समन्वय
सब उपनिषद् एक ही ब्रह्म पर आ मिलते हैं · 4 पाद, ~134 सूत्र, ~35 अधिकरण
इस अध्याय का काम
अध्याय 1 का नाम समन्वय है। समन्वय अर्थात् भिन्न-भिन्न वचनों को एक ही केन्द्र पर बैठा देना।

बादरायण के सामने प्रश्न यह है कि उपनिषद् अनेक हैं, और हर उपनिषद् भिन्न-भिन्न उपमाओं और कथाओं से बात करती है। कहीं अन्तर्यामी, कहीं आकाश, कहीं वैश्वानर, कहीं हृदय का दहर, कहीं अंगुष्ठ-मात्र पुरुष। तो क्या ये सब अलग-अलग तत्त्व हैं, या एक ही ब्रह्म के भिन्न-भिन्न रूप-वर्णन?
बादरायण का उत्तर है, एक ही ब्रह्म। और पूरा अध्याय 1 इसी को सिद्ध करता है, पाद-दर-पाद, अधिकरण-दर-अधिकरण। हर अधिकरण किसी एक उपनिषद्-वाक्य पर बैठ कर पूछता है कि यह वाक्य किसकी बात कर रहा है, और उत्तर वही आता है, ब्रह्म की।
अन्य दर्शन, विशेषतः सांख्य, कहते हैं कि कुछ वाक्य प्रधान (अचेतन प्रकृति) की बात कर रहे हैं, ब्रह्म की नहीं। बादरायण इन आक्षेपों का उत्तर भी इसी अध्याय में देते हैं।
पहले चार सूत्र आधार रखते हैं, ब्रह्म-जिज्ञासा का अधिकार, ब्रह्म का लक्षण, शास्त्र ही ब्रह्म-ज्ञान का प्रमाण, और समन्वय की प्रतिज्ञा। शेष सूत्रों में बादरायण विशेष उपनिषद्-वाक्यों को ब्रह्म पर घटाते हैं।
1.1.1
जिज्ञासाधिकरण: ब्रह्म की जिज्ञासा का अधिकार
1.1.2
जन्माद्यधिकरण: ब्रह्म का लक्षण
जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और संहार होता है, वही ब्रह्म है। चार शब्दों में बादरायण ब्रह्म का लक्षण कह देते हैं।
यह तटस्थ-लक्षण है, अर्थात् उसकी पहचान कैसे हो, यह बताने वाला लक्षण। एक स्वरूप-लक्षण भी है (सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म), परन्तु तटस्थ-लक्षण से आरम्भ करना सहज है। जो भी दीखता है उसके पीछे एक कारण है, और सबके पीछे जो एक ही कारण है, वही ब्रह्म है।
संगति: यह सीधे तैत्तिरीय उपनिषद् 3.1.1 से लिया गया है, यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। बादरायण उपनिषद् के इस वचन को सूत्र में संक्षिप्त कर देते हैं।
1.1.3
शास्त्र-योनित्व अधिकरण: ब्रह्म कैसे जाना जाए
क्योंकि शास्त्र ही ब्रह्म-ज्ञान का मूल है। दो शब्दों में बादरायण कह रहे हैं कि ब्रह्म को केवल सोच-विचार से नहीं जाना जा सकता, इसके लिए शास्त्र-प्रमाण चाहिए।
यह एक निश्चित प्रमाण-विषयक स्थापना है। तर्क, अनुमान और प्रत्यक्ष, सबके अपने प्रयोग हैं, परन्तु ब्रह्म का मूल प्रमाण केवल श्रुति ही हो सकती है। शंकराचार्य इस पर बहुत बल देते हैं।
संगति: मुण्डक उपनिषद् 1.1.5 में दो प्रकार के ज्ञान बताए गए हैं, परा और अपरा। अपरा-विद्या में चारों वेद और छह वेदांग आते हैं, और परा-विद्या से ही ब्रह्म जाना जाता है। बादरायण इसी भेद पर खड़े हैं।
1.1.4
समन्वय अधिकरण: सब उपनिषद् ब्रह्म पर
पूरे अध्याय का मुख्य सूत्र। तत्तु, अर्थात् वह तो, सब उपनिषद्-वाक्यों का समन्वय ब्रह्म पर ही होता है।
यही सूत्र इस अध्याय को समन्वय नाम देता है। आरम्भ में ही बादरायण घोषित कर देते हैं कि उपनिषद् चाहे कितने हों, उनकी उपमाएँ और कथाएँ चाहे कितनी भिन्न हों, सबका लक्ष्य एक ही है, ब्रह्म-ज्ञान। आगे जो भी सूत्र-समूह आएँगे, वे इसी की सिद्धि हैं।
जो यह कहे कि हर वचन का अपना अलग तात्पर्य है, बादरायण उसे इसी एक सूत्र से उत्तर देते हैं, हर वचन का अन्तिम तात्पर्य एक ही है, केवल वर्णन की शैली भिन्न है।
संगति: छान्दोग्य 6.2.1 (एकमेव अद्वितीयम्), बृहदारण्यक 4.4.19 (नेह नानास्ति किञ्चन), और कठ 2.1.11 (मनसैवेदम्) में यही एक केन्द्र दीखता है, सब एक ही ब्रह्म।
1.1.5-1.1.11
ईक्षत्यधिकरण: सांख्य का प्रधान ब्रह्म नहीं
यह पहला बड़ा अधिकरण है, सात सूत्रों का। यहाँ सांख्य-दर्शन का खण्डन है।
सांख्य-वादी कहते हैं कि जगत् का कारण प्रधान (अचेतन प्रकृति) है, ब्रह्म नहीं। बादरायण का उत्तर है, ईक्षतेर्नाशब्दम्, अर्थात् छान्दोग्य 6.2.3 कहता है, स ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेय, उसने देखा और सोच कर अनेक होने का संकल्प किया। देखना और सोचना अचेतन प्रधान नहीं कर सकता, चेतन ब्रह्म ही कर सकता है। इसी से जगत् का कारण ब्रह्म सिद्ध होता है, प्रधान नहीं।
आगे के सूत्रों में बादरायण अनेक दिशाओं से यही बात दृढ़ करते हैं। 1.1.6 में, यदि कोई कहे कि ऐक्षत शब्द गौण (उपचार-मात्र) है, तो वे मना करते हैं, क्योंकि उसी वाक्य में तत् का निर्देश आत्मा शब्द से होता है। 1.1.7 में, छान्दोग्य 6.8.7 का तत् त्वम् असि स्पष्ट है, और मोक्ष का उपदेश सीधा दे दिया गया है। 1.1.8 में, यदि वह प्रधान होता तो उसे त्याज्य बताया जाता, परन्तु ऐसा नहीं कहा गया। 1.1.9 में, सुषुप्ति में जीव अपने ही स्वरूप में लय हो जाता है, यानी ब्रह्म ही मूल है। 1.1.10 में, अन्य उपनिषद्-वाक्य भी इसी ओर संकेत करते हैं। 1.1.11 में, मुण्डक 1.1.6 साक्षात् कहता है, तद् एतत् सत्यं, वही सत्य है।
