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अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग

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अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग

सार: आठवाँ अध्याय अर्जुन के कई प्रश्नों से खुलता है और एक गहरे सूत्र पर आकर ठहरता है, कि अंत समय में मनुष्य जिसका स्मरण करता है, वही उसकी अगली गति बन जाती है। इसी में उस अविनाशी अक्षर की बात है, ॐ के जप की बात है, और उन दो रास्तों की, जिनमें से एक लौटाता है और दूसरा नहीं।

अभी-अभी श्रीकृष्ण ने अपनी बात के छोर पर कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए थे, जिन पर अर्जुन का मन अटक गया था। अब अर्जुन उन्हीं को खोलने की विनती करते हैं। वे हाथ जोड़कर पूछते हैं, हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म किसे कहते हैं? कर्म का अर्थ क्या है? अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ से क्या समझा जाए? और सबसे बड़ी बात, अंत समय में आपको जाना कैसे जाए, जब देह छूट रही हो और मन डगमगा रहा हो?

श्रीकृष्ण एक-एक करके उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, जो परम अविनाशी है, वही ब्रह्म है। हर जीव के भीतर बैठा उसका अपना स्वरूप अध्यात्म है। जिस रचना-शक्ति से प्राणी जन्म लेते और बढ़ते हैं, उस त्याग-रूप क्रिया को कर्म कहते हैं। नश्वर पदार्थ अधिभूत है, प्रकाशमान दिव्य पुरुष अधिदैव है, और इस देह में स्वयं हम ही अधियज्ञ के रूप में बैठे हैं।

अंत समय का स्मरण

इतना कहकर श्रीकृष्ण उस सूत्र पर आते हैं जो इस पूरे अध्याय का प्राण है। वे कहते हैं, हे कौन्तेय, अंत समय में मनुष्य जिस भाव को मन में लिए देह छोड़ता है, वही भाव लेकर वह आगे बढ़ता है।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

जो अंत समय में हमें ही स्मरण करता हुआ इस देह को छोड़कर जाता है, वह हमारे ही स्वरूप को पा लेता है, इसमें कोई संशय नहीं। (गीता 8.5)

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

मनुष्य अंत में जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, हे कौन्तेय, वह वही पा जाता है, क्योंकि जीवन भर वह उसी भाव में रँगा रहा था। (गीता 8.6)

अर्जुन इस बात की गहराई भाँप लेते हैं। अंत का वह क्षण आसमान से नहीं टपकता। वह तो पूरे जीवन के सोच का जोड़ है। जिसने जीवन भर जिसे याद किया, वही उस अंतिम साँस पर अपने-आप सामने आ खड़ा होगा। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, हर समय हमारा स्मरण कीजिए और अपने कर्तव्य में लगे रहिए, तो अंत में भी हम ही आपके मन में रहेंगे।

एक अक्षर ॐ

फिर श्रीकृष्ण उस साधना की ओर संकेत करते हैं जिससे मन अंत तक थिर रहता है। वे कहते हैं, जो मनुष्य मन को स्थिर करके, प्राण को भौंहों के बीच टिकाकर, उस एक अविनाशी अक्षर ॐ का उच्चारण करता हुआ और हमारा स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, वह परम गति को पाता है। यह ॐ वही बीज-ध्वनि है जिसमें सारा वेद, सारा ब्रह्म समाया हुआ है।

श्रीकृष्ण उस परम पुरुष का चित्र भी खींचते हैं जिस पर मन को टिकाना है। वे कहते हैं, वह सबका पुराना शासक है, अणु से भी सूक्ष्म, सबका पालनकर्ता, अचिंत्य रूप वाला, और अंधकार से परे सूरज-सा प्रकाशमान। जो मनुष्य प्रेम और अटल भक्ति के साथ, योग के बल से प्राण को ठीक जगह टिकाकर उस पुरुष का स्मरण करता है, वह उसी दिव्य पुरुष तक जा पहुँचता है।

वे यह भी आश्वासन देते हैं कि जो निरंतर, अनन्य मन से उन्हें याद करता है, उस नित्य-युक्त योगी के लिए वे सहज ही सुलभ हैं। ऐसे भक्त को उन तक पहुँचने के लिए किसी कठिन जोड़-तोड़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।

