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योग और वेदान्तमन, जागरण और अद्वैत

अध्याय 1 (समन्वय) · ब्रह्म सूत्र

ब्रह्म सूत्र · अध्याय 1 · पाद 1

समन्वय

सब उपनिषद् एक ही ब्रह्म पर आ मिलते हैं · 4 पाद, 134 सूत्र, 39 अधिकरण

पाद 1 · सूत्र 1.1.1 से 1.1.31 · पढ़ने का समय: लगभग 30 मिनट

इस अध्याय का काम

अध्याय 1 का नाम समन्वय है। समन्वय अर्थात् भिन्न-भिन्न वचनों को एक ही केन्द्र पर बैठा देना।

बरगद के नीचे बैठे बादरायण-व्यास खुली हथेली उठाए हैं; ऊपर खुला आकाश, वैश्वानर अग्नि, हृदय-कमल और अँगूठे-भर का ज्योति-पुरुष, चारों की किरणें एक ही प्रकाश-बिन्दु में जा मिलती हैं

बादरायण के सामने प्रश्न यह है कि उपनिषद् अनेक हैं, और हर उपनिषद् भिन्न-भिन्न उपमाओं और कथाओं से बात करता है। कहीं अन्तर्यामी, कहीं आकाश, कहीं वैश्वानर, कहीं हृदय का दहर, कहीं अंगुष्ठ-मात्र पुरुष। तो क्या ये सब अलग-अलग तत्त्व हैं, या एक ही ब्रह्म के भिन्न-भिन्न रूप-वर्णन?

बादरायण का उत्तर है, एक ही ब्रह्म। और पूरा अध्याय 1 इसी को सिद्ध करता है, पाद-दर-पाद, अधिकरण-दर-अधिकरण। हर अधिकरण किसी एक उपनिषद्-वाक्य पर बैठ कर पूछता है कि यह वाक्य किसकी बात कर रहा है, और उत्तर वही आता है, ब्रह्म की।

अन्य दर्शन, विशेषतः सांख्य, कहते हैं कि कुछ वाक्य प्रधान की, यानी अचेतन प्रकृति की, बात कर रहे हैं, ब्रह्म की नहीं। बादरायण इन आक्षेपों का उत्तर भी इसी अध्याय में देते हैं।

पाद 1 · ब्रह्म के स्वरूप का निर्धारण

पहले चार सूत्र आधार रखते हैं, ब्रह्म-जिज्ञासा का अधिकार, ब्रह्म का लक्षण, शास्त्र ही ब्रह्म-ज्ञान का प्रमाण, और समन्वय की प्रतिज्ञा। शेष सूत्रों में बादरायण विशेष उपनिषद्-वाक्यों को ब्रह्म पर घटाते हैं।

1.1.1

जिज्ञासाधिकरण: ब्रह्म की जिज्ञासा का अधिकार

1.1.1अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा ॥

पूरे ग्रन्थ का पहला सूत्र, और उसका द्वार भी। तीन ही शब्द हैं, अथ, अतः, ब्रह्म-जिज्ञासा, और शंकराचार्य के भाष्य में तीनों पर बहस होती है। अथ बताता है कि इससे पहले कुछ होना चाहिए। अतः कारण देता है। और ब्रह्म-जिज्ञासा उस जानने की इच्छा का नाम है जो जान लेने पर ही थमती है।

तो पहले क्या? मीमांसक उत्तर देता है, पहले कर्मकाण्ड का अध्ययन, क्योंकि वेद का पहला आधा पढ़े बिना दूसरे आधे तक कोई नहीं पहुँचता। और वह यह भी जोड़ता है कि ब्रह्म की जिज्ञासा का वैसे भी कोई अर्थ नहीं, क्योंकि ब्रह्म या तो अपनी आत्मा के रूप में सबको पहले से ज्ञात है, या फिर जाना ही नहीं जा सकता। शंकराचार्य का उत्तर है कि इस जिज्ञासा का कर्मकाण्ड से कोई लेना-देना नहीं, वह उसकी प्रतीक्षा नहीं करती। अथ जिस पूर्व-स्थिति को मान कर चलता है वह चार साधनों की तैयारी है, नित्य और अनित्य का विवेक, इस लोक और परलोक के फलों से वैराग्य, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान की छह सम्पत्तियाँ, और मोक्ष की तीव्र चाह। जिसके पास ये चारों हैं वह जिज्ञासा कर सकता है, चाहे उसने कर्मकाण्ड पढ़ा हो या नहीं, और जिसके पास नहीं हैं वह नहीं कर सकता, चाहे उसे कितना ही कर्मकाण्ड आता हो।

रही बात ब्रह्म के पहले से ज्ञात होने की, तो वह ज्ञात है भी, क्योंकि कोई नहीं सोचता कि मैं नहीं हूँ। पर यह मैं क्या है, इस पर लोग एक मत नहीं। कोई इसे देह कहता है, कोई इन्द्रियाँ, कोई मन, कोई क्षण भर चमकने वाला ज्ञान, कोई शून्य, कोई कर्ता और भोक्ता, कोई निरा साक्षी, कोई जीव से ऊपर बैठा ईश्वर। इसीलिए जिज्ञासा चाहिए, और इसे तय करने के लिए शास्त्र चाहिए। अतः कारण देता है। कर्मों के फल चुक जाते हैं। छान्दोग्य 8.1.6 कहता है कि जैसे यहाँ कर्म से कमाया लोक चुक जाता है, वैसे ही पुण्य से कमाया परलोक चुक जाता है, जबकि ब्रह्म को जानने वाला, तैत्तिरीय 2.1 के शब्दों में, परम को पा लेता है। जो बीत जाता है उसका शोक ही इस प्रश्न का बीज है।

