फल
मुक्ति का अनुभव · 4 पाद · पूरे ग्रंथ का समापन
इस अध्याय का प्रयोजन
चौथे अध्याय का नाम फल है। समन्वय, अविरोध और साधन के बाद बादरायण अब उस फल का निरूपण करते हैं जो ब्रह्म-ज्ञान से प्राप्त होता है। पाँच सौ पचपन सूत्रों का यह समापन-खण्ड बताता है कि ज्ञानी का जीवन, उसका देहत्याग और उसकी मुक्ति किस रूप में होती है।

पाद 1 में उपासना की रीति है, आवृत्ति अर्थात् ध्यान का बार-बार अभ्यास, आसन और मनोयोग, मृत्यु-पर्यन्त उपासना, और ज्ञान होने पर कर्मों की क्या गति होती है। अनारब्ध कर्म नष्ट हो जाते हैं, प्रारब्ध भोग कर ही क्षीण होता है।
पाद 2 में देहत्याग के समय जीव की भीतरी यात्रा है, वाक् का मन में, मन का प्राण में, प्राण का सूक्ष्म-शरीर में क्रमशः लय। ज्ञानी का सौ में से एक विशेष नाड़ी, ब्रह्मनाड़ी, से निकलना और अमृतत्व का अनुभव।
पाद 3 में देवयान-मार्ग है, अर्चि से लेकर ब्रह्मलोक तक का सोपानबद्ध पथ, और इस प्रश्न का विचार कि जीव साकार कार्य-ब्रह्म तक पहुँचता है फिर निर्गुण कारण-ब्रह्म में, अथवा सीधे। यहाँ क्रम-मुक्ति और सद्योमुक्ति का निर्णय होता है।
पाद 4 में मुक्त जीव के स्वरूप का निरूपण है, मुक्ति अपने ही स्वरूप का आविर्भाव है, कोई नवीन अर्जन नहीं। जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का भेद, मुक्त जीव जगत् का स्रष्टा नहीं (जगद्-व्यापार-वर्जम्), और अंत में “अनावृत्तिः शब्दात्” का अंतिम वचन।
आवृत्ति अर्थात् ध्यान के पुनः-पुनः अभ्यास से ब्रह्म-साक्षात्कार, आसन और मनोयोग का स्थान, और सबसे मूल यह कि ज्ञान कर्म के चक्र को किस प्रकार छिन्न करता है। तीन प्रकार के कर्मों, संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण, में से ज्ञान संचित और आगामी क्रियमाण को नष्ट करता है। प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है, ज्ञानी को भी।
4.1.1-4.1.2
आवृत्ति अधिकरण: ध्यान की आवृत्ति
4.1.3
आत्मा अधिकरण: आत्मा-रूप में ब्रह्म की उपासना
ब्रह्म की उपासना “मैं ब्रह्म हूँ” इस भाव से करनी है, “वह ब्रह्म है” इस भाव से नहीं। श्रुति स्वयं इसी रूप में उपगमन करती है और शिष्य को भी इसी रूप में ग्रहण कराती है।
यह “तत्त्वमसि” (छान्दोग्य 6.8.7) और “अहं ब्रह्मास्मि” (बृहदारण्यक 1.4.10) के महावाक्यों का व्यावहारिक रूप है। ब्रह्म को बाहर का कोई विषय नहीं, अपने ही स्वरूप के साथ अभिन्न देखना।
4.1.4
न-प्रतीक अधिकरण: प्रतीक में ब्रह्म-दृष्टि
प्रतीक अर्थात् कोई आलम्बन-रूप, जैसे नाम या चिह्न। “न प्रतीके”, प्रतीक में आत्मभाव से ब्रह्म-उपासना नहीं होती, क्योंकि प्रतीक स्वयं “वह” अर्थात् ब्रह्म नहीं है।
भेद सूक्ष्म है। प्रतीक पर ब्रह्म-दृष्टि का आरोप किया जा सकता है, किन्तु उपासक प्रतीक को अपना आत्मा नहीं मान सकता। अगले सूत्रों में यही प्रतीकोपासना का विधान आता है, परन्तु उत्तम साक्षात्कार प्रतीक में नहीं।
