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अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग

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अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग

कुरुक्षेत्र की धूल अभी बैठी नहीं थी। दोनों सेनाओं के बीच खड़ा वह रथ जैसे समय की धारा से बाहर आकर ठहर गया हो। अर्जुन का गाण्डीव हाथ में था, मगर मन कहीं और अटका था। और सारथी के भेस में बैठे कृष्ण ने बात को एक नया मोड़ दिया। अब तक कर्म की चर्चा थी, अब ज्ञान की बारी थी। यह चौथा अध्याय उसी ज्ञान का है, जो उतरता कैसे है और मिलता किसे है।

पुरानी विद्या, फिर से

कृष्ण ने कहा, हे पार्थ, यह जो योग हम आपको सुना रहे हैं, यह कोई नयी बात नहीं। सृष्टि के आरम्भ में हमने यही विद्या सूर्य को दी थी। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को दी, और मनु ने इक्ष्वाकु को। इसी क्रम से राजा भी ऋषि थे, और ऋषियों जैसा राज करते थे। मगर लम्बे समय की धारा में यह विद्या कहीं खो गयी। आज वही पुरानी विद्या हम फिर से आपको दे रहे हैं, क्योंकि आप हमारे भक्त हैं और हमारे मित्र भी।

अर्जुन को यह सुनकर एक सहज उलझन हुई। उन्होंने पूछा, हे केशव, आपका जन्म तो अभी हुआ, और सूर्य तो युगों पहले के हैं। यह हम कैसे मानें कि आपने आरम्भ में सूर्य को यह ज्ञान दिया?

अवतार का रहस्य

कृष्ण मुस्कुराए। यहीं उन्होंने वह बात कही जो आगे चलकर करोड़ों होंठों पर बसने वाली थी। बोले, हे अर्जुन, हमारे और आपके अनेक जन्म बीत चुके हैं। अन्तर बस इतना है कि आपको उनकी याद नहीं, और हमें सब याद है। हम अजन्मा हैं, अविनाशी हैं, फिर भी अपनी माया से देह धारण करके प्रकट होते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर उठाता है, तब-तब हम स्वयं को प्रकट करते हैं। साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के नाश के लिए, और धर्म को फिर से खड़ा करने के लिए, हम युग-युग में जन्म लेते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.7, 4.8

यही अवतार का सिद्धान्त है, जो यहाँ पहली बार इतने साफ़ शब्दों में खुलता है। हर युग में जब सचाई डगमगाती है, तब वह परम अपना कोई रूप गढ़कर उतर आता है, संतुलन लौटाने। “युग-युग में जन्म लेते हैं” का यह नाद आज भी मंदिरों की घंटियों के साथ गूँजता है। और कृष्ण ने साथ ही जोड़ा, जो हमारे इस जन्म और कर्म के दिव्य भेद को सच में जान लेता है, वह देह छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, हमीं में समा जाता है।

हर राह इसी ओर

फिर कृष्ण ने एक बहुत उदार बात कही। बोले, जो जिस भाव से हमारी शरण में आता है, हम उसे उसी भाव से अपना लेते हैं। कोई किसी भी राह पर चले, अंत में सब राहें हम तक ही आती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समाज के चार वर्ण गुण और कर्म के अनुसार ही बने, और उनका रचयिता होते हुए भी वे स्वयं अकर्ता ही हैं, क्योंकि किसी फल की चाह उन्हें छूती नहीं। यही कर्म का पहला सूत्र था, कि काम करते हुए भी भीतर से अछूता रहा जा सकता है।

कर्म, अकर्म और विकर्म

अब कृष्ण ने कर्म की सबसे बारीक गुत्थी खोली। तीन शब्द रखे सामने। कर्म, यानी उचित काम। अकर्म, यानी काम का न होना, या भीतर से निष्काम बने रहना। और विकर्म, यानी दूषित, टेढ़ा काम। बोले, यहाँ बड़े-बड़े भी उलझ जाते हैं, क्योंकि कर्म की गति गहरी है।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

जो कर्म में अकर्म देख लेता है और अकर्म में कर्म, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योग से जुड़ा है, वही सारा कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.18

बात बारीक है। कोई ऊपर से दिन-रात काम करता दिखे, मगर भीतर शान्त और निष्काम हो, तो वह असल में अकर्म में ठहरा है। और कोई हाथ पर हाथ धरे बैठा हो, मगर भीतर इच्छाओं की आँधी चल रही हो, तो वह असल में कर्म ही कर रहा है। असली भेद हाथ के हिलने में नहीं, मन के थमने में है।

ज्ञान की अग्नि

अंत में कृष्ण यज्ञ पर आए। बोले, यज्ञ कई तरह के हैं। कोई द्रव्य चढ़ाकर यज्ञ करता है, कोई तप से, कोई श्वास के संयम से, कोई इन्द्रियों को साधकर। मगर सबसे ऊँचा यज्ञ द्रव्य का नहीं, ज्ञान का है। जैसे धधकती आग लकड़ी के ढेर को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को जला डालती है। यह भीतर का यज्ञ है, और बाहर के हर यज्ञ से ऊपर।

फिर उन्होंने अर्जुन को वह सूत्र दिया जो हर शिष्य के लिए है। यह ज्ञान मिलता कैसे है?