संगति: छान्दोग्य 7.1.3 का वचन कि आत्मा को जानने वाला शोक से पार हो जाता है, इस जिज्ञासा के पीछे की प्रतिज्ञा है। और बृहदारण्यक 2.4.5 का वचन कि आत्मा को देखना चाहिए, सुनना चाहिए, उस पर मनन और निदिध्यासन करना चाहिए, उपनिषद् की अपनी बोली में यही पुकार है।

1.1.2

जन्माद्यधिकरण: ब्रह्म का लक्षण

1.1.2जन्माद्यस्य यतः ॥

जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और लय होता है, वह ब्रह्म है। चार शब्द, और वे एक लक्षण हैं।

आक्षेपी पूछता है कि उत्पत्ति और अन्त जैसी बातें उस नित्य का लक्षण कैसे हो सकती हैं जिसका न आदि है न अन्त। एक वस्तु का दूसरी वस्तुओं से व्यवहार यह नहीं बताता कि वह स्वयं क्या है। शंकराचार्य उत्तर देते हैं कि यह तटस्थ-लक्षण है, किनारे खड़ा हो कर उँगली उठाने वाला लक्षण, जैसे कोई कहे, वह घर जिसकी छत पर कौआ बैठा है, और घर पहचान लिया जाए। नाम और रूप में फैला यह जगत्, जिसमें अनगिनत कर्ता और भोक्ता हैं, जिसमें हर कर्म का फल अपने ही देश और काल में गिरता है, और जिसकी व्यवस्था कोई मन सोच कर नहीं बना सकता, न अचेतन प्रकृति से आ सकता है, न परमाणुओं से, न शून्य से, न अपने आप से। वह एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान कारण से आता है। ब्रह्म का अपना स्वरूप, स्वरूप-लक्षण, तैत्तिरीय 2.1 का सत्यं ज्ञानम् अनन्तम् है, सत्य, ज्ञान, अनन्त। सूत्र लक्षण से इसलिए आरम्भ करता है कि किसी वस्तु को पहले उसके काम से पहचाना जाता है, तब बताया जाता है कि वह है क्या। और यह लक्षण शास्त्र से लिया गया है। जगत् की रचना से जो अनुमान बनता है वह केवल उसका समर्थन करता है जो तैत्तिरीय कहता है।

संगति: तैत्तिरीय 3.1.1, जिससे ये प्राणी जन्म लेते हैं, जन्म लेकर जिसके सहारे जीते हैं, और विदा होते समय जिसमें समा जाते हैं, उसी को जानने की इच्छा रखनी चाहिए, वही ब्रह्म है। वरुण अपने पुत्र भृगु को पूरे उपदेश के रूप में यही वाक्य देते हैं। सूत्र उस वाक्य को चार शब्दों में बाँध देता है।

1.1.3

शास्त्र-योनित्व अधिकरण: ब्रह्म कैसे जाना जाए

1.1.3शास्त्र-योनित्वात् ॥

क्योंकि शास्त्र उसकी योनि है। दो शब्द, और शंकराचार्य उनके दो अर्थ निकालते हैं और दोनों रखते हैं। एक, ब्रह्म उस विशाल शास्त्र का उद्गम है, ऋक्, यजुः, साम और शेष सब का, जिसे वही साँस की तरह बाहर छोड़ सकता था जो सब कुछ जानता हो। सो 1.1.2 में जो कारण कहा गया वह सर्वज्ञ है। दो, शास्त्र हमारे ब्रह्म-ज्ञान का उद्गम है, वह साधन जिससे अकेले वह जाना जाता है।

दूसरा अर्थ एक आक्षेप का उत्तर है। यदि जगत् से उसका कारण वैसे ही अनुमान किया जा सकता है जैसे घड़े से कुम्हार, तो उपनिषदों की ज़रूरत क्या? शंकराचार्य कहते हैं कि प्रत्यक्ष और अनुमान का अपना-अपना क्षेत्र है, और ब्रह्म दोनों में नहीं आता। इन्द्रियाँ उस तक पहुँचती नहीं। जगत् से किया अनुमान कोई न कोई कारण तो दे देगा, पर उसके स्वरूप के बारे में कुछ पक्का नहीं कहेगा, क्योंकि जो एक तार्किक सिद्ध करता है उसे दूसरा गिरा देता है। और ब्रह्म का न रूप है, न शब्द, न कोई ऐसा चिह्न जिसे अनुमान पकड़ सके। वेदान्त-वाक्य ही उसे स्थापित करते हैं, जैसे धर्म को केवल कर्मकाण्ड के वाक्य स्थापित करते हैं। तर्क उसके बाद आता है, वाक्यों को समझने में सहायता के लिए।

संगति: बृहदारण्यक 2.4.10, जहाँ वेद उस महान् सत्ता के निःश्वास कहे गए हैं, और मुण्डक 1.1.5, जहाँ अपरा विद्या में चारों वेद और छह वेदांग आते हैं और परा विद्या वह है जिससे अक्षर पाया जाता है। सूत्र दोनों पर खड़ा है।

1.1.4

समन्वय अधिकरण: सब उपनिषद् ब्रह्म पर

1.1.4तत्तु समन्वयात् ॥

वह तो, समन्वय के कारण। पूरे अध्याय का मुख्य सूत्र, और वही जो अध्याय को उसका नाम देता है। तत् ब्रह्म है, शास्त्र का उद्गम और उसका विषय। तु किसी आक्षेप के विरुद्ध मुड़ता है। और समन्वयात् कहता है कि वेदान्त-वाक्य, जब पूरे पढ़े जाएँ, अपने उपक्रम और उपसंहार, अपने अभ्यास और अपने प्रयोजन के साथ, ब्रह्म पर आ कर ठहरते हैं। यही उनका तात्पर्य है।