4.1.5-4.1.6
ब्रह्म-दृष्टि अधिकरण: उपासना के आलम्बन
सूत्र 4.1.5, किसी आलम्बन पर ब्रह्म-दृष्टि का आरोप करना चाहिए, क्योंकि इससे उपास्य का उत्कर्ष होता है, न कि ब्रह्म का अपकर्ष। यह उपास्य को ऊँचा उठाने की रीति है। सूत्र 4.1.6, यज्ञ के अंगों पर आदित्य आदि देवताओं की मति का आरोप उचित है, क्योंकि इससे उपपत्ति बैठती है।
4.1.7-4.1.11
आसन-ध्यान अधिकरण: ध्यान का आसन
सूत्र 4.1.7, उपासना बैठ कर करनी चाहिए, क्योंकि स्थिरता बैठने में ही सम्भव है। सूत्र 4.1.8, ध्यान भी बैठे हुए ही फलित होता है। सूत्र 4.1.9, अचलता अपेक्षित है, इसी से आसन का विधान है। सूत्र 4.1.10, स्मृति-ग्रन्थ भी यही कहते हैं। सूत्र 4.1.11, जहाँ मन की एकाग्रता सहज हो, वही स्थान उपयुक्त है, इस विषय में देश का कोई विशेष नियम नहीं।
आसन आवश्यक है, परन्तु कोई एक ही निश्चित देश आवश्यक नहीं। एकाग्रता जहाँ साधे, वहीं उपासना सिद्ध होती है।
संगति: पतञ्जलि योग सूत्र 2.46-48 (आसन-निरूपण)।
4.1.12
आ-प्रायण अधिकरण: मृत्यु-पर्यन्त उपासना
“आ प्रायणात्”, अर्थात् मरण-पर्यन्त। उपासना अंतिम श्वास तक अविच्छिन्न बनी रहनी चाहिए।
अंत-समय का चित्त ही गति का निर्णायक है। गीता का वचन “यं यं वापि स्मरन्भावम्” (8.6) इसी सिद्धान्त पर खड़ा है।
4.1.13-4.1.19
कर्म-क्षपण अधिकरण: ज्ञान कर्मों को नष्ट करता है
यहाँ मुख्य प्रश्न यह है कि ब्रह्म-ज्ञान होने पर पूर्व-संचित कर्मों की क्या गति होती है।
सूत्र 4.1.13, ज्ञान के अधिगम होने पर आगामी पाप का अश्लेष होता है, वह जीव से चिपकता नहीं, और पूर्व-पाप का विनाश होता है। श्रुति स्वयं इसका व्यपदेश करती है। सूत्र 4.1.14, इसी प्रकार पुण्य-कर्म भी देहपात के समय असंश्लिष्ट हो जाते हैं।
सूत्र 4.1.15, किन्तु जो कर्म अभी फल देना आरम्भ नहीं कर चुके, केवल वे ही अनारब्ध कर्म नष्ट होते हैं। प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है, ज्ञानी को भी, देहावधि तक। सूत्र 4.1.16, अग्निहोत्र आदि जो नित्य कर्म हैं, वे विद्या के सहायक होने से उसी कार्य के लिए हैं। सूत्र 4.1.17, कुछ शाखाएँ कहती हैं कि अन्य कर्म भी इसी प्रकार क्षीण होते हैं। सूत्र 4.1.18, “जो विद्या से किया जाता है” यह श्रुति-वचन है। सूत्र 4.1.19, शेष कर्म अंशतः भोग कर क्षीण होते हैं, तदनन्तर जीव ब्रह्म में सम्पन्न होता है।
कर्म तीन प्रकार के हैं, संचित (संचित राशि), प्रारब्ध (जो फल देने में प्रवृत्त हो चुका) और क्रियमाण (इस समय किया जाने वाला)। ज्ञान संचित और आगामी क्रियमाण को नष्ट करता है। प्रारब्ध तो भोग कर ही क्षीण होता है, ज्ञानी के लिए भी।
संगति: यही जीवन्मुक्त की भूमि है। ज्ञानी देह में रहता है क्योंकि प्रारब्ध शेष है, ज्ञान होते ही देह तत्काल नहीं गिरती।
