3.2.30पूर्ववद्वा ॥

3.2.22 “प्रकृत-इतावत्त्व,” पहले-described limited-Brahman का “प्रतिषेध,” फिर “भूयः” आगे और-कुछ। यानी सगुण-वर्णन के बाद, श्रुति निर्गुण भी कहती है। 3.2.23 “अव्यक्त,” unmanifest Brahman। 3.2.24 “संराधन” (deep-meditation) में direct-experience। 3.2.25 “प्रकाश-वत्,” प्रकाश-तरह “अवैशेष्य” (no-distinction)। 3.2.26 “कर्म-अभ्यास” से। 3.2.27 “अनन्त” से। 3.2.28 “उभय-व्यपदेश,” “अहि-कुण्डलवत्” (साँप और उसकी coiled-shape), दोनों कह सकते हैं। 3.2.29 “प्रकाश-आश्रय-वत्।” 3.2.30 पहले-वर्णित-तरह।

3.2.31-3.2.38

अहि-कुण्डल अधिकरण

3.2.31प्रतिषेधाच्च ॥
3.2.32परमतस्सेतून्मान-सम्बन्ध-भेद-व्यपदेशेभ्यः ॥
3.2.33दर्शनात् ॥
3.2.34बुद्ध्यर्थः पादवत् ॥
3.2.35स्थान-विशेषात्प्रकाशादिवत् ॥
3.2.36उपपत्तेश्च ॥
3.2.37तथाऽन्य-प्रतिषेधात् ॥
3.2.38अनेन सर्वगतत्वमायाम-यश-शब्दादिभ्यः ॥

इस-cluster में फिर “सगुण-निर्गुण” का defense। 3.2.31 निर्गुण-position-against का प्रतिषेध। 3.2.32 “परमत-सेतून्मान-सम्बन्ध,” highest-Brahman seemingly-spatial-attributes from। 3.2.33 श्रुति-दर्शन। 3.2.34 “बुद्ध्यर्थ,” understanding-purpose for “पादवत्” (4-pad-रूप)। 3.2.35 “स्थान-विशेष,” location-specific। 3.2.36 उपपत्ति। 3.2.37 अन्य-प्रतिषेध। 3.2.38 “अनेन सर्वगतत्व,” इसी से सर्वगतत्व सिद्ध।

3.2.39-3.2.42

फल अधिकरण: कर्म-फल Brahman देता है

3.2.39फलमत उपपत्तेः ॥
3.2.40श्रुतत्वाच्च ॥
3.2.41धर्मं जैमिनिः अत एव ॥
3.2.42पूर्वं तु बादरायणो हेतु-व्यपदेशात् ॥

पाद 2 का closing। कर्म-फल कौन देता है, “अदृष्ट” (कर्म-residue) अपने-आप, या Brahman?

3.2.39 “फलम् अतः उपपत्तेः,” फल Brahman से, क्योंकि otherwise possible नहीं। 3.2.40 श्रुति-stated। 3.2.41 जैमिनि का view: “धर्म” (कर्म) ही फल देता है, automatic। 3.2.42 “पूर्वं तु बादरायणः,” बादरायण कहते हैं, “हेतु-व्यपदेश,” Brahman ही असली-कारण।

अद्वैत-position: Brahman ही ultimately फल-दाता है, कर्म तो उसका “सूचक” (indicator)। यह subtle-distinction है। कर्म-determinism नहीं, ईश्वर-mediated।

पाद 3 · उपनिषद्-विद्याओं का unity

सब-वेदान्त-passages एक-ही ब्रह्म-knowledge पर convergent। एक-विद्या-from-multiple-शाखाओं के parts combine, फिर distinct-विद्याओं का distinct-treatment। यह पाद 68-सूत्रों-का है, सबसे technical।

3.3.1-3.3.5

सर्व-वेदान्त-प्रत्यय अधिकरण: सब उपनिषद्-विद्याएँ एक

3.3.1सर्व-वेदान्त-प्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥
3.3.2भेदान्नेति चेदेकस्यामपि ॥
3.3.3स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च ॥
3.3.4सलिलवच्च तन्नियमः ॥
3.3.5दर्शयति च ॥

पाद 3 शुरू। यह सबसे लम्बा पाद, 68 सूत्र। यहाँ बादरायण “विद्या” (specific उपासना-meditation-techniques) का discussion करते हैं। मुख्य question, क्या एक ही विद्या अलग-अलग शाखाओं में अलग-तरह से बताई गई है, या ये अलग-अलग विद्याएँ हैं?