आक्षेपी मीमांसक है, जिसके लिए वेद का अर्थ केवल आज्ञा देने में है। वह कहता है कि जो वाक्य किसी सिद्ध वस्तु का कथन करे वह तब तक निरर्थक है जब तक किसी विधि की सेवा न करे। सो उपनिषद् या तो कर्म करने वाले को बताते हैं कि वह कौन है, या किसी उपासना की विधि देते हैं। ब्रह्म-ज्ञान उनका तात्पर्य नहीं हो सकता, क्योंकि सिद्ध वस्तु दूसरे प्रमाणों से जानी जाती है और वेद उसके लिए है जो करना है। कुछ पुराने वेदान्ती इससे आधे सहमत थे, और उन्होंने ब्रह्म को जानने की आज्ञा का विषय बना दिया था।

शंकराचार्य दोनों को अस्वीकार करते हैं। ब्रह्म कोई करने की चीज़ नहीं, और उसे जानना कोई ऐसा कर्म नहीं जिसकी आज्ञा दी जा सके, क्योंकि ज्ञान वस्तु के पीछे चलता है, जैसे देखना उसके पीछे चलता है जो आँख के सामने खड़ा है। और ये वाक्य निरर्थक होने से बहुत दूर हैं। जिस क्षण मनुष्य जान लेता है कि मैं ब्रह्म हूँ, उसी क्षण कर्ता और भोक्ता होने का भाव, जो हर विधि का आधार है, जाता रहता है, और वह फल, मोक्ष, वहीं दीख जाता है। मोक्ष कर्म से बनी कोई चीज़ नहीं, क्योंकि जो बनता है वह बिगड़ता भी है। वह तो वह है जो सदा से है। सो सारे वाक्य एक ही बात पर मिलते हैं। छान्दोग्य 6.2.1, आरम्भ में यह सत् ही था, एक, अद्वितीय। ऐतरेय 1.1.1, आरम्भ में यह आत्मा ही था। बृहदारण्यक 2.5.19, यह आत्मा ब्रह्म है। मुण्डक 2.2.11, यह सब अमृत ब्रह्म ही है।

संगति: छान्दोग्य 6.2.1, ऐतरेय 1.1.1, बृहदारण्यक 2.5.19 और मुण्डक 2.2.11 वे वाक्य हैं जिन्हें शंकराचार्य एक पंक्ति में खड़ा करते हैं। बृहदारण्यक 4.4.19 का नेह नानास्ति किञ्चन, यहाँ कोई अनेकता है ही नहीं, और कठ 2.1.11 का मनसैवेदम् आप्तव्यम्, मन से ही इसे पाना है, उसी एक केन्द्र की ओर इशारा करते हैं।

1.1.5-1.1.11

ईक्षत्यधिकरण: सांख्य का प्रधान ब्रह्म नहीं

1.1.5ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥
1.1.6गौणश्चेन्नात्म-शब्दात् ॥
1.1.7तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥
1.1.8हेयत्वावचनाच्च ॥
1.1.9स्वाप्ययात् ॥
1.1.10गति-सामान्यात् ॥
1.1.11श्रुतत्वाच्च ॥

पहला लम्बा अधिकरण, सात सूत्रों का, और सांख्य से पहली खुली लड़ाई। छान्दोग्य 6.2 कहता है कि आरम्भ में यह सत् ही था, एक, अद्वितीय। उसने देखा, ऐक्षत, मैं बहुत हो जाऊँ, मैं जन्मूँ। उसने तेज रचा। किसने देखा?

सांख्य कहता है कि जगत् का कारण प्रधान है, तीन गुणों की अचेतन मूल प्रकृति, और उपनिषद् हमसे सहमत है, क्योंकि 1.1.2 का लक्षण उस पर घटता है। रहा उसने देखा, तो वह अलंकार है, जैसे कहा जाता है कि नदी का किनारा गिरने की सोचता है। 1.1.5 उत्तर देता है। कारण ने देखा। देखना सोचना है। अचेतन वस्तु सोचती नहीं। सो कारण चेतन है, और प्रधान, जिसके पीछे श्रुति का एक भी शब्द नहीं, अशब्दम्, बाहर है।

अगले छह सूत्र बचाव का हर रास्ता बन्द करते हैं। 1.1.6: देखना अलंकार नहीं, क्योंकि वही प्रसंग कारण को आत्मा कहता है, वही आत्मा है, श्वेतकेतु, वही आप हैं, 6.8.7 का तत्त्वमसि, और कोई अचेतन जड़ को किसी चेतन की आत्मा नहीं कहता। 1.1.7: जो उसमें निष्ठ है उसके लिए मोक्ष का उपदेश है, और मुक्त होने के लिए किसी को जड़ में निष्ठा रखने को नहीं कहा जाता। 1.1.8: प्रसंग में कहीं नहीं कहा कि कारण को छोड़ना है, जो प्रधान के बारे में कहना पड़ता। 1.1.9: सुषुप्ति में जीव अपने में चला जाता है, स्वमपीतो भवति, 6.8.1, अपने कारण में लीन, और आत्मा अपनी आत्मा में ही लौटती है, जड़ में कभी नहीं। 1.1.10: सारे वेदान्त-वाक्य चेतन कारण पर एक मत हैं, गति-सामान्य। 1.1.11: और श्रुति इसे साफ़ कहती है, श्वेताश्वतर 6.9, वह कारण है, इन्द्रियों के स्वामियों का भी स्वामी, उसका न कोई जनक है न कोई स्वामी, जो सर्वज्ञ ईश्वर के बारे में कहा गया है।

