समन्वय
सब उपनिषद् ब्रह्म पर ही convergent · 4 पाद, ~134 सूत्र, ~35 अधिकरण
इस अध्याय का काम
अध्याय 1 का नाम “समन्वय” है। समन्वय अर्थात् harmonization, यानी “सब को एक frame में बैठाना।”
बादरायण का problem-वाक्य यह है: उपनिषद् कई हैं, और हर उपनिषद् भिन्न-भिन्न metaphors और कथाओं से बात करती है। कहीं “अन्तर्यामी,” कहीं “आकाश,” कहीं “वैश्वानर,” कहीं “हृदय-दहर,” कहीं “अंगुष्ठ-मात्र पुरुष।” प्रश्न, ये सब अलग entities हैं, या एक ही ब्रह्म के विभिन्न angles?
बादरायण का जवाब, एक ही ब्रह्म। और पूरा अध्याय 1 इसी claim को सिद्ध करता है, पाद-by-पाद, अधिकरण-by-अधिकरण। हर अधिकरण एक specific उपनिषद्-passage पर बैठ कर पूछता है, “यह passage किस की बात कर रहा है?” और जवाब वही, “ब्रह्म की।”
दूसरी schools (विशेषतः सांख्य) कहती हैं कि कोई-कोई passages “प्रधान” (अचेतन-प्रकृति) की बात कर रहे हैं, ब्रह्म नहीं। बादरायण उन objections का भी जवाब इसी अध्याय में देते हैं।
पहले 4 सूत्र foundational हैं, ब्रह्म-जिज्ञासा का अधिकार, ब्रह्म-लक्षण, शास्त्र-pramana, और समन्वय-दावा। बाक़ी सूत्रों में बादरायण विशेष उपनिषद्-passages को ब्रह्म-पर apply करते हैं।
1.1.1
जिज्ञासाधिकरण: ब्रह्म की inquiry का अधिकार
1.1.2
जन्माद्यधिकरण: ब्रह्म के लक्षण
जिस से इस जगत् का जन्म, स्थिति, और संहार होता है, वही ब्रह्म है। चार शब्दों में बादरायण ब्रह्म की definition दे रहे हैं।
यह तटस्थ-लक्षण है, अर्थात् “उसकी पहचान कैसे करें” वाला lakshana। एक स्वरूप-लक्षण भी है (सत्यं-ज्ञानम्-अनन्तं-ब्रह्म), परन्तु तटस्थ-लक्षण से शुरू करना natural है। जो भी दिखता है, उसके पीछे एक कारण है, और सबके पीछे जो common-कारण है, वह ब्रह्म।
संगति: यह सीधे तैत्तिरीय उपनिषद् 3.1.1 से लिया गया है, “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।” बादरायण उपनिषद्-statement को सूत्र में compress कर देते हैं।
1.1.3
शास्त्र-योनित्व अधिकरण: ब्रह्म कैसे जाना जाए
क्योंकि शास्त्र ही (ब्रह्म-ज्ञान का) source है। दो शब्दों में बादरायण कह रहे हैं कि ब्रह्म को केवल “सोचने” से नहीं जाना जा सकता, शास्त्र-pramana चाहिए।
यह एक specific epistemic-दावा है। तर्क, अनुमान, प्रत्यक्ष, सब के अपने उपयोग हैं,उसका source केवल revealed-text (श्रुति) हो सकता है। शंकराचार्य इस पर बहुत बल देते हैं।
संगति: मुण्डक उपनिषद् (1.1.5) में दो प्रकार के ज्ञान बताए गए हैं, परा और अपरा। अपरा-विद्या में चारों वेद और छह वेदांग हैं, परा-विद्या से ही ब्रह्म जाना जाता है। बादरायण उसी distinction पर खड़े हैं।
1.1.4
समन्वय अधिकरण: सब उपनिषद् ब्रह्म पर
पूरे अध्याय का mukhya सूत्र। “तत्तु,” अर्थात् “वह तो,” सब उपनिषद्-passages का “समन्वय,” यानी harmonization, ब्रह्म पर ही है।
यह सूत्र अध्याय 1 को “समन्वय” नाम देता है। प्रारम्भ में ही बादरायण declare कर देते हैं, उपनिषद् कितने भी हों, कितने भी अलग-अलग metaphors और कथाएँ हों, सबकी destination एक ही है, ब्रह्म-ज्ञान। हर sutra-cluster जो आगे आएगा, इसी claim का proof है।
दिल्ली में जैसे कोई कह दे कि “हर text अपना अलग message देता है,” तो बादरायण उसका जवाब इस एक सूत्र से देंगे, “नहीं, हर text का ultimate-message एक ही है, बस वर्णन-शैली भिन्न है।”
संगति: छान्दोग्य 6.2.1 (“एकमेव अद्वितीयम्”), बृहदारण्यक 4.4.19 (“नेह नानास्ति किञ्चन”), और कठ 2.1.11 (“मनसैवेदम्”) में ही convergent point देखा जा सकता है, सब एक ही ब्रह्म।
1.1.5-1.1.11
ईक्षत्यधिकरण: सांख्य का प्रधान ब्रह्म नहीं
पहला major अधिकरण, सात सूत्रों का। यहाँ सांख्य-दर्शन का refutation है।
सांख्य-वादी कहते हैं कि जगत् का कारण “प्रधान” (अचेतन-प्रकृति) है, ब्रह्म नहीं। बादरायण का जवाब, ईक्षतेर्नाशब्दम्, अर्थात् छान्दोग्य 6.2.3 कहता है “स ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेय,” अर्थात् वह “देखा” (ऐक्षत), और “सोच कर” बहुगुना होने का संकल्प किया। अब “देखना” और “सोचना” अचेतन प्रधान नहीं कर सकता, चेतन-Brahman ही कर सकता है। इसी कारण जगत् का कारण ब्रह्म है, प्रधान नहीं।
अगले सूत्रों में बादरायण कई angles से यही point reinforce करते हैं। 1.1.6 में: कोई कहे कि “ऐक्षत” शब्द metaphorical है (गौण), तो बादरायण मना करते हैं, क्योंकि उसी passage में “तत्” को “आत्मा” शब्द से reference मिलता है। 1.1.7 में: छान्दोग्य 6.8.7 में “तत् त्वम् असि” स्पष्ट कहता है, और मोक्ष-उपदेश सीधा कह दिया गया है। 1.1.8 में: यदि प्रधान होता, तो उसे “त्याज्य” बताया जाता, परन्तु ऐसा नहीं कहा गया। 1.1.9 में: सुषुप्ति में जीव अपने स्वरूप में ही लय हो जाता है, यानी ब्रह्म ही source है। 1.1.10 में: अन्य उपनिषद्-passages भी इसी पर point करते हैं। 1.1.11 में: मुण्डक 1.1.6 directly कहता है, “तद् एतत् सत्यं,” वह सत्य है।
संगति: छान्दोग्य उपनिषद् का छठा प्रपाठक (Uddalaka-Shvetaketu) इस पूरे अधिकरण का foundation है। हर सूत्र वहीं से quote कर रहा है।
1.1.12-1.1.19
आनन्दमय अधिकरण: तैत्तिरीय का “आनन्दमय कोश” ब्रह्म है
तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1-9 में पाँच कोशों का वर्णन है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय। प्रश्न है, इन पाँचों में कौनसा “ब्रह्म” है?