3.3.1 “सर्व-वेदान्त-प्रत्यय,” सब उपनिषदें एक ही Brahman-knowledge पर convergent हैं, “चोदना” (injunctions) सब common। 3.3.2 कोई कहे “भेद” है, बादरायण: एक-में-भी हो सकता है। 3.3.3 स्वाध्याय-rules से evidence। 3.3.4 “सलिल-वत्,” water की तरह सब-rivers same-ocean-meet। 3.3.5 श्रुति-दर्शन।

दिल्ली में आज: यह बहुत Hindu की परम्परा का foundational-दावा है, “सब-paths एक-mountain-top पर पहुँचते हैं।” मगर बादरायण specifically उपनिषद्-internal-दावा कर रहे हैं।

3.3.6-3.3.10

उपसंहार अधिकरण: एक-विद्या के अंग सब-शाखाओं में

3.3.6उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधि-शेषवत् समाने च ॥
3.3.7अन्यथात्वं च शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥
3.3.8न वा प्रकरण-भेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ॥
3.3.9संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥
3.3.10प्राप्तेश्च समञ्जसम् ॥

जब एक-विद्या अलग-शाखाओं में अलग-संस्करण में मिले, तो उसके सब-गुण combine किए जाते हैं। 3.3.6 “उपसंहार,” संक्षेप-संग्रह। 3.3.7 कोई कहे “अन्यथात्व” (difference), बादरायण: “अविशेष” से नहीं। 3.3.8 “प्रकरण-भेद” से difference अगर हो, “परोवरीयस्त्वादिवत्,” तो अलग। 3.3.9 “संज्ञा” अलग, मगर substance same। 3.3.10 “प्राप्ति” से सही।

3.3.11-3.3.14

सर्व-अभेद अधिकरण: Brahman के foundational-गुण सब-जगह

3.3.11सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥
3.3.12आनन्दादयः प्रधानस्य ॥
3.3.13प्रिय-शिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥
3.3.14इतरे त्वर्थ-सामान्यात् ॥

3.3.11 कुछ-गुण (जैसे सत्यत्व, ज्ञानत्व, अनन्तत्व) हर-Brahman-meditation में belong करते हैं। 3.3.12 “आनन्दादि” (आनन्द, ज्ञान) “प्रधान” Brahman के foundational-गुण। 3.3.13 “प्रिय-शिरस्त्वादि” subtle-distinctions उपासना-specific हैं। 3.3.14 “इतर” (अन्य) “अर्थ-सामान्यात्” से।

3.3.15-3.3.18

आत्म-शब्द अधिकरण: “आत्मा” शब्द कहीं भी Brahman

3.3.15आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥
3.3.16आत्म-शब्दाच्च ॥
3.3.17आत्म-गृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥
3.3.18अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥

3.3.15 जब उपनिषद् कहती है “ध्यान करो,” तो किसी specific-purpose के अभाव से, सीधा Brahman-ध्यान। 3.3.16 “आत्म-शब्द” से confirm, जहाँ-भी “आत्मा” शब्द आता है, Brahman की reference। 3.3.17 “आत्म-गृहीति,” आत्मा-as-self-reference, अन्य-तरह नहीं। 3.3.18 “अन्वय” से समझ।

3.3.19-3.3.22

कार्याख्यान अधिकरण: निरुक्तम्-meaning

3.3.19कार्याख्यानादपूर्वम् ॥
3.3.20समान एवञ्चाभेदात् ॥
3.3.21सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥
3.3.22न वा विशेषात् ॥

3.3.19 “कार्य-आख्यान,” result-description “अपूर्व” (unprecedented) हो सकता है। 3.3.20 “समान,” जब topic-समान हो, “अभेद” से एक। 3.3.21 “सम्बन्ध” से confirm। 3.3.22 या “विशेष” से difference।

