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अब तक कृष्ण ने कर्म और ज्ञान की राह दिखायी थी। इस छठे अध्याय में वे भीतर की सबसे बारीक विद्या खोलते हैं, ध्यान की विद्या। कैसे बैठें, मन को कैसे थामें, और सबसे ज़रूरी बात, मन को अपना शत्रु नहीं, अपना मित्र कैसे बनाएँ। यह पूरी गीता में योग-साधना का सबसे विस्तृत और सबसे कोमल वर्णन है।
असली संन्यासी कौन
कृष्ण ने पहले एक भ्रम मिटाया। बोले, हे अर्जुन, संन्यासी वह नहीं जो केवल आग और कर्म छोड़ बैठे। सच्चा संन्यासी और सच्चा योगी वही है जो अपने कर्म तो करता है, मगर उनके फल की चाह छोड़ देता है। जिसने कर्मफल की डोर छोड़ी, उसी ने भीतर की आग जलायी। जो साधना के आरम्भ में है, उसके लिए कर्म ही सीढ़ी है; और जो शिखर पर पहुँच गया, उसके लिए भीतर का ठहराव ही सीढ़ी बन जाता है।
अपने ही उद्धारक
फिर कृष्ण ने इस अध्याय का सबसे गहरा सूत्र रखा।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥अपने आप को अपने ही बल से ऊपर उठाइए, अपने आप को गिरने मत दीजिए। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।
श्रीमद्भगवद्गीता 6.5
कोई बाहर से आकर उद्धार नहीं करेगा। जिसने अपने मन को अपने वश में कर लिया, उसके लिए वही मन सबसे बड़ा मित्र है। और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही मन शत्रु-सा उसी के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। मित्र और शत्रु, दोनों एक ही जगह बैठे हैं, आपके ही भीतर।
ध्यान का आसन
अब कृष्ण ने विधि बतायी, बहुत बारीकी से। बोले, एकांत जगह चुनिए, न बहुत ऊँची न बहुत नीची, और वहाँ स्वच्छ आसन बिछाइए। स्थिर होकर बैठिए, देह, सिर और गर्दन को एक सीध में सम रखिए, और दृष्टि को इधर-उधर भटकने मत दीजिए। मन को एक बिंदु पर टिकाइए, भीतर की गहराई में उतरिए। बोले, यह योग न बहुत खाने वाले को सधता है, न बिलकुल भूखे रहने वाले को; न बहुत सोने वाले को, न रात-रात जागने वाले को। जिसका खाना-पीना, सोना-जागना और काम-काज सब सम है, उसी का दुख यह योग हर लेता है।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥जैसे हवा-रहित जगह में रखा दीपक हिलता तक नहीं, वैसी ही उपमा उस योगी की है जिसने अपने चित्त को साध लिया और आत्मा के योग में ठहर गया।
श्रीमद्भगवद्गीता 6.19
हवा न हो तो दीपक की लौ बिलकुल सीधी, अडोल जलती है। साधे हुए मन की भी यही दशा है। भीतर एक ऐसी शान्ति उतरती है जिसमें बैठकर योगी अपने ही भीतर उस परम को देख लेता है, और फिर उससे कभी डिगता नहीं। उस अवस्था में मिली आनन्द की एक झलक के आगे बड़े से बड़ा सुख फीका पड़ जाता है।
चंचल मन
यहाँ अर्जुन ने वह प्रश्न पूछा जो हर साधक के मन में उठता है।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥हे कृष्ण, यह मन तो बड़ा चंचल है, मथ डालने वाला, बलवान और ज़िद्दी। इसे थामना हमें हवा को मुट्ठी में बाँधने जैसा कठिन लगता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 6.34
कृष्ण ने इस ईमानदार शिकायत को झुठलाया नहीं। स्वीकार किया कि हाँ, मन सचमुच चंचल है और इसे थामना कठिन है। मगर फिर उन्होंने वह उपाय दिया जो आज तक हर साधक का सहारा है।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥हे महाबाहु, इसमें संदेह नहीं कि मन चंचल है और बड़ी कठिनाई से वश में आता है। मगर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह थम ही जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 6.35
दो ही साधन हैं। अभ्यास, यानी रोज़, धीरज के साथ, बार-बार मन को लौटा लाना। और वैराग्य, यानी चीज़ों से भीतरी पकड़ ढीली कर देना। ये दोनों साथ चलें, तो सबसे चंचल मन भी एक दिन उसी हवा-रहित दीपक की सीधी लौ-सा ठहर जाता है।
कोई प्रयास व्यर्थ नहीं
अंत में अर्जुन ने एक कोमल आशंका रखी, जो बहुतों के मन में होती है। बोले, और अगर कोई इस राह पर चले, पूरे मन से प्रयास करे, फिर भी बीच में डिग जाए और सिद्धि से पहले ही चूक जाए, तो उसका क्या होगा? क्या उसका सारा परिश्रम व्यर्थ जाएगा, क्या वह दोनों ओर से हाथ धो बैठेगा?