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

इसे विनम्र प्रणाम से जानिए, सच्चे प्रश्न से जानिए, और सेवा से जानिए। जिन्होंने तत्त्व को अपनी आँखों देखा है, वे ज्ञानी आपको यह ज्ञान देंगे।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.34

तीन बातें, झुकना, सही सवाल, और सेवा। इन तीनों के बिना ज्ञान न आता है, न टिकता है। और जिसे यह ज्ञान मिल गया, कृष्ण ने कहा, वह फिर कभी मोह में नहीं भटकता, क्योंकि इसी ज्ञान की नाव पर बैठकर बड़े से बड़ा पापी भी संसार के समुद्र को पार कर जाता है।

इस अध्याय का सार एक साँस में यही है। यह ज्ञान बहुत पुराना है, बार-बार खोता है और बार-बार लौटता है। इसे पाने की राह कोई जादू नहीं, बस विनम्रता, सच्चा प्रश्न, और सेवा। जिसने भीतर की यह आग जला ली, उसके सारे संशय राख हो जाते हैं, और वह अपने ही भीतर एक गहरी शान्ति में ठहर जाता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 42 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/4/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

4.1इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्

श्रीभगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥1॥

imaṃ vivasvate yogaṃ proktavān aham avyayam |
vivasvān manave prāha manur ikṣvākave ’bravīt

इमम्
इस
विवस्वते
विवस्वान् (सूर्य) से
योगम्
योग को
प्रोक्तवान्
कहा था
अहम्
मैंने
अव्ययम्
अविनाशी
विवस्वान्
सूर्य ने
मनवे
मनु से
प्राह
कहा
मनुः
मनु ने
इक्ष्वाकवे
इक्ष्वाकु से
अब्रवीत्
कहा

अन्वय: अहम् इमम् अव्ययम् योगम् विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् मनवे प्राह। मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत्।

मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् सूर्य से कहा था। सूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।

4.2एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः

एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥2॥

evaṃ paraṃparāprāptam imaṃ rājarṣayo viduḥ |
sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ paraṃtapa

एवम्
इस प्रकार
परंपराप्राप्तम्
परंपरा से प्राप्त
इमम्
इस (योग) को
राजर्षयः
राजर्षियों ने
विदुः
जाना
सः
वह
कालेन
काल से
इह
यहाँ (इस लोक में)
महता
बहुत (लंबे)
योगः
योग
नष्टः
लुप्त हो गया
परंतप
हे परंतप

अन्वय: परंतप, एवम् परंपराप्राप्तम् इमम् (योगम्) राजर्षयः विदुः। सः योगः इह महता कालेन नष्टः।

हे परंतप, इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। बहुत काल बीतने से वह योग इस लोक में लुप्त हो गया।

4.3स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥3॥

sa evāyaṃ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ |
bhakto ’si me sakhā ceti rahasyaṃ hy etad uttamam

सः
वह
एव
ही
अयम्
यह
मया
मेरे द्वारा
ते
आपको
अद्य
आज
योगः
योग
प्रोक्तः
कहा गया
पुरातनः
पुरातन
भक्तः
भक्त
असि
हैं
मे
मेरे
सखा
सखा
च
और
इति
इसलिए
रहस्यम्
रहस्य
हि
क्योंकि
एतत्
यह
उत्तमम्
उत्तम

अन्वय: सः एव अयम् पुरातनः योगः अद्य मया ते प्रोक्तः, (यतः त्वम्) मे भक्तः सखा च असि इति। हि एतत् उत्तमम् रहस्यम्।

वही यह पुरातन योग आज मैंने आपसे कहा है, क्योंकि आप मेरे भक्त और सखा हैं। यह रहस्य अत्यंत उत्तम है।

4.4अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः

अर्जुन उवाच

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥4॥

aparaṃ bhavato janma paraṃ janma vivasvataḥ |
katham etad vijānīyāṃ tvam ādau proktavān iti

अपरम्
बाद का (अभी का)
भवतः
आपका
जन्म
जन्म
परम्
पहले का
जन्म
जन्म
विवस्वतः
विवस्वान् का
कथम्
कैसे
एतत्
यह
विजानीयाम्
मैं जानूँ
त्वम्
आपने
आदौ
आदि में
प्रोक्तवान्
कहा था
इति
ऐसा

अन्वय: भवतः जन्म अपरम्, विवस्वतः जन्म परम्। त्वम् आदौ (एतम् योगम्) प्रोक्तवान् इति एतत् कथम् विजानीयाम्?

आपका जन्म तो अभी का है और विवस्वान् सूर्य का जन्म बहुत पहले का है। फिर मैं कैसे समझूँ कि आपने ही आदि में यह योग कहा था?