पूर्व-पक्ष कहता है कि “आनन्दमय” भी एक कोश है, कोश तो “जीव” का होता है, ब्रह्म नहीं। बादरायण का जवाब, “अभ्यासात्,” यानी उपनिषद् बार-बार “आनन्द” को ही ब्रह्म कहती है। 2.7.1 में “रसो वै सः,” 2.7.2 में “एष ह्येवानन्दयाति,” बार-बार आनन्द-तत्त्व का अभ्यास।
1.1.13 में: यदि कोई कहे कि “मय” प्रत्यय का अर्थ “विकार” (modification) है, तो बादरायण मना करते हैं। यहाँ “मय” का अर्थ “प्राचुर्य” (abundance) है, मतलब “आनन्द-प्रधान।” 1.1.14: तैत्तिरीय खुद कहता है आनन्द ही सबका हेतु है। 1.1.15: “रसो वै सः” वाला मन्त्र-वर्णक आनन्दमय का ही गुण-गान कर रहा है। 1.1.16: अन्य कोई जीव-तत्त्व ब्रह्म नहीं हो सकता। 1.1.17: तैत्तिरीय में जीव और ब्रह्म का भेद-व्यपदेश है। 1.1.18: “सोऽकामयत,” ब्रह्म ने “इच्छा” की, अनुमान-prediction नहीं। 1.1.19: तैत्तिरीय आनन्दमय में ब्रह्म-योग का उपदेश देती है।
दिल्ली में आज: हम तीन kinds of आनन्द को जानते हैं, sense-pleasure, achievement-satisfaction, और एक तीसरा प्रकार, जो meditation में कभी-कभी मिलता है, बिना कोई trigger के। उपनिषद् कह रही है कि तीसरा वाला ही “ब्रह्म-आनन्द” है। बाक़ी दो छाया-आनन्द हैं।
संगति: तैत्तिरीय उपनिषद् 2.7-2.9, विशेषतः “रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।” यह अधिकरण उसी मन्त्र का व्याख्यान है।
1.1.20-1.1.21
अन्तर अधिकरण: सूर्य के भीतर का “अन्तर” ब्रह्म
छान्दोग्य उपनिषद् 1.6.6 में कहा गया है, “अथ य एषो अन्तर् आदित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते।” सूर्य के भीतर एक “स्वर्णिम पुरुष” दिखता है। प्रश्न, यह “पुरुष” कौन?
पूर्व-पक्ष कहे, यह “सूर्य-देवता” या कोई जीव है। बादरायण का उत्तर, “तद्-धर्म-उपदेशात्,” वही गुण उपदेशे गए हैं जो ब्रह्म के हैं (पाप-रहित, अजर, अमर, सत्य-काम, सत्य-संकल्प)।ब्रह्म ही है।
1.1.21 में बादरायण add करते हैं: सूर्य-देव और इस “हिरण्मय पुरुष” का स्पष्ट भेद-व्यपदेश है, अर्थात् इन्हें different कहा गया है। तो यह कोई बाहरी देवता नहीं।
संगति: छान्दोग्य 1.6-1.7 का यह passage Vedic-symbolism का एक उदाहरण है, सूर्य outer-symbol, पर अंदर का “हिरण्मय पुरुष” inner-meaning, ब्रह्म।
1.1.22
आकाश अधिकरण: “आकाश” ब्रह्म है
छान्दोग्य उपनिषद् 1.9.1 में कहा गया है, “आकाशो ह वै नाम-रूपयोर्निर्वहिता।” आकाश ही नाम-रूप का “निर्वाहक” है। अब, यह “आकाश” क्या है?
पूर्व-पक्ष कहे, यह physical आकाश (element-akasha) है। बादरायण का उत्तर, “तत्-लिङ्गात्,” यानी इसके साथ जो गुण-वर्णन है (नाम-रूप का निर्वाहक), वह केवल ब्रह्म पर apply होता है। physical आकाश नाम-रूप का निर्वाहक नहीं हो सकता।
संगति: छान्दोग्य में “आकाश” शब्द कई जगह आता है, कभी physical-element के लिए, कभी ब्रह्म के लिए। बादरायण case-by-case मार्ग सिखा रहे हैं।
1.1.23
प्राण अधिकरण: “प्राण” ब्रह्म है
छान्दोग्य 1.11.5 में “प्राण” को सबसे superior बताया गया है। प्रश्न, क्या यह physical-breath है, या ब्रह्म?