कृष्ण का उत्तर पूरी गीता की सबसे सांत्वना देने वाली पंक्तियों में है। बोले, हे तात, ऐसा कभी नहीं होता। जो भला करने चला है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती, न इस लोक में, न अगले में। ऐसा साधक अच्छे लोकों में कुछ समय बिताकर फिर किसी पवित्र और भाग्यशाली घर में जन्म लेता है, और वहाँ पिछले जन्म का वह अधूरा अभ्यास अपने-आप फिर जाग उठता है। एक बार जो इस राह पर चल पड़ा, वह टूटी हुई कड़ी से आगे ही जुड़ता है, पीछे नहीं गिरता।
फिर कृष्ण ने योगी को तपस्वियों से, शास्त्र जानने वालों से, और केवल कर्म करने वालों से भी ऊँचा बताया। और सबसे ऊँचा उस योगी को कहा जो श्रद्धा और प्रेम से भरकर अपने अंतर में उन्हीं को थामे रहता है। इसी प्रेम की डोर आगे के अध्यायों में भक्ति बनकर खुलने वाली है।
इस अध्याय का सार एक वाक्य में। मन तब तक शत्रु है जब तक उसे थामना न आए, और जिस दिन थामना आ गया, वही मन सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। थामने का तरीक़ा कोई जादू नहीं, बस रोज़ का अभ्यास और चीज़ों से भीतरी दूरी। और इस राह पर रखा एक भी कदम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 47 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/6/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
6.1अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥1॥
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnir na cākriyaḥ
- अनाश्रितः
- आश्रय न लेकर
- कर्मफलम्
- कर्म के फल का
- कार्यम्
- करने योग्य
- कर्म
- कर्म
- करोति
- करता है
- यः
- जो
- सः
- वह
- संन्यासी
- संन्यासी
- च
- और
- योगी
- योगी
- च
- भी
- न
- नहीं
- निरग्निः
- अग्नि का त्याग करने वाला
- न
- नहीं
- च
- और
- अक्रियः
- क्रियाओं का त्याग करने वाला
अन्वय: यः कर्मफलम् अनाश्रितः कार्यम् कर्म करोति, सः संन्यासी च योगी च; न निरग्निः, न च अक्रियः।
जो कर्म के फल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है। जिसने केवल अग्नि का त्याग किया हो वह संन्यासी नहीं, और जिसने केवल क्रियाओं का त्याग किया हो वह योगी नहीं।
6.2यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥2॥
yaṃ saṃnyāsam iti prāhur yogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava |
na hy asaṃnyastasaṃkalpo yogī bhavati kaś cana
- यम्
- जिसको
- संन्यासम्
- संन्यास
- इति
- ऐसा
- प्राहुः
- कहते हैं
- योगम्
- योग
- तम्
- उसको
- विद्धि
- जानिए
- पाण्डव
- हे पाण्डव
- न
- नहीं
- हि
- क्योंकि
- असंन्यस्तसंकल्पः
- संकल्पों का त्याग न करने वाला
- योगी
- योगी
- भवति
- होता है
- कश्चन
- कोई भी
अन्वय: पाण्डव, यम् संन्यासम् इति प्राहुः, तम् योगम् विद्धि; हि असंन्यस्तसंकल्पः कश्चन योगी न भवति।
हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही आप योग जानिए। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं होता।
6.3आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥3॥
ārurukṣor muner yogaṃ karma kāraṇam ucyate |
yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇam ucyate
- आरुरुक्षोः
- योग पर चढ़ने की इच्छा वाले
- मुनेः
- मुनि के लिए
- योगम्
- योग पर
- कर्म
- कर्म
- कारणम्
- साधन
- उच्यते
- कहा जाता है
- योगारूढस्य
- योग पर आरूढ़ हुए
- तस्य
- उसके
- एव
- ही
- शमः
- शम, सब संकल्पों की शान्ति
- कारणम्
- साधन
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: योगम् आरुरुक्षोः मुनेः कर्म कारणम् उच्यते; तस्य एव योगारूढस्य शमः कारणम् उच्यते।
योग पर चढ़ने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए कर्म साधन कहा गया है। उसी मुनि के योग पर आरूढ़ हो जाने पर शम साधन कहा गया है।
6.4यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥4॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasv anuṣajjate |
sarvasaṃkalpasaṃnyāsī yogārūḍhas tadocyate
- यदा
- जब
- हि
- निश्चय ही
- न
- नहीं
- इन्द्रियार्थेषु
- इन्द्रियों के विषयों में
- न
- नहीं
- कर्मसु
- कर्मों में
- अनुषज्जते
- आसक्त होता है
- सर्वसंकल्पसंन्यासी
- सब संकल्पों का त्यागी
- योगारूढः
- योग पर आरूढ़
- तदा
- तब
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: यदा हि इन्द्रियार्थेषु न, कर्मसु न अनुषज्जते, तदा सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढः उच्यते।
जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है, तब वह सब संकल्पों का त्यागी योगारूढ़ कहा जाता है।
6.5उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥5॥
uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet |
ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
- उद्धरेत्
- उद्धार करे
- आत्मना
- अपने द्वारा
- आत्मानम्
- अपना
- न
- नहीं
- आत्मानम्
- अपने को
- अवसादयेत्
- अधोगति में गिराए
- आत्मा
- स्वयं
- एव
- ही
- हि
- क्योंकि
- आत्मनः
- अपना
- बन्धुः
- बन्धु
- आत्मा
- स्वयं
- एव
- ही
- रिपुः
- शत्रु
- आत्मनः
- अपना
अन्वय: आत्मना आत्मानम् उद्धरेत्, आत्मानम् न अवसादयेत्; हि आत्मा एव आत्मनः बन्धुः, आत्मा एव आत्मनः रिपुः।
मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न गिराए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना बन्धु है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
6.6बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥6॥
bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ |
