साधन
ब्रह्म-साक्षात्कार का साधन · 4 पाद, 73 सूत्र, सबसे विस्तृत अध्याय
इस अध्याय का विषय
तीसरा अध्याय “साधन” कहलाता है, अर्थात् ब्रह्म-साक्षात्कार का उपाय। बादरायण के समस्त ग्रन्थ में यही सबसे विस्तृत अध्याय है।

पाद 1 में मृत्यु के समय जीव के साथ क्या जाता है, इसका विचार है। पञ्चाग्नि-विद्या के आधार पर जीव का देहान्तर, अनुशय अर्थात् भोग से शेष रहा कर्म, सात नरकों का उल्लेख, और रेतः-योग के द्वारा नये जन्म की प्रक्रिया।
पाद 2 में ब्रह्म के सगुण और निर्गुण रूप, स्वप्न-अवस्था, सुषुप्ति, मूर्च्छा-अवस्था, जल में सूर्य के प्रतिबिम्ब जैसे अद्वैत-दृष्टान्त, और कर्म-फल का दाता कौन है, इन पर विचार है।
पाद 3 सबसे विस्तृत पाद है, जिसमें उपनिषदों की विद्याओं की एकता और भिन्नता का सूक्ष्म विवेचन है।
पाद 4 में मुख्य प्रश्न यह है कि विद्या अर्थात् ब्रह्म-ज्ञान कर्मकाण्ड का अंग है, अथवा स्वतन्त्र पुरुषार्थ। इसी में आश्रम-कर्म का स्थान, संन्यास का अधिकार, आपद्-धर्म, और मुक्ति-फल का अनियम आता है।
यहाँ पञ्चाग्नि-विद्या (छान्दोग्य 5.3-10) का क्रमबद्ध निरूपण है। जीव किस प्रकार सूक्ष्म-शरीर से आवृत्त होकर शीघ्रता से जाता है, कर्म-शेष किस प्रकार साथ रहता है, सात नरकों का संकेत, और रेतः-योग के द्वारा नये जन्म का ग्रहण।
3.1.1-3.1.7
तदन्तर-प्रतिपत्ति अधिकरण: मृत्यु के समय जीव के साथ क्या जाता है
3.1.8-3.1.11
कृत-अत्यय अधिकरण: कर्म-फल समाप्त होने पर जीव की गति
जीव अपने पुण्य-कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग में रहता है, किन्तु वह वास अनन्त नहीं। पुण्य-कर्म समाप्त होने पर क्या होता है, यही यहाँ का विषय है।
सूत्र 3.1.8 में “कृतात्यय” का अर्थ कर्म की समाप्ति है। तब जीव “अनुशयवान्” रहता है, अर्थात् कुछ कर्म, जो अभी भोगे नहीं गये, शेष रह जाते हैं, और उन्हीं के साथ नया जन्म होता है। 3.1.9 के अनुसार जिस क्रम से, श्रद्धा और यज्ञ-तत्त्वों के रूप में, जीव ऊपर गया था, उससे उल्टे क्रम से लौटता है। 3.1.10 में कार्ष्णाजनि का मत कि “चरण” शब्द उपलक्षण के अर्थ में है। 3.1.11 में इस विवेचन की निरर्थकता की आशंका का निराकरण, क्योंकि सब कुछ अनुशय पर ही अवलम्बित है।
3.1.12-3.1.21
अनिष्ट-कारी अधिकरण: पाप-कर्म करने वालों की गति
जो पुण्य-कर्म नहीं करते, ऐसे अनिष्ट-कारी जीव किस गति को प्राप्त होते हैं, इस पर विचार है।
सूत्र 3.1.12 में बादरि आचार्य का मत कि उत्थान और पतन के कारण केवल सुकृत और दुष्कृत हैं। 3.1.13 में श्रुति में अनिष्ट-कारियों का भी उल्लेख दिखाया गया है। 3.1.14 में “संयमन” अर्थात् यम के नियन्त्रण में अनुभव, तथा अन्य जीवों के लिए आरोह और अवरोह। 3.1.15 में स्मृति का समर्थन। 3.1.16 में सात नरकों का उल्लेख। 3.1.17 में यम के व्यापार से अविरोध। 3.1.18 में विद्या और कर्म का प्रकरण। 3.1.19 के अनुसार देव-योनि और पितृ-योनि से भिन्न तीसरे स्थान में यह गति नहीं। 3.1.20 और 3.1.21 में लोक-स्मृति और दर्शन से समर्थन।