बादरायण का उत्तर सीधा: पिछले सूत्र (आकाश-अधिकरण) की logic इस पर भी apply होती है। साथ-में गुण-वर्णन (सर्व-वेद, सर्व-शक्ति) ब्रह्म पर ही apply होते हैं।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 4.20 में भी “प्राण-ब्रह्म” का identical equation है। यह Vedic-तरीक़ा है, immediate-experience (breath, sky) को ले कर deeper-reality की ओर इशारा करना।
1.1.24-1.1.27
ज्योति अधिकरण: “ज्योति” ब्रह्म है
छान्दोग्य 3.13.7 में कहा गया है, “अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।” स्वर्ग के पार जो ज्योति प्रकाशित होती है। यह क्या?
पूर्व-पक्ष कहे, यह physical light, सूर्य या तारे। बादरायण का उत्तर, उसी passage में “चरण” का reference है, अर्थात् “एक-चौथाई।” वही passage पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद 10.90.3) में “पाद” शब्द से बँधा है, “पादोऽस्य विश्वा भूतानि।” यानी सब भूत उसके एक-चरण-मात्र हैं। physical-light ऐसी claim नहीं करवा सकती। यह ब्रह्म ही है।
1.1.25: यदि कोई कहे यह “गायत्री-छन्द” की praise है, बादरायण मना करते हैं। यहाँ “चेतो-अर्पण-निगद,” यानी ध्यान-लक्ष्य के रूप में निगद, वही पुरुष पर apply होता है। 1.1.26: चार-पाद-वर्णन ब्रह्म पर fit होता है, छन्द पर नहीं। 1.1.27: कोई कहे कि “उपदेश में भेद” है, पर ब्रह्म और गायत्री-छन्द दोनों ही aspect हैं, no विरोध।
संगति: छान्दोग्य 3.12-13 (गायत्री-meditation) और पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद 10.90)। दोनों के बीच का connection यहाँ formal-कर दिया गया है।
1.1.28-1.1.31
प्राण-पुनर अधिकरण: “प्राण” फिर से ब्रह्म
कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.2 में इन्द्र खुद को “प्राण-ब्रह्म” कह कर अपनी praise कर रहे हैं। पूर्व-पक्ष कहे, यह तो जीव-इन्द्र की self-praise है, ब्रह्म कैसे?
बादरायण का उत्तर: 1.1.28 में, उसी passage में जो गुण कहे गए हैं, वो “प्राण-ब्रह्म” पर ही apply होते हैं। 1.1.29: कोई कहे यह “वक्ता” (इन्द्र) की self-व्यपदेश है, पर वहाँ जो अध्यात्म-संबन्ध-वर्णन है, वो ब्रह्म का है। 1.1.30: यह उपदेश “वामदेव” वाला ही pattern है, जहाँ Rishi Vamadeva ने भी कहा था “अहम् मनुर्भवं सूर्यश्च,” यानी “मैं मनु था, मैं सूर्य था।” वामदेव-वाक्य भी अहं-ब्रह्मास्मि वाली realization थी। इन्द्र-वाक्य भी वही। 1.1.31: यदि कोई कहे यह जीव-मुख्य-प्राण-वर्णन है, बादरायण मना करते हैं, क्योंकि यहाँ ब्रह्म-योग का तीन-स्तरीय उपासना का संकेत है।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.1-3.2। और ऋग्वेद 4.26.1 में वामदेव-वाक्य।
इस पाद में बादरायण विभिन्न उपनिषद्-passages को ले कर दिखाते हैं कि उनमें वर्णित entity ब्रह्म ही है, जीव या प्रधान या देवता नहीं। प्रत्येक अधिकरण एक specific passage पर है।
1.2.1-1.2.8
सर्वत्र-प्रसिद्धि अधिकरण: सब जगह प्रसिद्ध, यानी ब्रह्म
छान्दोग्य 3.14.1 में कहा गया है, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” यह सब ब्रह्म है। इसी सूत्र-cluster में बादरायण उसी passage के सम्बंध में जो objection उठते हैं, उनका जवाब देते हैं।
पूर्व-पक्ष: यह “सर्वं” शब्द जीव पर भी apply हो सकता है, इस-तरह जीव ही “सर्व” है। बादरायण का उत्तर: सर्वत्र-प्रसिद्ध, अर्थात् यह वाक्य universal के संदर्भ में है, सब-कुछ पर apply होता है, सिर्फ़ जीव पर नहीं।
अगले सूत्रों में: 1.2.2 जो गुण कहे गए हैं (मनोमय, प्राणशरीर, भारूप, सत्य-संकल्प) वो ब्रह्म पर apply होते हैं। 1.2.3 शारीर-जीव पर ये गुण apply नहीं हो सकते। 1.2.4 कर्ता-कर्म का व्यपदेश “तं क्रतुं कुर्वीत” ब्रह्म को indicate करता है। 1.2.5 शब्द-विशेष ब्रह्म-specific हैं। 1.2.6 स्मृति (गीता 18.61) भी same point करती है। 1.2.7 कोई कहे “अर्भक-स्थान” (छोटी जगह, हृदय में) में ब्रह्म कैसे, बादरायण का जवाब: “व्योम-वत्,” यानी आकाश-तरह, स्थानिक-मात्रा से limited नहीं। 1.2.8 कोई कहे यदि ब्रह्म हृदय में है तो जीव-दुख ब्रह्म को भी होंगे, बादरायण मना करते हैं, “वैशेष्यात्,” ब्रह्म-स्वरूप जीव से वैशिष्ट्य रखता है।
संगति: छान्दोग्य 3.14.1-4। और गीता 18.61, “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।”
1.2.9-1.2.10
अत्तृ अधिकरण: “अत्ता” (खाने वाला) ब्रह्म है
कठ उपनिषद् 1.2.25 में एक भयानक image है, “यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनम् क इत्था वेद यत्र सः।” जिसके भोजन में ब्रह्म और क्षत्र (दोनों वर्ण) हैं, और मृत्यु जिसकी चटनी है। यह “अत्ता” कौन?