ब्रह्मा का दिन और रात

फिर श्रीकृष्ण समय के उस विराट पहिए की बात करते हैं जिसके आगे मनुष्य का सारा जीवन एक पल जैसा है। वे कहते हैं, ब्रह्मा का एक दिन हज़ार युगों जितना लंबा है, और उतनी ही लंबी उनकी एक रात। जब वह दिन उगता है, सारे प्राणी अव्यक्त से प्रकट हो जाते हैं, और जब रात उतरती है, वही सब फिर उसी अव्यक्त में समा जाते हैं। यह क्रम बार-बार चलता रहता है, बिना रुके, जन्म और लय का एक न थमने वाला चक्र।

पर श्रीकृष्ण यहीं नहीं रुकते। वे कहते हैं, इस सारे प्रकट और अप्रकट के परे एक और अव्यक्त है, जो सनातन है, जो तब भी नहीं मिटता जब सब कुछ मिट जाता है। वही हमारा परम धाम है। जो एक बार वहाँ पहुँच जाता है, वह फिर लौटकर इस आवागमन में नहीं आता। अर्जुन समझ जाते हैं कि साधना का असली निशाना यही अटल धाम है, वे लोक नहीं जो समय के साथ बनते और बिखरते रहते हैं।

दो रास्ते

अंत में श्रीकृष्ण देह छोड़कर जाने वाले दो रास्तों की बात करते हैं। एक प्रकाश का रास्ता है, जो अग्नि, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीनों से होकर जाता है। इस राह से जो जाता है, वह ब्रह्म को पाकर फिर लौटकर नहीं आता। दूसरा धुएँ का रास्ता है, जो रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन से होकर जाता है। इस राह से जाने वाला चंद्रलोक का सुख भोगकर फिर संसार में लौट आता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं, हे पार्थ, इन दोनों रास्तों को जान लेने वाला योगी मोह में नहीं पड़ता। इसीलिए आप हर काल में योग में स्थिर रहिए और मन को हमारी ओर लगाए रखिए। जो इस भेद को समझ लेता है, वह न जीने से घबराता है, न मरने से।

इतना सुनकर अर्जुन के भीतर एक शान्ति उतरती है। मृत्यु, जो अभी युद्ध के मुहाने पर सबसे बड़ा भय थी, अब एक द्वार जैसी लगने लगती है, जिसके पार जाने का रास्ता उनके अपने ही मन में है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 28 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/8/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

8.1किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम

अर्जुन उवाच

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥1॥

kiṃ tad brahma kim adhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama |
adhibhūtaṃ ca kiṃ proktam adhidaivaṃ kim ucyate

किम्
क्या है
तत्
वह
ब्रह्म
ब्रह्म
किम्
क्या है
अध्यात्मम्
अध्यात्म
किम्
क्या है
कर्म
कर्म
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम
अधिभूतम्
अधिभूत
च
और
किम्
क्या
प्रोक्तम्
कहा गया है
अधिदैवम्
अधिदैव
किम्
क्या
उच्यते
कहा जाता है

अन्वय: पुरुषोत्तम, तत् ब्रह्म किम्? अध्यात्मम् किम्? कर्म किम्? अधिभूतम् च किम् प्रोक्तम्? अधिदैवम् किम् उच्यते?

हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है और कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे कहते हैं?

8.2अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥2॥

adhiyajñaḥ kathaṃ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana |
prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ

अधियज्ञः
अधियज्ञ
कथम्
कैसे है
कः
कौन है
अत्र
यहाँ
देहे
देह में
अस्मिन्
इस
मधुसूदन
हे मधुसूदन
प्रयाणकाले
मृत्यु के समय
च
और
कथम्
किस प्रकार
ज्ञेयः
जानने योग्य
असि
हैं आप
नियतात्मभिः
संयत चित्त वालों द्वारा

अन्वय: मधुसूदन, अत्र अस्मिन् देहे अधियज्ञः कः, कथम्? प्रयाणकाले च नियतात्मभिः (त्वम्) कथम् ज्ञेयः असि?