संगति: छान्दोग्य 6, उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद, 1.1.5 से 1.1.9 तक का आधार है। 1.1.10 सारे उपनिषदों पर नज़र डालता है। 1.1.11 श्वेताश्वतर से लेता है। अन्त में शंकराचार्य पूछते हैं कि कारण तय हो गया तो सूत्र आगे क्यों चलते हैं, और उत्तर देते हैं कि ब्रह्म दो तरह से सिखाया जाता है, उपासना के लिए उपाधियों के साथ और ज्ञान के लिए उनके बिना, और आगे के सूत्र वाक्यों को इन दोनों में बाँटते हैं।

1.1.12-1.1.19

आनन्दमय अधिकरण: आनन्दमय कोश और उसका आधार, ब्रह्म

1.1.12आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥
1.1.13विकार-शब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥
1.1.14तद्धेतु-व्यपदेशाच्च ॥
1.1.15मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥
1.1.16नेतरोऽनुपपत्तेः ॥
1.1.17भेद-व्यपदेशाच्च ॥
1.1.18कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥
1.1.19अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥

तैत्तिरीय 2.1 से 2.5 तक पाँच आत्माओं से हो कर भीतर उतरता है, हर एक पिछले के भीतर। अन्न से बनी आत्मा, जो देह है। उसके भीतर प्राण से बना। उसके भीतर मन से बना। उसके भीतर विज्ञान से बना। और उसके भीतर एक और भीतरी आत्मा, आनन्द से बनी, जिसका सिर प्रिय है, दाहिना पक्ष मोद, बायाँ पक्ष प्रमोद, धड़ आनन्द, और ब्रह्म उसकी पूँछ है, उसकी प्रतिष्ठा। अध्याय ब्रह्म पर खुला था, सत्य, ज्ञान, अनन्त। तो यह आनन्दमय कौन है, वही ब्रह्म, या उसके ऊपर पड़ा एक और कोश? शंकराचार्य इस बहस को दो बार खड़ा करते हैं।

पहले वे एक पुराने वेदान्ती, वृत्तिकार, का पाठ रखते हैं, जो ऊपर से देखने पर आठों सूत्रों का भी पाठ लगता है। आनन्दमय ब्रह्म है, क्योंकि अध्याय भर उसके लिए आनन्द बार-बार आता है। वही आनन्द देता है, 2.7। अब आनन्द की मीमांसा, 2.8। जो ब्रह्म के आनन्द को जानता है वह किसी से नहीं डरता, 2.9। यह 1.1.12 है, अभ्यासात्। मय प्रत्यय, जो अन्नमय में विकार बताता है, यहाँ प्राचुर्य बताता है, जैसे अन्न से भरे यज्ञ को अन्नमय यज्ञ कहते हैं, और यह 1.1.13 है। जो आनन्द देता है वह स्वयं आनन्द से भरा होगा, 1.1.14। जिस ब्रह्म की स्तुति पहले मन्त्र ने की, वही यहाँ गाया गया है, 1.1.15। यह जीव नहीं हो सकता, क्योंकि जिसने इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ उसने यह किसी देह के बनने से पहले किया, 1.1.16, और अध्याय जीव को उससे अलग रखता है, जैसे चखने वाले को रस से, 1.1.17। इच्छा सांख्य के प्रधान को बाहर कर देती है, जो चाह नहीं सकता, 1.1.18। और श्रुति इसी आत्मा के जान लेने पर जीव का उससे योग सिखाती है, जब वह उस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वचनीय में निर्भय हो कर विश्राम पा लेता है, तब वह अभय को पा लेता है, 2.7, और यह 1.1.19 है। पहला पाठ यों चलता है।

फिर शंकराचार्य इसी पाठ का खण्डन करते हैं। मय चार बार विकार क्यों कहे और पाँचवीं बार प्राचुर्य क्यों हो जाए? यदि पहले मन्त्र का ब्रह्म पूरे अध्याय का विषय है और यह बदलाव कराता है, तो वह अन्नमय और प्राणमय को भी ब्रह्म बना देगा। जिसका सिर हो, दो पक्ष हों, धड़ हो, वह अंगों वाली वस्तु है, और अध्याय उस ब्रह्म पर समाप्त होता है जहाँ से वाणी और मन लौट आते हैं, जिसके कोई अंग नहीं। आनन्द की प्रचुरता अपने विपरीत की थोड़ी गुंजाइश छोड़ देती है, और छान्दोग्य का भूमा, जहाँ कोई दूसरा नहीं दीखता, ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। प्रिय हर देह में अलग है, सो प्रिय से बनी आत्मा हर देह में अलग आत्मा होगी, और ब्रह्म सबमें एक है। और अध्याय जो दोहराता है वह अकेला शब्द आनन्द है, जिसे बृहदारण्यक भी ब्रह्म के लिए सीधा बरतता है, विज्ञानम् आनन्दं ब्रह्म, 3.9.28। पूरा शब्द आनन्दमय केवल वहीं लौटता है जहाँ कोश पाने योग्य वस्तुओं की तरह गिनाए जाते हैं, और वे सब कार्य हैं। प्रसंग स्वयं बताता है कि ब्रह्म कहाँ खड़ा है, ब्रह्म पूँछ है, प्रतिष्ठा है। उसके बाद का श्लोक, जो ब्रह्म को असत् जानता है वह स्वयं असत् हो जाता है, जो ब्रह्म को सत् जानता है उसे हम सत् जानते हैं, ब्रह्म के बारे में है, आनन्द-आत्मा के बारे में कहीं नहीं, और प्रिय और मोद हैं भी या नहीं, इस पर किसी को चेतावनी के श्लोक की ज़रूरत नहीं।