anātmanas tu śatrutve vartetātmaiva śatruvat
- बन्धुः
- बन्धु
- आत्मा
- आत्मा, स्वयं
- आत्मनः
- अपना
- तस्य
- उसका
- येन
- जिसने
- आत्मा
- मन आदि
- एव
- ही
- आत्मना
- अपने द्वारा
- जितः
- जीत लिया
- अनात्मनः
- अपने को न जीतने वाले का
- तु
- परन्तु
- शत्रुत्वे
- शत्रुता में
- वर्तेत
- बर्तता है
- आत्मा
- आत्मा, स्वयं
- एव
- ही
- शत्रुवत्
- शत्रु की भाँति
अन्वय: येन आत्मना आत्मा एव जितः, तस्य आत्मा आत्मनः बन्धुः; अनात्मनः तु आत्मा एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तेत।
जिसने अपने द्वारा अपने को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। परन्तु जिसने अपने को नहीं जीता, उसका आत्मा ही शत्रु की भाँति शत्रुता में बर्तता है।
6.7जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानयोः ॥7॥
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāvamānayoḥ
- जितात्मनः
- जिसने मन को जीत लिया
- प्रशान्तस्य
- परम शान्त
- परमात्मा
- परमात्मा
- समाहितः
- भली प्रकार स्थित
- शीतोष्णसुखदुःखेषु
- सर्दी गर्मी सुख दुःख में
- तथा
- और
- मानावमानयोः
- मान और अपमान में
अन्वय: शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानयोः जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
सर्दी गर्मी, सुख दुःख और मान अपमान में जिसका मन जीता हुआ और भली प्रकार शान्त है, उसके भीतर परमात्मा सम्यक् रूप से स्थित है।
6.8ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥8॥
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ |
yukta ity ucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ
- ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा
- ज्ञान विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला
- कूटस्थः
- निर्विकार, अचल
- विजितेन्द्रियः
- इन्द्रियों को जीता हुआ
- युक्तः
- योगयुक्त
- इति
- ऐसा
- उच्यते
- कहा जाता है
- योगी
- योगी
- समलोष्टाश्मकाञ्चनः
- मिट्टी, पत्थर, सोना समान मानने वाला
अन्वय: ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थः विजितेन्द्रियः समलोष्टाश्मकाञ्चनः योगी युक्तः इति उच्यते।
जिसका अन्तःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो कूटस्थ अर्थात् निर्विकार है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं, वह योगी युक्त कहा जाता है।
6.9सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥9॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu |
sādhuṣv api ca pāpeṣu samabuddhir viśiṣyate
- सुहृद्
- निःस्वार्थ हित करने वाला
- मित्र
- मित्र
- अरि
- शत्रु
- उदासीन
- उदासीन
- मध्यस्थ
- मध्यस्थ
- द्वेष्य
- द्वेष के पात्र
- बन्धुषु
- और बन्धुओं में
- साधुषु
- साधुओं में
- अपि
- भी
- च
- और
- पापेषु
- पापियों में
- समबुद्धिः
- समान बुद्धि वाला
- विशिष्यते
- श्रेष्ठ है
अन्वय: सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुषु पापेषु च अपि समबुद्धिः विशिष्यते।
जो सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुओं में, तथा साधुओं और पापियों में भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
6.10योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥10॥
yogī yuñjīta satatam ātmānaṃ rahasi sthitaḥ |
ekākī yatacittātmā nirāśīr aparigrahaḥ
- योगी
- योगी
- युञ्जीत
- लगाए
- सततम्
- निरन्तर
- आत्मानम्
- मन को
- रहसि
- एकान्त में
- स्थितः
- स्थित
- एकाकी
- अकेला
- यतचित्तात्मा
- चित्त और शरीर वश में किए
- निराशीः
- आशा रहित
- अपरिग्रहः
- संग्रह रहित
अन्वय: योगी रहसि स्थितः एकाकी यतचित्तात्मा निराशीः अपरिग्रहः सततम् आत्मानम् युञ्जीत।
योगी एकान्त में स्थित होकर, अकेला, चित्त और शरीर को वश में रखते हुए, आशा और संग्रह से रहित होकर निरन्तर मन को एकाग्र करे।
6.11शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥11॥
śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ |
nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram
- शुचौ
- शुद्ध
- देशे
- स्थान में
- प्रतिष्ठाप्य
- स्थापित करके
- स्थिरम्
- स्थिर
- आसनम्
- आसन
- आत्मनः
- अपना
- न
- न
- अत्युच्छ्रितम्
- बहुत ऊँचा
- न
- न
- अतिनीचम्
- बहुत नीचा
- चैलाजिनकुशोत्तरम्
- कुश, मृगचर्म, वस्त्र क्रम से बिछा
अन्वय: शुचौ देशे न अत्युच्छ्रितम् न अतिनीचम् चैलाजिनकुशोत्तरम् आत्मनः स्थिरम् आसनम् प्रतिष्ठाप्य।
शुद्ध भूमि पर, जिस पर क्रम से कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछे हों, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, ऐसा अपना स्थिर आसन स्थापित करके,
6.12तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥12॥
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ |
upaviśyāsane yuñjyād yogam ātmaviśuddhaye
- तत्र
- वहाँ
- एकाग्रम्
- एकाग्र
- मनः
- मन
- कृत्वा
- करके
- यतचित्तेन्द्रियक्रियः
- चित्त, इन्द्रियों की क्रियाएँ वश में
- उपविश्य
- बैठ कर
- आसने
- आसन पर
- युञ्ज्यात्
- अभ्यास करे
- योगम्
- योग का
- आत्मविशुद्धये
- अन्तःकरण की शुद्धि के लिए
अन्वय: तत्र आसने उपविश्य मनः एकाग्रम् कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः आत्मविशुद्धये योगम् युञ्ज्यात्।
वहाँ उस आसन पर बैठ कर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
6.13समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥13॥
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayann acalaṃ sthiraḥ |
saṃprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaś cānavalokayan
- समम्
- सीधा, सम
- कायशिरोग्रीवम्
- शरीर, सिर और गले को
- धारयन्
- धारण करते हुए
- अचलम्
- अचल
- स्थिरः
- स्थिर होकर
- संप्रेक्ष्य
- देखते हुए
- नासिकाग्रम्
- नासिका के अग्रभाग को
- स्वम्
- अपनी
- दिशः
- दिशाओं को
- च
- और
- अनवलोकयन्
- न देखता हुआ
अन्वय: कायशिरोग्रीवम् समम् अचलम् धारयन् स्थिरः, स्वम् नासिकाग्रम् संप्रेक्ष्य, दिशः च अनवलोकयन्।
शरीर, सिर और गले को सीधा और अचल धारण करके स्थिर हो, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखे और दिशाओं की ओर न देखे।
6.14प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥14॥
praśāntātmā vigatabhīr brahmacārivrate sthitaḥ |
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ
- प्रशान्तात्मा
- शान्त अन्तःकरण वाला
- विगतभीः
- भय रहित
- ब्रह्मचारिव्रते
- ब्रह्मचारी के व्रत में
- स्थितः
- स्थित
- मनः
- मन को
- संयम्य
- संयत करके
- मच्चित्तः
- हममें चित्त लगाए हुए
- युक्तः
- योगयुक्त
- आसीत
- बैठे
- मत्परः
- हमें ही परम लक्ष्य मानने वाला
अन्वय: प्रशान्तात्मा विगतभीः ब्रह्मचारिव्रते स्थितः मनः संयम्य मच्चित्तः मत्परः युक्तः आसीत।
शान्त अन्तःकरण वाला, भय से रहित, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित योगी मन को संयत करके, मुझमें चित्त लगाए और मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए योगयुक्त होकर बैठे।
6.15युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥15॥
yuñjann evaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ |
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthām adhigacchati
- युञ्जन्
- लगाता हुआ
- एवम्
- इस प्रकार
- सदा
- सदा
- आत्मानम्
- मन को
- योगी
- योगी
- नियतमानसः
- वश में किए मन वाला
- शान्तिम्
- शान्ति को
- निर्वाणपरमाम्
- निर्वाण जिसकी पराकाष्ठा है
- मत्संस्थाम्
- हममें स्थित
- अधिगच्छति
- प्राप्त करता है
अन्वय: एवम् सदा आत्मानम् युञ्जन् नियतमानसः योगी निर्वाणपरमाम् मत्संस्थाम् शान्तिम् अधिगच्छति।
इस प्रकार सदा मन को लगाता हुआ, वश में किए हुए मन वाला योगी उस शान्ति को प्राप्त करता है जो निर्वाण की पराकाष्ठा है और मुझमें स्थित है।
6.16नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥16॥
nātyaśnatas tu yogo ’sti na caikāntam anaśnataḥ |
na cātisvapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna
- न
- नहीं
- अत्यश्नतः
- बहुत खाने वाले का
- तु
- परन्तु
- योगः
- योग
- अस्ति
- होता है
- न
- न
- च
- और
- एकान्तम्
- सर्वथा
- अनश्नतः
- न खाने वाले का
- न
- न
- च
- और
- अतिस्वप्नशीलस्य
- बहुत सोने के स्वभाव वाले का
- जाग्रतः
- अधिक जागने वाले का
- न
- न
- एव
- ही
- च
- और
- अर्जुन
- हे अर्जुन
अन्वय: अर्जुन, अत्यश्नतः तु योगः न अस्ति, एकान्तम् अनश्नतः च न, अतिस्वप्नशीलस्य च न, जाग्रतः च न एव।
हे अर्जुन, बहुत खाने वाले का योग नहीं सिद्ध होता, और सर्वथा न खाने वाले का भी नहीं। बहुत सोने के स्वभाव वाले का भी नहीं, और अधिक जागने वाले का भी नहीं।
6.17युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥17॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu |
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā
- युक्ताहारविहारस्य
- नियमित आहार विहार वाले का
- युक्तचेष्टस्य
- नियमित चेष्टा वाले का
- कर्मसु
- कर्मों में
- युक्तस्वप्नावबोधस्य
- नियमित सोने जागने वाले का
- योगः
- योग
- भवति
- होता है
- दुःखहा
- दुःखों का नाश करने वाला
अन्वय: युक्ताहारविहारस्य कर्मसु युक्तचेष्टस्य युक्तस्वप्नावबोधस्य दुःखहा योगः भवति।
जिसका आहार और विहार नियमित है, कर्मों में जिसकी चेष्टा नियमित है, और जिसका सोना और जागना नियमित है, उसका योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
6.18यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥18॥
yadā viniyataṃ cittam ātmany evāvatiṣṭhate |
niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ity ucyate tadā
- यदा
- जब
- विनियतम्
- भली प्रकार वश में किया हुआ
- चित्तम्
- चित्त
- आत्मनि
- आत्मा में
- एव
- ही
- अवतिष्ठते
- स्थित हो जाता है
- निःस्पृहः
- स्पृहा रहित
- सर्वकामेभ्यः
- सब कामनाओं से
- युक्तः
- योगयुक्त
- इति
- ऐसा
- उच्यते
- कहा जाता है
- तदा
- तब
अन्वय: यदा विनियतम् चित्तम् आत्मनि एव अवतिष्ठते, तदा सर्वकामेभ्यः निःस्पृहः युक्तः इति उच्यते।
जब भली प्रकार वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है, तब सब कामनाओं से स्पृहा रहित हुआ वह पुरुष युक्त कहा जाता है।
6.19यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥19॥
yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā |
yogino yatacittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
- यथा
- जैसे
- दीपः
- दीपक
- निवातस्थः
- वायु रहित स्थान में रखा
- न
- नहीं
- इङ्गते
- चंचल होता
- सा
- वह
- उपमा
- उपमा
- स्मृता
- कही गई है
- योगिनः
- योगी के लिए
- यतचित्तस्य
- वश में किए चित्त वाले
- युञ्जतः
- अभ्यास करते हुए
- योगम्
- योग का
- आत्मनः
- आत्मा के
अन्वय: यथा निवातस्थः दीपः न इङ्गते, सा उपमा आत्मनः योगम् युञ्जतः यतचित्तस्य योगिनः स्मृता।
जैसे वायु रहित स्थान में रखा दीपक चंचल नहीं होता, वैसी ही उपमा आत्मा के योग का अभ्यास करते हुए वश में किए चित्त वाले योगी के लिए कही गई है।