4.5बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन

श्रीभगवानुवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥5॥

bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna |
tāny ahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha paraṃtapa

बहूनि
बहुत से
मे
मेरे
व्यतीतानि
बीत चुके
जन्मानि
जन्म
तव
आपके
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन
तानि
उन
अहम्
मैं
वेद
जानता हूँ
सर्वाणि
सबको
न
नहीं
त्वम्
आप
वेत्थ
जानते
परंतप
हे परंतप

अन्वय: अर्जुन, मे तव च बहूनि जन्मानि व्यतीतानि। परंतप, तानि सर्वाणि अहम् वेद, त्वम् न वेत्थ।

हे अर्जुन, मेरे और आपके बहुत से जन्म बीत चुके हैं। हे परंतप, उन सबको मैं जानता हूँ, आप नहीं जानते।

4.6अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥6॥

ajo ’pi sann avyayātmā bhūtānām īśvaro ’pi san |
prakṛtiṃ svām adhiṣṭhāya saṃbhavāmy ātmamāyayā

अजः
अजन्मा
अपि
भी
सन्
होते हुए
अव्ययात्मा
अविनाशी स्वरूप वाला
भूतानाम्
प्राणियों का
ईश्वरः
ईश्वर
अपि
भी
सन्
होते हुए
प्रकृतिम्
प्रकृति को
स्वाम्
अपनी
अधिष्ठाय
अधीन करके
संभवामि
प्रकट होता हूँ
आत्ममायया
अपनी माया से

अन्वय: अजः अव्ययात्मा अपि सन्, भूतानाम् ईश्वरः अपि सन्, (अहम्) स्वाम् प्रकृतिम् अधिष्ठाय आत्ममायया संभवामि।

अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, और समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

4.7यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥7॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata |
abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham

यदा यदा
जब जब
हि
निश्चय ही
धर्मस्य
धर्म की
ग्लानिः
हानि
भवति
होती है
भारत
हे भारत
अभ्युत्थानम्
वृद्धि
अधर्मस्य
अधर्म की
तदा
तब
आत्मानम्
अपने रूप को
सृजामि
रचता हूँ
अहम्
मैं

अन्वय: भारत, यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः अधर्मस्य अभ्युत्थानम् (च) भवति, तदा अहम् आत्मानम् सृजामि।

हे भारत, जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं अपने रूप को रचता हूँ।

4.8परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥8॥

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām |
dharmasaṃsthāpanārthāya saṃbhavāmi yuge yuge

परित्राणाय
रक्षा के लिए
साधूनाम्
साधु पुरुषों की
विनाशाय
विनाश के लिए
च
और
दुष्कृताम्
दुष्कर्म करने वालों के
धर्मसंस्थापनार्थाय
धर्म की भली प्रकार स्थापना के लिए
संभवामि
प्रकट होता हूँ
युगे युगे
युग युग में

अन्वय: साधूनाम् परित्राणाय, दुष्कृताम् विनाशाय, धर्मसंस्थापनार्थाय च (अहम्) युगे युगे संभवामि।

साधु पुरुषों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की भली प्रकार स्थापना के लिए मैं युग युग में प्रकट होता हूँ।

4.9जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥9॥

janma karma ca me divyam evaṃ yo vetti tattvataḥ |
tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti mām eti so ’rjuna

जन्म
जन्म
कर्म
कर्म
च
और
मे
मेरे
दिव्यम्
दिव्य
एवम्
इस प्रकार
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्त्व से
त्यक्त्वा
त्याग कर
देहम्
शरीर को
पुनर्जन्म
फिर जन्म को
न
नहीं
एति
पाता
माम्
मुझे
एति
प्राप्त होता है
सः
वह
अर्जुन
हे अर्जुन

अन्वय: अर्जुन, यः मे दिव्यम् जन्म कर्म च एवम् तत्त्वतः वेत्ति, सः देहम् त्यक्त्वा पुनर्जन्म न एति, माम् एति।

हे अर्जुन, जो मेरे दिव्य जन्म और कर्म को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्याग कर फिर जन्म नहीं पाता। वह मुझे ही प्राप्त होता है।

4.10वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥10॥

vītarāgabhayakrodhā manmayā mām upāśritāḥ |
bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvam āgatāḥ

वीतरागभयक्रोधाः
राग, भय और क्रोध से रहित
मन्मयाः
मुझमें तन्मय
माम्
मेरे
उपाश्रिताः
आश्रित
बहवः
बहुत लोग
ज्ञानतपसा
ज्ञानरूप तप से
पूताः
पवित्र होकर
मद्भावम्
मेरे स्वरूप को
आगताः
प्राप्त हो गए

अन्वय: वीतरागभयक्रोधाः मन्मयाः माम् उपाश्रिताः बहवः ज्ञानतपसा पूताः मद्भावम् आगताः।

राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय और मेरे आश्रित बहुत से लोग ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गए हैं।

4.11ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥11॥

ye yathā māṃ prapadyante tāṃs tathaiva bhajāmy aham |
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ

ये
जो
यथा
जिस प्रकार
माम्
मुझे
प्रपद्यन्ते
भजते हैं
तान्
उन्हें
तथा
उसी प्रकार
एव
ही
भजामि
भजता हूँ
अहम्
मैं
मम
मेरे
वर्त्म
मार्ग का
अनुवर्तन्ते
अनुसरण करते हैं
मनुष्याः
मनुष्य
पार्थ
हे पार्थ
सर्वशः
सब प्रकार से

अन्वय: ये माम् यथा प्रपद्यन्ते, तान् अहम् तथा एव भजामि। पार्थ, मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते।

जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार भजता हूँ। हे पार्थ, सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

4.12काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥12॥

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ |
kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhir bhavati karmajā

काङ्क्षन्तः
चाहते हुए
कर्मणाम्
कर्मों की
सिद्धिम्
सिद्धि को
यजन्ते
पूजते हैं
इह
इस लोक में
देवताः
देवताओं को
क्षिप्रम्
शीघ्र
हि
क्योंकि
मानुषे
मनुष्य
लोके
लोक में
सिद्धिः
सिद्धि
भवति
होती है
कर्मजा
कर्म से उत्पन्न