सो शंकराचार्य सूत्रों को उसी पूँछ वाले वाक्य के ब्रह्म पर फिर से पढ़ते हैं। 1.1.12: यह प्रतिष्ठा ही मुख्य विषय है, क्योंकि श्लोक ब्रह्म को दोहराता है, और किसी को नहीं। 1.1.13: यदि कोई कहे कि पूँछ शब्द उसे निरा अंग बना देता है, तो नहीं। प्रसंग पाँच आत्माओं के लिए सिर, पक्ष, धड़ और पूँछ गिनाता आया है, अंग-शब्द उसी अंग-बोली की प्रचुरता में बहा चला आया है, और पिछला सूत्र ब्रह्म को मुख्य विषय पहले ही ठहरा चुका है। 1.1.14: ब्रह्म सबका कारण कहा गया है, आनन्दमय का भी, उसने यह सब रचा जो कुछ है, 2.6, और कारण अपने कार्य का अंग नहीं होता। 1.1.15 से 1.1.19 तक फिर उसी ब्रह्म पर पढ़े जाते हैं। वही है जिसे मन्त्र ने गाया। वह जीव नहीं, क्योंकि देहों से पहले की इच्छा कारण की है। जीव उससे अलग बताया गया है। इच्छा प्रधान को बाहर करती है। और 2.7 का निर्भय विश्राम उसी से योग सिखाता है।

निर्णय यह हुआ कि आनन्दमय पाँचवाँ और सबसे सूक्ष्म कोश है, पहले चार की तरह एक कार्य, और पाँचों इसीलिए बिछाए गए हैं कि मन भीतर की ओर उस तक चले जो इन्हें थामे है। ब्रह्म वह प्रतिष्ठा है, अंगों से रहित, गुणों से रहित। रामानुज पहला पाठ रखते हैं, आनन्द से बनी आत्मा ही ब्रह्म, और पाँच कोशों की वह प्रचलित सीख जिसमें आनन्द-आत्मा सबसे भीतर है, वहाँ उन्हीं के पीछे चलती है।

1.1.20-1.1.21

अन्तर अधिकरण: सूर्य के भीतर का अन्तर-पुरुष ब्रह्म

1.1.20अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥
1.1.21भेद-व्यपदेशाच्चान्यः ॥

छान्दोग्य 1.6.6 से 1.6.8: अब वह पुरुष, सोने सा दमकता, जो सूर्य के भीतर दीखता है, सोने की दाढ़ी, सोने के बाल, नखों की नोक तक सोने का, जिसकी आँखें नीले कमल सी हैं, उसका नाम उत् है, क्योंकि वह सब पापों से ऊपर उठा हुआ है, उदित। ऋक् और साम उसके पर्व हैं। और वही पुरुष, पाठ आगे कहता है, आँख में दीखता है। वह कौन है?

पूर्व-पक्ष कहता है, कोई बड़े पुण्य वाला जीव, जिसे ज्ञान और कर्म ने सूर्य के ऐश्वर्य तक उठा दिया। उसका आकार है, सोने की दाढ़ी और बाल हैं, और ब्रह्म का कोई आकार नहीं, कठ 1.3.15 उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप कहता है। उसका एक ठिकाना है, सूर्य और आँख, और ब्रह्म छान्दोग्य 7.24.1 के अनुसार अपनी ही महिमा में टिका है। उसकी शक्ति की सीमा है, सूर्य से परे के लोकों का और देवताओं की कामनाओं का स्वामी, और ब्रह्म की कोई सीमा नहीं। 1.1.20 उत्तर देता है: भीतर वाला ईश्वर है, क्योंकि उसके धर्म कहे गए हैं। उत् नाम की व्याख्या सब पापों से मुक्ति से हुई है, और श्रुति वह केवल परमात्मा को देती है, छान्दोग्य 8.7.1 का अपहतपाप्मा आत्मा। वह ऋक् है, वह साम है, उक्थ, यजुः, ब्रह्म, और ऋक् और साम उसके पर्व हैं, यह केवल सर्वात्मा के बारे में कहा जा सकता है। जो वीणा पर गाते हैं वे सब उसी को गाते हैं, यह ईश्वर के सिवा किसी के बारे में सच नहीं। सोने का रूप वह रूप है जो ईश्वर अपने उपासकों के लिए माया से धरता है, और ठिकाना और सीमा उपासना के लिए रखे गए हैं, क्योंकि मन के टिकने के लिए किसी वस्तु को एक जगह दी जा सकती है, चाहे उसकी कोई जगह न हो।

1.1.21 जोड़ता है: सूर्य को चलाने वाले जीव से अलग एक और है, क्योंकि श्रुति भेद कहती है। बृहदारण्यक 3.7.9, जो सूर्य में बसता है और सूर्य के भीतर है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसकी देह है, जो सूर्य को भीतर से चलाता है, वह आपकी आत्मा है, अन्तर्यामी, अमृत। सूर्य का पुरुष वही भीतर का शासक है। सो यह सुनहरा पुरुष कोई सूर्य-देव नहीं।