संगति: छान्दोग्य उपनिषद् का छठा प्रपाठक (उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद) इस पूरे अधिकरण का आधार है। हर सूत्र वहीं से उद्धृत है।
1.1.12-1.1.19
आनन्दमय अधिकरण: तैत्तिरीय का आनन्दमय कोश ब्रह्म है
तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1-9 में पाँच कोशों का वर्णन है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। प्रश्न यह है कि इन पाँचों में कौन ब्रह्म है।
पूर्व-पक्ष कहता है कि आनन्दमय भी एक कोश है, और कोश तो जीव का होता है, ब्रह्म नहीं। बादरायण का उत्तर है, अभ्यासात्, अर्थात् उपनिषद् बार-बार आनन्द को ही ब्रह्म कहती है। 2.7.1 में रसो वै सः, 2.7.2 में एष ह्येवानन्दयाति, बार-बार आनन्द-तत्त्व का अभ्यास होता है।
1.1.13 में, यदि कोई कहे कि मय प्रत्यय का अर्थ विकार है, तो बादरायण मना करते हैं। यहाँ मय का अर्थ प्राचुर्य है, अर्थात् आनन्द-प्रधान। 1.1.14, तैत्तिरीय स्वयं कहता है कि आनन्द ही सबका हेतु है। 1.1.15, रसो वै सः वाला मन्त्र आनन्दमय का ही गुण-गान करता है। 1.1.16, अन्य कोई जीव-तत्त्व ब्रह्म नहीं हो सकता। 1.1.17, तैत्तिरीय में जीव और ब्रह्म का भेद-व्यपदेश है। 1.1.18, सोऽकामयत, ब्रह्म ने इच्छा की, यह अनुमान-मात्र नहीं। 1.1.19, तैत्तिरीय आनन्दमय में ब्रह्म-योग का उपदेश देती है।
आनन्द के तीन रूप पहचाने जाते हैं। एक इन्द्रिय-भोग का सुख, दूसरा किसी सिद्धि की तृप्ति का सुख, और एक तीसरा, जो किसी बाहरी निमित्त के बिना भीतर ही उमड़ता है, गहरे ध्यान में कभी-कभी झलक जाता है। उपनिषद् कहती है कि वही तीसरा ब्रह्म-आनन्द है, शेष दोनों उसी की छाया-मात्र हैं।
संगति: तैत्तिरीय उपनिषद् 2.7-2.9, विशेषतः रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। यह अधिकरण इसी मन्त्र का व्याख्यान है।
1.1.20-1.1.21
अन्तर अधिकरण: सूर्य के भीतर का अन्तर-पुरुष ब्रह्म
छान्दोग्य उपनिषद् 1.6.6 में कहा गया है, अथ य एषो अन्तर् आदित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते। सूर्य के भीतर एक स्वर्णिम पुरुष दीखता है। प्रश्न यह है कि वह पुरुष कौन है।
पूर्व-पक्ष कहता है कि यह सूर्य-देवता है या कोई जीव। बादरायण का उत्तर है, तद्-धर्म-उपदेशात्, वही गुण उसमें कहे गए हैं जो ब्रह्म के हैं, निष्पाप, अजर, अमर, सत्य-काम, सत्य-संकल्प। अतः वह ब्रह्म ही है।
1.1.21 में बादरायण और जोड़ते हैं कि सूर्य-देव और इस हिरण्मय पुरुष का स्पष्ट भेद-व्यपदेश है, अर्थात् इन्हें भिन्न कहा गया है। अतः यह कोई बाहरी देवता नहीं।
संगति: छान्दोग्य 1.6-1.7 का यह वाक्य वैदिक संकेत-शैली का एक उदाहरण है, सूर्य बाहरी प्रतीक, पर भीतर का हिरण्मय पुरुष उसका भीतरी अर्थ, ब्रह्म।
1.1.22
आकाश अधिकरण: आकाश ब्रह्म है
छान्दोग्य उपनिषद् 1.9.1 में कहा गया है, आकाशो ह वै नाम-रूपयोर्निर्वहिता। आकाश ही नाम और रूप का निर्वाहक है। अब यह आकाश क्या है?
पूर्व-पक्ष कहता है कि यह भौतिक आकाश (भूत-आकाश) है। बादरायण का उत्तर है, तत्-लिङ्गात्, अर्थात् इसके साथ जो गुण-वर्णन है, नाम-रूप का निर्वाहक होना, वह केवल ब्रह्म पर घटता है। भौतिक आकाश नाम-रूप का निर्वाहक नहीं हो सकता।
संगति: छान्दोग्य में आकाश शब्द अनेक स्थानों पर आता है, कहीं भूत-आकाश के अर्थ में, कहीं ब्रह्म के अर्थ में। बादरायण प्रत्येक स्थल को उसके प्रसंग से समझने का मार्ग सिखा रहे हैं।
1.1.23
प्राण अधिकरण: प्राण ब्रह्म है
छान्दोग्य 1.11.5 में प्राण को सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। प्रश्न यह है कि यह भौतिक श्वास है या ब्रह्म।
बादरायण का उत्तर सीधा है, पिछले अधिकरण (आकाश) का तर्क इस पर भी घटता है। साथ जो गुण-वर्णन है, सर्व-वेदन, सर्व-शक्ति, वह ब्रह्म पर ही घटता है।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 4.20 में भी प्राण को ब्रह्म कहने वाली यही स्थापना है। यह वैदिक शैली है, श्वास या आकाश जैसे निकटतम अनुभव को लेकर उस गहरी सत्ता की ओर संकेत करना।
1.1.24-1.1.27
ज्योति अधिकरण: ज्योति ब्रह्म है
छान्दोग्य 3.13.7 में कहा गया है, अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते। स्वर्ग के पार जो ज्योति प्रकाशित होती है, वह क्या है?