हे मधुसूदन, यहाँ इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? और मृत्यु के समय संयत चित्त वाले साधक आपको किस प्रकार जान पाते हैं?

8.3अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥3॥

akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo ’dhyātmam ucyate |
bhūtabhāvodbhavakaro visargaḥ karmasaṃjñitaḥ

अक्षरम्
अविनाशी
ब्रह्म
ब्रह्म है
परमम्
परम
स्वभावः
अपना स्वरूप (जीवात्मा)
अध्यात्मम्
अध्यात्म
उच्यते
कहा जाता है
भूतभावोद्भवकरः
प्राणियों के भाव उत्पन्न करने वाला
विसर्गः
त्याग (यज्ञ रूप)
कर्मसंज्ञितः
कर्म नाम से कहा गया है

अन्वय: परमम् अक्षरम् ब्रह्म (अस्ति)। स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते। भूतभावोद्भवकरः विसर्गः कर्मसंज्ञितः।

परम अक्षर ही ब्रह्म है और अपना स्वरूप, अर्थात जीवात्मा, अध्यात्म कहा जाता है। प्राणियों के भावों को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह कर्म नाम से कहा गया है।

8.4अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥4॥

adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaś cādhidaivatam |
adhiyajño ’ham evātra dehe dehabhṛtāṃ vara

अधिभूतम्
अधिभूत है
क्षरः
नाशवान
भावः
पदार्थ
पुरुषः
पुरुष (हिरण्यगर्भ)
च
और
अधिदैवतम्
अधिदैव है
अधियज्ञः
अधियज्ञ
अहम्
मैं
एव
ही
अत्र
यहाँ
देहे
देह में
देहभृताम्
देहधारियों में
वर
हे श्रेष्ठ

अन्वय: क्षरः भावः अधिभूतम्, पुरुषः च अधिदैवतम्। देहभृताम् वर, अत्र देहे अहम् एव अधियज्ञः।

नाशवान पदार्थ अधिभूत है और पुरुष, अर्थात हिरण्यगर्भ, अधिदैव है। हे देहधारियों में श्रेष्ठ, इस देह में मैं ही अधियज्ञ हूँ।

8.5अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥5॥

antakāle ca mām eva smaran muktvā kalevaram |
yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāsty atra saṃśayaḥ

अन्तकाले
अन्तकाल में
च
और
माम्
मुझे
एव
ही
स्मरन्
स्मरण करता हुआ
मुक्त्वा
छोड़कर
कलेवरम्
शरीर को
यः
जो
प्रयाति
जाता है
सः
वह
मद्भावम्
मेरे स्वरूप को
याति
प्राप्त होता है
न
नहीं
अस्ति
है
अत्र
इसमें
संशयः
संशय

अन्वय: यः च अन्तकाले माम् एव स्मरन् कलेवरम् मुक्त्वा प्रयाति, सः मद्भावम् याति। अत्र संशयः न अस्ति।

जो अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है।

8.6यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥6॥

yaṃ yaṃ vāpi smaran bhāvaṃ tyajaty ante kalevaram |
taṃ tam evaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ

यम् यम्
जिस जिस
वा
भी
अपि
ही
स्मरन्
स्मरण करता हुआ
भावम्
भाव को
त्यजति
छोड़ता है
अन्ते
अन्त में
कलेवरम्
शरीर को
तम् तम्
उस उस को
एव
ही
एति
प्राप्त होता है
कौन्तेय
हे कौन्तेय
सदा
सदा
तद्भावभावितः
उस भाव से भावित हुआ

अन्वय: कौन्तेय, यम् यम् वा अपि भावम् स्मरन् अन्ते कलेवरम् त्यजति, सदा तद्भावभावितः तम् तम् एव एति।

हे कौन्तेय, यह मनुष्य अन्तकाल में जिस जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, उसी उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।

8.7तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥7॥

tasmāt sarveṣu kāleṣu mām anusmara yudhya ca |
mayy arpitamanobuddhir mām evaiṣyasy asaṃśayaḥ