6.20यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥20॥
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā |
yatra caivātmanātmānaṃ paśyann ātmani tuṣyati
- यत्र
- जिस अवस्था में
- उपरमते
- उपराम हो जाता है
- चित्तम्
- चित्त
- निरुद्धम्
- निरुद्ध हुआ
- योगसेवया
- योग के अभ्यास से
- यत्र
- जिसमें
- च
- और
- एव
- ही
- आत्मना
- शुद्ध बुद्धि से
- आत्मानम्
- आत्मा को
- पश्यन्
- देखता हुआ
- आत्मनि
- आत्मा में
- तुष्यति
- सन्तुष्ट होता है
अन्वय: यत्र योगसेवया निरुद्धम् चित्तम् उपरमते, यत्र च एव आत्मना आत्मानम् पश्यन् आत्मनि तुष्यति।
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त उपराम हो जाता है, और जिसमें योगी शुद्ध हुई बुद्धि से आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है,
6.21सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥21॥
sukham ātyantikaṃ yat tad buddhigrāhyam atīndriyam |
vetti yatra na caivāyaṃ sthitaś calati tattvataḥ
- सुखम्
- सुख
- आत्यन्तिकम्
- अनन्त, अत्यन्त
- यत्
- जो
- तत्
- वह
- बुद्धिग्राह्यम्
- बुद्धि से ग्रहण करने योग्य
- अतीन्द्रियम्
- इन्द्रियों से परे
- वेत्ति
- अनुभव करता है
- यत्र
- जिस अवस्था में
- न
- नहीं
- च
- और
- एव
- ही
- अयम्
- यह
- स्थितः
- स्थित हुआ
- चलति
- चलायमान होता
- तत्त्वतः
- तत्त्व से
अन्वय: यत् आत्यन्तिकम् बुद्धिग्राह्यम् अतीन्द्रियम् सुखम्, तत् यत्र वेत्ति, यत्र च स्थितः अयम् तत्त्वतः न एव चलति।
जिस अवस्था में योगी उस अनन्त सुख का अनुभव करता है जो इन्द्रियों से परे है और केवल बुद्धि से ग्रहण होता है, और जिसमें स्थित हुआ वह तत्त्व से कभी चलायमान नहीं होता,
6.22यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥22॥
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ |
yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate
- यम्
- जिसको
- लब्ध्वा
- प्राप्त करके
- च
- और
- अपरम्
- दूसरे
- लाभम्
- लाभ को
- मन्यते
- मानता
- न
- नहीं
- अधिकम्
- अधिक
- ततः
- उससे
- यस्मिन्
- जिसमें
- स्थितः
- स्थित हुआ
- न
- नहीं
- दुःखेन
- दुःख से
- गुरुणा
- भारी
- अपि
- भी
- विचाल्यते
- विचलित किया जाता
अन्वय: यम् च लब्ध्वा ततः अपरम् लाभम् अधिकम् न मन्यते, यस्मिन् स्थितः गुरुणा दुःखेन अपि न विचाल्यते।
जिसे पाकर वह किसी दूसरे लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं किया जा सकता,
6.23तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥23॥
taṃ vidyād duḥkhasaṃyogaviyogaṃ yogasaṃjñitam |
sa niścayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇacetasā
- तम्
- उसको
- विद्यात्
- जानना चाहिए
- दुःखसंयोगवियोगम्
- दुःख के संयोग से रहित
- योगसंज्ञितम्
- योग नाम वाला
- सः
- वह
- निश्चयेन
- निश्चय के साथ
- योक्तव्यः
- अभ्यास करने योग्य
- योगः
- योग
- अनिर्विण्णचेतसा
- न उकताए हुए चित्त से
अन्वय: तम् दुःखसंयोगवियोगम् योगसंज्ञितम् विद्यात्; सः योगः अनिर्विण्णचेतसा निश्चयेन योक्तव्यः।
उस अवस्था को, जिसमें दुःख के संयोग का वियोग हो जाता है, योग नाम से जानना चाहिए। उस योग का अभ्यास न उकताए हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए।
6.24संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥24॥
saṃkalpaprabhavān kāmāṃs tyaktvā sarvān aśeṣataḥ |
manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ
- संकल्पप्रभवान्
- संकल्प से उत्पन्न
- कामान्
- कामनाओं को
- त्यक्त्वा
- त्याग कर
- सर्वान्
- सब
- अशेषतः
- पूर्णतया
- मनसा
- मन से
- एव
- ही
- इन्द्रियग्रामम्
- इन्द्रियों के समूह को
- विनियम्य
- भली प्रकार वश में करके
- समन्ततः
- सब ओर से
अन्वय: संकल्पप्रभवान् सर्वान् कामान् अशेषतः त्यक्त्वा, मनसा एव इन्द्रियग्रामम् समन्ततः विनियम्य।
संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को पूर्णतया त्याग कर, और मन से ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से भली प्रकार वश में करके,
6.25शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किं चिदपि चिन्तयेत् ॥25॥
śanaiḥ śanair uparamed buddhyā dhṛtigṛhītayā |
ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiṃ cid api cintayet
- शनैः शनैः
- धीरे धीरे
- उपरमेत्
- उपराम हो
- बुद्ध्या
- बुद्धि से
- धृतिगृहीतया
- धैर्य से युक्त
- आत्मसंस्थम्
- आत्मा में स्थित
- मनः
- मन को
- कृत्वा
- करके
- न
- नहीं
- किञ्चित्
- कुछ
- अपि
- भी
- चिन्तयेत्
- चिन्तन करे
अन्वय: धृतिगृहीतया बुद्ध्या शनैः शनैः उपरमेत्; मनः आत्मसंस्थम् कृत्वा किञ्चित् अपि न चिन्तयेत्।
धैर्य से युक्त बुद्धि के द्वारा धीरे धीरे उपराम हो, और मन को आत्मा में स्थित करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।
6.26यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥26॥
yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram |
tatas tato niyamyaitad ātmany eva vaśaṃ nayet
- यतः यतः
- जहाँ जहाँ
- निश्चरति
- विचरता है
- मनः
- मन
- चञ्चलम्
- चंचल
- अस्थिरम्
- अस्थिर
- ततः ततः
- वहाँ वहाँ से
- नियम्य
- रोक कर
- एतत्
- इसको
- आत्मनि
- आत्मा में
- एव
- ही
- वशम्
- वश में
- नयेत्
- लाए
अन्वय: चञ्चलम् अस्थिरम् मनः यतः यतः निश्चरति, ततः ततः एतत् नियम्य आत्मनि एव वशम् नयेत्।
यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ जहाँ विचरता है, वहाँ वहाँ से इसे रोक कर आत्मा में ही वश में लाए।