पूर्व-पक्ष कहता है कि यह भौतिक प्रकाश है, सूर्य या तारे। बादरायण का उत्तर है कि उसी वाक्य में चरण का निर्देश है, अर्थात् एक-चौथाई। वही वाक्य पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद 10.90.3) के पाद शब्द से बँधा है, पादोऽस्य विश्वा भूतानि, अर्थात् सब भूत उसके एक चरण-मात्र हैं। भौतिक प्रकाश ऐसा वर्णन नहीं उठा सकता। अतः यह ब्रह्म ही है।
1.1.25, यदि कोई कहे कि यह गायत्री-छन्द की स्तुति है, तो बादरायण मना करते हैं। यहाँ चेतो-अर्पण-निगद है, अर्थात् ध्यान के लक्ष्य रूप में कथन, और वह उसी पुरुष पर घटता है। 1.1.26, चार-पाद का वर्णन ब्रह्म पर घटता है, छन्द पर नहीं। 1.1.27, यदि कोई कहे कि उपदेश में भेद है, तो भी ब्रह्म और गायत्री-छन्द दोनों दृष्टियाँ हैं, इनमें कोई विरोध नहीं।
संगति: छान्दोग्य 3.12-13 (गायत्री-उपासना) और पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद 10.90)। दोनों के बीच का सम्बन्ध यहाँ निश्चित कर दिया गया है।
1.1.28-1.1.31
प्राण-पुनर अधिकरण: प्राण फिर से ब्रह्म
कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.2 में इन्द्र स्वयं को प्राण-ब्रह्म कह कर अपनी स्तुति करते हैं। पूर्व-पक्ष कहता है कि यह तो जीव-इन्द्र की आत्म-प्रशंसा है, ब्रह्म कैसे?
बादरायण का उत्तर इस प्रकार है। 1.1.28 में, उसी वाक्य में जो गुण कहे गए हैं, वे प्राण-ब्रह्म पर ही घटते हैं। 1.1.29, यदि कोई कहे कि यह वक्ता (इन्द्र) का आत्म-कथन है, तो वहाँ जो अध्यात्म-सम्बन्ध का विस्तृत वर्णन है, वह ब्रह्म का है। 1.1.30, यह उपदेश वामदेव वाला ही रूप है, जहाँ ऋषि वामदेव ने भी कहा था, अहम् मनुर्भवं सूर्यश्च, मैं मनु था, मैं सूर्य था। वामदेव का यह वचन भी अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति था, और इन्द्र का वचन भी वही है। 1.1.31, यदि कोई कहे कि यह जीव या मुख्य प्राण का वर्णन है, तो बादरायण मना करते हैं, क्योंकि यहाँ ब्रह्म-योग की तीन-स्तरीय उपासना का संकेत है।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.1-3.2, और वामदेव का वचन ऋग्वेद 4.26.1 में।
इस पाद में बादरायण भिन्न-भिन्न उपनिषद्-वाक्यों को लेकर दिखाते हैं कि उनमें वर्णित तत्त्व ब्रह्म ही है, जीव या प्रधान या देवता नहीं। प्रत्येक अधिकरण किसी एक वाक्य पर है।
1.2.1-1.2.8
सर्वत्र-प्रसिद्धि अधिकरण: सर्वत्र प्रसिद्ध, यानी ब्रह्म
छान्दोग्य 3.14.1 में कहा गया है, सर्वं खल्विदं ब्रह्म। यह सब ब्रह्म है। इसी सूत्र-समूह में बादरायण उसी वाक्य पर उठने वाले आक्षेपों का उत्तर देते हैं।
पूर्व-पक्ष कहता है कि सर्व शब्द जीव पर भी घट सकता है, इस प्रकार जीव ही सर्व है। बादरायण का उत्तर है, सर्वत्र-प्रसिद्ध, अर्थात् यह वाक्य समस्त के संदर्भ में है, सब पर घटता है, केवल जीव पर नहीं।
आगे के सूत्रों में, 1.2.2, जो गुण कहे गए हैं, मनोमय, प्राण-शरीर, भारूप, सत्य-संकल्प, वे ब्रह्म पर घटते हैं। 1.2.3, शरीरधारी जीव पर ये गुण नहीं घट सकते। 1.2.4, तं क्रतुं कुर्वीत में कर्ता और कर्म का व्यपदेश ब्रह्म की ओर संकेत करता है। 1.2.5, विशेष शब्द ब्रह्म पर ही घटते हैं। 1.2.6, स्मृति (गीता 18.61) भी यही बात कहती है। 1.2.7, यदि कोई कहे कि छोटे स्थान (हृदय) में ब्रह्म कैसे, तो बादरायण का उत्तर है, व्योम-वत्, आकाश की भाँति, स्थान की लघुता से वह सीमित नहीं होता। 1.2.8, यदि कोई कहे कि ब्रह्म हृदय में है तो जीव के दुख-भोग ब्रह्म को भी होंगे, तो बादरायण मना करते हैं, वैशेष्यात्, ब्रह्म का स्वरूप जीव से विशिष्ट है।
संगति: छान्दोग्य 3.14.1-4, और गीता 18.61, ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
1.2.9-1.2.10
अत्तृ अधिकरण: अत्ता (खाने वाला) ब्रह्म है
कठ उपनिषद् 1.2.25 में एक भयंकर चित्र है, यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः, मृत्युर्यस्योपसेचनम् क इत्था वेद यत्र सः। जिसके भोजन में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों हैं, और मृत्यु जिसकी चटनी है। यह अत्ता कौन है?