तस्मात्
इसलिए
सर्वेषु
सब
कालेषु
समयों में
माम्
मेरा
अनुस्मर
निरन्तर स्मरण कीजिए
युध्य
युद्ध कीजिए
च
और
मयि
मुझमें
अर्पितमनोबुद्धिः
मन बुद्धि अर्पित किए हुए
माम्
मुझे
एव
ही
एष्यसि
प्राप्त होंगे
असंशयः
निःसंदेह

अन्वय: तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर, युध्य च। मयि अर्पितमनोबुद्धिः असंशयः माम् एव एष्यसि।

इसलिए आप सब समय मेरा निरन्तर स्मरण कीजिए और युद्ध भी कीजिए। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके आप निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होंगे।

8.8अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥8॥

abhyāsayogayuktena cetasā nānyagāminā |
paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan

अभ्यासयोगयुक्तेन
अभ्यास योग से युक्त
चेतसा
चित्त से
न
नहीं
अन्यगामिना
अन्यत्र जाने वाले
परमम्
परम
पुरुषम्
पुरुष को
दिव्यम्
दिव्य
याति
प्राप्त होता है
पार्थ
हे पार्थ
अनुचिन्तयन्
निरन्तर चिन्तन करता हुआ

अन्वय: पार्थ, अभ्यासयोगयुक्तेन न अन्यगामिना चेतसा अनुचिन्तयन् परमम् दिव्यम् पुरुषम् याति।

हे पार्थ, अभ्यास योग से युक्त और अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

8.9कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥9॥

kaviṃ purāṇam anuśāsitāram aṇor aṇīyāṃsam anusmared yaḥ |
sarvasya dhātāram acintyarūpam ādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt

कविम्
सर्वज्ञ
पुराणम्
अनादि
अनुशासितारम्
सबके नियामक
अणोः
अणु से
अणीयांसम्
भी सूक्ष्म
अनुस्मरेत्
स्मरण करे
यः
जो
सर्वस्य
सबके
धातारम्
धारण पोषण करने वाले
अचिन्त्यरूपम्
अचिन्त्य स्वरूप
आदित्यवर्णम्
सूर्य के समान प्रकाशमान
तमसः
अज्ञान अन्धकार से
परस्तात्
परे

अन्वय: यः कविम् पुराणम् अनुशासितारम् अणोः अणीयांसम् सर्वस्य धातारम् अचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णम् तमसः परस्तात् (पुरुषम्) अनुस्मरेत्,

जो मनुष्य उस सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियामक, अणु से भी सूक्ष्म, सबके धारण पोषण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञान के अन्धकार से परे परम पुरुष का निरन्तर स्मरण करता है।

8.10प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥10॥

prayāṇakāle manasācalena bhaktyā yukto yogabalena caiva |
bhruvor madhye prāṇam āveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣam upaiti divyam

प्रयाणकाले
मृत्यु के समय
मनसा
मन से
अचलेन
अचल
भक्त्या
भक्ति से
युक्तः
युक्त
योगबलेन
योग के बल से
च
और
एव
भी
भ्रुवोः
दोनों भौंहों के
मध्ये
मध्य में
प्राणम्
प्राण को
आवेश्य
स्थापित करके
सम्यक्
भली प्रकार
सः
वह
तम्
उस
परम्
परम
पुरुषम्
पुरुष को
उपैति
प्राप्त होता है
दिव्यम्
दिव्य

अन्वय: सः प्रयाणकाले भक्त्या युक्तः योगबलेन च एव भ्रुवोः मध्ये प्राणम् सम्यक् आवेश्य अचलेन मनसा तम् परम् दिव्यम् पुरुषम् उपैति।

वह भक्ति से युक्त पुरुष मृत्यु के समय योग के बल से दोनों भौंहों के मध्य में प्राण को भली प्रकार स्थापित करके, अचल मन से उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

8.11यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥11॥

yad akṣaraṃ vedavido vadanti viśanti yad yatayo vītarāgāḥ |
yad icchanto brahmacaryaṃ caranti tat te padaṃ saṃgraheṇa pravakṣye