बादरायण का उत्तर: यह केवल ब्रह्म हो सकता है, क्योंकि चराचर (move + non-move) सब को “ग्रहण” (consume) करना ब्रह्म के अलावा किसी का नहीं। और इस passage का प्रकरण भी ब्रह्म के संदर्भ में है (नचिकेता-यम संवाद, जो आत्मा-ब्रह्म पर है)।
संगति: कठ उपनिषद् 1.2.25। यह image बहुत strong है, मृत्यु-को-भी-निगलने-वाला ब्रह्म।
1.2.11-1.2.12
गुहा-प्रविष्ट अधिकरण: हृदय-गुहा में दो
कठ उपनिषद् 1.3.1 में एक प्रसिद्ध image है, “ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे।” दो प्राणी हृदय-गुहा में बैठे हैं, ऋत (cosmic-truth) पी रहे हैं। ये दो कौन?
बादरायण का उत्तर: यह जीव और ब्रह्म दोनों हैं। 1.2.12 में बादरायण add करते हैं कि उसी passage में बाद में specifically इन दोनों का विशेषण देखें, “एक है खाता है, एक देखता है।” यह जीव-ब्रह्म-distinction की foundational image है।
संगति: मुण्डक उपनिषद् 3.1.1 में same image, “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया।” दो पक्षी एक पेड़ पर। हम इसको पहले से उपनिषद्-संग्रह में देख चुके हैं।
1.2.13-1.2.17
अन्तर अधिकरण: “अन्तर” आत्मा ब्रह्म है
छान्दोग्य उपनिषद् 4.15.1 में कहा गया है, “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा।” आँख में जो “पुरुष” दिखता है, वही आत्मा। यह क्या? आँख की pupil-reflection?
यह ब्रह्म है। अगले passage में इस पुरुष को “अमृत, अभय, ब्रह्म” कहा गया है। 1.2.14 स्थान-तत्त्व-व्यपदेश ब्रह्म-specific। 1.2.15 सुख-विशिष्ट-अभिधान, जो आँख-reflection पर apply नहीं। 1.2.16 श्रुति में इसी से archirado-gati (ज्योति-marg) का उपदेश है, ज्ञानी के अंतिम-gati का। 1.2.17 पुपिल-reflection कोई “अनवस्थित” entity है, पर ब्रह्म “अवस्थित” है।
संगति: छान्दोग्य 4.15। और इसी “अन्तर-पुरुष” को ईशावास्य उपनिषद् 1.1 भी indicate करती है।
1.2.18-1.2.20
अन्तर्यामी अधिकरण: सबके भीतर का controller
बृहदारण्यक उपनिषद् 3.7 में याज्ञवल्क्य उद्दालक से बात कर रहे हैं, और एक specific entity का वर्णन करते हैं, “अन्तर्यामी।” वह जो सब-कुछ के भीतर है, सब-कुछ को control करता है, पर सब-कुछ उसे नहीं जानता।
बादरायण: यह अन्तर्यामी ब्रह्म ही है। उपनिषद् में अधिदैव, अधिभूत, अध्यात्म, तीनों स्तरों पर उसी एक का वर्णन है। 1.2.19 कोई कहे कि यह सांख्य का “प्रधान” है, बादरायण मना करते हैं, क्योंकि उसके धर्म (अदृष्ट, अपालन-समर्थ) सांख्य-प्रधान पर apply नहीं। 1.2.20 शरीर भी “अन्तर्यामी” नहीं हो सकता, क्योंकि उपनिषद् ही उन्हें “भेद से” describe करती है, पृथक्।
संगति: बृहदारण्यक 3.7 (“अन्तर्यामी-ब्राह्मण”)। यह उपनिषद्-passages में सबसे elaborate-philosophical है।
1.2.21-1.2.23
अदृश्यत्व अधिकरण: “अदृश्य-गुण” वाला ब्रह्म
मुण्डक उपनिषद् 1.1.6 में एक specific entity का वर्णन है, “यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुश्रोत्रम् तदपाणिपादम्।” वह जो अदृश्य है, अग्राह्य है, बिना गोत्र-वर्ण-इन्द्रिय-हाथ-पैर के।
बादरायण: यह ब्रह्म है। उसके निषेधात्मक धर्मों का उल्लेख स्पष्ट करता है। 1.2.22 इसमें कुछ विशेषण और कुछ भेद-व्यपदेश हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि यह न जीव है, न प्रकृति। 1.2.23 साथ-में उसके स्व-रूप का भी उपन्यास, “हिरण्मय,” “स्वर्णिम,” जो उसे जीव से अलग करता है।
संगति: मुण्डक 1.1.5-1.1.6। यह passage बाद के नेति-नेति-तरीक़े (बृहदारण्यक 3.9) का foundation है।
1.2.24-1.2.32
वैश्वानर अधिकरण: “वैश्वानर” ब्रह्म है
छान्दोग्य 5.11-5.18 में एक specific विद्या है, “वैश्वानर-विद्या।” राजा अश्वपति केकय अपने पाँच ब्रह्म-ज्ञानी atithis को इस विद्या का उपदेश देते हैं।