बादरायण का उत्तर है कि यह ब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि चराचर समस्त सृष्टि को ग्रास बना लेना ब्रह्म के अतिरिक्त किसी का सामर्थ्य नहीं। और इस वाक्य का प्रकरण भी ब्रह्म के संदर्भ में है, नचिकेता और यम का वही संवाद, जो आत्मा-ब्रह्म पर है।
संगति: कठ उपनिषद् 1.2.25। यह चित्र अत्यन्त प्रबल है, मृत्यु को भी निगल लेने वाला ब्रह्म।
1.2.11-1.2.12
गुहा-प्रविष्ट अधिकरण: हृदय-गुहा में दो
कठ उपनिषद् 1.3.1 में एक प्रसिद्ध चित्र है, ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। दो हृदय-गुहा में बैठे हैं और ऋत का पान कर रहे हैं। ये दो कौन हैं?
बादरायण का उत्तर है कि ये जीव और ब्रह्म दोनों हैं। 1.2.12 में बादरायण और जोड़ते हैं कि उसी वाक्य में आगे इन दोनों का विशेष वर्णन भी है, एक खाता है, एक केवल देखता है। यह जीव और ब्रह्म के भेद का मूल चित्र है।
संगति: मुण्डक उपनिषद् 3.1.1 में यही चित्र है, द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, दो पक्षी एक वृक्ष पर। इसे हम उपनिषद्-संग्रह में पहले देख चुके हैं।
1.2.13-1.2.17
अन्तर अधिकरण: अन्तर-आत्मा ब्रह्म है
छान्दोग्य उपनिषद् 4.15.1 में कहा गया है, य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा। आँख में जो पुरुष दीखता है, वही आत्मा। यह क्या है, आँख की पुतली में पड़ता प्रतिबिम्ब?
यह ब्रह्म है। आगे के वाक्य में इसी पुरुष को अमृत, अभय और ब्रह्म कहा गया है। 1.2.14, स्थान आदि का व्यपदेश ब्रह्म पर ही घटता है। 1.2.15, सुख से विशिष्ट कह कर वर्णन हुआ है, जो आँख के प्रतिबिम्ब पर नहीं घटता। 1.2.16, श्रुति इसी से अर्चि-आदि गति (ज्योति-मार्ग) का उपदेश देती है, जो ज्ञानी की अन्तिम गति है। 1.2.17, पुतली का प्रतिबिम्ब अस्थिर है, पर ब्रह्म नित्य अवस्थित है।
संगति: छान्दोग्य 4.15, और इसी अन्तर-पुरुष की ओर ईशावास्य उपनिषद् 1.1 भी संकेत करती है।
1.2.18-1.2.20
अन्तर्यामी अधिकरण: सबके भीतर का नियन्ता
बृहदारण्यक उपनिषद् 3.7 में याज्ञवल्क्य उद्दालक से बात कर रहे हैं, और एक तत्त्व का वर्णन करते हैं, अन्तर्यामी। वह जो सबके भीतर है, सबका नियमन करता है, पर जिसे सब नहीं जानते।
बादरायण कहते हैं कि यह अन्तर्यामी ब्रह्म ही है। उपनिषद् में अधिदैव, अधिभूत और अध्यात्म, तीनों स्तरों पर उसी एक का वर्णन है। 1.2.19, यदि कोई कहे कि यह सांख्य का प्रधान है, तो बादरायण मना करते हैं, क्योंकि उसके धर्म (अदृष्ट रहना, सबका पालन कर सकना) सांख्य के प्रधान पर नहीं घटते। 1.2.20, शरीर भी अन्तर्यामी नहीं हो सकता, क्योंकि उपनिषद् ही उसे भेद से, पृथक्, वर्णन करती है।
संगति: बृहदारण्यक 3.7 (अन्तर्यामी-ब्राह्मण)। यह उपनिषद्-वाक्यों में सबसे विस्तृत दार्शनिक स्थल है।
1.2.21-1.2.23
अदृश्यत्व अधिकरण: अदृश्य-गुण वाला ब्रह्म
मुण्डक उपनिषद् 1.1.6 में एक तत्त्व का वर्णन है, यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुश्रोत्रम् तदपाणिपादम्। वह जो अदृश्य है, अग्राह्य है, गोत्र-वर्ण और इन्द्रिय-हाथ-पैर से रहित है।
बादरायण कहते हैं कि यह ब्रह्म है। इन निषेधात्मक धर्मों का उल्लेख ही इसे स्पष्ट कर देता है। 1.2.22, इसमें कुछ विशेषण और कुछ भेद-व्यपदेश हैं, जो स्पष्ट करते हैं कि यह न जीव है न प्रकृति। 1.2.23, साथ ही इसके स्वरूप का भी वर्णन है, हिरण्मय, स्वर्णिम, जो इसे जीव से अलग करता है।
संगति: मुण्डक 1.1.5-1.1.6। यह वाक्य आगे की नेति-नेति शैली (बृहदारण्यक 3.9) का आधार है।
1.2.24-1.2.32
वैश्वानर अधिकरण: वैश्वानर ब्रह्म है
छान्दोग्य 5.11-5.18 में एक विद्या है, वैश्वानर-विद्या। राजा अश्वपति केकय अपने पाँच ब्रह्म-ज्ञानी अतिथियों को इस विद्या का उपदेश देते हैं।
पूर्व-पक्ष कहता है कि वैश्वानर तो जठराग्नि का नाम है, या पेट का। बादरायण कहते हैं कि वैश्वानर शब्द यहाँ विशेष अर्थ में प्रयुक्त है, और वह ब्रह्म पर घटता है। 1.2.25, स्मृति (गीता 15.14, अहं वैश्वानरो भूत्वा) से भी यही पुष्ट होता है। 1.2.26, यदि कोई कहे कि उसे हृदय में रहता बताया गया है, अतः सीमित है, तो बादरायण कहते हैं कि यह केवल दृष्टि-उपदेश है, ध्यान के लिए संकेत, और साथ पुरुष की भाँति पूर्ण वर्णन भी है।