यत्
जिसको
अक्षरम्
अक्षर
वेदविदः
वेद के ज्ञाता
वदन्ति
कहते हैं
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
यत्
जिसमें
यतयः
यत्नशील संन्यासी
वीतरागाः
राग रहित
यत्
जिसको
इच्छन्तः
चाहते हुए
ब्रह्मचर्यम्
ब्रह्मचर्य का
चरन्ति
आचरण करते हैं
तत्
उस
ते
आपको
पदम्
पद को
संग्रहेण
संक्षेप में
प्रवक्ष्ये
कहूँगा

अन्वय: वेदविदः यत् अक्षरम् वदन्ति, वीतरागाः यतयः यत् विशन्ति, यत् इच्छन्तः ब्रह्मचर्यम् चरन्ति, तत् पदम् ते संग्रहेण प्रवक्ष्ये।

वेद के ज्ञाता जिसे अक्षर कहते हैं, राग रहित यत्नशील संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है, वह पद मैं आपको संक्षेप में कहूँगा।

8.12सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥12॥

sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca |
mūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yogadhāraṇām

सर्वद्वाराणि
सब इन्द्रिय द्वारों को
संयम्य
रोककर
मनः
मन को
हृदि
हृदय में
निरुध्य
स्थिर करके
च
और
मूर्ध्नि
मस्तक में
आधाय
स्थापित करके
आत्मनः
अपने
प्राणम्
प्राण को
आस्थितः
स्थित हुआ
योगधारणाम्
योग धारणा में

अन्वय: सर्वद्वाराणि संयम्य, मनः हृदि निरुध्य, आत्मनः प्राणम् मूर्ध्नि आधाय च योगधारणाम् आस्थितः,

जो साधक सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके और अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके योग की धारणा में स्थित होता है।

8.13ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥13॥

om ity ekākṣaraṃ brahma vyāharan mām anusmaran |
yaḥ prayāti tyajan dehaṃ sa yāti paramāṃ gatim

ओम्
ओम्
इति
इस
एकाक्षरम्
एक अक्षर रूप
ब्रह्म
ब्रह्म का
व्याहरन्
उच्चारण करता हुआ
माम्
मेरा
अनुस्मरन्
निरन्तर स्मरण करता हुआ
यः
जो
प्रयाति
जाता है
त्यजन्
त्यागता हुआ
देहम्
देह को
सः
वह
याति
प्राप्त होता है
परमाम्
परम
गतिम्
गति को

अन्वय: यः ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म व्याहरन् माम् अनुस्मरन् देहम् त्यजन् प्रयाति, सः परमाम् गतिम् याति।

जो ओम् इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा निरन्तर स्मरण करता हुआ देह को त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

8.14अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥14॥

ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ |
tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ

अनन्यचेताः
अनन्य चित्त वाला
सततम्
निरन्तर
यः
जो
माम्
मुझे
स्मरति
स्मरण करता है
नित्यशः
नित्य
तस्य
उस
अहम्
मैं
सुलभः
सुलभ हूँ
पार्थ
हे पार्थ
नित्ययुक्तस्य
नित्य युक्त
योगिनः
योगी के लिए

अन्वय: पार्थ, यः अनन्यचेताः सततम् नित्यशः माम् स्मरति, तस्य नित्ययुक्तस्य योगिनः अहम् सुलभः।

हे पार्थ, जो अनन्य चित्त वाला मनुष्य निरन्तर और नित्य मेरा स्मरण करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।

8.15मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥15॥

mām upetya punarjanma duḥkhālayam aśāśvatam |
nāpnuvanti mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ

माम्
मुझे
उपेत्य
प्राप्त करके
पुनर्जन्म
पुनर्जन्म को
दुःखालयम्
दुःखों के घर
अशाश्वतम्
क्षणभंगुर
न
नहीं
आप्नुवन्ति
प्राप्त होते
महात्मानः
महात्मा जन
संसिद्धिम्
सिद्धि को
परमाम्
परम
गताः
प्राप्त हुए

अन्वय: परमाम् संसिद्धिम् गताः महात्मानः माम् उपेत्य दुःखालयम् अशाश्वतम् पुनर्जन्म न आप्नुवन्ति।

परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्मा जन मुझे प्राप्त करके दुःखों के घर और क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं पाते।

8.16आ ब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन

आ ब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥16॥

ā brahmabhuvanāl lokāḥ punarāvartino ’rjuna |
mām upetya tu kaunteya punarjanma na vidyate

आ
तक
ब्रह्मभुवनात्
ब्रह्मलोक
लोकाः
सब लोक
पुनरावर्तिनः
लौटकर आने वाले हैं
अर्जुन
हे अर्जुन
माम्
मुझे
उपेत्य
प्राप्त करके
तु
परन्तु
कौन्तेय
हे कौन्तेय
पुनर्जन्म
पुनर्जन्म
न
नहीं
विद्यते
होता

अन्वय: अर्जुन, आ ब्रह्मभुवनात् लोकाः पुनरावर्तिनः। कौन्तेय, माम् उपेत्य तु पुनर्जन्म न विद्यते।

हे अर्जुन, ब्रह्मलोक तक सब लोक लौटकर आने वाले हैं। परन्तु हे कौन्तेय, मुझे प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता।

8.17सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥17॥

sahasrayugaparyantam ahar yad brahmaṇo viduḥ |
rātriṃ yugasahasrāntāṃ te ’horātravido janāḥ

सहस्रयुगपर्यन्तम्
एक हजार युगों तक का
अहः
दिन
यत्
जो
ब्रह्मणः
ब्रह्मा का
विदुः
जानते हैं
रात्रिम्
रात्रि को
युगसहस्रान्ताम्
हजार युगों में समाप्त होने वाली
ते
वे
अहोरात्रविदः
दिन रात का तत्त्व जानने वाले
जनाः
लोग

अन्वय: (ये) ब्रह्मणः यत् अहः सहस्रयुगपर्यन्तम् रात्रिम् (च) युगसहस्रान्ताम् विदुः, ते जनाः अहोरात्रविदः।

जो लोग ब्रह्मा के एक हजार युगों तक के दिन को और एक हजार युगों में समाप्त होने वाली रात्रि को जानते हैं, वे ही दिन और रात के तत्त्व को जानने वाले हैं।

8.18अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥18॥

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavanty aharāgame |
rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake

अव्यक्तात्
अव्यक्त से
व्यक्तयः
व्यक्त पदार्थ
सर्वाः
सब
प्रभवन्ति
उत्पन्न होते हैं
अहरागमे
दिन के आरम्भ में
रात्र्यागमे
रात्रि के आरम्भ में
प्रलीयन्ते
लीन हो जाते हैं
तत्र
उसी में
एव
ही
अव्यक्तसंज्ञके
अव्यक्त नामक में

अन्वय: अहरागमे सर्वाः व्यक्तयः अव्यक्तात् प्रभवन्ति। रात्र्यागमे तत्र एव अव्यक्तसंज्ञके प्रलीयन्ते।

दिन के आरम्भ में सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और रात्रि के आरम्भ में उसी अव्यक्त नामक कारण में लीन हो जाते हैं।

8.19भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥19॥

bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ bhūtvā bhūtvā pralīyate |
rātryāgame ’vaśaḥ pārtha prabhavaty aharāgame

भूतग्रामः
प्राणियों का समुदाय
सः
वह
एव
ही
अयम्
यह
भूत्वा भूत्वा
बार बार उत्पन्न होकर
प्रलीयते
लीन हो जाता है
रात्र्यागमे
रात्रि के आरम्भ में
अवशः
परवश हुआ
पार्थ
हे पार्थ
प्रभवति
उत्पन्न होता है
अहरागमे
दिन के आरम्भ में

अन्वय: पार्थ, सः एव अयम् भूतग्रामः भूत्वा भूत्वा रात्र्यागमे प्रलीयते, अवशः अहरागमे प्रभवति।

हे पार्थ, वही यह प्राणियों का समुदाय बार बार उत्पन्न होकर रात्रि के आरम्भ में लीन हो जाता है और परवश हुआ दिन के आरम्भ में फिर उत्पन्न होता है।