अन्वय: इह कर्मणाम् सिद्धिम् काङ्क्षन्तः देवताः यजन्ते, हि मानुषे लोके कर्मजा सिद्धिः क्षिप्रम् भवति।

इस लोक में कर्मों की सिद्धि चाहने वाले लोग देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्म से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।

4.13चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥13॥

cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ |
tasya kartāram api māṃ viddhy akartāram avyayam

चातुर्वर्ण्यम्
चार वर्णों का समूह
मया
मेरे द्वारा
सृष्टम्
रचा गया
गुणकर्मविभागशः
गुण और कर्म के विभाग से
तस्य
उसका
कर्तारम्
कर्ता
अपि
भी
माम्
मुझे
विद्धि
जानिए
अकर्तारम्
अकर्ता
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यम् मया सृष्टम्। तस्य कर्तारम् अपि माम् अव्ययम् अकर्तारम् विद्धि।

गुण और कर्म के विभाग के अनुसार चारों वर्णों की रचना मैंने की है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझ अविनाशी को आप अकर्ता ही जानिए।

4.14न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥14॥

na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā |
iti māṃ yo ’bhijānāti karmabhir na sa badhyate

न
नहीं
माम्
मुझे
कर्माणि
कर्म
लिम्पन्ति
लिप्त करते
न
नहीं
मे
मेरी
कर्मफले
कर्मफल में
स्पृहा
चाह
इति
इस प्रकार
माम्
मुझे
यः
जो
अभिजानाति
तत्त्व से जानता है
कर्मभिः
कर्मों से
न
नहीं
सः
वह
बध्यते
बँधता

अन्वय: कर्माणि माम् न लिम्पन्ति, मे कर्मफले स्पृहा न (अस्ति)। इति यः माम् अभिजानाति, सः कर्मभिः न बध्यते।

कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और कर्मफल में मेरी कोई चाह नहीं है। जो मुझे इस प्रकार तत्त्व से जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।

4.15एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥15॥

evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvair api mumukṣubhiḥ |
kuru karmaiva tasmāt tvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam

एवम्
इस प्रकार
ज्ञात्वा
जानकर
कृतम्
किया गया
कर्म
कर्म
पूर्वैः
पूर्वजों द्वारा
अपि
भी
मुमुक्षुभिः
मोक्ष चाहने वालों द्वारा
कुरु
कीजिए
कर्म
कर्म
एव
ही
तस्मात्
इसलिए
त्वम्
आप
पूर्वैः
पूर्वजों द्वारा
पूर्वतरम्
बहुत पहले से
कृतम्
किया गया

अन्वय: एवम् ज्ञात्वा पूर्वैः मुमुक्षुभिः अपि कर्म कृतम्। तस्मात् त्वम् पूर्वैः पूर्वतरम् कृतम् कर्म एव कुरु।

इस प्रकार जानकर पहले के मुमुक्षुओं ने भी कर्म किया है। इसलिए आप भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए गए कर्म को ही कीजिए।

4.16किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥16॥

kiṃ karma kim akarmeti kavayo ’py atra mohitāḥ |
tat te karma pravakṣyāmi yaj jñātvā mokṣyase ’śubhāt

किम्
क्या
कर्म
कर्म
किम्
क्या
अकर्म
अकर्म
इति
इस विषय में
कवयः
बुद्धिमान लोग
अपि
भी
अत्र
यहाँ
मोहिताः
मोहित हैं
तत्
वह
ते
आपको
कर्म
कर्म
प्रवक्ष्यामि
भली प्रकार कहूँगा
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
मुक्त हो जाएँगे
अशुभात्
अशुभ से

अन्वय: किम् कर्म किम् अकर्म इति अत्र कवयः अपि मोहिताः। तत् कर्म ते प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा अशुभात् मोक्ष्यसे।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। वह कर्म मैं आपको भली प्रकार बताऊँगा, जिसे जानकर आप अशुभ से मुक्त हो जाएँगे।

4.17कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥17॥

karmaṇo hy api boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ |
akarmaṇaś ca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ

कर्मणः
कर्म का (स्वरूप)
हि
क्योंकि
अपि
भी
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
च
और
विकर्मणः
विकर्म का
अकर्मणः
अकर्म का
च
और
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
गहना
गहन
कर्मणः
कर्म की
गतिः
गति

अन्वय: हि कर्मणः अपि बोद्धव्यम्, विकर्मणः च बोद्धव्यम्, अकर्मणः च बोद्धव्यम्। कर्मणः गतिः गहना।

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है।

4.18कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥18॥

karmaṇy akarma yaḥ paśyed akarmaṇi ca karma yaḥ |
sa buddhimān manuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt

कर्मणि
कर्म में
अकर्म
अकर्म
यः
जो
पश्येत्
देखे
अकर्मणि
अकर्म में
च
और
कर्म
कर्म
यः
जो
सः
वह
बुद्धिमान्
बुद्धिमान
मनुष्येषु
मनुष्यों में
सः
वह
युक्तः
योगी
कृत्स्नकर्मकृत्
सब कर्मों का करने वाला