वाक्, मन, प्राण और सूक्ष्म-शरीर का क्रमिक लय। ज्ञानी का ब्रह्मनाड़ी से निकलना, सौ और एक नाड़ियों के विधान के साथ। देह में जो ऊष्मा शेष रहती है, उसका कारण। हृदय-स्थान से ऊर्ध्व यात्रा।
4.2.1-4.2.6
वाक्-मन-प्राण-सूक्ष्म-शरीर का क्रम
यह पाद देहत्याग के समय इन्द्रियों के क्रमिक उपसंहार का निरूपण करता है।
सूत्र 4.2.1, सर्वप्रथम वाक्-इन्द्रिय मन में लीन होती है, ऐसा श्रुति का दर्शन और शब्द दोनों कहते हैं। सूत्र 4.2.2, इसी क्रम से शेष इन्द्रियाँ भी मन में लीन होती हैं। सूत्र 4.2.3, तदनन्तर मन प्राण में लीन होता है। सूत्र 4.2.4, प्राण जीव अर्थात् अध्यक्ष में लीन होता है। सूत्र 4.2.5, फिर जीव सूक्ष्म-भूतों के साथ निकलता है। सूत्र 4.2.6, किसी एक ही भूत में नहीं, समस्त भूतों के सूक्ष्म अंश के साथ।
उपनिषद् देहत्याग की इस प्रक्रिया का सूक्ष्म वर्णन करते हैं, जिसमें इन्द्रियाँ एक के बाद एक उपशान्त होती जाती हैं।
संगति: छान्दोग्य 6.8.6, बृहदारण्यक 4.4.1-2।
4.2.7-4.2.11
अमृतत्व अधिकरण: ज्ञानी की भिन्न गति
सूत्र 4.2.7, यह क्रम ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के लिए समान है, संसार के उपक्रम-पर्यन्त। ज्ञानी सूक्ष्म-शरीर को बिना जलाए ही अमृतत्व प्राप्त करता है। सूत्र 4.2.8, यह अमृतत्व आपेक्षिक है, प्रलय में ब्रह्म-लय तक, क्योंकि वहाँ तक संसार का व्यपदेश है। सूत्र 4.2.9, सूक्ष्म-शरीर परिमाण से सूक्ष्म है, ऐसी उपलब्धि होती है। सूत्र 4.2.10, स्थूल देह के गिरने से सूक्ष्म-शरीर का उपमर्दन नहीं होता। सूत्र 4.2.11, इसी सूक्ष्म-शरीर के निकलते रहने के कारण मृत देह में कुछ काल ऊष्मा शेष रहती है।
4.2.12-4.2.16
प्राण-निरोध अधिकरण: ज्ञानी के प्राणों का लय
सूत्र 4.2.12, कोई आशंका करे कि श्रुति में ज्ञानी के प्राणों के उत्क्रमण का प्रतिषेध है। बादरायण कहते हैं, ऐसा नहीं, वह प्रतिषेध केवल शरीर से उत्क्रमण के विषय में है। सूत्र 4.2.13, कुछ शाखाओं में यह स्पष्ट कहा गया है। सूत्र 4.2.14, स्मृति भी इसका समर्थन करती है। सूत्र 4.2.15, ज्ञानी की इन्द्रियाँ और भूत परम तत्त्व में लीन हो जाते हैं, श्रुति ऐसा ही कहती है। सूत्र 4.2.16, वहाँ कोई विभाग शेष नहीं रहता, यह श्रुति-वचन से सिद्ध है।
4.2.17-4.2.22
हृदय-नाड़ी अधिकरण: ज्ञानी के निकलने का मार्ग
सूत्र 4.2.17 दीर्घ है। जीव का जो आयतन है, अर्थात् हृदय, उसका अग्रभाग प्रज्वलित होता है, उससे द्वार प्रकाशित होता है, और विद्या के सामर्थ्य तथा गति की अनुस्मृति से हृदय-देवता के अनुग्रह-सहित जीव सौ से अधिक नाड़ियों में से उस एक विशेष नाड़ी, ब्रह्मनाड़ी, से निकलता है। सूत्र 4.2.18, फिर वह सूर्य की रश्मियों का अनुसरण करता है। सूत्र 4.2.19, कोई कहे कि रात्रि में मरने पर क्या होगा, तो वैसा नहीं, क्योंकि नाड़ी-रश्मि का सम्बन्ध दिन-रात दोनों में रहता है। सूत्र 4.2.20, यह सम्बन्ध देह रहने तक बना रहता है, श्रुति ऐसा दिखाती है।