संगति: छान्दोग्य 1.6 और 1.7, जहाँ सूर्य बाहरी प्रतीक है और उसके भीतर का पुरुष वह जो कहा जा रहा है। शंकराचार्य इस अधिकरण को उन अधिकरणों में पहला मानते हैं जो उपासना के लिए सगुण ब्रह्म सिखाते हैं, आनन्दमय अधिकरण के निर्गुण ब्रह्म को ज्ञेय ठहरा देने के बाद।

1.1.22

आकाश अधिकरण: आकाश ब्रह्म है

1.1.22आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥

छान्दोग्य 1.9.1: इस लोक की गति क्या है? आकाश, उसने उत्तर दिया, क्योंकि ये सब प्राणी आकाश से ही उत्पन्न होते हैं और आकाश में ही लौट जाते हैं, आकाश इनसे बड़ा है, आकाश इनका परम आश्रय है। शालावत्य ने दावा किया था कि वह उद्गीथ के देवता को जानता है, और जैवलि प्रवाहण इस वाक्य से उसे सुधारते हैं। कौन सा आकाश?

पूर्व-पक्ष कहता है, भूत-आकाश, क्योंकि शब्द का साधारण अर्थ यही है और जहाँ सीधा अर्थ काम दे वहाँ शब्द को मोड़ा नहीं जाता। भूत-आकाश भी कारण कहा जा सकता है, क्योंकि तैत्तिरीय 2.1 के अनुसार उससे वायु आती है और वायु से अग्नि, और वह बाकी सबसे बड़ा और तुलना में उनका आश्रय है भी। 1.1.22 उत्तर देता है: ब्रह्म, क्योंकि ब्रह्म के लिंग दिए गए हैं, तल्लिङ्गात्। ये सब प्राणी आकाश से ही उत्पन्न होते हैं, हर वेदान्त-वाक्य कहता है कि प्राणी ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं, और ही और सब भूत-आकाश के बारे में खाली पड़ जाते हैं, जो स्वयं एक कार्य है। आकाश में लौट जाते हैं, वही बात फिर कहता है। इनसे बड़ा, श्रुति यह केवल परम को देती है, पृथ्वी से बड़ा, अन्तरिक्ष से बड़ा, द्युलोक से बड़ा, छान्दोग्य 3.14.3। और जैवलि ने आकाश इसलिए चुना कि शालावत्य के साम का अन्त था और उन्हें वह चाहिए था जिसका अन्त न हो, अनन्त, जो ब्रह्म का लक्षण है। आकाश शब्द ब्रह्म के लिए और जगह भी आता है, यदि वह आनन्द आकाश में न होता, तैत्तिरीय 2.7, आकाश नाम और रूप का निर्वाहक है, छान्दोग्य 8.14.1। और शब्द का अर्थ उसके बाद आने वाले वाक्य से तय होता है, चाहे वह पहले आया हो, जैसे अग्नि अपना पाठ पढ़ता है, सुनते ही अग्नि नाम का कोई लड़का समझ लिया जाता है।

संगति: छान्दोग्य 1.8 से 1.9, तीन उद्गीथ-ज्ञाताओं का विवाद। आकाश शब्द छान्दोग्य में कहीं भूत के लिए आता है और कहीं ब्रह्म के लिए, और सूत्र सिखाता है कि हर जगह को उसके लिंगों से कैसे पढ़ा जाए।

1.1.23

प्राण अधिकरण: प्राण ब्रह्म है

1.1.23अत एव प्राणः ॥

छान्दोग्य 1.11.4 से 1.11.5, उषस्ति चाक्रायण प्रस्ताव के देवता पर: वह देवता कौन है? प्राण। क्योंकि ये सब प्राणी प्राण में ही समा जाते हैं, और प्राण से ही उठते हैं। साँस, या ब्रह्म?

पूर्व-पक्ष कहता है साँस, पाँच प्रकार की प्राण-वायु, शब्द का आम अर्थ। और समा जाना उस पर घटता है, क्योंकि शतपथ ब्राह्मण 10.3.3.6 कहता है कि जब मनुष्य सोता है तो वाणी प्राण में समा जाती है, आँख प्राण में, कान, मन, और जागने पर वे फिर प्राण से निकल आते हैं, जो कोई भी देख सकता है। फिर, आगे उद्गीथ और प्रतिहार के लिए सूर्य और अन्न देवता बताए गए हैं, और वे ब्रह्म नहीं, तो प्राण क्यों हो? 1.1.23 उत्तर देता है: उसी कारण से, अत एव, लिंगों से। नींद में केवल इन्द्रियाँ प्राण में डूबती हैं, जबकि पाठ कहता है सब प्राणी, देह, इन्द्रियाँ, सब, समाते और निकलते हैं। वह सबके कारण का लिंग है, और सबका कारण ब्रह्म है। सूची में पड़ोसी किसी पूरक वाक्य के विरुद्ध कुछ सिद्ध नहीं करते, और प्राण शब्द ब्रह्म के लिए और जगह भी आता है, मन प्राण में बँधा है, छान्दोग्य 6.8.2, प्राण का प्राण, बृहदारण्यक 4.4.18।

संगति: छान्दोग्य 1.10 और 1.11, उषस्ति की कथा, जिसने एक राजा के यज्ञ में ऋत्विजों को उसके तीन स्तोत्रों के देवता सिखाए। शंकराचार्य कहते हैं कि यह अधिकरण और इससे पहले वाला एक ही ढाँचे के हैं, एक शब्द जिसका आम अर्थ है, एक पूरक वाक्य जो उसे ब्रह्म के लिंग देता है, और निर्णय कि लिंगों की बात मान्य होती है।

1.1.24-1.1.27

ज्योति अधिकरण: ज्योति ब्रह्म है

1.1.24ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥
1.1.25छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पण-निगदात्तथा हि दर्शनम् ॥
1.1.26भूतादि-पाद-व्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥
1.1.27उपदेश-भेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥

छान्दोग्य 3.13.7: अब वह ज्योति जो इस द्युलोक के ऊपर चमकती है, सबसे ऊपर, सबके ऊपर, उन सर्वोच्च लोकों में जिनसे ऊपर कोई नहीं, वही ज्योति है जो मनुष्य के भीतर है। यह ज्योति सूर्य की है, या ब्रह्म?