3.1.22-3.1.27
तत्साभाव्य अधिकरण: जीव का अगला शरीर
सूत्र 3.1.22 में तीसरे स्थान में शोक से उत्पन्न जो प्राणी हैं, उनका शब्द से अवरोध। 3.1.23 में स्मृति से समर्थन। 3.1.24 में “तत्-साभाव्यापत्ति” का अर्थ कि अगला शरीर पूर्व-कर्म के स्वभाव के अनुरूप बनता है। 3.1.25 के अनुसार जीव बहुत देर तक मार्ग में नहीं रहता। 3.1.26 में अन्य से अधिष्ठित ऐसे शरीरों में पूर्ववत् कथन। 3.1.27 में यह आशंका कि यह गति अशुद्ध है, इसका निराकरण शब्द-प्रमाण से किया गया है।
3.1.28-3.1.29
रेतः-योग अधिकरण: नया शरीर कैसे बनता है
सूत्र 3.1.28 में “रेतः-सिक्-योग” के द्वारा जीव सृष्टि-क्रम में प्रवेश करता है। 3.1.29 के अनुसार माता की योनि से शरीर का ग्रहण होता है। अर्थात् पञ्चाग्नि की अन्तिम अग्नि के रूप में, माता की योनि में, जीव नये शरीर को धारण करता है।
संगति: छान्दोग्य 5.10.6, “इह स्त्री वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिर्ज्वालो यदन्तःकरोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः।” यही पञ्चाग्नि की अन्तिम अग्नि है।
यहाँ स्वप्न को माया-मात्र बताया गया है, सुषुप्ति को ब्रह्म में लय, जल में सूर्य के प्रतिबिम्ब के दृष्टान्त से अद्वैत का निरूपण, और कर्म-फल का दाता ब्रह्म ही है, यह बादरायण का सिद्धान्त है।
3.2.1-3.2.6
स्वप्न-अधिकरण: स्वप्न-अवस्था में जीव
पाद का आरम्भ स्वप्न-अवस्था के विचार से होता है। बृहदारण्यक 4.3 का स्वप्न-वर्णन इसका आधार है।
सूत्र 3.2.1 में “द्युभ्व-आदि-आयतन” से कहा गया कि जीव स्वप्न में अपने भीतर ही एक दूसरी सृष्टि रचता है, जैसे जाग्रत में बाहर। 3.2.2 के अनुसार कुछ शाखाओं में जीव को स्वप्न का “निर्माता” कहा गया है, जो पुत्र आदि की भी रचना करता है। 3.2.3 में बादरायण का सिद्धान्त कि वह स्वप्न माया-मात्र है, क्योंकि उसमें वस्तु का स्वरूप पूर्णतः प्रकट नहीं होता। इसी सूत्र में “माया” शब्द का प्रथम प्रयोग है।
सूत्र 3.2.4 के अनुसार स्वप्न कभी शुभ-अशुभ का सूचक भी होते हैं, ऐसा शास्त्र और तद्विद कहते हैं। 3.2.5 में “पर-अभिध्यान” से कहा गया कि ब्रह्म की शक्ति से ही जीव का बन्ध और मोक्ष होता है। 3.2.6 के अनुसार जीव देह में रहते हुए ही यह सब अनुभव करता है।
उपनिषद् यह सिखाती है कि जैसे स्वप्न में रची सृष्टि जागने पर मिथ्या सिद्ध होती है, वैसे ही जाग्रत-अवस्था भी एक प्रकार का स्वप्न ही है, जो ब्रह्म-साक्षात्कार होने पर लीन हो जाती है।
संगति: बृहदारण्यक 4.3 (याज्ञवल्क्य-जनक संवाद, तीन अवस्थाओं पर), तथा माण्डूक्य उपनिषद् (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय)।
3.2.7-3.2.9
सुषुप्ति अधिकरण: गाढ़ निद्रा में जीव