सूत्र 4.2.21, इसी कारण दक्षिणायन में मरने पर भी ज्ञानी की गति देवयान-मार्ग से होती है। सूत्र 4.2.22, अयन-सम्बन्धी जो विधान स्मृति में है, वह योगियों के प्रति, यज्ञ-कर्मियों के लिए है।
सौ और एक नाड़ियों का यह विधान योग-परम्परा का आधार बना। ब्रह्मनाड़ी वह ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी है जिससे ज्ञानी का प्राण निकलता है।
संगति: छान्दोग्य 8.6.6, “शतं चैका च हृदयस्य नाड्यः।” सौ नाड़ियों में एक ऊर्ध्व-गामिनी।
अर्चि से आरम्भ होने वाला सोपानबद्ध मार्ग, जिसकी प्रत्येक भूमि किसी एक देवता के अधिष्ठान में है। मुख्य विचार यह कि क्या ज्ञानी कार्य-ब्रह्म (सगुण) तक पहुँचता है, फिर कारण-ब्रह्म (निर्गुण) में, अथवा सीधे। बादरायण दोनों पक्षों का निरूपण करते हैं।
4.3.1-4.3.6
अर्चि-आदि-मार्ग अधिकरण: देवयान-मार्ग
इस पाद का मुख्य विषय देवयान-मार्ग है, ज्ञानी के देहत्याग के पश्चात् की गति। छान्दोग्य 5.10 में दो मार्ग वर्णित हैं, देवयान और पितृयान। ज्ञानी देवयान से जाते हैं।
सूत्र 4.3.1, यह मार्ग अर्चि अर्थात् ज्योति से आरम्भ होता है, क्योंकि श्रुति में यही प्रसिद्ध है। क्रम इस प्रकार है, अर्चि, दिन, शुक्ल-पक्ष, उत्तरायण, संवत्सर, आदित्य, चन्द्र, विद्युत्, और अंत में ब्रह्मलोक। सूत्र 4.3.2, वायु की भूमि भी इस क्रम में है, अविशेष और विशेष के वचनों से। सूत्र 4.3.3, विद्युत् के पश्चात् वरुण आदि की भूमि है, सम्बन्ध से। सूत्र 4.3.4, ये भूमियाँ आतिवाहिक हैं, अर्थात् एक भूमि जीव को अगली तक पहुँचाती है, ऐसा लिङ्ग से सिद्ध है। सूत्र 4.3.5, कोई कहे जीव स्वयं नहीं जा सकता, तो ये अधिष्ठातृ-देवता ही उसे ले जाते हैं। सूत्र 4.3.6, विद्युत् की भूमि से आगे की गति वैद्युत-पुरुष ही कराता है, श्रुति ऐसा कहती है।
प्रत्येक भूमि किसी एक देवता के अधिष्ठान में है, और यही उत्तरायण-गति का सोपानबद्ध मार्ग है।
संगति: छान्दोग्य 4.15.5, 5.10.1-2। बृहदारण्यक 6.2.15।
4.3.7-4.3.14
कार्य-ब्रह्म अधिकरण: ज्ञानी की गति का गन्तव्य
यहाँ प्रश्न यह है कि देवयान से जाता हुआ ज्ञानी जिस स्थान तक पहुँचता है, वह कार्य-ब्रह्म (सगुण, हिरण्यगर्भ) है अथवा कारण-ब्रह्म (निर्गुण, परमार्थ)।
सूत्र 4.3.7, आचार्य बादरि का मत है कि वह कार्य-ब्रह्म ही है, क्योंकि गति की उपपत्ति वहीं तक बैठती है, गमन सगुण-लोक तक ही सम्भव है। सूत्र 4.3.8, श्रुति में उसका विशेषण-सहित कथन है, इससे भी यही सिद्ध है। सूत्र 4.3.9, सामीप्य के कारण उसे परम-ब्रह्म कह दिया जाता है। सूत्र 4.3.10, कार्य-दशा के क्षीण होने पर वहाँ के अधिष्ठाता के साथ जीव परम-ब्रह्म तक पहुँचता है। यही क्रम-मुक्ति का आधार है।
सूत्र 4.3.11, स्मृति भी इसका समर्थन करती है। सूत्र 4.3.12, आचार्य जैमिनि का मत है कि गति परम-ब्रह्म तक ही है, क्योंकि श्रुति में ब्रह्म-शब्द मुख्य अर्थ में है। सूत्र 4.3.13, श्रुति का दर्शन भी यही है। सूत्र 4.3.14, कार्य-ब्रह्म की प्राप्ति का संकल्प ज्ञानी नहीं करता, उसका लक्ष्य तो परम-ब्रह्म ही है।