8.20परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥20॥

paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ |
yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati

परः
परे
तस्मात्
उससे
तु
परन्तु
भावः
भाव (सत्ता)
अन्यः
दूसरा
अव्यक्तः
अव्यक्त
अव्यक्तात्
अव्यक्त से
सनातनः
सनातन
यः
जो
सः
वह
सर्वेषु
सब
भूतेषु
प्राणियों के
नश्यत्सु
नष्ट होने पर
न
नहीं
विनश्यति
नष्ट होता

अन्वय: तस्मात् अव्यक्तात् तु परः अन्यः सनातनः अव्यक्तः भावः (अस्ति), यः सः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।

परन्तु उस अव्यक्त से भी परे दूसरा सनातन अव्यक्त भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।

8.21अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥21॥

avyakto ’kṣara ity uktas tam āhuḥ paramāṃ gatim |
yaṃ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṃ mama

अव्यक्तः
अव्यक्त
अक्षरः
अक्षर
इति
ऐसा
उक्तः
कहा गया है
तम्
उसे
आहुः
कहते हैं
परमाम्
परम
गतिम्
गति
यम्
जिसे
प्राप्य
प्राप्त करके
न
नहीं
निवर्तन्ते
लौटते
तत्
वह
धाम
धाम
परमम्
परम
मम
मेरा

अन्वय: (यः) अव्यक्तः अक्षरः इति उक्तः, तम् परमाम् गतिम् आहुः। यम् प्राप्य न निवर्तन्ते, तत् मम परमम् धाम।

जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति कहते हैं। जिसे प्राप्त करके लोग लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।

8.22पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥22॥

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tv ananyayā |
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvam idaṃ tatam

पुरुषः
पुरुष
सः
वह
परः
परम
पार्थ
हे पार्थ
भक्त्या
भक्ति से
लभ्यः
प्राप्त होने योग्य है
तु
ही
अनन्यया
अनन्य
यस्य
जिसके
अन्तःस्थानि
भीतर स्थित हैं
भूतानि
सब प्राणी
येन
जिससे
सर्वम्
सम्पूर्ण
इदम्
यह (जगत्)
ततम्
व्याप्त है

अन्वय: पार्थ, यस्य अन्तःस्थानि भूतानि, येन इदम् सर्वम् ततम्, सः परः पुरुषः अनन्यया भक्त्या तु लभ्यः।

हे पार्थ, जिसके भीतर सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है।

8.23यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥23॥

yatra kāle tv anāvṛttim āvṛttiṃ caiva yoginaḥ |
prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha

यत्र
जिस
काले
काल में
तु
और
अनावृत्तिम्
न लौटने की गति को
आवृत्तिम्
लौटने की गति को
च
और
एव
ही
योगिनः
योगी
प्रयाताः
शरीर छोड़कर गए हुए
यान्ति
प्राप्त होते हैं
तम्
उस
कालम्
काल को
वक्ष्यामि
कहूँगा
भरतर्षभ
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ

अन्वय: भरतर्षभ, यत्र काले तु प्रयाताः योगिनः अनावृत्तिम् आवृत्तिम् च एव यान्ति, तम् कालम् वक्ष्यामि।

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, जिस काल में शरीर छोड़कर गए हुए योगी न लौटने वाली गति को और जिस काल में लौटने वाली गति को प्राप्त होते हैं, वह काल मैं कहूँगा।

8.24अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥24॥

agnir jyotir ahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam |
tatra prayātā gacchanti brahma brahmavido janāḥ

अग्निः
अग्नि
ज्योतिः
ज्योति
अहः
दिन
शुक्लः
शुक्ल पक्ष
षण्मासाः
छह महीने
उत्तरायणम्
उत्तरायण
तत्र
उस मार्ग में
प्रयाताः
शरीर छोड़कर गए हुए
गच्छन्ति
जाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म को
ब्रह्मविदः
ब्रह्म को जानने वाले
जनाः
लोग

अन्वय: अग्निः, ज्योतिः, अहः, शुक्लः, उत्तरायणम् षण्मासाः, तत्र प्रयाताः ब्रह्मविदः जनाः ब्रह्म गच्छन्ति।