1.2.27, इसी से वह न केवल देवता है न केवल भूत। 1.2.28-31, चार आचार्यों के मत, जैमिनि (साक्षात् ब्रह्म), आश्मरथ्य (अभिव्यक्ति), बादरि (अनुस्मृति), और फिर जैमिनि (सम्पत्ति)। 1.2.32, आमनन्ति च एनम् अस्मिन्, वेद उसे इसी में, हृदय में, स्वीकार करते हैं।
संगति: छान्दोग्य 5.11-5.24। यह उपनिषद् की सबसे विस्तृत विद्या है, पञ्चाग्नि-विद्या और वैश्वानर-विद्या एक साथ।
तीसरे पाद में मुण्डक का द्युभ्व-आयतन, छान्दोग्य का भूमा, बृहदारण्यक का अक्षर, दहर-आकाश, अंगुष्ठ-पुरुष, और कई अन्य वाक्य आते हैं। बीच में एक विशेष विचार है, क्या देवताओं को ब्रह्म-विद्या का अधिकार है, और अन्त में शूद्र के अधिकार पर एक प्रसंग, जो ऐतिहासिक रूप से विवादित रहा है।
1.3.1-1.3.7
द्युभ्व-आद्य-आयतन अधिकरण: स्वर्ग-पृथ्वी का आयतन
मुण्डक उपनिषद् 2.2.5 में कहा गया है, यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षम् ओतम्। जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष ओत-प्रोत हैं, वह आयतन।
बादरायण कहते हैं कि यह आयतन ब्रह्म है। उसी वाक्य में उसे उसके अपने नाम (आत्मा, ब्रह्म) से कहा गया है। 1.3.2, आगे कहा गया है कि मुक्त-पुरुष यहीं पहुँचते हैं, और मुक्ति का गन्तव्य ब्रह्म ही हो सकता है। 1.3.3, अनुमान-वादी कहें कि यह प्रधान है, तो बादरायण मना करते हैं, अ-तत्-शब्दात्, वहाँ प्रधान का कोई शब्द नहीं। 1.3.4, साथ प्राणभृत् भी कहा गया है, जो ब्रह्म पर ही घटता है। 1.3.5, जीव और ब्रह्म का भेद-व्यपदेश भी है। 1.3.6, प्रकरण ब्रह्म के संदर्भ में है। 1.3.7, स्थिति और अदन, सबको धारण कर लेने वाले ये गुण ब्रह्म पर ही घटते हैं।
संगति: मुण्डक 2.2.5।
1.3.8-1.3.9
भूमा अधिकरण: भूमा (अनन्त) ब्रह्म है
छान्दोग्य 7.23-7.24 में नारद और सनत्कुमार के संवाद का चरम। सनत्कुमार कहते हैं, यो वै भूमा तत् सुखम्, नाल्पे सुखम् अस्ति। जहाँ भूमा (अनन्त) है, वहीं सुख है। अल्प में सुख नहीं।
बादरायण कहते हैं कि यह भूमा ब्रह्म है। सम्प्रसाद शब्द जीव की अवस्था के लिए आता है, और जब सम्प्रसाद से ऊपर का उपदेश दिया जाए, तब वह ब्रह्म ही है। 1.3.9, साथ जो धर्म कहे गए हैं, निर्भयता, सबसे ऊपर होना, वे ब्रह्म पर ही घटते हैं।
जीवन प्रायः छोटे-छोटे सुखों में बीतता है, कभी कोई लाभ, कभी कोई नई वस्तु। उपनिषद् कहती है कि अल्प-सुख सदा हाथ से फिसलता रहता है। सच्चा सुख भूमा में है, जहाँ कोई सीमा नहीं, कोई बँधन नहीं।
संगति: छान्दोग्य 7.23-7.24। यह भूमा-विद्या वेदान्त-शास्त्र में अत्यन्त केन्द्रीय है।
1.3.10-1.3.12
अक्षर अधिकरण: अक्षर ब्रह्म है
बृहदारण्यक 3.8 में गार्गी का प्रसिद्ध प्रश्न है, यह सब किस पर ओत-प्रोत है? याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं, अक्षरे, हे गार्गी। अक्षर पर।
बादरायण कहते हैं कि यह अक्षर ब्रह्म है। अम्बर (आकाश) तक को धारण कर लेना केवल ब्रह्म ही कर सकता है। 1.3.11, इसी अक्षर का प्रशासन भी है, अर्थात् सब इसकी आज्ञा से चलते हैं। 1.3.12, अन्य सम्भावनाएँ, जीव और प्रधान, सब निरस्त कर दी जाती हैं।
संगति: बृहदारण्यक उपनिषद् 3.8, गार्गी और याज्ञवल्क्य का प्रसिद्ध संवाद।
1.3.13
ईक्षति-कर्म अधिकरण: जो दर्शन का विषय है, वही ब्रह्म
प्रश्न उपनिषद् 5.5 में कहा गया है, स ओमकारेणैवायतनेन परमं पुरुषमभिगच्छति। वह ओङ्कार के आश्रय से उस परम पुरुष को प्राप्त करता है।
बादरायण कहते हैं कि यह परम-पुरुष ब्रह्म है। उसी वाक्य में जिसे देखना है, वह कर्म-रूप से कहा गया है, और वही ब्रह्म है। ओङ्कार-उपासना का लक्ष्य ब्रह्म ही है।
संगति: प्रश्न उपनिषद् 5।
1.3.14-1.3.21
दहर अधिकरण: हृदय का दहर-आकाश ब्रह्म है
छान्दोग्य 8.1 का प्रसिद्ध वाक्य। हृदय में एक दहर (छोटा) आकाश है, तत्र यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्। उसके भीतर जो है, उसी की खोज करनी चाहिए।