यहाँ क्रम-मुक्ति और सद्योमुक्ति का विवेक है। शंकर का सिद्धान्त, ज्ञान होते ही, इसी देह में, सद्योमुक्ति होती है, यही जीवन्मुक्ति है। किन्तु सगुण-उपासक के लिए ब्रह्मलोक होते हुए क्रम-मुक्ति का मार्ग है। बादरायण दोनों स्थितियों का निरूपण करते हैं।
4.3.15-4.3.16
अप्रतीक-आलम्बन अधिकरण: पाद 3 का समापन
सूत्र 4.3.15, बादरायण का मत है कि जो प्रतीक का आलम्बन न ले कर निर्गुण-ब्रह्म का चिन्तन करते हैं, उन्हें ही अधिष्ठातृ-पुरुष परम-ब्रह्म तक ले जाता है। दोनों ओर एक-एक दोष आता है, इसलिए जैसी क्रतु अर्थात् उपासना, वैसी गति। सूत्र 4.3.16, श्रुति इन उपासकों में विशेष भेद भी दिखाती है।
निर्गुण-चिन्तन करने वाले ज्ञानी की गति सीधे परम-ब्रह्म की ओर है, प्रतीकोपासक की गति ब्रह्मलोक के मार्ग से।
मुक्ति अपने ही स्वरूप का आविर्भाव है, कोई नवीन अर्जन नहीं। तीन आचार्यों के मत, जैमिनि, औडुलोमि और बादरायण। जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का भेद। मुक्त जीव जगत् का स्रष्टा नहीं (जगद्-व्यापार-वर्जम्)। और अंत में “अनावृत्तिः शब्दात्, अनावृत्तिः शब्दात्” का द्विगुणित वचन।
4.4.1-4.4.4
सम्पद्य-आविर्भाव अधिकरण: मुक्त जीव का स्वरूप
यह पाद आरम्भ होता है, और यही पूरे ग्रंथ का समापन-खण्ड है। यहाँ बादरायण मुक्त जीव के अनुभव और स्वरूप का निरूपण करते हैं।
सूत्र 4.4.1, ब्रह्म को प्राप्त कर जीव अपने ही स्वरूप में आविर्भूत होता है, क्योंकि श्रुति में “स्वेन” अर्थात् “अपने रूप से” यह शब्द है। कुछ नया अर्जित नहीं होता, जो स्वरूप पहले से था वही प्रकट होता है। सूत्र 4.4.2, यह मुक्त-अवस्था है, क्योंकि श्रुति की प्रतिज्ञा यही है। सूत्र 4.4.3, यहाँ आत्मा प्रकरण से ब्रह्म-अभिन्न आत्मा ही अभिप्रेत है। सूत्र 4.4.4, यह अवस्था अविभाग-रूप से दृष्ट है, परम तत्त्व से अभिन्न।
यह अद्वैत-वेदान्त का शुद्धतम वचन है। मुक्ति में कुछ जुड़ता नहीं, अज्ञान का निवारण-मात्र होता है। अपने ही स्वरूप का प्रकाश हो जाना ही मुक्ति है।
संगति: छान्दोग्य 8.3.4, “एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिः उपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।”
4.4.5-4.4.7
आचार्य-मत अधिकरण: मुक्त-अवस्था की प्रकृति
यहाँ तीन आचार्यों के मत हैं। सूत्र 4.4.5, आचार्य जैमिनि का मत है कि मुक्त जीव ब्राह्म गुणों, जैसे सर्वज्ञता आदि, से युक्त होता है, क्योंकि श्रुति में ऐसा उपन्यास है। सूत्र 4.4.6, आचार्य औडुलोमि का मत है कि वह केवल चितिमात्र, अर्थात् शुद्ध चैतन्य, है, क्योंकि उसका स्वरूप वही है। सूत्र 4.4.7, बादरायण का निर्णय है कि दोनों मतों में विरोध नहीं, क्योंकि श्रुति में गुणों का उपन्यास है और चैतन्य-स्वरूप का पूर्व-भाव भी।