सुषुप्ति की अवस्था में जीव कहाँ रहता है, यही यहाँ का प्रश्न है।
सूत्र 3.2.7 के अनुसार श्रुति कहती है कि उस समय अनुभव का अभाव नाड़ियों में, अथवा आत्मा में होता है, अर्थात् जीव ब्रह्म में लीन रहता है। 3.2.8 के अनुसार इसी से जागृति होती है। 3.2.9 में “स एव तु” से कहा गया कि जागने पर वही जीव लौटता है, क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, शब्द और विधि, ये सब उसी पर लागू होते हैं।
गाढ़ निद्रा प्रतिदिन आती है, जिसमें हम मानो नहीं रहते, और फिर लौट आते हैं। यह लौटना उसी ब्रह्म में लय और उससे पुनः प्रकट होने के सिद्धान्त से समझा जाता है।
3.2.10
मुग्ध अधिकरण: मूर्च्छा की अवस्था
“मुग्ध” का अर्थ मूर्च्छित है। यह न सुषुप्ति है, न मृत्यु, अपितु इनके बीच की अवस्था। बादरायण इसे “अर्ध-सम्पत्ति” अर्थात् आधी लय कहते हैं, क्योंकि शेष विकल्पों के निरास से यही सिद्ध होता है।
3.2.11-3.2.21
उभय-लिङ्ग अधिकरण: ब्रह्म सगुण भी और निर्गुण भी
यह अद्वैत-वेदान्त का अत्यन्त केन्द्रीय विचार है। ब्रह्म का वर्णन दो प्रकार से होता है, सगुण अर्थात् गुणों सहित, और निर्गुण अर्थात् गुणों से रहित। इनमें वस्तुतः सत्य कौन है, यही प्रश्न है।
सूत्र 3.2.11 के अनुसार ब्रह्म का “उभय-लिङ्ग” सर्वत्र है, किसी स्थान से बँधा नहीं। 3.2.12 में भेद की आशंका का निराकरण, क्योंकि प्रत्येक स्थान पर अतत् का वचन है। 3.2.13 में कुछ शाखाएँ इसी रीति से पढ़ती हैं। 3.2.14 में “अरूपवत्” से कहा गया कि वस्तुतः ब्रह्म रूप-रहित ही है, और यही उसका प्रधान स्वरूप है। 3.2.15 में प्रकाश का दृष्टान्त।
सूत्र 3.2.16 के अनुसार वह केवल तन्मात्र है। 3.2.17 में श्रुति और स्मृति दोनों यही दर्शाती हैं। 3.2.18 में “सूर्यकादिवत्” दृष्टान्त कि जैसे एक सूर्य जल में अनेक रूप में प्रतिबिम्बित होता है, फिर भी एक ही है। 3.2.19 के अनुसार जल का यह दृष्टान्त सीमित है, क्योंकि ब्रह्म किसी उपाधि से ग्रहण नहीं होता। 3.2.20 के अनुसार जल का प्रतिबिम्ब घटता-बढ़ता है, किन्तु ब्रह्म नहीं। 3.2.21 में श्रुति से समर्थन।
श्रीशंकर का सिद्धान्त यह है कि निर्गुण ब्रह्म ही वस्तुतः सत्य है, और सगुण रूप उपासना के लिए स्वीकृत है। बादरायण के सूत्र दोनों रूपों का समन्वय करते हैं, और शंकर उनका अर्थ निर्गुण की प्रधानता में करते हैं।
3.2.22-3.2.30
अव्यक्त-ब्रह्म अधिकरण
सूत्र 3.2.22 में “प्रकृत-एतावत्त्व” अर्थात् पूर्व-वर्णित सीमित ब्रह्म का प्रतिषेध, और फिर श्रुति “भूयः” आगे और कहती है। अर्थात् सगुण वर्णन के पश्चात् श्रुति निर्गुण भी कहती है। 3.2.23 में “अव्यक्त” अर्थात् अप्रकट ब्रह्म। 3.2.24 के अनुसार “संराधन” अर्थात् गहरी उपासना में उसका साक्षात् अनुभव होता है। 3.2.25 में प्रकाश के समान अवैशेष्य। 3.2.26 में कर्म में अभ्यास से। 3.2.27 में अनन्त से। 3.2.28 में “उभय-व्यपदेश” का दृष्टान्त “अहि-कुण्डलवत्”, अर्थात् सर्प और उसकी कुण्डली, दोनों रूपों में कथन हो सकता है। 3.2.29 में प्रकाश और उसके आश्रय का दृष्टान्त। 3.2.30 में पूर्व-वर्णित रीति से।