बादरायण कहते हैं कि यह दहर-आकाश ब्रह्म है। 1.3.14, आगे के वाक्यों का तर्क इसी ओर संकेत करता है। 1.3.15, गति और शब्द से लक्षण मिलते हैं। 1.3.16, इस महिमा को धारण करना ब्रह्म पर ही घटता है। 1.3.17, ब्रह्म ही इस रूप में प्रसिद्ध है। 1.3.18, यहाँ इतर (जीव) का ग्रहण सम्भव नहीं। 1.3.19, आगे जो आविर्भूत-स्वरूप कहा गया है, वह ब्रह्म ही है। 1.3.20, यदि जीव का ग्रहण भी हुआ है तो वह अन्य प्रयोजन से। 1.3.21, यदि कोई कहे कि श्रुति इसे अल्प कहती है, तो बादरायण मना करते हैं, वह केवल स्थान का निर्देश है, स्वरूप का नहीं।
हृदय पर हाथ रख कर लोग कहते हैं कि वह दिल में बसा है। यह उपमा वस्तुतः बहुत गहरी है। हृदय में जो स्थान है, परम्परा वहीं दहर-आकाश, अर्थात् ब्रह्म का निवास, कहती है।
संगति: छान्दोग्य 8.1। यह विद्या दहर-विद्या कहलाती है।
1.3.22-1.3.23
अनुकृति अधिकरण: जिसका सब अनुसरण करते हैं, वही ब्रह्म
मुण्डक 2.2.10 में कहा गया है, तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति। वही चमकता है और सब उसी का अनुसरण कर चमकते हैं, उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं।
बादरायण कहते हैं कि जिसका सब अनुसरण करते हैं, वह ब्रह्म है। 1.3.23, स्मृति (गीता 15.6, न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः) में भी यही बात है।
संगति: मुण्डक 2.2.10 और गीता 15.6।
1.3.24-1.3.25
प्रमित अधिकरण: अंगुष्ठ-मात्र पुरुष ब्रह्म है
कठ उपनिषद् 2.1.12-13 और श्वेताश्वतर 3.13 में कहा गया है, अङ्गुष्ठ-मात्रः पुरुषः। अंगूठे के परिमाण का पुरुष।
बादरायण कहते हैं कि यह अंगुष्ठ-मात्र पुरुष ब्रह्म है, क्योंकि शब्द से ही उसका सम्बन्ध ब्रह्म से सिद्ध होता है। 1.3.25, अंगुष्ठ-मात्र का यह वर्णन हृदय की दृष्टि से है, मनुष्य के अधिकार के कारण, अर्थात् ध्यान के लिए एक रूप-संकेत है।
संगति: कठ 2.1.12-13 और श्वेताश्वतर 3.13।
1.3.26-1.3.33
देवता-अधिकार अधिकरण: देवता को ब्रह्म-विद्या का अधिकार
एक प्रश्न उठता है, क्या केवल मनुष्य ब्रह्म-विद्या के अधिकारी हैं, या देवता भी? यहाँ बादरायण और जैमिनि के बीच स्पष्ट मतभेद है।
जैमिनि का पक्ष है कि देवता नित्य-कर्म में बँधे हैं, और मधु-विद्या में उन्हें स्थान नहीं, अतः अधिकार नहीं। बादरायण का पक्ष है कि देवता भी अधिकारी हैं, तदुपरि अपि सम्भवात्, यह सम्भव है। 1.3.27, उनमें अनेक प्रकार की धारणाएँ सम्भव हैं। 1.3.28, शब्द-प्रमाण से देवता का अस्तित्व सिद्ध है। 1.3.29, इसी से उनका नित्यत्व भी। 1.3.30, समान नाम-रूप होने से, आवृत्ति में भी विरोध नहीं। 1.3.31, जैमिनि का प्रतिवाद, मधु-विद्या में देवताओं को स्थान नहीं। 1.3.32, ज्योतिष-शास्त्र में भाव से प्रमाण। 1.3.33, बादरायण का अन्तिम मत, भावं तु बादरायणः अस्ति हि, देवताओं को अवश्य अधिकार है।
संगति: यह मीमांसा और वेदान्त के बीच का अत्यन्त विशिष्ट दार्शनिक विचार है।
1.3.34-1.3.38
शुग अधिकरण: शूद्र के अधिकार का प्रसंग
यह अधिकरण ऐतिहासिक रूप से विवादित है, और इसका प्रसंग समझ लेना आवश्यक है। छान्दोग्य 4.1-4.2 में जानश्रुति की कथा है। प्रश्न यह है कि क्या शूद्र-वर्ण को ब्रह्म-विद्या का अधिकार है।
बादरायण का पक्ष (1.3.34), शूद्र को नहीं। उपनिषद्-वाक्य में शुक् (शोक) शब्द से संकेत मिलता है कि जानश्रुति का शोक क्षत्रिय-कुल का है, शूद्र-वर्ण का नहीं। 1.3.35, जानश्रुति के क्षत्रियत्व के प्रमाण आगे चैत्ररथ-सम्बन्ध से मिलते हैं। 1.3.36, संस्कार के उल्लेख और उसके अभाव के कथन से शूद्र का व्यवच्छेद होता है। 1.3.37, इसी अभाव के निर्धारण के लिए ही वाक्य की प्रवृत्ति है। 1.3.38, श्रवण, अध्ययन और यज्ञ के निषेध तथा स्मृति-प्रमाण से।
यह अधिकरण आज के पाठक के लिए असहज है, और रहना भी चाहिए। बादरायण के समय का वर्ण-विमर्श आज से बहुत भिन्न था। वेदान्त की तीनों परम्पराओं (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत) में आगे चल कर सुधार हुआ, और श्री रामकृष्ण मिश्र तथा श्री विद्या जैसी परम्पराएँ सब वर्णों को अधिकार स्पष्ट रूप से देती हैं। हम इस वाक्य को सच्चाई से पढ़ते हैं, पर यह आज की जीवित परम्परा का मत नहीं है।