6.27प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥27॥
praśāntamanasaṃ hy enaṃ yoginaṃ sukham uttamam |
upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtam akalmaṣam
- प्रशान्तमनसम्
- शान्त मन वाले
- हि
- क्योंकि
- एनम्
- इस
- योगिनम्
- योगी को
- सुखम्
- सुख
- उत्तमम्
- उत्तम
- उपैति
- प्राप्त होता है
- शान्तरजसम्
- जिसका रजोगुण शान्त हो गया
- ब्रह्मभूतम्
- ब्रह्मरूप हुए
- अकल्मषम्
- पाप रहित
अन्वय: हि प्रशान्तमनसम् शान्तरजसम् अकल्मषम् ब्रह्मभूतम् एनम् योगिनम् उत्तमम् सुखम् उपैति।
क्योंकि जिसका मन शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, जो पाप रहित है और ब्रह्मरूप हो गया है, ऐसे इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।
6.28युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥28॥
yuñjann evaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ |
sukhena brahmasaṃsparśam atyantaṃ sukham aśnute
- युञ्जन्
- लगाता हुआ
- एवम्
- इस प्रकार
- सदा
- सदा
- आत्मानम्
- मन को
- योगी
- योगी
- विगतकल्मषः
- पाप रहित
- सुखेन
- सुखपूर्वक
- ब्रह्मसंस्पर्शम्
- ब्रह्म के संस्पर्श रूप
- अत्यन्तम्
- अत्यन्त
- सुखम्
- सुख को
- अश्नुते
- भोगता है
अन्वय: एवम् सदा आत्मानम् युञ्जन् विगतकल्मषः योगी ब्रह्मसंस्पर्शम् अत्यन्तम् सुखम् सुखेन अश्नुते।
इस प्रकार सदा मन को लगाता हुआ पाप रहित योगी ब्रह्म के संस्पर्श रूप अत्यन्त सुख को सुखपूर्वक भोगता है।
6.29सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥29॥
sarvabhūtastham ātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ
- सर्वभूतस्थम्
- सब प्राणियों में स्थित
- आत्मानम्
- आत्मा को
- सर्वभूतानि
- सब प्राणियों को
- च
- और
- आत्मनि
- आत्मा में
- ईक्षते
- देखता है
- योगयुक्तात्मा
- योग से युक्त अन्तःकरण वाला
- सर्वत्र
- सब जगह
- समदर्शनः
- समान देखने वाला
अन्वय: योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः आत्मानम् सर्वभूतस्थम् सर्वभूतानि च आत्मनि ईक्षते।
योग से युक्त अन्तःकरण वाला और सब जगह समान देखने वाला योगी आत्मा को सब प्राणियों में स्थित और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है।
6.30यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥30॥
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati
- यः
- जो
- माम्
- मुझे
- पश्यति
- देखता है
- सर्वत्र
- सब जगह
- सर्वम्
- सब को
- च
- और
- मयि
- मुझमें
- पश्यति
- देखता है
- तस्य
- उसके लिए
- अहम्
- मैं
- न
- नहीं
- प्रणश्यामि
- अदृश्य होते हैं
- सः
- वह
- च
- और
- मे
- मेरा, मुझे
- न
- नहीं
- प्रणश्यति
- अदृश्य होता है
अन्वय: यः माम् सर्वत्र पश्यति, सर्वम् च मयि पश्यति, तस्य अहम् न प्रणश्यामि, सः च मे न प्रणश्यति।
जो मुझे सब जगह देखता है और सब को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।
6.31सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥31॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajaty ekatvam āsthitaḥ |
sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate
- सर्वभूतस्थितम्
- सब प्राणियों में स्थित
- यः
- जो
- माम्
- मुझे
- भजति
- भजता है
- एकत्वम्
- एकत्व में
- आस्थितः
- स्थित हुआ
- सर्वथा
- सब प्रकार से
- वर्तमानः
- बर्तता हुआ
- अपि
- भी
- सः
- वह
- योगी
- योगी
- मयि
- मुझमें
- वर्तते
- रहता है
अन्वय: यः एकत्वम् आस्थितः सर्वभूतस्थितम् माम् भजति, सः योगी सर्वथा वर्तमानः अपि मयि वर्तते।
जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझको भजता है, वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मुझमें ही रहता है।
6.32आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥32॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo ’rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ
- आत्मौपम्येन
- अपनी उपमा से
- सर्वत्र
- सब जगह
- समम्
- समान
- पश्यति
- देखता है
- यः
- जो
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- सुखम्
- सुख
- वा
- या
- यदि वा
- अथवा
- दुःखम्
- दुःख
- सः
- वह
- योगी
- योगी
- परमः
- परम श्रेष्ठ
- मतः
- माना गया है
अन्वय: अर्जुन, यः आत्मौपम्येन सर्वत्र सुखम् वा यदि वा दुःखम् समम् पश्यति, सः योगी परमः मतः।
हे अर्जुन, जो अपनी उपमा से सब जगह सुख हो या दुःख, सबको समान देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
6.33योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥33॥
yo ’yaṃ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana |
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām
- यः
- जो
- अयम्
- यह
- योगः
- योग
- त्वया
- आपके द्वारा
- प्रोक्तः
- कहा गया
- साम्येन
- समता के रूप में
- मधुसूदन
- हे मधुसूदन
- एतस्य
- इसकी
- अहम्
- हम
- न
- नहीं
- पश्यामि
- देखते हैं
- चञ्चलत्वात्
- मन की चंचलता के कारण
- स्थितिम्
- स्थिति
- स्थिराम्
- स्थिर
अन्वय: मधुसूदन, यः अयम् योगः त्वया साम्येन प्रोक्तः, एतस्य स्थिराम् स्थितिम् अहम् चञ्चलत्वात् न पश्यामि।
हे मधुसूदन, समता के रूप में आपने जो यह योग कहा है, मन की चंचलता के कारण हम इसकी स्थिर स्थिति नहीं देख पाते।
6.34चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥34॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham |
tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyor iva suduṣkaram
- चञ्चलम्
- चंचल
- हि
- क्योंकि
- मनः