3.3.23-3.3.42

विद्या-विशेष-समूह अधिकरण: कई विद्याएँ

3.3.23दर्शयति च ॥
3.3.24सम्भृति-द्युव्याप्त्यपि चातः ॥
3.3.25पुरुष-विद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥
3.3.26वेधाद्यर्थ-भेदात् ॥
3.3.27हानौ तूपायन-शब्द-शेषात् कुशाच्छन्दः-स्तुत्युपगानवत् तदुक्तम् ॥
3.3.28साम्पराये तर्तव्याभावात् तथा ह्यन्ये ॥
3.3.29छन्दत उभयाविरोधात् ॥
3.3.30गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ॥
3.3.31उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेः लोकवत् ॥
3.3.32अनियमः सर्वेषामविरोधश्शब्दानुमानाभ्याम् ॥
3.3.33यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥
3.3.34अक्षर-धियां त्वविरोधः सामान्य-तद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् ॥
3.3.35इयदामननात् ॥
3.3.36अन्तरा भूत-ग्रामवदिति चेत् तदुक्तम् ॥
3.3.37अन्यथा भेदानुपपत्तिरितिचेन्नोपदेशवत् ॥
3.3.38व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरव्रत् ॥
3.3.39सैव हि सत्यादयः ॥
3.3.40कामादितरत्र तत्र च आयतनादिभ्यः ॥
3.3.41आदारादलोपः ॥
3.3.42उपस्थितेस्तद्वचनात् ॥

यह बहुत-बड़ा cluster है जहाँ बादरायण कई-विद्याओं का distinctness-vs-unity discuss करते हैं। 3.3.23 “दर्शयति,” श्रुति shows। 3.3.24 “सम्भृति-द्युव्याप्ति” specific-meditations। 3.3.25 “पुरुष-विद्या” (छान्दोग्य 3.16) के साथ अन्य-इतर के अनाम्नान। 3.3.26 “वेधादि” से अर्थ-भेद। 3.3.27 “उपायन-शब्द-शेष” से।

3.3.28 “साम्पराय” (मरते-समय) में “तर्तव्य” (कुछ-करने का) अभाव। 3.3.29 “छन्दतः” से उभय-विरोध-रहित। 3.3.30 “गति” का “अर्थवत्त्व।” 3.3.31 “लोक-वत्,” लौकिक-तरह।

3.3.32-42 इस-cluster में बादरायण “विद्या-rules” finalize करते हैं: अधिकारिक-स्थिति, अक्षर-धी, इयदाम्नान, आदर-से-अलोप, उपस्थिति, ये सब technical-rules।

दिल्ली में आज: यह बहुत-Vedic-दार्शनिक-technical है, साधक के लिए सीधा-relevance कम। मगर इन-rules से ही उपनिषद्-meditations systematically-organized रहे।

3.3.43-3.3.68

विद्या-संगठन अधिकरण: अंतिम-rules

3.3.43तन्निर्धारणार्थ-नियमस्तद्दृष्टेरपृथग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ॥
3.3.44प्रदानवदेव हि तदुक्तम् ॥
3.3.45लिङ्ग-भूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥
3.3.46पूर्व-विकल्पः प्रकरणात्स्यात्क्रिया-मानसवत् ॥
3.3.47अतिदेशाच्च ॥
3.3.48विद्यैव तु निर्धारणात् ॥
3.3.49दर्शनाच्च ॥
3.3.50श्रुत्यादि-बलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥
3.3.51अनुबन्धादिभ्यः ॥
3.3.52प्रज्ञान्तर-पृथक्त्ववद्दृष्टिश्च तदुक्तम् ॥
3.3.53न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्नहि लोकापत्तिः ॥
3.3.54परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥
3.3.55एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥
3.3.56व्यतिरेकस्तद्भाव-भावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥
3.3.57अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥
3.3.58मन्त्रादिवद्वाऽविरोधः ॥
3.3.59भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ॥
3.3.60नानाशब्दादि-भेदात् ॥
3.3.61विकल्पो विशिष्ट-फलत्वात् ॥
3.3.62काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्व-हेत्वभावात् ॥
3.3.63अङ्गेषु यथाश्रय-भावः ॥
3.3.64शिष्टेश्च ॥
3.3.65समाहारात् ॥
3.3.66गुण-साधारण्य-श्रुतेश्च ॥
3.3.67न वा तत्सह-भाव-श्रुतेः ॥
3.3.68दर्शनाच्च ॥