पूर्व-पक्ष कहे, “वैश्वानर” तो जठराग्नि (digestion-fire) का नाम है, या पेट का। बादरायण: वैश्वानर शब्द साधारण-वर्ण-विशेष है (अर्थात् “viशेष” अर्थ में use हुआ है), यह ब्रह्म पर refer करता है। 1.2.25 स्मृति (गीता 15.14, “अहं वैश्वानरो भूत्वा”) से भी confirm। 1.2.26 कोई कहे कि उसे “हृदय में रहता” बताया गया, सीमित। पर बादरायण उत्तर: यह सिर्फ़ “दृष्टि-उपदेश” है, ध्यान-के-लिए point। पुरुष-वत् पूरा वर्णन भी है।
1.2.27 इसी कारण यह न केवल देवता है, न केवल भूत है। 1.2.28-31 चार आचार्यों (जैमिनि, आश्मरथ्य, बादरि, जैमिनि-again) के views: साक्षात्-ब्रह्म, अभिव्यक्ति, अनुस्मृति, सम्पत्ति-वाला readings। 1.2.32 “आमनन्ति च एनम् अस्मिन्,” वेद उसे “इसमें” (हृदय में) मानते हैं।
संगति: छान्दोग्य 5.11-5.24। यह उपनिषद् का सबसे elaborate “विद्या” है, पाँच-fire-knowledge और वैश्वानर-knowledge combined।
तीसरे पाद में मुण्डक का “द्युभ्व-आयतन,” छान्दोग्य का “भूमा,” बृहदारण्यक का “अक्षर,” “दहर-आकाश,” “अंगुष्ठ-पुरुष,” और कई अन्य passages। बीच में एक specific debate है: क्या देवताओं को ब्रह्म-विद्या का अधिकार है? और अंत में शूद्र-अधिकार पर एक historically-controversial अधिकरण।
1.3.1-1.3.7
द्युभ्व-आद्य-आयतन अधिकरण: स्वर्ग-पृथ्वी का आयतन
मुण्डक उपनिषद् 2.2.5 में कहा गया है, “यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षम् ओतम्।” जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी, और अंतरिक्ष ओत-प्रोत हैं, वह आयतन।
बादरायण: यह आयतन ब्रह्म है। उसी passage में “स्व-शब्द” (self-name) से refer किया गया है (आत्मा, ब्रह्म)। 1.3.2 आगे “मुक्त-पुरुष यहाँ पहुँचते हैं” कहा गया है, मुक्ति का destination ब्रह्म ही हो सकता है। 1.3.3 अनुमान-वादी कहें कि यह प्रधान है, बादरायण मना करते हैं, “अ-तत्-शब्दात्,” वहाँ कोई specifically प्रधान का शब्द नहीं। 1.3.4 साथ-में “प्राणभृत्” (प्राण-धारण-करने वाला) कहा गया है, जो ब्रह्म पर ही apply। 1.3.5 जीव-ब्रह्म का भेद-व्यपदेश भी है। 1.3.6 प्रकरण ब्रह्म के संदर्भ। 1.3.7 “स्थिति” और “अदन” (खाने वाला) यानी “all-encompassing” गुण ब्रह्म-specific।
संगति: मुण्डक 2.2.5।
1.3.8-1.3.9
भूमा अधिकरण: “भूमा” (infinite) ब्रह्म है
छान्दोग्य 7.23-7.24 में नारद-सनत्कुमार संवाद का climax। सनत्कुमार कहते हैं, “यो वै भूमा तत् सुखम्, नाल्पे सुखम् अस्ति।” जहाँ “भूमा” (infinite) है, वहीं सुख है। अल्प में सुख नहीं।
बादरायण: यह “भूमा” ब्रह्म है। “सम्प्रसाद” शब्द जीव-स्थिति के लिए use होता है, और जब “सम्प्रसाद से ऊपर” का उपदेश दिया जाए, तब वह ब्रह्म ही है। 1.3.9 साथ-में जो धर्म (निर्भयत्व, सबसे ऊपर, आदि) कहे गए हैं, वो ब्रह्म पर ही apply होते हैं।
दिल्ली में आज: हम सब “थोड़े-सुख” में जी रहे हैं, कभी salary बढ़ती है, कभी एक नया gadget आता है। उपनिषद् कहती है, अल्प-सुख फिसलता रहता है। असली सुख “भूमा” में है, जहाँ कोई बँधाव नहीं।
संगति: छान्दोग्य 7.23-7.24। यह “भूमा-विद्या” वेदान्त-शास्त्र में बहुत central है।
1.3.10-1.3.12
अक्षर अधिकरण: “अक्षर” ब्रह्म है
बृहदारण्यक 3.8 में गार्गी का प्रसिद्ध प्रश्न: “किस पर यह सब ओत-प्रोत है?” याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं, “अक्षरे, हे गार्गी।” अक्षर पर।
बादरायण: यह “अक्षर” ब्रह्म है। अम्बर (आकाश) तक धारण करने वाला, यह केवल ब्रह्म कर सकता है। 1.3.11 इसी अक्षर का “प्रशासन” (कमान्ड) भी है, यानी सब इसकी आज्ञा से चलते हैं। 1.3.12 अन्य संभावनाएँ (जीव, प्रधान) सब “व्यावृत्त” (negated) कर दी जाती हैं।
संगति: बृहदारण्यक उपनिषद् 3.8गार्गी-याज्ञवल्क्य प्रसिद्ध संवाद।
1.3.13
ईक्षति-कर्म अधिकरण: “देखा जाने वाला” यानी ब्रह्म