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने, इस मार्ग में शरीर छोड़कर गए हुए ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

8.25धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥25॥

dhūmo rātris tathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam |
tatra cāndramasaṃ jyotir yogī prāpya nivartate

धूमः
धूम
रात्रिः
रात्रि
तथा
तथा
कृष्णः
कृष्ण पक्ष
षण्मासाः
छह महीने
दक्षिणायनम्
दक्षिणायन
तत्र
उस मार्ग में
चान्द्रमसम्
चन्द्रमा की
ज्योतिः
ज्योति को
योगी
योगी
प्राप्य
प्राप्त करके
निवर्तते
लौट आता है

अन्वय: धूमः, रात्रिः, तथा कृष्णः, दक्षिणायनम् षण्मासाः, तत्र योगी चान्द्रमसम् ज्योतिः प्राप्य निवर्तते।

धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने, इस मार्ग में गया हुआ योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त करके लौट आता है।

8.26शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥26॥

śuklakṛṣṇe gatī hy ete jagataḥ śāśvate mate |
ekayā yāty anāvṛttim anyayāvartate punaḥ

शुक्लकृष्णे
शुक्ल और कृष्ण
गती
दो गतियाँ
हि
निश्चय ही
एते
ये
जगतः
जगत् की
शाश्वते
सनातन
मते
मानी गई हैं
एकया
एक से
याति
जाता है
अनावृत्तिम्
न लौटने की गति को
अन्यया
दूसरी से
आवर्तते
लौट आता है
पुनः
फिर

अन्वय: एते शुक्लकृष्णे गती हि जगतः शाश्वते मते। एकया अनावृत्तिम् याति, अन्यया पुनः आवर्तते।

जगत् के ये शुक्ल और कृष्ण दो मार्ग सनातन माने गए हैं। एक से जाने वाला न लौटने की गति को प्राप्त होता है और दूसरे से जाने वाला फिर लौट आता है।

8.27नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥27॥

naite sṛtī pārtha jānan yogī muhyati kaś cana |
tasmāt sarveṣu kāleṣu yogayukto bhavārjuna

न
नहीं
एते
इन
सृती
दोनों मार्गों को
पार्थ
हे पार्थ
जानन्
जानता हुआ
योगी
योगी
मुह्यति
मोहित होता
कश्चन
कोई भी
तस्मात्
इसलिए
सर्वेषु
सब
कालेषु
समयों में
योगयुक्तः
योग से युक्त
भव
होइए
अर्जुन
हे अर्जुन

अन्वय: पार्थ, एते सृती जानन् कश्चन योगी न मुह्यति। तस्मात् अर्जुन, सर्वेषु कालेषु योगयुक्तः भव।

हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, आप सब समय योग से युक्त रहिए।

8.28वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥28॥

vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva dāneṣu yat puṇyaphalaṃ pradiṣṭam |
atyeti tat sarvam idaṃ viditvā yogī paraṃ sthānam upaiti cādyam

वेदेषु
वेदों में
यज्ञेषु
यज्ञों में
तपःसु
तपों में
च
और
एव
भी
दानेषु
दानों में
यत्
जो
पुण्यफलम्
पुण्य फल
प्रदिष्टम्
कहा गया है
अत्येति
उल्लंघन कर जाता है
तत्
उस
सर्वम्
सबको
इदम्
यह (तत्त्व)
विदित्वा
जानकर
योगी
योगी
परम्
परम
स्थानम्
स्थान को
उपैति
प्राप्त होता है
च
और
आद्यम्
आदि (सनातन)

अन्वय: वेदेषु यज्ञेषु तपःसु दानेषु च एव यत् पुण्यफलम् प्रदिष्टम्, इदम् विदित्वा योगी तत् सर्वम् अत्येति, परम् आद्यम् स्थानम् च उपैति।

वेदों, यज्ञों, तपों और दानों में जो पुण्य फल कहा गया है, योगी इस तत्त्व को जानकर उस सबका उल्लंघन कर जाता है और परम आदि स्थान को प्राप्त होता है।