संगति: छान्दोग्य 4.1-4.2 (जानश्रुति-रैक्व), और 4.4 (सत्यकाम जाबाल)। दूसरी कथा (सत्यकाम) कुल अज्ञात होते हुए भी सत्य-वचन के कारण ब्रह्म-विद्या के योग्य दिखाती है, और यह विरोध भी सदा चर्चा में रहा है।
1.3.39
कम्पन अधिकरण: कम्पन ब्रह्म से
कठ 2.3.2 में कहा गया है, महद्भयं वज्रमुद्यतम्, य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति। बहुत बड़ा भय, उठा हुआ वज्र, और जो इसे जान लेता है वह अमर हो जाता है। यहाँ कम्पन, अर्थात् समस्त सृष्टि का स्पन्दन, ब्रह्म से ही होता है।
बादरायण कहते हैं कि कम्पन का कारण ब्रह्म है, यह उपनिषद्-वाक्य से ही स्पष्ट है।
संगति: कठ 2.3।
1.3.40
ज्योति अधिकरण: परम-ज्योति का दर्शन
छान्दोग्य 8.12.3 में कहा गया है, एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिः उपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते। मुक्त-जीव परम-ज्योति को प्राप्त कर अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाता है।
बादरायण कहते हैं कि यह परम-ज्योति ब्रह्म है। ज्योति का दर्शन ही ब्रह्म का दर्शन है।
संगति: छान्दोग्य 8.12।
1.3.41
आकाश-अर्थान्तर अधिकरण: आकाश फिर एक बार
छान्दोग्य 8.14.1 में फिर आकाश का उल्लेख है, और यह शब्द यहाँ भिन्न अर्थ रखता है।
बादरायण कहते हैं कि इस भिन्न अर्थ का निर्देश ही इसके ब्रह्म होने का संकेत है।
संगति: छान्दोग्य 8.14।
1.3.42-1.3.43
सुषुप्ति-उत्क्रान्ति अधिकरण: सुषुप्ति और मरण में आत्मा
बृहदारण्यक 4.3-4.4 में याज्ञवल्क्य सुषुप्ति (गहरी निद्रा) और उत्क्रान्ति (मरण-काल) का वर्णन करते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में आत्मा का ब्रह्म से मिलाप होता है।
बादरायण कहते हैं कि इन दो अवस्थाओं से आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। 1.3.43, पति और अपहत-पाप्मा आदि शब्दों से ब्रह्म ही विशेष रूप से सूचित होता है।
संगति: बृहदारण्यक 4.3-4.4। याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के संवाद का यह आधार है।
चौथे पाद में मुख्यतः सांख्य-दर्शन का खण्डन है, और एक सिद्धान्त की स्थापना, ब्रह्म दो प्रकार का कारण है, निमित्त-कारण और उपादान-कारण। यही अद्वैत-वेदान्त की मूल नींव है।
1.4.1-1.4.7
आनुमानिक अधिकरण: सांख्य के प्रधान का खण्डन
सांख्य-वादी कहते हैं कि अव्यक्त (कठ 1.3.11), अर्थात् प्रधान या प्रकृति, ही जगत् का कारण है। यह उसी का खण्डन है।
1.4.1, वह अव्यक्त शरीर-रूपक के प्रसंग में बैठा है। 1.4.2, अव्यक्त को सूक्ष्म इसलिए कहा गया कि वह सूक्ष्म कारण है, सांख्य का प्रधान नहीं। 1.4.3, अव्यक्त ब्रह्म के अधीन है। 1.4.4, ज्ञेय शब्द अव्यक्त पर नहीं लगाया गया। 1.4.5, यदि कोई कहे कि अव्यक्त बोलता है, तो बादरायण मना करते हैं, यह तो प्राज्ञ ब्रह्म का कार्य है। 1.4.6, प्रकरण ब्रह्म के संदर्भ में है। 1.4.7, तीन (बुद्धि, इन्द्रिय, विषय) का उपन्यास और प्रश्न की शैली सांख्य का प्रसंग नहीं है।
संगति: कठ 1.3.10-15। यह कठ-वाक्य देखने में सांख्य-दर्शन से मिलता-जुलता है, पर इसका असली प्रसंग ब्रह्म ही है।
1.4.8-1.4.10
चमस अधिकरण: चमस का रहस्य
श्वेताश्वतर 4.5 में एक गूढ़ श्लोक है, अजामेकाम् लोहित-शुक्ल-कृष्णाम् बह्वीः प्रजाः सृजमानाम् सरूपाः। एक अजा (अजन्मा), लाल-श्वेत-कृष्ण वर्ण वाली, अनेक प्रजाएँ रचती हुई। पूर्व-पक्ष कहता है कि यह प्रधान है।
बादरायण कहते हैं, नहीं। 1.4.8, यह महत् के समान ब्रह्म का ही रूप है। 1.4.9, चमस वाला दृष्टान्त लीजिए, जो एक विशेष वैदिक प्रसंग है, उसका विशेष अर्थ प्रसंग से ही ज्ञात होता है। यहाँ भी अजा का अर्थ ब्रह्म है, सांख्य का प्रधान नहीं। 1.4.10, इसकी ज्योति से उपक्रम होने वाला पाठ कुछ शाखाएँ इस रूप में पढ़ती हैं।
संगति: श्वेताश्वतर उपनिषद् 4.5।
1.4.11-1.4.13
पञ्चजन अधिकरण: पाँच-जन क्या हैं
बृहदारण्यक 4.4.17 में पञ्चजन शब्द आता है। पूर्व-पक्ष पूछता है कि ये पाँच क्या हैं, सांख्य के पाँच तत्त्व?