पूर्व-पक्ष कहता है भौतिक प्रकाश। ज्योति और अन्धकार सीधे शब्द हैं, जो आँख की सहायता करे और जो बाधा डाले। चमकना सूर्य के लिए कहा जाता है। जो ज्योति इस द्युलोक के ऊपर है उसका किनारा द्युलोक है, जो किसी कार्य पर घटता है, सर्वात्मा पर कभी नहीं। सर्वोच्च लोक अनेक ठिकाने हैं। और मनुष्य के भीतर की ज्योति पेट की आग है, जो 3.13.8 में अपनी गर्मी और अपनी आवाज़ से पहचानी जाती है, और उसके साथ एक छोटा सा फल जुड़ा है, वह तेजस्वी और प्रसिद्ध हो जाता है, जहाँ ब्रह्म होता तो मोक्ष मिलता। 1.1.24 उत्तर देता है: ब्रह्म, चरणों के कारण। ठीक पहले का मन्त्र, 3.12.6, कहता है, इतनी उसकी महिमा है, पुरुष उससे भी बड़ा है, उसका एक चरण सब प्राणी हैं, तीन चरण द्युलोक में अमृत। द्युलोक में वह त्रिपाद अमृत ही है जिसे द्युलोक के ऊपर की ज्योति फिर उठाती है, द्युलोक के नाते से और जो सर्वनाम से। उसे छोड़ कर सूर्य पर चल पड़ना बिना कारण विषय छोड़ना होगा, और आगे की शाण्डिल्य-विद्या, 3.14, भी ब्रह्म पर ही है। ब्रह्म ज्योति कहा जा सकता है, क्योंकि वह सबको प्रकाशित करता है, उसके चमकने पर सब उसके पीछे चमकते हैं, कठ 2.2.15। उपासना के लिए उसे एक जगह, और कई जगहें भी, दी जा सकती हैं। पेट की आग उसका प्रतीक है, जैसे नाम होता है। और फल इसलिए छोटा है कि यहाँ सगुण ब्रह्म सिखाया जा रहा है, जैसे बृहदारण्यक 4.4.24 में जो सब अन्न खाता है उस ब्रह्म के बारे में कहा गया है कि इसे जानने वाला धन पाता है।

1.1.25: यदि कोई कहे कि पहले का प्रसंग गायत्री छन्द पर है, गायत्री यह सब है जो कुछ है, 3.12.1, सो वहाँ ब्रह्म विषय ही नहीं, तो नहीं। छन्द के द्वारा मन को ब्रह्म की ओर मोड़ा जा रहा है, क्योंकि अक्षरों की कोई व्यवस्था यह सब नहीं हो सकती, और ब्रह्म की उपासना उसके किसी कार्य के रूप में और जगह भी दीखती है, जैसे बह्वृच उसे महा-उक्थ में देखते हैं और अध्वर्यु अग्नि में। 1.1.26: तभी प्राणी, पृथ्वी, देह और हृदय गायत्री के चार चरण कहे जा सकते हैं, और तभी इतनी उसकी महिमा वाले मन्त्र की कोई जगह बनती है। पुरुष-सूक्त, ऋग्वेद 10.90.3, वह मन्त्र ब्रह्म के ही बारे में गाता है, और 3.13.6 के ब्रह्म के पाँच पुरुषों को एक पहले से सामने खड़ा ब्रह्म चाहिए। 1.1.27: यदि कोई कहे कि दोनों वाक्य द्युलोक को अलग-अलग कहते हैं, एक में ठिकाना, द्युलोक में अमृत, दूसरे में सीमा, द्युलोक के ऊपर, तो किसी भी तरह विरोध नहीं। पेड़ की चोटी पर बैठे बाज़ को पेड़ पर भी कहा जाता है और पेड़ के ऊपर भी।

संगति: छान्दोग्य 3.12 और 3.13, गायत्री-उपासना, और ऋग्वेद 10.90.3, सब प्राणी उसका एक चौथाई हैं, तीन चौथाई द्युलोक में अमृत। सूत्र तय करते हैं कि छन्द, मन्त्र और ज्योति एक ही शिक्षा हैं।

1.1.28-1.1.31

प्रतर्दन अधिकरण: प्राण फिर से ब्रह्म

1.1.28प्राणस्तथानुगमात् ॥
1.1.29न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्म-संबन्ध-भूमा ह्यस्मिन् ॥
1.1.30शास्त्र-दृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥
1.1.31जीव-मुख्य-प्राण-लिङ्गान्नेति चेन्नोपासा-त्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ॥