3.2.31-3.2.38
अहि-कुण्डल अधिकरण
इस समूह में पुनः सगुण और निर्गुण का समन्वय है। सूत्र 3.2.31 में निर्गुण-पक्ष के विरुद्ध आशंका का प्रतिषेध। 3.2.32 में सेतु, उन्मान और सम्बन्ध आदि के व्यपदेश से परम ब्रह्म का निरूपण। 3.2.33 में श्रुति-दर्शन। 3.2.34 में बोध के प्रयोजन से “पादवत्” अर्थात् चार-पाद रूप में कथन। 3.2.35 में स्थान-विशेष से। 3.2.36 में उपपत्ति से। 3.2.37 में अन्य का प्रतिषेध। 3.2.38 में इसी से ब्रह्म का सर्वगतत्व सिद्ध होता है।
3.2.39-3.2.42
फल अधिकरण: कर्म-फल ब्रह्म ही देता है
पाद का समापन इस प्रश्न से होता है कि कर्म-फल कौन देता है, स्वयं अदृष्ट अर्थात् कर्म-संस्कार, अथवा ब्रह्म।
सूत्र 3.2.39 के अनुसार फल ब्रह्म से ही मिलता है, क्योंकि अन्यथा वह सम्भव नहीं। 3.2.40 में श्रुति का प्रमाण। 3.2.41 में जैमिनि का मत कि धर्म अर्थात् कर्म ही स्वयं फल देता है। 3.2.42 में “पूर्वं तु बादरायणः” से सिद्धान्त कि हेतु के व्यपदेश से ब्रह्म ही फल का वास्तविक कारण है।
अद्वैत का सिद्धान्त यह है कि फल का दाता अन्ततः ब्रह्म ही है, और कर्म उसका निमित्त-मात्र है। यह कर्म का जड़ नियतिवाद नहीं, अपितु ईश्वर के द्वारा फल का विधान है।
समस्त वेदान्त-वाक्य एक ही ब्रह्म-ज्ञान पर अभिमुख हैं। एक ही विद्या के अनेक शाखाओं में बिखरे अंग मिलाये जाते हैं, और फिर भिन्न विद्याओं का भिन्न निरूपण होता है। यह पाद सबसे विस्तृत और सबसे सूक्ष्म है।
3.3.1-3.3.5
सर्व-वेदान्त-प्रत्यय अधिकरण: सब उपनिषद्-विद्याएँ एक
इस पाद में बादरायण विद्याओं अर्थात् ब्रह्म की उपासना की विशिष्ट विधियों का विचार करते हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि एक ही विद्या क्या भिन्न-भिन्न शाखाओं में भिन्न रूप में कही गयी है, अथवा वे पृथक् विद्याएँ हैं।
सूत्र 3.3.1 में “सर्व-वेदान्त-प्रत्यय” से कहा गया कि समस्त उपनिषदें एक ही ब्रह्म-ज्ञान पर अभिमुख हैं, क्योंकि उनकी चोदना आदि में कोई भेद नहीं। 3.3.2 में भेद की आशंका का निराकरण, क्योंकि एक ही शाखा में भी ऐसा हो सकता है। 3.3.3 में स्वाध्याय के नियम से प्रमाण। 3.3.4 में “सलिल-वत्” अर्थात् जैसे सब नदियाँ एक ही सागर में मिलती हैं। 3.3.5 में श्रुति-दर्शन।
यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि बादरायण का यह कथन उपनिषदों के भीतर की एकता के विषय में है, अर्थात् सब वेदान्त-वाक्य एक ही ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं।
3.3.6-3.3.10
उपसंहार अधिकरण: एक विद्या के अंग सब शाखाओं में