अन्वय: यः कर्मणि अकर्म पश्येत्, यः च अकर्मणि कर्म (पश्येत्), सः मनुष्येषु बुद्धिमान्, सः युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।

जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वही योगी है और सब कर्मों का करने वाला है।

4.19यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥19॥

yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṃkalpavarjitāḥ |
jñānāgnidagdhakarmāṇaṃ tam āhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ

यस्य
जिसके
सर्वे
सब
समारम्भाः
कर्म
कामसंकल्पवर्जिताः
कामना और संकल्प से रहित
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्
ज्ञानरूप अग्नि से भस्म हुए कर्मों वाले को
तम्
उसको
आहुः
कहते हैं
पण्डितम्
पंडित
बुधाः
ज्ञानी लोग

अन्वय: यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः, तम् ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् बुधाः पण्डितम् आहुः।

जिसके सब कर्म कामना और संकल्प से रहित हैं और जिसके कर्म ज्ञानरूप अग्नि से भस्म हो गए हैं, उसे ज्ञानी लोग पंडित कहते हैं।

4.20त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किं चित्करोति सः ॥20॥

tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ |
karmaṇy abhipravṛtto ’pi naiva kiṃ cit karoti saḥ

त्यक्त्वा
त्याग कर
कर्मफलासङ्गम्
कर्मफल की आसक्ति को
नित्यतृप्तः
सदा तृप्त
निराश्रयः
आश्रय रहित
कर्मणि
कर्म में
अभिप्रवृत्तः
भली प्रकार लगा हुआ
अपि
भी
न
नहीं
एव
ही
किंचित्
कुछ भी
करोति
करता
सः
वह

अन्वय: कर्मफलासङ्गम् त्यक्त्वा नित्यतृप्तः निराश्रयः सः कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि किंचित् न एव करोति।

कर्मफल की आसक्ति त्याग कर जो सदा तृप्त और आश्रय से रहित है, वह कर्म में भली प्रकार लगा हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

4.21निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥21॥

nirāśīr yatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ |
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam

निराशीः
आशा रहित
यतचित्तात्मा
जिसका चित्त और शरीर वश में है
त्यक्तसर्वपरिग्रहः
सब संग्रह का त्याग करने वाला
शारीरम्
शरीर संबंधी
केवलम्
केवल
कर्म
कर्म
कुर्वन्
करता हुआ
न
नहीं
आप्नोति
पाता
किल्बिषम्
पाप को

अन्वय: निराशीः यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः केवलम् शारीरम् कर्म कुर्वन् किल्बिषम् न आप्नोति।

जिसने आशा छोड़ दी है, जिसका चित्त और शरीर वश में है और जिसने सब संग्रह त्याग दिया है, वह केवल शरीर संबंधी कर्म करता हुआ पाप को नहीं पाता।

4.22यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥22॥

yadṛcchālābhasaṃtuṣṭo dvaṃdvātīto vimatsaraḥ |
samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate

यदृच्छालाभसंतुष्टः
अपने आप मिले लाभ में संतुष्ट
द्वंद्वातीतः
द्वंद्वों से परे
विमत्सरः
ईर्ष्या रहित
समः
समान
सिद्धौ
सिद्धि में
असिद्धौ
असिद्धि में
च
और
कृत्वा
कर्म करके
अपि
भी
न
नहीं
निबध्यते
बँधता

अन्वय: यदृच्छालाभसंतुष्टः द्वंद्वातीतः विमत्सरः सिद्धौ असिद्धौ च समः (सः) कृत्वा अपि न निबध्यते।

जो अपने आप मिल जाने वाले लाभ में संतुष्ट है, द्वंद्वों से परे और ईर्ष्या से रहित है, तथा सिद्धि और असिद्धि में समान है, वह कर्म करके भी नहीं बँधता।

4.23गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥23॥

gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ |
yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyate

गतसङ्गस्य
आसक्ति रहित
मुक्तस्य
मुक्त पुरुष का
ज्ञानावस्थितचेतसः
ज्ञान में स्थित चित्त वाले का
यज्ञाय
यज्ञ के लिए
आचरतः
आचरण करने वाले का
कर्म
कर्म
समग्रम्
संपूर्ण
प्रविलीयते
विलीन हो जाता है

अन्वय: गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः यज्ञाय आचरतः (पुरुषस्य) समग्रम् कर्म प्रविलीयते।

जिसकी आसक्ति चली गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसका संपूर्ण कर्म विलीन हो जाता है।

4.24ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥24॥

brahmārpaṇaṃ brahmahavir brahmāgnau brahmaṇā hutam |
brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā

ब्रह्म
ब्रह्म
अर्पणम्
अर्पण (हवन का साधन)
ब्रह्म
ब्रह्म
हविः
हवि (आहुति द्रव्य)
ब्रह्माग्नौ
ब्रह्मरूप अग्नि में
ब्रह्मणा
ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा
हुतम्
हवन किया गया
ब्रह्म
ब्रह्म
एव
ही
तेन
उसके द्वारा
गन्तव्यम्
प्राप्त करने योग्य
ब्रह्मकर्मसमाधिना
ब्रह्मरूप कर्म में समाधि वाले

अन्वय: अर्पणम् ब्रह्म, हविः ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्रह्माग्नौ हुतम्। ब्रह्मकर्मसमाधिना तेन ब्रह्म एव गन्तव्यम्।

अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, और ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा हवन किया गया है। जिसकी समाधि ब्रह्मरूप कर्म में लगी है, उसे ब्रह्म ही प्राप्त होता है।

4.25दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥25॥

daivam evāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate |
brahmāgnāv apare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati

दैवम्
देवताओं के पूजन रूप
एव
ही
अपरे
दूसरे
यज्ञम्
यज्ञ को
योगिनः
योगी
पर्युपासते
भली प्रकार करते हैं
ब्रह्माग्नौ
ब्रह्मरूप अग्नि में
अपरे
दूसरे
यज्ञम्
यज्ञ को
यज्ञेन
यज्ञ द्वारा
एव
ही
उपजुह्वति
हवन करते हैं

अन्वय: अपरे योगिनः दैवम् एव यज्ञम् पर्युपासते। अपरे ब्रह्माग्नौ यज्ञेन एव यज्ञम् उपजुह्वति।

कुछ योगी देवताओं के पूजन रूप यज्ञ का ही भली प्रकार अनुष्ठान करते हैं। दूसरे योगी ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।

4.26श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥26॥

śrotrādīnīndriyāṇy anye saṃyamāgniṣu juhvati |
śabdādīn viṣayān anya indriyāgniṣu juhvati

श्रोत्रादीनि
श्रोत्र आदि
इन्द्रियाणि
इंद्रियों को
अन्ये
दूसरे
संयमाग्निषु
संयम रूप अग्नियों में
जुह्वति
हवन करते हैं
शब्दादीन्
शब्द आदि
विषयान्
विषयों को
अन्ये
दूसरे
इन्द्रियाग्निषु
इंद्रिय रूप अग्नियों में
जुह्वति
हवन करते हैं

अन्वय: अन्ये श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि संयमाग्निषु जुह्वति। अन्ये शब्दादीन् विषयान् इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।

कुछ लोग श्रोत्र आदि इंद्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन करते हैं। दूसरे शब्द आदि विषयों को इंद्रिय रूप अग्नियों में हवन करते हैं।

4.27सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥27॥

sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare |
ātmasaṃyamayogāgnau juhvati jñānadīpite

सर्वाणि
सब
इन्द्रियकर्माणि
इंद्रियों की क्रियाओं को
प्राणकर्माणि
प्राणों की क्रियाओं को
च
और
अपरे
दूसरे
आत्मसंयमयोगाग्नौ
आत्मसंयम रूप योगाग्नि में
जुह्वति
हवन करते हैं
ज्ञानदीपिते
ज्ञान से प्रकाशित

अन्वय: अपरे सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि च ज्ञानदीपिते आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति।

दूसरे लोग इंद्रियों की सब क्रियाओं और प्राणों की क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम रूप योगाग्नि में हवन करते हैं।

4.28द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥28॥

dravyayajñās tapoyajñā yogayajñās tathāpare |
svādhyāyajñānayajñāś ca yatayaḥ saṃśitavratāḥ

द्रव्ययज्ञाः
द्रव्य से यज्ञ करने वाले
तपोयज्ञाः
तप रूप यज्ञ करने वाले
योगयज्ञाः
योग रूप यज्ञ करने वाले
तथा
तथा
अपरे
दूसरे
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः
स्वाध्याय और ज्ञान रूप यज्ञ करने वाले
च
और
यतयः
यत्नशील पुरुष
संशितव्रताः
तीक्ष्ण व्रत वाले

अन्वय: तथा अपरे संशितव्रताः यतयः द्रव्ययज्ञाः तपोयज्ञाः योगयज्ञाः स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः च (सन्ति)।

इसी प्रकार दूसरे तीक्ष्ण व्रत वाले यत्नशील पुरुष द्रव्य से यज्ञ करने वाले, तप रूप यज्ञ करने वाले, योग रूप यज्ञ करने वाले, तथा स्वाध्याय और ज्ञान रूप यज्ञ करने वाले होते हैं।

4.29अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥29॥

apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe ’pānaṃ tathāpare |
prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ

अपाने
अपान में
जुह्वति
हवन करते हैं
प्राणम्
प्राण को
प्राणे
प्राण में
अपानम्
अपान को
तथा
तथा
अपरे
दूसरे
प्राणापानगती
प्राण और अपान की गतियों को
रुद्ध्वा
रोककर
प्राणायामपरायणाः
प्राणायाम में तत्पर

अन्वय: तथा अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणापानगती रुद्ध्वा अपाने प्राणम् प्राणे अपानम् जुह्वति।

इसी प्रकार दूसरे प्राणायाम में तत्पर लोग प्राण और अपान की गति रोककर प्राण को अपान में और अपान को प्राण में हवन करते हैं।

4.30अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥30॥

apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati |
sarve ’py ete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ

अपरे
दूसरे
नियताहाराः
नियमित आहार वाले
प्राणान्
प्राणों को
प्राणेषु
प्राणों में
जुह्वति
हवन करते हैं
सर्वे
सब
अपि
भी
एते
ये
यज्ञविदः
यज्ञ को जानने वाले
यज्ञक्षपितकल्मषाः
यज्ञ से नष्ट हुए पापों वाले

अन्वय: अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति। एते सर्वे अपि यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मषाः (सन्ति)।