प्रश्न उपनिषद् 5.5 में कहा गया है, “स ओमकारेणैवायतनेन परमं पुरुषमभिगच्छति।” वह ओङ्कार के ayatana से उस “परम पुरुष” को प्राप्त करता है।
बादरायण: यह “परम-पुरुष” ब्रह्म है। उसी passage में “ईक्षति-कर्म,” यानी जिस को “देखना” है, वह ब्रह्म। ओङ्कार-meditation का target ब्रह्म ही है।
संगति: प्रश्न उपनिषद् 5।
1.3.14-1.3.21
दहर अधिकरण: “दहर-आकाश” यानी हृदय का छोटा-आकाश ब्रह्म
छान्दोग्य 8.1 का प्रसिद्ध passage। हृदय में एक “दहर” (छोटा) आकाश है, “तत्र यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्।” वहाँ जो भीतर है, उसी की खोज करनी चाहिए।
बादरायण: यह दहर-आकाश ब्रह्म है। 1.3.14 बाद के passages की logic इसी पर point। 1.3.15 “गति” और “शब्द” से लिङ्ग मिलते हैं। 1.3.16 इस “महिमा” का धारण ब्रह्म पर apply। 1.3.17 ब्रह्म ही “प्रसिद्ध” है। 1.3.18 इतर (जीव) का परामर्श यहाँ नहीं possible। 1.3.19 “उत्तर” वाला आविर्भूत-स्वरूप ब्रह्म। 1.3.20 अन्य-अर्थ का परामर्श अन्य reasons से। 1.3.21 कोई कहे कि श्रुति इसे “अल्प” कहती है, बादरायण मना करते हैं, यह केवल स्थान-निर्देश है, स्वरूप-निर्देश नहीं।
दिल्ली में आज: हम सब अपने सीने में हाथ रख कर कहते हैं “दिल में बैठा है।” यह metaphor असल में बहुत-गहरा है। हृदय में जो स्थान है, वहीं “दहर-आकाश” यानी ब्रह्म का स्थान है, परंपरा कहती है।
संगति: छान्दोग्य 8.1। यह विद्या “दहर-विद्या” कहलाती है।
1.3.22-1.3.23
अनुकृति अधिकरण: “अनुकरण-कर्ता” ब्रह्म
मुण्डक 2.2.10 में कहा गया है, “तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।” वही चमकता है, सब कुछ उसका अनुकरण करता है। उसके प्रकाश से ही सब चमकते हैं।
बादरायण: यह “अनुकरण” (अनुकृति) करने वाला ब्रह्म है। 1.3.23 स्मृति (गीता 15.6, “न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः”) में भी same point।
संगति: मुण्डक 2.2.10 + गीता 15.6।
1.3.24-1.3.25
प्रमित अधिकरण: “अंगुष्ठ-मात्र” यानी ब्रह्म
कठ उपनिषद् 2.1.12-13 और श्वेताश्वतर 3.13 में कहा गया है, “अङ्गुष्ठ-मात्रः पुरुषः।” अंगूठे के आकार का पुरुष।
बादरायण: यह “अंगुष्ठ-मात्र” ब्रह्म है, क्योंकि शब्द से ही उसका सम्बन्ध ब्रह्म से है। 1.3.25 “अंगुष्ठ-मात्र” प्रशास्त्रिक description हृदय-दृष्टि से है, मनुष्य-perspective से।meditation-image है।
संगति: कठ 2.1.12-13 + श्वेताश्वतर 3.13।
1.3.26-1.3.33
देवता-अधिकार अधिकरण: देवता को ब्रह्म-विद्या का अधिकार
एक प्रश्न: क्या केवल मनुष्य ब्रह्म-विद्या के अधिकारी हैं, या देवता भी? बादरायण और जैमिनि के बीच यहाँ-स्पष्ट मतभेद है।
क्योंकि वे “नित्य-कर्म” में बँधे हुए हैं। मधु-विद्या में देवताओं को “अस्ति-भाव” नहीं, अधिकार नहीं। बादरायण का pakshasion: देवता भी अधिकारी हैं, “तदुपरि अपि सम्भवात्,” यह possible है।क्योंकि एक-समय-एक-कर्म ही नहीं, अनेक प्रतिपत्ति-conceptions हैं। 1.3.28 शब्द-evidence से देवता-अस्तित्व सिद्ध। 1.3.29 इससे ही नित्यत्व भी। 1.3.30 समान-नाम-रूप होने से, आवृत्ति में भी विरोध नहीं। 1.3.31 जैमिनि का counter, मधु-विद्या में देवताओं को place नहीं। 1.3.32 ज्योतिष-शास्त्र में “भाव” से evidence। 1.3.33 बादरायण final, “भावं तु बादरायणः अस्ति हि,” ज़रूर देवताओं को अधिकार है।
संगति: यह बहुत specific philosophical debate है, मीमांसा-वेदान्त-interface पर। आज के reader के लिए historical-interest है।
1.3.34-1.3.38
शुग अधिकरण: शूद्र की अधिकार-कथा
यह अधिकरण ऐतिहासिक-controversial है, और इसका context-अवश्य समझना ज़रूरी है। छान्दोग्य 4.2 में सत्यकाम जाबाल और जानश्रुति की कथाएँ हैं। प्रश्न: क्या शूद्र-वर्ण को ब्रह्म-विद्या का अधिकार है?