बादरायण कहते हैं, नहीं। 1.4.11, कल्पना के उपदेश से, मधु-विद्या की भाँति विरोध-रहित। 1.4.12, केवल संख्या से सांख्य का सम्बन्ध नहीं बनता। 1.4.13, वाक्य-शेष से पञ्चजन का अर्थ प्राण आदि पाँच (प्राण, आँख, कान, मन, अन्न) है।
संगति: बृहदारण्यक 4.4.17।
1.4.14-1.4.15
ज्योतिरादि अधिकरण: ज्योति और अन्न का पाठ-भेद
कुछ शाखाओं में बृहदारण्यक के वाक्य में ज्योति के स्थान पर अन्न का पाठ है। बादरायण कहते हैं कि यह पाठ-भेद विशेष अन्तर नहीं डालता। 1.4.15, कारणता की दृष्टि से, आकाश आदि में भी ब्रह्म ही अन्तिम कारण है।
संगति: बृहदारण्यक के पाठ-भेद।
1.4.16-1.4.18
कारण-व्यपदेश अधिकरण: कौषीतकी का इन्द्र
कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3.1 में बालाकी और अजातशत्रु का संवाद है। बालाकी कहता है कि मैं ब्रह्म सिखाता हूँ, और सूर्य, चन्द्र आदि के विषय में बताता है। अजातशत्रु कहता है कि नहीं, असली ब्रह्म कुछ और है।
बादरायण कहते हैं कि यहाँ इन्द्र का अर्थ ब्रह्म है। 1.4.16, समाकर्षण से, हर वर्णन में ब्रह्म का ही सूत्र चलता है। 1.4.17, जगत्-वाचि होने से, जगत् का मूल ब्रह्म है। 1.4.18, यदि कोई कहे कि यह जीव या मुख्य प्राण है, तो बादरायण मना करते हैं, पूर्व-व्याख्या के अनुसार।
संगति: कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 3।
1.4.19-1.4.22
वाक्यान्वय अधिकरण: मैत्रेयी-संवाद
बृहदारण्यक 2.4 का प्रसिद्ध संवाद। याज्ञवल्क्य वन जाने से पहले अपनी पत्नी मैत्रेयी को ब्रह्म-विद्या समझाते हैं। यह पूरा वाक्य आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः से आरम्भ होता है।
बादरायण कहते हैं कि यहाँ आत्मा का अर्थ ब्रह्म है। 1.4.19, जैमिनि के अनुसार यह अन्य प्रयोजन से है, पर बादरायण इसी प्रश्न और व्याख्यान से ब्रह्म-अर्थ स्थापित करते हैं। 1.4.20, पूरा वाक्य ब्रह्म के संदर्भ में बँधा है। 1.4.21, आश्मरथ्य कहते हैं कि यह प्रतिज्ञा की सिद्धि का लक्षण है। 1.4.22, औडुलोमि का मत, मुक्ति के समय जीव उत्क्रमण करता हुआ ब्रह्म-भाव को प्राप्त होता है।
संगति: बृहदारण्यक 2.4 और 4.5 (मैत्रेयी-संवाद, जो दो बार आता है)।
1.4.23-1.4.27
प्रकृति अधिकरण: ब्रह्म उपादान और निमित्त दोनों कारण
पूरे अध्याय का सर्वाधिक सिद्धान्त-प्रधान अधिकरण। बादरायण घोषित करते हैं कि ब्रह्म दो प्रकार का कारण है, निमित्त-कारण, जैसे घड़े का कुम्हार, और उपादान-कारण, जैसे घड़े की मिट्टी।
1.4.23, काशकृत्स्न के अनुसार, अवस्थिति से, जीव अन्तर्यामी रूप में ब्रह्म में ही स्थित है। 1.4.24, ब्रह्म प्रकृति, अर्थात् उपादान-कारण, भी है, और यह उपनिषद् की प्रतिज्ञाओं और दृष्टान्तों से सिद्ध होता है। 1.4.25, सोऽकामयत, बहु स्यां प्रजायेय, उसने इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ, यह इच्छा का उपदेश ब्रह्म को कारण रूप में पुष्ट करता है। 1.4.26, साक्षात् और उभय-आम्नान, दोनों रूप उपनिषद् में सीधे कहे गए हैं। 1.4.27, आत्म-कृति, अर्थात् स्वयं को रच लेने, से परिणाम सिद्ध होता है।
संगति: छान्दोग्य 6.2.1-3 (एकमेव अद्वितीयम् और सोऽकामयत बहु स्याम्)। यह ब्रह्म-को-दोनों-कारण मानने वाला सिद्धान्त पूरे अद्वैत-वेदान्त की नींव है।
1.4.28
योनि-व्याख्यान अधिकरण: योनि शब्द भी ब्रह्म पर
मुण्डक 1.1.6 में योनि शब्द ब्रह्म पर प्रयुक्त हुआ है, भूत-योनि। अर्थात् ब्रह्म ही सबका उद्गम है।
संगति: मुण्डक 1.1।
1.4.29
सर्व-व्याख्यान अधिकरण: समापन
अध्याय 1 का अन्तिम सूत्र। एतेन सर्वे, अर्थात् इसी विधि से सब, जो भी अन्य वाक्य हैं, व्याख्याताः व्याख्याताः, उन सबकी व्याख्या हो गई, व्याख्या हो गई। यह बादरायण का समापन-वाक्य है।
सूत्र का यह दोहराव (व्याख्याताः व्याख्याताः) परम्परा के नियम के अनुसार अध्याय की समाप्ति का सूचक है। अध्याय 1 यहाँ पूर्ण होता है।
आगे अध्याय 2 आरम्भ होगा, जहाँ बादरायण इसी ब्रह्म-स्थापना को अन्य दर्शनों (सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन) के आक्षेपों के सामने दृढ़ करेंगे।
संगति: यह समापन अध्याय 2.1 के स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् के साथ क्रम जोड़ता है।
साथ में पढ़ें
- ब्रह्म सूत्र सूची
- उपनिषद् संग्रह, हर अधिकरण के मूल वाक्य वहाँ
- भगवद् गीता, स्मृति-प्रस्थान
- अष्टावक्र गीता, अद्वैत का साक्षात् कथन
- श्री राम गीता, संक्षिप्त वेदान्त
पूरे ग्रंथ का पहला सूत्र, और यही ग्रंथ का द्वार भी। तीन शब्दों में बादरायण कह रहे हैं, अब, इसके अनन्तर, ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए।
अथ शब्द में एक पूर्व-स्थिति छिपी है। शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यह अथ चार साधनों को मान कर चलता है, नित्य और अनित्य का विवेक, इस लोक और परलोक के भोगों से वैराग्य, षट्-सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान), और मुमुक्षुत्व। इन चारों के बिना ब्रह्म-जिज्ञासा का अधिकार ही नहीं बनता।
यही कारण है कि सूत्र पहले अधिकार की बात करता है। जब तक भोगों की क्षणभंगुरता का बोध और एक गहरा वैराग्य भीतर नहीं उठता, तब तक यह प्रश्न सच्चे रूप में जन्म ही नहीं लेता।
संगति: यह सूत्र छान्दोग्य 7.1.3 के तरति शोकम् आत्मवित् से जुड़ता है, जो आत्मा को जान लेता है वह शोक से पार हो जाता है। शोक से ही जिज्ञासा का बीज पड़ता है।