दूसरे नियमित आहार वाले लोग प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सब ही यज्ञ को जानने वाले हैं और यज्ञ से इनके पाप नष्ट हो गए हैं।

4.31यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥31॥

yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam |
nāyaṃ loko ’sty ayajñasya kuto ’nyaḥ kurusattama

यज्ञशिष्टामृतभुजः
यज्ञ से बचे अमृत का भोग करने वाले
यान्ति
जाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म को
सनातनम्
सनातन
न
नहीं
अयम्
यह
लोकः
लोक
अस्ति
है
अयज्ञस्य
यज्ञ न करने वाले का
कुतः
कहाँ से
अन्यः
दूसरा (लोक)
कुरुसत्तम
हे कुरुश्रेष्ठ

अन्वय: यज्ञशिष्टामृतभुजः सनातनम् ब्रह्म यान्ति। कुरुसत्तम, अयज्ञस्य अयम् लोकः न अस्ति, अन्यः कुतः?

यज्ञ से बचे हुए अमृत का भोग करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी नहीं है, फिर दूसरा लोक कहाँ से होगा?

4.32एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥32॥

evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe |
karmajān viddhi tān sarvān evaṃ jñātvā vimokṣyase

एवम्
इस प्रकार
बहुविधाः
बहुत प्रकार के
यज्ञाः
यज्ञ
वितताः
विस्तार से कहे गए
ब्रह्मणः
वेद के
मुखे
मुख में (वाणी में)
कर्मजान्
कर्म से उत्पन्न
विद्धि
जानिए
तान्
उन
सर्वान्
सबको
एवम्
इस प्रकार
ज्ञात्वा
जानकर
विमोक्ष्यसे
मुक्त हो जाएँगे

अन्वय: एवम् बहुविधाः यज्ञाः ब्रह्मणः मुखे वितताः। तान् सर्वान् कर्मजान् विद्धि। एवम् ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।

इस प्रकार बहुत प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको आप कर्म से उत्पन्न जानिए; इस प्रकार जानकर आप मुक्त हो जाएँगे।

4.33श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥33॥

śreyān dravyamayād yajñāj jñānayajñaḥ paraṃtapa |
sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate

श्रेयान्
श्रेष्ठ
द्रव्यमयात्
द्रव्य से होने वाले
यज्ञात्
यज्ञ से
ज्ञानयज्ञः
ज्ञान यज्ञ
परंतप
हे परंतप
सर्वम्
सब
कर्म
कर्म
अखिलम्
संपूर्ण
पार्थ
हे पार्थ
ज्ञाने
ज्ञान में
परिसमाप्यते
समाप्त हो जाता है

अन्वय: परंतप, द्रव्यमयात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः श्रेयान्। पार्थ, सर्वम् अखिलम् कर्म ज्ञाने परिसमाप्यते।

हे परंतप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ, संपूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।

4.34तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥34॥

tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |
upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninas tattvadarśinaḥ

तत्
उस (ज्ञान) को
विद्धि
जानिए
प्रणिपातेन
प्रणाम से
परिप्रश्नेन
विनीत प्रश्न से
सेवया
सेवा से
उपदेक्ष्यन्ति
उपदेश देंगे
ते
आपको
ज्ञानम्
ज्ञान का
ज्ञानिनः
ज्ञानी
तत्त्वदर्शिनः
तत्त्व को देखने वाले

अन्वय: तत् प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया विद्धि। तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ते ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।

उस ज्ञान को आप प्रणाम, विनीत प्रश्न और सेवा के द्वारा जानिए। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी आपको उस ज्ञान का उपदेश देंगे।

4.35यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥35॥

yaj jñātvā na punar moham evaṃ yāsyasi pāṇḍava |
yena bhūtāny aśeṣeṇa drakṣyasy ātmany atho mayi

यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
न
नहीं
पुनः
फिर
मोहम्
मोह को
एवम्
इस प्रकार
यास्यसि
प्राप्त होंगे
पाण्डव
हे पाण्डव
येन
जिससे
भूतानि
प्राणियों को
अशेषेण
संपूर्ण रूप से
द्रक्ष्यसि
देखेंगे
आत्मनि
अपने में
अथो
और फिर
मयि
मुझमें

अन्वय: पाण्डव, यत् ज्ञात्वा पुनः एवम् मोहम् न यास्यसि, येन अशेषेण भूतानि आत्मनि अथो मयि द्रक्ष्यसि।

हे पाण्डव, जिसे जानकर आप फिर इस प्रकार मोह को नहीं पाएँगे, और जिसके द्वारा आप समस्त प्राणियों को अपने में और फिर मुझमें देखेंगे।

4.36अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥36॥

api ced asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ |
sarvaṃ jñānaplavenaiva vṛjinaṃ saṃtariṣyasi

अपि
भी
चेत्
यदि
असि
हैं
पापेभ्यः
पापियों से
सर्वेभ्यः
सब
पापकृत्तमः
सबसे अधिक पाप करने वाले
सर्वम्
संपूर्ण
ज्ञानप्लवेन
ज्ञानरूप नौका से
एव
ही
वृजिनम्
पाप को
संतरिष्यसि
भली प्रकार पार कर जाएँगे

अन्वय: चेत् सर्वेभ्यः पापेभ्यः पापकृत्तमः अपि असि, ज्ञानप्लवेन एव सर्वम् वृजिनम् संतरिष्यसि।