जब एक ही विद्या भिन्न शाखाओं में भिन्न संस्करण में मिलती है, तब उसके सब गुण मिलाये जाते हैं। सूत्र 3.3.6 में “उपसंहार” का अर्थ संक्षेप में संग्रह। 3.3.7 में भिन्नता की आशंका का निराकरण, क्योंकि अविशेष है। 3.3.8 में प्रकरण-भेद से भिन्नता हो तो, “परोवरीयस्त्वादिवत्”, पृथक्। 3.3.9 के अनुसार संज्ञा भिन्न हो सकती है, किन्तु वस्तु एक ही रहती है। 3.3.10 में प्राप्ति से समञ्जस।
3.3.11-3.3.14
सर्व-अभेद अधिकरण: ब्रह्म के मूल गुण सर्वत्र
सूत्र 3.3.11 के अनुसार कुछ गुण, जैसे सत्यत्व, ज्ञानत्व और अनन्तत्व, ब्रह्म की प्रत्येक उपासना में अनुगत रहते हैं। 3.3.12 के अनुसार आनन्द आदि प्रधान ब्रह्म के मूल गुण हैं। 3.3.13 में “प्रिय-शिरस्त्व” आदि सूक्ष्म विशेषताएँ उपासना-विशेष में ही सीमित हैं। 3.3.14 में अन्य गुण अर्थ-सामान्य से अनुगत।
3.3.15-3.3.18
आत्म-शब्द अधिकरण: “आत्मा” शब्द जहाँ भी, ब्रह्म ही
सूत्र 3.3.15 के अनुसार जब उपनिषद् ध्यान का उपदेश देती है, तब किसी अन्य प्रयोजन के अभाव में वह सीधा ब्रह्म-ध्यान ही है। 3.3.16 में “आत्म-शब्द” से समर्थन, अर्थात् जहाँ भी “आत्मा” शब्द आता है, वहाँ ब्रह्म का ही संकेत है। 3.3.17 में “आत्म-गृहीति”, आत्मा का स्वरूप-ग्रहण, अन्य रीति से नहीं। 3.3.18 में अन्वय से अवधारण।
3.3.19-3.3.22
कार्याख्यान अधिकरण: फल-वर्णन का अर्थ
सूत्र 3.3.19 में “कार्य-आख्यान” अर्थात् फल का वर्णन “अपूर्व”, पूर्व-अप्राप्त, हो सकता है। 3.3.20 के अनुसार जब विषय समान हो, तब अभेद से एकता। 3.3.21 में सम्बन्ध से समर्थन। 3.3.22 में अथवा विशेष से भिन्नता।
3.3.23-3.3.42
विद्या-विशेष-समूह अधिकरण: अनेक विद्याएँ
यह विस्तृत समूह है, जिसमें बादरायण अनेक विद्याओं की एकता और भिन्नता का विचार करते हैं। सूत्र 3.3.23 के अनुसार श्रुति स्वयं यह दर्शाती है। 3.3.24 में “सम्भृति” और “द्युव्याप्ति” विशिष्ट उपासनाएँ। 3.3.25 में पुरुष-विद्या (छान्दोग्य 3.16) के समान अन्य का अनाम्नान। 3.3.26 में वेध आदि से अर्थ-भेद। 3.3.27 में उपायन-शब्द-शेष से।
सूत्र 3.3.28 में “साम्पराय” अर्थात् मरण-काल में “तर्तव्य”, कुछ करने का, अभाव। 3.3.29 में “छन्दतः” से उभय-अविरोध। 3.3.30 में गति का अर्थवत्त्व। 3.3.31 में लौकिक दृष्टान्त।
सूत्र 3.3.32 से 3.3.42 तक बादरायण विद्याओं के नियम स्थिर करते हैं, जैसे अधिकारिक-स्थिति, अक्षर की धारणा, इयदामनन, आदर से अलोप, और उपस्थिति। ये सब उपासना के सूक्ष्म नियम हैं, जिनसे उपनिषद् की विद्याएँ व्यवस्थित रहती हैं।
3.3.43-3.3.68
विद्या-संगठन अधिकरण: अन्तिम नियम
पाद के ये अन्तिम छब्बीस सूत्र विशिष्ट विद्याओं के प्रयोग-नियमों का निरूपण करते हैं। यहाँ हम सार रूप में संकेत दे रहे हैं।
मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं। सूत्र 3.3.43 में किसी निश्चय का विशिष्ट नियम। 3.3.45 में “लिङ्ग-भूयस्त्व” अर्थात् लक्षणों की बहुलता प्रबल प्रमाण है। 3.3.48 में विद्या ही प्रधान है, अन्य उसके सहायक नहीं। 3.3.55 के अनुसार एक शरीर में एक ही आत्मा है, इसी से अनुभव सम्भव। 3.3.57 के अनुसार अंग से बँधी विद्याएँ किसी एक शाखा तक सीमित नहीं, अपितु सब वेदों में अनुगत। 3.3.61 और 3.3.62 के अनुसार विकल्प रखा जा सकता है, यद्यपि प्रायः नहीं। 3.3.63 से 3.3.68 तक अंगों में आश्रय-भाव, शिष्टि, समाहार और गुण-साधारण्य की श्रुति, ये सब विशिष्ट प्रयोग-नियम हैं।
यह पाद विशेषतः वेदान्त के अभ्यासी विद्वानों के लिए है। इन्हीं सूक्ष्म नियमों से उपनिषदों की उपासनाएँ क्रमबद्ध रूप में स्थिर रहती हैं।
यहाँ बादरायण और जैमिनि के बीच यह मूल विचार है कि मुक्ति केवल ज्ञान से होती है, अथवा ज्ञान और कर्म के समुच्चय से। साथ ही ज्ञानी की शम-दम आदि सम्पत्ति की अपेक्षा, आश्रम-कर्म का स्थान, संन्यास का अधिकार, और मुक्ति का काल, इन पर विचार है।
3.4.1-3.4.8
पुरुषार्थ अधिकरण: विद्या ही मुक्ति का साधन
पाद का मुख्य प्रश्न यह है कि विद्या अर्थात् ब्रह्म-ज्ञान कर्मकाण्ड का अंग है, अथवा स्वतन्त्र पुरुषार्थ। यह मीमांसा और वेदान्त के बीच का महत्त्वपूर्ण विचार है।
सूत्र 3.4.1 में बादरायण कहते हैं कि विद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थ है, क्योंकि श्रुति का शब्द यही बताता है। 3.4.2 में जैमिनि का मत कि विद्या भी कर्मकाण्ड का शेष अर्थात् अंग है, और उसमें पुरुषार्थ का कथन केवल स्तुति के लिए है। 3.4.3 में आचार-दर्शन से जैमिनि के पक्ष में। 3.4.4 में श्रुति का प्रमाण। 3.4.5 में समन्वारम्भण से। 3.4.6 में तद्वत् के विधान से। 3.4.7 में नियम से।
सूत्र 3.4.8 में “अधिक-उपदेश” से बादरायण सिद्ध करते हैं कि श्रुति में ऐसे अतिरिक्त उपदेश हैं जो विद्या को स्वतन्त्र बनाते हैं। यही वेदान्त का अन्तिम सिद्धान्त है।
श्रीशंकर के अनुसार मुक्ति केवल ज्ञान से होती है, कर्म से नहीं। बादरायण के सूत्र विद्या की स्वतन्त्रता की ओर हैं, और शंकर उनका अर्थ ज्ञान की स्वतन्त्र साधनता में करते हैं।
संगति: गीता के अध्याय तीन, चार और पाँच इसी विचार में गहरे उतरते हैं।
3.4.9-3.4.15
विभाग अधिकरण: कर्म और विद्या का भेद
सूत्र 3.4.9 में “तुल्य-दर्शन”, जैमिनि के पक्ष का प्रमाण भी मिलता है। 3.4.10 में “असार्वत्रिकी”, वह सर्वत्र नहीं। 3.4.11 में “विभाग शतवत्”, सौ प्रकार से भेद सम्भव। 3.4.12 में “अध्ययन-मात्रवत्”, केवल अध्ययन करने वालों के लिए। 3.4.13 में “नाविशेषात्”, कोई विशेष भेद नहीं। 3.4.14 में स्तुति के लिए अनुमति। 3.4.15 में “काम-कार”, स्व-प्रेरित।
3.4.16-3.4.20
ऊर्ध्व-रेतस् अधिकरण: ब्रह्मचर्य और ज्ञान
सूत्र 3.4.16 में “उपमर्द”, पूर्व-तर्कों का परिष्कार। 3.4.17 के अनुसार ऊर्ध्व-रेता ब्रह्मचारी आदि निवृत्त-आश्रमों में भी ब्रह्म-ज्ञान की पात्रता है, शब्द-प्रमाण से। 3.4.18 में जैमिनि का मत कि वहाँ केवल परामर्श अर्थात् उल्लेख है, चोदना नहीं, अतः वह अपवाद है। 3.4.19 में बादरायण का उत्तर कि यह अनुष्ठेय है, साम्य-श्रुति से, अर्थात् ज्ञान सब आश्रमों में सम्भव है। 3.4.20 में अथवा यह “धारणवत्” विधि है।