अंतिम-26 सूत्र पाद 3 के, जो specific-विद्याओं के application-rules हैं। यह बहुत-technical है, हम-यहाँ summary दे रहे हैं।

मुख्य-points: 3.3.43 “तद्-निर्धारण” का specific-नियम। 3.3.45 “लिङ्ग-भूयस्त्व,” indications-multiplicity stronger-evidence। 3.3.48 “विद्या ही” main, अन्य-supports नहीं। 3.3.55 एक-आत्मा per-शरीर, इसी कारण अनुभव। 3.3.57 “अंग-अवबद्ध” विद्याएँ शाखा-confined नहीं, सब-वेदों में। 3.3.61-62 “विकल्प” (option) रखी जा सकती है, mostly नहीं। 3.3.63-68 अंगों में आश्रय-भाव, शिष्टि, समाहार, गुण-साधारण्य-श्रुति, ये सब specific-application-rules।

दिल्ली में आज: यह पाद specifically-trained-vedantist-scholars के लिए है, सामान्य-reader के लिए less-relevant। यहाँ technical-Vedantic-internal-debates हैं।

पाद 4 · विद्या-as-पुरुषार्थ + संन्यास-debate

बादरायण-vs-जैमिनि के बीच “ज्ञान-only-mukti” vs “ज्ञान-कर्म-समुच्चय” का foundational-debate। ज्ञानी की “षट्-संपत्ति” requirement। आश्रम-कर्म-role। संन्यास-अधिकार। मुक्ति-timing।

3.4.1-3.4.8

पुरुषार्थ अधिकरण: विद्या ही मुक्ति-साधन

3.4.1पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः ॥
3.4.2शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ॥
3.4.3आचार-दर्शनात् ॥
3.4.4तच्छ्रुतेः ॥
3.4.5समन्वारम्भणात् ॥
3.4.6तद्वतो विधानात् ॥
3.4.7नियमाच्च ॥
3.4.8अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥

पाद 4 शुरू। मुख्य-question: विद्या (Brahman-knowledge) कर्म-काण्ड का “अंग” है, या independent-पुरुषार्थ? यह बहुत-important debate है मीमांसा vs vedanta।

3.4.1 बादरायण: “पुरुषार्थ” (independent-end), क्योंकि श्रुति-शब्द से। 3.4.2 जैमिनि (मीमांसक): “शेषत्व,” विद्या भी कर्म-काण्ड का “शेष” (अंग) है, “पुरुषार्थ-वाद” बस-तरह। 3.4.3 “आचार-दर्शन” से जैमिनि के favor में। 3.4.4 श्रुति-evidence। 3.4.5 “समन्वारम्भण।” 3.4.6 “तद्वत् विधान।” 3.4.7 “नियम।”

3.4.8 “अधिक-उपदेश,” बादरायण: श्रुति में additional-उपदेश हैं जो viद्या को independent बनाते हैं। यह view final-Vedanta-position है।

दिल्ली में आज: यह “ज्ञान-कर्म-समुच्चय” (combined) vs “ज्ञान-only” debate है। शंकर: ज्ञान-only। रामानुज और अन्य: combined। बादरायण-position यहाँ ambiguous, मगर शंकर-interpretation independent-knowledge की ओर।

संगति: गीता अध्याय 3-4-5 इसी debate में deep जाती है।

3.4.9-3.4.15

विभाग अधिकरण: कर्म और विद्या का distinction

3.4.9तुल्यं तु दर्शनम् ॥
3.4.10असार्वत्रिकी ॥
3.4.11विभागः शतवत् ॥
3.4.12अध्ययन-मात्रवतः ॥
3.4.13नाविशेषात् ॥
3.4.14स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥
3.4.15काम-कारेण चैके ॥