यदि आप सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हों, तो भी ज्ञानरूप नौका से ही आप संपूर्ण पाप को भली प्रकार पार कर जाएँगे।

4.37यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥37॥

yathaidhāṃsi samiddho ’gnir bhasmasāt kurute ’rjuna |
jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasāt kurute tathā

यथा
जैसे
एधांसि
ईंधन को
समिद्धः
प्रज्वलित
अग्निः
अग्नि
भस्मसात्
भस्म
कुरुते
कर देती है
अर्जुन
हे अर्जुन
ज्ञानाग्निः
ज्ञानरूप अग्नि
सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
भस्मसात्
भस्म
कुरुते
कर देती है
तथा
वैसे ही

अन्वय: अर्जुन, यथा समिद्धः अग्निः एधांसि भस्मसात् कुरुते, तथा ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते।

हे अर्जुन, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।

4.38न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥38॥

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitram iha vidyate |
tat svayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati

न
नहीं
हि
निश्चय ही
ज्ञानेन
ज्ञान के
सदृशम्
समान
पवित्रम्
पवित्र करने वाला
इह
इस लोक में
विद्यते
है
तत्
उस (ज्ञान) को
स्वयम्
स्वयं
योगसंसिद्धः
योग में भली प्रकार सिद्ध
कालेन
समय पाकर
आत्मनि
अपने में
विन्दति
पा लेता है

अन्वय: इह ज्ञानेन सदृशम् पवित्रम् न हि विद्यते। योगसंसिद्धः तत् कालेन स्वयम् आत्मनि विन्दति।

इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ नहीं है। योग में भली प्रकार सिद्ध पुरुष उस ज्ञान को समय पाकर स्वयं अपने में पा लेता है।

4.39श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥39॥

śraddhāvāṃl labhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ |
jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntim acireṇādhigacchati

श्रद्धावान्
श्रद्धावान
लभते
पाता है
ज्ञानम्
ज्ञान को
तत्परः
उसमें तत्पर
संयतेन्द्रियः
जितेंद्रिय
ज्ञानम्
ज्ञान को
लब्ध्वा
पाकर
पराम्
परम
शान्तिम्
शांति को
अचिरेण
शीघ्र ही
अधिगच्छति
प्राप्त होता है

अन्वय: श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानम् लभते। ज्ञानम् लब्ध्वा अचिरेण पराम् शान्तिम् अधिगच्छति।

श्रद्धावान, उसमें तत्पर और जितेंद्रिय पुरुष ज्ञान को पाता है। ज्ञान को पाकर वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।

4.40अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥40॥

ajñaś cāśraddadhānaś ca saṃśayātmā vinaśyati |
nāyaṃ loko ’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ

अज्ञः
अज्ञानी
च
और
अश्रद्दधानः
श्रद्धा रहित
च
और
संशयात्मा
संशय करने वाला
विनश्यति
नष्ट हो जाता है
न
नहीं
अयम्
यह
लोकः
लोक
अस्ति
है
न
न
परः
परलोक
न
न
सुखम्
सुख
संशयात्मनः
संशय करने वाले के लिए

अन्वय: अज्ञः च अश्रद्दधानः च संशयात्मा विनश्यति। संशयात्मनः अयम् लोकः न अस्ति, न परः, न सुखम्।

अज्ञानी, श्रद्धा रहित और संशय करने वाला पुरुष नष्ट हो जाता है। संशय करने वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख है।

4.41योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥41॥

yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasaṃchinnasaṃśayam |
ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanaṃjaya

योगसंन्यस्तकर्माणम्
योग द्वारा कर्मों का संन्यास करने वाले को
ज्ञानसंछिन्नसंशयम्
ज्ञान से कटे संशय वाले को
आत्मवन्तम्
आत्मपरायण को
न
नहीं
कर्माणि
कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते
धनंजय
हे धनंजय

अन्वय: धनंजय, योगसंन्यस्तकर्माणम् ज्ञानसंछिन्नसंशयम् आत्मवन्तम् कर्माणि न निबध्नन्ति।

हे धनंजय, जिसने योग द्वारा कर्मों का संन्यास कर दिया है, जिसका संशय ज्ञान से कट गया है और जो आत्मपरायण है, उसे कर्म नहीं बाँधते।

4.42तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥42॥

tasmād ajñānasaṃbhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinātmanaḥ |
chittvainaṃ saṃśayaṃ yogam ātiṣṭhottiṣṭha bhārata

तस्मात्
इसलिए
अज्ञानसंभूतम्
अज्ञान से उत्पन्न
हृत्स्थम्
हृदय में स्थित
ज्ञानासिना
ज्ञानरूप तलवार से
आत्मनः
अपने
छित्त्वा
काटकर
एनम्
इस
संशयम्
संशय को
योगम्
योग में
आतिष्ठ
स्थित हो जाइए
उत्तिष्ठ
उठिए
भारत
हे भारत

अन्वय: तस्मात् भारत, आत्मनः हृत्स्थम् अज्ञानसंभूतम् एनम् संशयम् ज्ञानासिना छित्त्वा योगम् आतिष्ठ, उत्तिष्ठ।

इसलिए हे भारत, अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न इस संशय को ज्ञानरूप तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाइए और उठिए।