यहाँ यह प्रसिद्ध विचार है कि ज्ञान की पात्रता केवल संन्यासी को है, अथवा सब आश्रमों के साधकों को। बादरायण का सिद्धान्त है कि यह पात्रता सब आश्रमों में रहती है, अतः गृहस्थ के लिए भी ज्ञान का मार्ग खुला है।
3.4.21-3.4.27
पारिप्लव अधिकरण: अनुष्ठान के नियम
सूत्र 3.4.21 में यह आशंका कि विद्या-वाक्य केवल स्तुति-मात्र हैं, इसका निराकरण “अपूर्वत्व” से। 3.4.22 में भाव-शब्द से। 3.4.23 के अनुसार वे केवल पारिप्लव अर्थात् यज्ञ में पठनीय आख्यान नहीं हैं, क्योंकि वे विशेषित हैं। 3.4.24 में एक-वाक्यता के सम्बन्ध से। 3.4.25 के अनुसार ज्ञान-मार्ग में अग्नि और इन्धन आदि की अपेक्षा नहीं। 3.4.26 के अनुसार यज्ञ आदि सब साधनों की अपेक्षा “अश्ववत्”, अर्थात् जैसे अश्व कर्म में सहायक हैं।
सूत्र 3.4.27 अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानी शम, दम आदि गुणों से युक्त हो, और ये गुण अवश्य अनुष्ठेय हैं। यही षट्-सम्पत्ति, अर्थात् साधक की छह प्रकार की आन्तरिक सम्पदा, का आधार है।
3.4.28-3.4.31
सर्वान्न अधिकरण: आहार की अनुमति
सूत्र 3.4.28 के अनुसार प्राणों के संकट में सब प्रकार का अन्न ग्रहण करने की अनुमति है। 3.4.29 में अबाध से। 3.4.30 में स्मृति से। 3.4.31 में शब्द से “अकाम-चार”, अर्थात् यह स्वेच्छाचार नहीं, केवल आपत्ति-काल में ही है।
यह आपद्-धर्म का सिद्धान्त है। सामान्य अवस्था में नियम का कठोर पालन, किन्तु संकट में मर्यादित छूट।
3.4.32-3.4.39
आश्रम-कर्म अधिकरण: कर्म ज्ञान का सहायक
सूत्र 3.4.32 के अनुसार वर्ण और आश्रम के अनुसार विहित कर्म भी शास्त्र-विहित है। 3.4.33 के अनुसार वे ज्ञान के सहकारी हैं। 3.4.34 में उभय-लिङ्ग, दोनों दिशाओं का प्रमाण। 3.4.35 में “अनभिभव”, कर्म करते हुए भी ज्ञान सम्भव है। 3.4.36 में बीच की अवस्था में भी। 3.4.37 में स्मृति से। 3.4.38 में विशेषण-अनुग्रह से। 3.4.39 में “इतरत् ज्यायः”, अर्थात् कर्म से रहित ज्ञान-मार्ग श्रेष्ठ है।
यहाँ मूल प्रश्न यह है कि क्या गृहस्थ अपने कर्तव्य निभाते हुए ब्रह्म-साक्षात्कार पा सकता है। बादरायण का उत्तर है कि हाँ, यह सम्भव है, यद्यपि निवृत्ति का ज्ञान-मार्ग एक श्रेणी ऊपर है।
3.4.40-3.4.42
तद्भूत-अधिकार अधिकरण: संन्यास का अधिकार
सूत्र 3.4.40 के अनुसार जो संन्यासी हो गया, वह उसी संन्यास-भाव में स्थिर रहता है। 3.4.41 के अनुसार वह पुनः गृहस्थ नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें पतन का अनुमान होता है। 3.4.42 के अनुसार कुछ शाखाएँ प्रारम्भिक अवस्था के पश्चात् इसकी अनुमति देती हैं।
3.4.43-3.4.46
बहिर-अधिकरण: बाह्य नियम