- मन
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- प्रमाथि
- मथ देने वाला
- बलवत्
- बलवान
- दृढम्
- दृढ़
- तस्य
- उसका
- अहम्
- हम
- निग्रहम्
- निग्रह
- मन्ये
- मानते हैं
- वायोः
- वायु के
- इव
- समान
- सुदुष्करम्
- अत्यन्त कठिन
अन्वय: कृष्ण, हि मनः चञ्चलम् प्रमाथि बलवत् दृढम्; तस्य निग्रहम् अहम् वायोः इव सुदुष्करम् मन्ये।
हे कृष्ण, यह मन चंचल है, मथ देने वाला है, बलवान और दृढ़ है। इसका निग्रह हम वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन मानते हैं।
6.35असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥35॥
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate
- असंशयम्
- निःसन्देह
- महाबाहो
- हे महाबाहो
- मनः
- मन
- दुर्निग्रहम्
- कठिनता से वश में होने वाला
- चलम्
- चंचल
- अभ्यासेन
- अभ्यास से
- तु
- परन्तु
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- वैराग्येण
- वैराग्य से
- च
- और
- गृह्यते
- वश में होता है
अन्वय: महाबाहो, असंशयम् मनः चलम् दुर्निग्रहम्; कौन्तेय, तु अभ्यासेन वैराग्येण च गृह्यते।
हे महाबाहो, निःसन्देह मन चंचल है और कठिनता से वश में होता है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में हो जाता है।
6.36असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥36॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ |
vaśyātmanā tu yatatā śakyo ’vāptum upāyataḥ
- असंयतात्मना
- अवश मन वाले के द्वारा
- योगः
- योग
- दुष्प्रापः
- दुष्प्राप्य
- इति
- ऐसा
- मे
- मेरा, मुझे
- मतिः
- मत
- वश्यात्मना
- वश में किए मन वाले द्वारा
- तु
- परन्तु
- यतता
- यत्न करने वाले द्वारा
- शक्यः
- सम्भव है
- अवाप्तुम्
- प्राप्त करना
- उपायतः
- उपाय से
अन्वय: असंयतात्मना योगः दुष्प्रापः इति मे मतिः; वश्यात्मना तु यतता उपायतः अवाप्तुम् शक्यः।
जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसा मेरा मत है। परन्तु जिसका मन वश में है, ऐसे यत्नशील पुरुष के लिए उपाय द्वारा उसे प्राप्त करना सम्भव है।
6.37अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥37॥
ayatiḥ śraddhayopeto yogāc calitamānasaḥ |
aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati
- अयतिः
- यत्न में शिथिल
- श्रद्धया
- श्रद्धा से
- उपेतः
- युक्त
- योगात्
- योग से
- चलितमानसः
- विचलित मन वाला
- अप्राप्य
- न पाकर
- योगसंसिद्धिम्
- योग की पूर्ण सिद्धि को
- काम्
- किस
- गतिम्
- गति को
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- गच्छति
- प्राप्त होता है
अन्वय: कृष्ण, श्रद्धया उपेतः अयतिः योगात् चलितमानसः योगसंसिद्धिम् अप्राप्य काम् गतिम् गच्छति?
हे कृष्ण, जो श्रद्धा से युक्त है, यत्न में शिथिल है, और जिसका मन योग से विचलित हो गया है, वह योग की पूर्ण सिद्धि को न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
6.38कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥38॥
kaccin nobhayavibhraṣṭaś chinnābhram iva naśyati |
apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi
- कच्चित्
- क्या
- न
- नहीं
- उभयविभ्रष्टः
- दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ
- छिन्नाभ्रम्
- छिन्न हुए बादल के
- इव
- समान
- नश्यति
- नष्ट हो जाता है
- अप्रतिष्ठः
- आश्रय रहित
- महाबाहो
- हे महाबाहो
- विमूढः
- मोहित हुआ
- ब्रह्मणः
- ब्रह्म के
- पथि
- मार्ग में
अन्वय: महाबाहो, ब्रह्मणः पथि विमूढः अप्रतिष्ठः उभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रम् इव कच्चित् न नश्यति?
हे महाबाहो, ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ, आश्रय रहित और दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ वह पुरुष क्या छिन्न हुए बादल की भाँति नष्ट तो नहीं हो जाता?
6.39एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥39॥
etan me saṃśayaṃ kṛṣṇa chettum arhasy aśeṣataḥ |
tvad anyaḥ saṃśayasyāsya chettā na hy upapadyate
- एतत्
- इस
- मे
- हमारे
- संशयम्
- संशय को
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- छेत्तुम्
- छेदन करने में
- अर्हसि
- समर्थ हैं
- अशेषतः
- पूर्णतया
- त्वत्
- आपसे
- अन्यः
- दूसरा
- संशयस्य
- संशय का
- अस्य
- इस
- छेत्ता
- छेदन करने वाला
- न
- नहीं
- हि
- क्योंकि
- उपपद्यते
- मिल सकता
अन्वय: कृष्ण, मे एतत् संशयम् अशेषतः छेत्तुम् अर्हसि; हि अस्य संशयस्य त्वत् अन्यः छेत्ता न उपपद्यते।
हे कृष्ण, हमारे इस संशय को पूर्णतया छेदन करने में आप ही समर्थ हैं। क्योंकि इस संशय का छेदन करने वाला आपके सिवा दूसरा कोई मिल नहीं सकता।
6.40पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥40॥
pārtha naiveha nāmutra vināśas tasya vidyate |
na hi kalyāṇakṛt kaś cid durgatiṃ tāta gacchati
- पार्थ
- हे पार्थ
- न
- नहीं
- एव
- ही
- इह
- इस लोक में
- न
- न
- अमुत्र
- परलोक में
- विनाशः
- विनाश
- तस्य
- उसका
- विद्यते
- होता है
- न
- नहीं
- हि
- क्योंकि
- कल्याणकृत्
- शुभ कर्म करने वाला
- कश्चित्
- कोई भी
- दुर्गतिम्
- दुर्गति को
- तात
- हे प्यारे
- गच्छति
- जाता है
अन्वय: पार्थ, तस्य इह न एव, अमुत्र न विनाशः विद्यते; हि तात, कश्चित् कल्याणकृत् दुर्गतिम् न गच्छति।
हे पार्थ, उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में विनाश होता है। क्योंकि हे प्यारे, शुभ कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं जाता।
6.41प्राप्य पुण्यकृतांल्लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः
प्राप्य पुण्यकृतांल्लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥41॥
prāpya puṇyakṛtāṃl lokān uṣitvā śāśvatīḥ samāḥ |
śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo ’bhijāyate
- प्राप्य
- प्राप्त करके
- पुण्यकृताम्
- पुण्य करने वालों के
- लोकान्
- लोकों को
- उषित्वा
- निवास करके
- शाश्वतीः
- बहुत
- समाः
- वर्षों तक
- शुचीनाम्
- शुद्ध आचरण वाले
- श्रीमताम्
- श्रीमानों के
- गेहे
- घर में
- योगभ्रष्टः
- योग से भ्रष्ट हुआ
- अभिजायते
- जन्म लेता है
अन्वय: योगभ्रष्टः पुण्यकृताम् लोकान् प्राप्य शाश्वतीः समाः उषित्वा शुचीनाम् श्रीमताम् गेहे अभिजायते।
योग से भ्रष्ट हुआ पुरुष पुण्य करने वालों के लोकों को प्राप्त करके वहाँ बहुत वर्षों तक निवास करता है, फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमानों के घर में जन्म लेता है।
6.42अथ वा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्
अथ वा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥42॥
atha vā yoginām eva kule bhavati dhīmatām |
etad dhi durlabhataraṃ loke janma yad īdṛśam
- अथ वा
- अथवा
- योगिनाम्
- योगियों के
- एव
- ही
- कुले
- कुल में
- भवति
- जन्म लेता है
- धीमताम्
- ज्ञानवान
- एतत्
- यह
- हि
- निश्चय ही
- दुर्लभतरम्
- अत्यन्त दुर्लभ
- लोके
- संसार में
- जन्म
- जन्म
- यत्
- जो
- ईदृशम्
- ऐसा
अन्वय: अथ वा धीमताम् योगिनाम् एव कुले भवति; यत् ईदृशम् जन्म, एतत् हि लोके दुर्लभतरम्।
अथवा वह ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। इस प्रकार का जो जन्म है, वह संसार में निश्चय ही अत्यन्त दुर्लभ है।
6.43तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥43॥
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam |
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana
- तत्र
- वहाँ
- तम्
- उस
- बुद्धिसंयोगम्
- बुद्धि के संयोग को
- लभते
- प्राप्त करता है
- पौर्वदेहिकम्
- पूर्व शरीर में संचित
- यतते
- यत्न करता है
- च
- और
- ततः
- उससे
- भूयः
- फिर अधिक
- संसिद्धौ
- पूर्ण सिद्धि के लिए
- कुरुनन्दन
- हे कुरुनन्दन
अन्वय: कुरुनन्दन, तत्र तम् पौर्वदेहिकम् बुद्धिसंयोगम् लभते, ततः च संसिद्धौ भूयः यतते।
हे कुरुनन्दन, वहाँ वह पूर्व शरीर में संचित उस बुद्धि के संयोग को फिर से प्राप्त कर लेता है, और उसके बल पर पूर्ण सिद्धि के लिए फिर अधिक यत्न करता है।
6.44पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥44॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hy avaśo ’pi saḥ |
jijñāsur api yogasya śabdabrahmātivartate
- पूर्वाभ्यासेन
- पूर्व जन्म के अभ्यास से
- तेन
- उस
- एव
- ही
- ह्रियते
- खींचा जाता है
- हि
- निश्चय ही
- अवशः
- विवश
- अपि
- भी
- सः
- वह
- जिज्ञासुः
- जिज्ञासु
- अपि
- भी
- योगस्य
- योग का
- शब्दब्रह्म
- वेदोक्त सकाम कर्मों के फल को
- अतिवर्तते
- लाँघ जाता है
अन्वय: हि सः अवशः अपि तेन एव पूर्वाभ्यासेन ह्रियते; योगस्य जिज्ञासुः अपि शब्दब्रह्म अतिवर्तते।
वह विवश होकर भी उसी पूर्व जन्म के अभ्यास से खींचा जाता है। योग का जिज्ञासु मात्र होने पर भी वह शब्दब्रह्म को लाँघ जाता है।
6.45प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥45॥
prayatnād yatamānas tu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ |
anekajanmasaṃsiddhas tato yāti parāṃ gatim
- प्रयत्नात्
- प्रयत्नपूर्वक
- यतमानः
- यत्न करता हुआ
- तु
- परन्तु
- योगी
- योगी
- संशुद्धकिल्बिषः
- पापों से भली प्रकार शुद्ध हुआ
- अनेकजन्मसंसिद्धः
- अनेक जन्मों से सिद्ध हुआ
- ततः
- तब
- याति
- प्राप्त होता है
- पराम्
- परम
- गतिम्
- गति को
अन्वय: प्रयत्नात् यतमानः तु योगी संशुद्धकिल्बिषः अनेकजन्मसंसिद्धः ततः पराम् गतिम् याति।
परन्तु प्रयत्नपूर्वक यत्न करने वाला योगी पापों से भली प्रकार शुद्ध होकर अनेक जन्मों में सिद्ध हुआ, तब परम गति को प्राप्त होता है।
6.46तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥46॥
tapasvibhyo ’dhiko yogī jñānibhyo ’pi mato ’dhikaḥ |
karmibhyaś cādhiko yogī tasmād yogī bhavārjuna
- तपस्विभ्यः
- तपस्वियों से
- अधिकः
- श्रेष्ठ
- योगी
- योगी
- ज्ञानिभ्यः
- ज्ञानियों से
- अपि
- भी
- मतः
- माना गया है
- अधिकः
- श्रेष्ठ
- कर्मिभ्यः
- कर्म करने वालों से
- च
- और
- अधिकः
- श्रेष्ठ
- योगी
- योगी
- तस्मात्
- इसलिए
- योगी
- योगी
- भव
- हो जाइए
- अर्जुन
- हे अर्जुन
अन्वय: योगी तपस्विभ्यः अधिकः, ज्ञानिभ्यः अपि अधिकः मतः, कर्मिभ्यः च योगी अधिकः; तस्मात् अर्जुन, योगी भव।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन, आप योगी हो जाइए।
6.47योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥47॥
yoginām api sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā |
śraddhāvān bhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ
- योगिनाम्
- योगियों में
- अपि
- भी
- सर्वेषाम्
- सब
- मद्गतेन
- हममें लगे हुए
- अन्तरात्मना
- अन्तरात्मा से
- श्रद्धावान्
- श्रद्धावान
- भजते
- भजता है
- यः
- जो
- माम्
- मुझे
- सः
- वह
- मे
- मेरा, मुझे
- युक्ततमः
- सबसे श्रेष्ठ योगी
- मतः
- माना गया है
अन्वय: सर्वेषाम् योगिनाम् अपि यः श्रद्धावान् मद्गतेन अन्तरात्मना माम् भजते, सः मे युक्ततमः मतः।
सब योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको भजता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी है।