दो छोरों के मत हैं, गुण-सहित और शुद्ध-चैतन्य-मात्र, और बादरायण का निर्णय इन दोनों को समन्वित करता है।
4.4.8-4.4.9
सङ्कल्प अधिकरण: मुक्त की इच्छाएँ
सूत्र 4.4.8, मुक्त जीव की इच्छाएँ केवल सङ्कल्प-मात्र से पूर्ण होती हैं, श्रुति इसका प्रमाण देती है। सूत्र 4.4.9, इसी कारण उसका कोई अन्य अधिपति नहीं, वह स्वतन्त्र है।
मुक्त जीव परम तत्त्व से अभिन्न है, इसलिए उसका सङ्कल्प ही उसकी पूर्णता है।
4.4.10-4.4.14
भाव-अभाव-शरीर अधिकरण: मुक्त के देह का प्रश्न
मुक्त जीव के पास देह रहती है अथवा नहीं, यह प्रश्न यहाँ विचारित है।
सूत्र 4.4.10, आचार्य बादरि का मत है कि देह का अभाव रहता है। सूत्र 4.4.11, आचार्य जैमिनि का मत है कि देह हो सकती है, क्योंकि श्रुति में विकल्प का आम्नान है। सूत्र 4.4.12, बादरायण का निर्णय है कि उभयविध, अर्थात् दोनों, सम्भव है, जैसे द्वादशाह यज्ञ दोनों प्रकार से होता है। सूत्र 4.4.13, देह के अभाव में मुक्त की स्थिति स्वप्न के समान है, ऐसी उपपत्ति है। सूत्र 4.4.14, देह के सद्भाव में उसकी स्थिति जाग्रत् के समान है।
यही जीवन्मुक्ति, अर्थात् देह रहते मुक्ति, और विदेहमुक्ति, अर्थात् देहपात के पश्चात् मुक्ति, का भेद है। बादरायण दोनों अवस्थाओं को स्वीकार करते हैं।
4.4.15-4.4.16
अनेक-शरीर अधिकरण: एक साथ अनेक देह
सूत्र 4.4.15, जैसे एक दीप अनेक वर्तिकाओं में एक साथ आवेश कर सकता है, उसी प्रकार मुक्त जीव सङ्कल्प से अनेक देहों में एक साथ आविष्ट हो सकता है, श्रुति ऐसा दिखाती है। सूत्र 4.4.16, सुषुप्ति और लय, इन दोनों में से किसी एक की अपेक्षा से ही उसका विभाग-रहित स्वरूप प्रकट होता है।
यह विभूति-सम्बन्धी कथन है, जो साधु-परम्परा में अनेक स्थानों पर श्रुत है।
4.4.17-4.4.22
जगद्-व्यापार अधिकरण: मुक्त के ऐश्वर्य की मर्यादा
सूत्र 4.4.17 मूल वचन है। “जगद्-व्यापार-वर्जम्”, मुक्त जीव को ब्रह्म-तुल्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है, किन्तु जगत् का व्यापार, अर्थात् सृष्टि, स्थिति और संहार, उसके अधिकार में नहीं। यह केवल ईश्वर का कार्य है।
यह बादरायण का सूक्ष्म सिद्धान्त है। मुक्त जीव परम तत्त्व के अनुभव से सम्पन्न है, किन्तु जगत् का स्रष्टा नहीं।
सूत्र 4.4.18, प्रकरण से और असन्निहित होने से भी यही सिद्ध है। सूत्र 4.4.19, कोई कहे कि प्रत्यक्ष उपदेश है, तो वह अधिकारिक-मण्डल में स्थित ईश्वर के विषय में है, मुक्त जीव के विषय में नहीं। सूत्र 4.4.20, मुक्त जीव विकार से परे है, श्रुति ऐसा दिखाती है। सूत्र 4.4.21, उसकी स्थिति का कथन श्रुति प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों से करती है। सूत्र 4.4.22, मुक्त को ईश्वर के साथ केवल भोग-मात्र में साम्य है, ऐश्वर्य के पूर्ण व्यापार में नहीं।