यहाँ विद्या के सहायक कर्मों के विषय में सूक्ष्म नियम हैं। सूत्र 3.4.43 के अनुसार बाह्य कर्मों के लिए दोनों प्रकार स्मृति और आचार से। 3.4.44 में आत्रेय का मत कि वह कर्म स्वामी का है, श्रुति से। 3.4.45 में औडुलोमि का मत कि वह आर्त्विज्य अर्थात् ऋत्विक् का कर्म है। 3.4.46 में “सहकारी-अन्तर-विधि”, तीसरा पक्ष।
3.4.47-3.4.50
गृहस्थ-संग्रह अधिकरण: गृहस्थ का सार
सूत्र 3.4.47 के अनुसार “कृत्स्न-भाव” से, गृहस्थ-आश्रम में सब अवस्थाएँ समाविष्ट हैं। 3.4.48 में “मौनवत्”, जैसे मौन की अवस्था, ज्ञान सब आश्रमों के लिए है। 3.4.49 में “अनाविष्कुर्वन् अन्वयात्”, बिना प्रकट किये, केवल अनुसरण से। 3.4.50 में “ऐहिक”, इसी जन्म में, प्रतिबन्ध के अभाव में।
3.4.51
मुक्ति-फल अधिकरण: समापन
यह अध्याय का समापन-वाक्य है, जो द्विरुक्ति से अध्याय की समाप्ति सूचित करता है। “एवं मुक्ति-फल-अनियम” से कहा गया कि मुक्ति-फल का कोई निश्चित काल नहीं, और “तद्-अवस्था-अवधृति” से कि जब पात्रता की अवस्था सिद्ध हो जाती है, तभी वह प्राप्त होता है। बादरायण का सिद्धान्त है कि मुक्ति किसी नियत काल-क्रम से बँधी नहीं, अपितु ज्ञान के उदय होते ही प्राप्त होती है।
इसके पश्चात् चौथे अध्याय “फल” का आरम्भ होता है, जिसमें ज्ञान के फल का, मरण के पश्चात् की गति का, और जीवन्मुक्ति तथा विदेहमुक्ति का विचार है।
साथ में पढ़ें
- ब्रह्म सूत्र संग्रह
- अध्याय 1 (समन्वय)
- अध्याय 2 (अविरोध)
- उपनिषद् संग्रह, विशेषतः छान्दोग्य 5.3-10 (पञ्चाग्नि-विद्या) और बृहदारण्यक 4.3 (तीन अवस्थाएँ)
- भगवद् गीता, अध्याय 3, 4 और 5 (ज्ञान और कर्म का विचार)
- अष्टावक्र गीता, ज्ञान-निष्ठा का सबसे प्रत्यक्ष कथन
अध्याय का आरम्भ इस प्रश्न से होता है कि देह छोड़ते समय जीव की गति कैसी होती है। छान्दोग्य 5.10 की पञ्चाग्नि-विद्या इसका आधार है, जहाँ प्रवाहण राजा के प्रश्न पर पाँच अग्नियों के रूप में यह रहस्य खोला गया है।
सूत्र 3.1.1 में “तदन्तर-प्रतिपत्ति” का अर्थ है देह-त्याग और देह-ग्रहण के बीच की गति। जीव “रंहति” अर्थात् शीघ्र जाता है, और “सम्परिष्वक्त” अर्थात् भूत-सूक्ष्म तत्त्वों से आवृत्त रहता है। यही सूक्ष्म-शरीर अगले जन्म में नये स्थूल-शरीर का बीज बनता है।
सूत्र 3.1.2 में कहा कि वह सूक्ष्म-शरीर तीन तत्त्वों (तेज, जल, अन्न) से बना है। 3.1.3 के अनुसार प्राणों की गति भी इसी सूक्ष्म-शरीर के साथ होती है। 3.1.4 में आशंका कि अग्नि आदि भी गति करते हैं, इसका उत्तर है कि वह गौण अर्थ में है। 3.1.5 में पहली अग्नि का सीधा श्रवण न होने पर भी उपपत्ति से वही सिद्ध होती है। 3.1.6 में इष्टापूर्त आदि कर्म करने वालों की प्रतीति का उल्लेख। 3.1.7 में गौणत्व का कारण यह कि वे अनात्म-ज्ञानी हैं।
संगति: छान्दोग्य 5.3-10 (पञ्चाग्नि-विद्या), तथा बृहदारण्यक 4.4.1-6 (मृत्यु के समय का वर्णन)।