3.4.9 “तुल्य-दर्शन,” जैमिनि-position-evidence भी मिलता है। 3.4.10 “असार्वत्रिकी,” every-where नहीं। 3.4.11 “विभाग शतवत्,” 100-तरह से distinction possible। 3.4.12 “अध्ययन-मात्रवत्,” study-only वालों के लिए। 3.4.13 “नाविशेषात्,” no-specific-difference। 3.4.14 “स्तुति” के लिए “अनुमति।” 3.4.15 “काम-कार,” self-driven।

3.4.16-3.4.20

ऊर्ध्व-रेतस् अधिकरण: brahmacharya और ज्ञान

3.4.16उपमर्दं च ॥
3.4.17ऊर्ध्व-रेतस्सु च शब्दे हि ॥
3.4.18परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदिति हि ॥
3.4.19अनुष्ठेयं बादरायणः साम्य-श्रुतेः ॥
3.4.20विधिर्वा धारणवत् ॥

3.4.16 “उपमर्द,” पिछले-arguments का refinement। 3.4.17 “ऊर्ध्व-रेतस्सु,” brahmachari-renunciate-stages में भी Brahman-knowledge-eligibility, शब्द-evidence से। 3.4.18 जैमिनि: सिर्फ़ “परामर्श” (mention), “अचोदना” (no-injunction), यानी “अपवाद” (exception)। 3.4.19 बादरायण: नहीं, “अनुष्ठेय” (must-do), “साम्य-श्रुति” से, ज्ञान सब-आश्रमों में possible। 3.4.20 या “विधि” (positive-injunction), “धारणवत्।”

दिल्ली में आज: यह famous-debate, ज्ञान-eligibility केवल-संन्यासी या सब-आश्रमों के लोग? बादरायण: सब-आश्रम। यह householder-friendly-position है।

3.4.21-3.4.27

पारिप्लव अधिकरण: अनुष्ठान-rules

3.4.21स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥
3.4.22भाव-शब्दाच्च ॥
3.4.23पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥
3.4.24तथा चैकवाक्योपबन्धात् ॥
3.4.25अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥
3.4.26सर्वापेक्षा च यज्ञादि-श्रुतेः अश्ववत् ॥
3.4.27शमदमाद्युपेतः स्यात्तथाऽपि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥

3.4.21 कोई कहे विद्या-passages सिर्फ़ “स्तुति-मात्र,” बादरायण: “अपूर्वत्व” (newness) से नहीं। 3.4.22 “भाव-शब्द” से। 3.4.23 “पारिप्लव” (ritual-recitation) नहीं। 3.4.24 “एक-वाक्य-उपबन्ध।” 3.4.25 “अग्नि-इन्धन-अनपेक्षा,” ज्ञान-marg में अग्नि-rituals आवश्यक नहीं। 3.4.26 “सर्व-अपेक्षा,” यज्ञ-आदि-श्रुति “अश्व-वत्” (horse-symbol), जैसे यज्ञ-aid for खेती।

3.4.27 बहुत-important सूत्र। ज्ञानी “शम-दम-आदि-उपेत” (with-self-control) होंगे, “अवश्य-अनुष्ठेयत्व,” ये गुण must-have हैं। यह “षट्-संपत्ति” (six-fold-treasure) का foundation।

3.4.28-3.4.31

सर्वान्न अधिकरण: आहार-अनुमति

3.4.28सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥
3.4.29अबाधाच्च ॥
3.4.30अपि स्मर्यते ॥
3.4.31शब्दश्चातोऽकाम-चारे ॥

3.4.28 “सर्व-अन्न-अनुमति,” प्राण-अत्यय (life-threatening) में सब-food eatable। 3.4.29 “अबाध” से। 3.4.30 स्मृति। 3.4.31 शब्द से “अकाम-चार” (no-arbitrary-action), यानी सिर्फ़-emergency में।

दिल्ली में आज: यह “आपद्-धर्म” का concept है। आम-conditions में strict-rules, मगर crisis में flexibility।

3.4.32-3.4.39

आश्रम-कर्म अधिकरण: कर्म ज्ञान-aid

3.4.32विहितत्वाच्चाश्रम-कर्मापि ॥
3.4.33सहकारित्वेन च ॥
3.4.34सर्वथापि तु त एवोभय-लिङ्गात् ॥
3.4.35अनभिभवं च दर्शयति ॥
3.4.36अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥
3.4.37अपि स्मर्यते ॥
3.4.38विशेषणानुग्रहं च ॥
3.4.39अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च ॥