मुक्त जीव को लघु-ईश्वर मानने का भाव बादरायण अस्वीकार करते हैं। स्रष्टा एक ही ईश्वर है, मुक्त जीव परम तत्त्व के अनुभव में अभिन्न होते हैं, किन्तु जगत् के कर्ता नहीं।
4.4.23
अनावृत्ति अधिकरण: समापन, “अब लौटना नहीं”
यह पूरे ग्रंथ का अंतिम सूत्र है। बादरायण ने “अनावृत्तिः शब्दात्”, अर्थात् “श्रुति के अनुसार अब लौटना नहीं”, कह कर समापन किया, और ग्रंथ की समाप्ति के नियम के अनुसार अंतिम सूत्र को द्विगुणित किया, “अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात्।”
दो शब्दों में समस्त ग्रंथ का सार है। “अनावृत्ति”, अर्थात् वापसी नहीं। ब्रह्म में लीन होने के पश्चात् न कोई वापसी, न पुनर्जन्म, न संसार-चक्र।
और “शब्दात्”, अर्थात् यह श्रुति का वचन है। बादरायण ने अपने सम्पूर्ण ग्रंथ में जितनी युक्ति लगाई हो, अंत में वे श्रुति-प्रमाण पर ही प्रतिष्ठित हैं। यही उनके दर्शन की नींव है।
संसार-चक्र से मुक्ति, अंतिम विश्रान्ति। बादरायण की पाँच सौ पचपन सूत्रों की यात्रा इसी एक शब्द पर पूर्ण होती है, “अनावृत्ति।”
संगति: छान्दोग्य 4.15.6, बृहदारण्यक 6.2.15, मुण्डक 3.2.6 (“न च पुनरावर्तते”)। श्रुति में यह स्पष्ट कहा गया है।
पूरे ग्रंथ का समापन
पाँच सौ पचपन सूत्र, सोलह पाद, चार अध्याय। इस प्राचीन ग्रंथ का अंतिम वचन अत्यन्त सरल है।
“श्रुति के अनुसार अब लौटना नहीं। श्रुति के अनुसार अब लौटना नहीं।”
दो शब्दों में समस्त ग्रंथ का सार है। बादरायण ने इसी वचन के साथ समापन किया।
“अनावृत्ति” अर्थात् पुनरागमन नहीं। ब्रह्म-साक्षात्कार होने पर जीव फिर संसार-चक्र में नहीं आता। यह जन्म-मरण से अंतिम मुक्ति का वचन है।
और “शब्दात्” अर्थात् “श्रुति के अनुसार”। बादरायण ने अपने सम्पूर्ण ग्रंथ में जितनी युक्ति लगाई, अंत में वे श्रुति पर ही प्रतिष्ठित हैं। यही उनका प्रमाण-निष्ठ स्वभाव है।
परम्परा के नियम के अनुसार अंतिम सूत्र को दो बार लिखा जाता है, यह अध्याय की समाप्ति का चिह्न है। बादरायण ने इसी सूत्र को द्विगुणित कर के पूरे ग्रंथ की पूर्णता का संकेत दिया है।
साथ में पढ़ें
- ब्रह्म सूत्र संग्रह
- अध्याय 1 (समन्वय)
- अध्याय 2 (अविरोध)
- अध्याय 3 (साधन)
- उपनिषद् संग्रह विशेषतः छान्दोग्य 4.15 और 5.10 (देवयान-मार्ग) तथा बृहदारण्यक 6.2 (पञ्चाग्नि-विद्या)
- भगवद् गीता अध्याय 8 (अन्त-समय का स्मरण) और 15 (पुरुषोत्तम)
- अष्टावक्र गीता जीवन्मुक्त अवस्था का सबसे प्रत्यक्ष कथन
अध्याय का आरम्भ इस जिज्ञासा से होता है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के निमित्त उपासना एक ही बार करनी है अथवा बार-बार।
सूत्र 4.1.1 कहता है, आवृत्ति आवश्यक है, क्योंकि श्रुति में उपदेश असकृत्, अर्थात् बार-बार, हुआ है। उपासना एक ही प्रयास से सिद्ध नहीं होती, सतत अभ्यास अपेक्षित है। सूत्र 4.1.2 में लिङ्ग अर्थात् श्रुति के अन्य चिह्न भी इसी ओर संकेत करते हैं।