बादरायण का pakshasion (1.3.34): नहीं, शूद्र को नहीं। उपनिषद्-passage में “शुक” (शोक) शब्द से signal मिलता है कि जानश्रुति का “शोक” क्षत्रिय-गोत्र का है, शूद्र-वर्ण का नहीं। 1.3.35 जानश्रुति की क्षत्रियत्व-evidences चैत्ररथ-संबंध से। 1.3.36 संस्कार-परामर्श के lack से शूद्र-disqualification। 1.3.37 इस disqualification के निर्धारण के लिए ही passage की प्रवृत्ति। 1.3.38 श्रवण-अध्ययन-यज्ञ के प्रतिषेध शूद्र-काल में, स्मृति-evidence से।
दिल्ली में आज: यह अधिकरण आधुनिक readers के लिए uncomfortable है, और रहना भी चाहिए। बादरायण-time का caste-discourse आज की दुनिया से बहुत भिन्न था। आधुनिक तीनों Vedanta-traditions (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत) में reform हुई है, और श्री रामकृष्ण-mission, श्री विद्या परंपराएँ, सब वर्णों को अधिकार स्पष्टतः देती हैं। हम इस passage को honestly पढ़ते हैं, मगर यह आज के living की परम्परा का position नहीं।
संगति: छान्दोग्य 4.2 (जानश्रुति-रैक्व), 4.4 (सत्यकाम जाबाल)। दूसरी कथा (सत्यकाम) actually शूद्र-style birth के बाद भी ब्रह्म-विद्या-eligible दिखाती है, यह विरोध भी रहा है।
1.3.39
कम्पन अधिकरण: “कम्पन” (vibration) ब्रह्म
कठ 2.3.2 में कहा गया है, “महद्भयं वज्रमुद्यतम्, य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।” बहुत-बड़ा भय, उठा हुआ वज्र, जो जानता है वो अमर। यहाँ “कम्पन” यानी पूरी सृष्टि का अद्भुत-कम्पन ब्रह्म से ही है।
बादरायण: कम्पन-cause ब्रह्म है, उपनिषद्-passage से ही clear।
संगति: कठ 2.3।
1.3.40
ज्योति अधिकरण: “ज्योति-दर्शन”
छान्दोग्य 8.12.3 में कहा गया है, “एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिः उपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।” मुक्त-जीव “परम-ज्योति” को प्राप्त कर अपने स्वरूप में निष्पन्न होता है।
बादरायण: यह “परम-ज्योति” ब्रह्म है। ज्योति-दर्शन यानी ब्रह्म-दर्शन।
संगति: छान्दोग्य 8.12।
1.3.41
आकाश-अर्थान्तर अधिकरण: “आकाश” फिर एक बार
छान्दोग्य 8.14.1 में फिर “आकाश” का उल्लेख।यह “अर्थ-अन्तर” (different referent) रखता है।
बादरायण: इस “अर्थ-अन्तर” का व्यपदेश इसके ब्रह्म-होने का signal है।
संगति: छान्दोग्य 8.14।
1.3.42-1.3.43
सुषुप्ति-उत्क्रान्ति अधिकरण: सुषुप्ति और मरने में आत्मा
बृहदारण्यक 4.3-4.4 में याज्ञवल्क्य का सुषुप्ति (deep-sleep) और उत्क्रान्ति (मरते-समय) का वर्णन है। दोनों ही stages में आत्मा-ब्रह्म का “मिलाप” होता है।
बादरायण: इन दो stages के through आत्मा-ब्रह्म-संबंध स्पष्ट होता है। 1.3.43 “पति,” “अपहत-पाप्मा,” आदि शब्दों से ब्रह्म ही specifically indicated।
संगति: बृहदारण्यक 4.3-4.4। याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद का यह foundation है।
चौथे पाद में मुख्यतः सांख्य-दर्शन का refutation, और एक doctrinal claim, ब्रह्म दो-तरह का कारण है, निमित्त (efficient) + उपादान (material)। यह अद्वैत-वेदान्त की foundational neev है।
1.4.1-1.4.7
आनुमानिक अधिकरण: सांख्य-प्रधान का refutation
सांख्य-वादी कहते हैं कि “अव्यक्त” (कठ 1.3.11) यानी “प्रधान” (प्रकृति) ही जगत् का कारण है। बादरायण का refutation।
शरीर-रूपक के context में बैठा है। 1.4.2 “अव्यक्त” को “सूक्ष्म” इसलिए कहा गया कि वह subtle-cause है, सांख्य-प्रधान नहीं। 1.4.3 अव्यक्त ब्रह्म-अधीन है। 1.4.4 “ज्ञेय” शब्द अव्यक्त पर apply नहीं किया गया। 1.4.5 कोई कहे “अव्यक्त बोलता है” , बादरायण मना करते हैं, यह “प्राज्ञ-Brahman” का function है। 1.4.6 प्रकरण ब्रह्म के संदर्भ। 1.4.7 तीनों (बुद्धि, इन्द्रिय, विषय) का उपन्यास और प्रश्न-pattern सांख्य-prakaran नहीं।
संगति: कठ 1.3.10-15। यह कठ-passage सांख्य-दर्शन के साथ overlap-दिखता है, मगर ब्रह्म के संदर्भ ही असली है।
1.4.8-1.4.10
चमस अधिकरण: “चमस”-रहस्य
श्वेताश्वतर 4.5 में एक तकनीकी श्लोक है, “अजामेकाम् लोहित-शुक्ल-कृष्णाम् बह्वीः प्रजाः सृजमानाम् सरूपाः।” एक अजा (unborn), लाल-सफ़ेद-काली (तीन-गुण?), कई प्रजाएँ। पूर्व-पक्ष कहे यह “प्रधान” है।
बादरायण: नहीं। 1.4.8 यह “महत्” के equivalent है, ब्रह्म का aspect। 1.4.9 “चमस” वाला उदाहरण लीजिए, जो एक specific Vedic-term है, उसका विशेष-अर्थ context से ही पता चलता है। यहाँ भी “अजा” का अर्थ ब्रह्म, सांख्य-प्रधान नहीं। 1.4.10 इसकी “ज्योति-उपक्रम” (light-beginning) है, यह कुछ traditions में इसको इस तरह पढ़ती हैं।
संगति: श्वेताश्वतर उपनिषद् 4.5।
1.4.11-1.4.13
पञ्चजन अधिकरण: “पाँच-जन” क्या
बृहदारण्यक 4.4.17 में “पञ्चजन” शब्द आता है। पूर्व-पक्ष पूछे, यह पाँच क्या? सांख्य-पाँच-तत्त्व?