3.4.32 “आश्रम-कर्म,” varna-ashrama-prescribed कर्म भी “विहित” (prescribed)। 3.4.33 “सहकारी” यानी ज्ञान-aid। 3.4.34 “उभय-लिङ्ग,” दोनों-direction-evidence। 3.4.35 “अनभिभव,” कर्म-doing-while-ज्ञान possible। 3.4.36 “अन्तरा,” बीच-state में भी। 3.4.37 स्मृति। 3.4.38 “विशेषण-अनुग्रह।” 3.4.39 “इतरत् ज्यायः,” dedicated-ज्ञान-marg better।

दिल्ली में आज: यह core-question है, “क्या-job करते-करते-Brahman-realization?” बादरायण-answer: हाँ-possible, मगर dedicated-renunciation-marg एक-tier-higher।

3.4.40-3.4.42

तद्भूत-अधिकार अधिकरण: संन्यास-अधिकार

3.4.40तद्भूतस्य तु तद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाऽभावेभ्यः ॥
3.4.41न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥
3.4.42उपपूर्वमपीत्येके भाव-शमनवत्तदुक्तम् ॥

3.4.40 “तद्-भूत,” जो संन्यासी बन गया, वो “तद्-भाव,” संन्यास-state में स्थिर। 3.4.41 “न च अधिकारिक,” संन्यासी re-householder नहीं हो सकता, “पतन-अनुमान।” 3.4.42 कुछ-शाखाएँ “उप-पूर्व” (initial) के बाद allow करती हैं।

3.4.43-3.4.46

बहिर-अधिकरण: outside-rules

3.4.43बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥
3.4.44स्वामिनः श्रुतेरित्यात्रेयः ॥
3.4.45आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिः तस्मै हि परिक्रियते ॥
3.4.46सहकार्यन्तर-विधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विद्यादिवत् ॥

विद्या-aux-कर्मों के बारे में technical-rules। 3.4.43 “बहिः” (outside) के लिए दोनों-तरह स्मृति-आचार से। 3.4.44 आत्रेय का view: “स्वामिनः” (master’s) से, श्रुति-evidence। 3.4.45 औडुलोमि का view: “आर्त्विज्य” (priestly-function)। 3.4.46 “सहकारी-अन्तर-विधि,” third-option।

3.4.47-3.4.50

गृहस्थ-वत्-संग्रह अधिकरण: householder-summary

3.4.47कृत्स्न-भावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥
3.4.48मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥
3.4.49अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥
3.4.50ऐहिकमप्रस्तुत-प्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥

3.4.47 “कृत्स्न-भाव,” गृहस्थ में सब-stage included। 3.4.48 “मौन-वत्,” जैसे मौन-stage, ज्ञानी सब-आश्रमों के लिए। 3.4.49 “अनाविष्कुर्वन्न् अन्वयात्,” बिना-disclose, just अनुसरण। 3.4.50 “ऐहिक,” इस-जन्म में, “प्रतिबन्ध-अभाव” से।

3.4.51

मुक्ति-फल अधिकरण: closing

3.4.51एवं मुक्ति-फलानियमस्तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेः ॥

अध्याय 3 का closing-double-वाक्य। “एवं मुक्ति-फल-अनियम,” इस-तरह मुक्ति-फल का “अनियम” (no-fixed-time), “तद्-अवस्था-अवधृति,” जब-condition-fulfilled-तब। बादरायण: मुक्ति deterministic-timeline नहीं। ज्ञान-होने पर, “तत्काल” मुक्ति।

अब अध्याय 4 का प्रारम्भ, “फल।” यानी मुक्ति-होने पर क्या होता है, मरते-समय के बाद का sequence, जीवन्मुक्ति, विदेहमुक्ति, ये सब अंतिम-questions।

साथ में पढ़ें

स्रोत: देवनागरी Sanskrit text from sanskritdocuments.org।

परंपरा: ब्रह्म सूत्र अध्याय 3 (साधन)। बादरायण-व्यास।

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