कौषीतकी 3: दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रम से इन्द्र के घर पहुँचता है, और इन्द्र वर देने को कहते हैं। प्रतर्दन कहता है, मेरे लिए वही चुनिए जिसे आप मनुष्य के लिए सबसे हितकर मानते हों, और इन्द्र कहते हैं, मुझे ही जानिए। मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा। मेरी उपासना आयु के रूप में, अमृत के रूप में कीजिए, 3.2। और अन्त में, वह प्राण ही प्रज्ञात्मा है, आनन्द, अजर, अमर, 3.8। शब्द के चार अर्थ हो सकते हैं। उस साँस की ओर जो इस देह को थाम कर खड़ा करती है। उस देवता की ओर जो कहता है, मुझे जानिए। उस जीव की ओर जो वाणी के पीछे का वक्ता है। और ब्रह्म की ओर, जिसके लक्षण आनन्द, अजर, अमर हैं।

जो पूर्व-पक्ष इसे साँस मानता है, उसे 1.1.28 उत्तर देता है: ब्रह्म, पूरे प्रसंग के अनुगम से, उसके जुड़े हुए अर्थ से। प्रतर्दन ने मनुष्य का सर्वोच्च हित माँगा था, और वह केवल परमात्मा का ज्ञान देता है। जो मुझे जानता है उसका कोई कर्म उसका लोक नहीं छीनता, न चोरी, न ब्राह्मण का वध, यह केवल उसके बारे में सच है जिसके कर्म ब्रह्म-ज्ञान में जल चुके हैं। वायु प्रज्ञात्मा नहीं हो सकती। और 3.8 का वचन, जिसे वह ऊपर ले जाना चाहता है उससे अच्छे कर्म कराता है और जिसे नीचे ले जाना चाहता है उससे बुरे, वह लोक का रक्षक है, उसका राजा, उसका स्वामी, ब्रह्म के बारे में कहा गया है या किसी के बारे में नहीं। 1.1.29: यदि कोई कहे कि इन्द्र अपने बारे में बोल रहे हैं, मैंने त्वष्टा के तीन सिर वाले पुत्र को मारा, मैंने अरुन्मुखों को भेड़ियों को दे दिया, और देवता ब्रह्म नहीं, तो अध्याय भीतर की आत्मा से इतना भरा है कि यह नहीं चलता। जब तक प्राण इस देह में बसता है तब तक आयु है। वह चक्र जिसकी नेमि अरों पर टिकी है और अरे नाभि पर, जैसे विषय इन्द्रियों पर टिके हैं और इन्द्रियाँ प्राण पर। वह मेरी आत्मा है, ऐसा जाना जाए।

1.1.30: इन्द्र शास्त्र-दृष्टि से बोलते हैं, ऋषि की दृष्टि से यह देख कर कि उनकी आत्मा परमात्मा है, जैसे वामदेव ने देखा और कहा, मैं मनु था, मैं सूर्य था, ऋग्वेद 4.26.1, और बृहदारण्यक 1.4.10, जिस किसी देवता ने इसे जाना वही वह हो गया। क्रूर कर्मों की डींग ज्ञान की प्रशंसा के लिए है, ऐसे काम करके भी मेरा एक बाल बाँका नहीं होता, क्योंकि मैं ब्रह्म हूँ। 1.1.31: यदि कोई कहे कि जीव के लक्षण, वक्ता, और मुख्य प्राण के लक्षण, जो देह को खड़ा करता है, भी यहाँ हैं, तो नहीं, तीन कारणों से। शब्दशः लिए जाएँ तो एक प्रसंग तीन उपासनाओं की विधि देगा, जीव की, प्राण की और ब्रह्म की, जबकि उसका उपक्रम, मुझे ही जानिए, और उपसंहार, वह प्राण ही प्रज्ञात्मा है, आनन्द, अजर, अमर, एक विषय दिखाते हैं। प्राण शब्द ब्रह्म के लिए वहाँ-वहाँ स्वीकृत है जहाँ ब्रह्म के लक्षण दीखें। और ब्रह्म के लक्षण इसी प्रसंग से बँधे हैं, क्योंकि दस विषय और दस शक्तियाँ और किसी पर टिक नहीं सकतीं। साँस का काम ब्रह्म पर टिका है और उसका कहा जा सकता है, कोई मर्त्य न ऊपर जाती साँस से जीता है न नीचे जाती से, हम किसी और से जीते हैं जिसमें ये दोनों टिकी हैं, कठ 2.2.5, और वाणी के पीछे का वक्ता जीव केवल उपाधियों में ब्रह्म है, जिसे वाणी कह नहीं पाती, जिससे वाणी कही जाती है, उसी को ब्रह्म जानिए, केन 1.5।

संगति: कौषीतकी 3.1 से 3.8, ऋग्वेद 4.26.1 में वामदेव का सूक्त, और बृहदारण्यक 1.4.10। शंकराचार्य 1.1.31 पर वृत्तिकार का पाठ भी दर्ज करते हैं कि यहाँ ब्रह्म की एक उपासना तीन रूपों में सिखाई गई है, प्राण के रूप में, प्रज्ञा के रूप में और स्वयं उसके रूप में, और उसे अपने पाठ के बगल में रहने देते हैं।

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स्रोत: देवनागरी सूत्र-पाठ, उसकी क्रम-संख्या और अधिकरण-विभाग शंकर-भाष्य वाले हैं (555 सूत्र, 191 अधिकरण), sanskritdocuments.org की ब्रह्मसूत्राधिकरण-अनुक्रमणिका से, जो स्वामी गम्भीरानन्द के अनुवाद और बेलवलकर के ब्रह्मसूत्रपाठ से तैयार हुई है। आदि शंकराचार्य का शारीरक-भाष्य संदर्भ हेतु।

परंपरा: ब्रह्म सूत्र अध्याय 1 (समन्वय), पाद 1 (सूत्र 1.1.1 से 1.1.31)। बादरायण-व्यास।

अनुज्ञा: मूल संस्कृत पाठ सार्वजनिक। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।