बादरायण: नहीं। 1.4.11 कल्पना-उपदेश से, मधु-विद्या की तरह विरोध-रहित। 1.4.12 केवल संख्या से सांख्य-link नहीं बनता। 1.4.13 वाक्य-शेष से, “पञ्चजन” का अर्थ “प्राण-आदि-पाँच” (प्राण, आँख, कान, मन, अन्न) है।
संगति: बृहदारण्यक 4.4.17।
1.4.14-1.4.15
ज्योतिरादि अधिकरण: ज्योति-अन्न (light + food)
कुछ शाखाओं में बृहदारण्यक के passage में “ज्योति” का variant पाठ है, “ज्योति” के बजाय “अन्न।” बादरायण: यह variation अधिक नहीं affect करती। 1.4.15 कारणत्व के दृष्टि से, आकाश-आदि में ब्रह्म ही अंतिम-कारण।
संगति: बृहदारण्यक variant readings।
1.4.16-1.4.18
कारण-व्यपदेश अधिकरण: कौषीतकी का “इन्द्र”
कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.1 में “बालाकी” और “अजातशत्रु” का संवाद। बालाकी कहता है “मैं ब्रह्म सिखाता हूँ,” और सूर्य, चन्द्र, आदि के बारे में बताता है। अजातशत्रु कहता है “नहीं, असली ब्रह्म और कुछ है।”
बादरायण: यहाँ “इन्द्र” यानी ब्रह्म। 1.4.16 समाकर्षण से, हर scenario में ब्रह्म-thread। 1.4.17 “जगत्-वाचि,” जगत्-source ब्रह्म। 1.4.18 कोई कहे यह जीव-मुख्य-प्राण है, बादरायण मना करते हैं, पिछले explanation से।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3।
1.4.19-1.4.22
वाक्यान्वय अधिकरण: मैत्रेयी-संवाद
बृहदारण्यक 2.4 का प्रसिद्ध संवाद। याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को ब्रह्म-विद्या समझाते हैं, उनके वन-जाने से पहले। पूरा passage “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” से शुरू होता है।
बादरायण: यहाँ “आत्मा” ब्रह्म है। 1.4.19 जैमिनि के अनुसार यह अन्य-अर्थ है, पर बादरायण इसी प्रश्न-व्याख्यान से ब्रह्म-meaning establish करते हैं। 1.4.20 पूरा वाक्य के संदर्भ ब्रह्म पर है। 1.4.21 आश्मरथ्य कहते हैं, यह “प्रतिज्ञा-सिद्धि” के लिए लिङ्ग। 1.4.22 औडुलोमि का view, मुक्ति-समय जीव “उत्क्रमिष्यत” (निकलने वाला) “एवं भाव,” यानी ब्रह्म-होने वाला।
संगति: बृहदारण्यक 2.4 + 4.5 (मैत्रेयी-संवाद, repeat होता है दो बार)।
1.4.23-1.4.27
प्रकृति अधिकरण: ब्रह्म as material + efficient cause
पूरे अध्याय का most-doctrinal अधिकरण। बादरायण declare करते हैं कि ब्रह्म दो-तरह का कारण है, निमित्त-कारण (efficient cause, जैसे कुम्हार) और उपादान-कारण (material cause, जैसे मिट्टी)।
1.4.23 काशकृत्स्न के अनुसार, “अवस्थिति” से, जीव अंतर्यामी-रूप में ब्रह्म-स्थित। 1.4.24 ब्रह्म प्रकृति (material cause) भी है, उपनिषद्-प्रतिज्ञाओं और दृष्टान्तों से इसी पर point। 1.4.25 “सोऽकामयत, बहु स्यां प्रजायेय,” “उसने इच्छा की कि बहु हो जाऊँ,” यह अभिध्या-उपदेश ब्रह्म-as-कारण को confirm करता है। 1.4.26 “साक्षात्” और “उभय-आम्नान,” दोनों रूप उपनिषद् में direct कहा गया। 1.4.27 आत्म-कृति (खुद को बनाना) से परिणाम (effect)।
संगति: छान्दोग्य 6.2.1-3 (एकमेव अद्वितीयम् + सोऽकामयत बहु स्याम्)। यह “ब्रह्म-as-दोनों-कारण” position पूरे अद्वैत-वेदान्त की neev है।
1.4.28
योनि-व्याख्यान अधिकरण: योनि शब्द भी ब्रह्म पर
मुण्डक 1.1.6 में “योनि” शब्द ब्रह्म पर use हुआ है, “भूत-योनि।” यानी ब्रह्म ही सब-कुछ की योनि (source)।
संगति: मुण्डक 1.1।
1.4.29
सर्व-व्याख्यान अधिकरण: closing
अध्याय 1 का अंतिम सूत्र। “एतेन सर्वे,” अर्थात् “इसी (पाठ) से सब,” जो भी अन्य passages हैं, “व्याख्याताः व्याख्याताः,” व्याख्या हैं गई, व्याख्या हैं गई। बादरायण का closing-double-वाक्य।
सूत्र double-occurrence (“व्याख्याताः व्याख्याताः”) में होता है, परंपरा-rule के अनुसार, यह “अध्याय-समाप्ति-marker” है। अध्याय 1 यहाँ पूरा।
अब अध्याय 2 का प्रारम्भ होंगे, जहाँ बादरायण इसी ब्रह्म-position को अन्य darshanas (सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन) के objections के सामने defend करेंगे।
संगति: यह formal-closing अध्याय 2.1 के “स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्” के साथ continuity बनाता है।
साथ में पढ़ें
- ब्रह्म सूत्र index
- उपनिषद् संग्रहहर अधिकरण के source-passages वहाँ
- भगवद् गीतास्मृति-प्रस्थान
- अष्टावक्र गीताअद्वैत का direct expression
- श्री राम गीताvedanta compressed
पूरे ग्रंथ का पहला सूत्र, और यही ग्रंथ का door भी। तीन शब्दों में बादरायण कह रहे हैं, अब, इसके बाद, ब्रह्म-जिज्ञासा।
“अथ” शब्द में एक pre-condition assume किया गया है। शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यह “अथ” चार चीज़ें assume करता है: (1) नित्य-अनित्य का विवेक, (2) इस लोक और परलोक के भोगों से वैराग्य, (3) षट्-संपत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान), और (4) मुमुक्षुत्व। बिना इन चारों के, ब्रह्म-जिज्ञासा का अधिकार ही नहीं बनता।
दिल्ली में आज अगर आप किसी से कहें “ब्रह्म पर बात करते हैं,” वो शायद ignore कर दे। अधिकार-prerequisite इसीलिए है। पहले life-experience से एक specific वैराग्य आता है, फिर यह प्रश्न genuinely उठता है।
संगति: यह सूत्र Upanishads के “तरति शोकम् आत्मवित्” (छान्दोग्य 7.1.3) से जुड़ा है, “जो आत्मा को जानता है, वह शोक से पार होता है।” शोक से ही जिज्ञासा का बीज पड़ता है।