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अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग

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अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग

सार: दसवें अध्याय की माला सुनकर अर्जुन का मन कहता है कि अब शब्द बहुत हो गए, एक बार वह असली रूप आँखों से देख लें। कृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाते हैं। उस एक ही रूप में सारे लोक हैं, सारे देवता हैं, और समय का वह भयानक मुख भी है जिसमें सेनाएँ समाती जा रही हैं। अर्जुन काँप उठते हैं, और तब गीता की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति गूँजती है, “मैं काल हूँ।”

अर्जुन की माँग

अर्जुन हाथ जोड़कर बोले, “आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं, और मेरा मोह बहुत हद तक मिट गया। पर अब एक साध रह गई है। यदि आप समझते हैं कि मैं इसे सह पाऊँगा, तो कृपा करके अपना वह अविनाशी ऐश्वर्य-रूप मुझे दिखा दीजिए।”

कृष्ण बोले, “देखिए, मेरे सैकड़ों-हज़ारों रूप हैं, अनेक रंगों और आकारों के। पर इन चर्म-आँखों से आप उन्हें देख नहीं पाएँगे। इसलिए मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ।” और यह कहकर उन्होंने अर्जुन को वे आँखें दीं, जो साधारण नहीं थीं।

विश्वरूप

फिर जो दिखा, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। असंख्य मुख, असंख्य आँखें, असंख्य भुजाएँ। एक साथ हज़ारों सूर्य आकाश में फट पड़ें, तब शायद उस तेज की कुछ झलक मिले। उस एक ही रूप में सारे देवता दिख रहे थे, सारे लोक दिख रहे थे, ऋषि और नाग, सूर्य और चन्द्र, आदि जिसका न कोई ओर था, न छोर। अर्जुन के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर, काँपती वाणी से स्तुति की।

अर्जुन की वाणी लड़खड़ाने लगी। उन्होंने कहा कि इस रूप को देखकर तीनों लोक काँप रहे हैं, देवता हाथ जोड़े हुए भीतर समाते जा रहे हैं, और ऋषिगण “कल्याण हो, कल्याण हो” कहकर स्तुति गा रहे हैं। उस विराट के मुख की दाढ़ें इतनी विकराल थीं कि देखते ही दिशाओं का बोध जाता रहा, और मन में न कहीं शान्ति बची, न कोई ठौर।

पर जैसे-जैसे वे देखते गए, विस्मय धीरे-धीरे डर में बदलने लगा। उन्होंने देखा कि उस विराट रूप के धधकते मुखों में योद्धा वैसे ही समाते जा रहे हैं, जैसे पतंगे आग की ओर दौड़कर उसमें गिरते हैं। भीष्म, द्रोण, कर्ण, और दोनों ओर के राजा, सब उन जलते जबड़ों की ओर खिंचे चले जा रहे थे। कुछ के सिर दाँतों के बीच पिसते दिखे। अर्जुन का धीरज टूट गया।

“मैं काल हूँ”

काँपते हुए उन्होंने पूछा, “मुझे बताइए, इस भयानक रूप में आप कौन हैं? आप करना क्या चाहते हैं?” तब वह उत्तर आया, जो सदियों से गूँजता चला आया है।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

“मैं काल हूँ, निरंतर बढ़ता हुआ, लोकों का संहार करने वाला। इस समय मैं इन सब लोकों को समेटने निकला हूँ। सामने खड़ी इन विरोधी सेनाओं के योद्धा, आपके लड़े बिना भी, बचने वाले नहीं हैं।” यही गीता का सबसे चौंका देने वाला वाक्य है। जीवन जिसे भविष्य समझकर सँजोता रहता है, वह समय अपना निर्णय पहले ही दे चुका होता है।

फिर कृष्ण ने अर्जुन का बोझ हल्का किया, “इसलिए आप उठिए, यश पाइए। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगिए। इन्हें तो मैं पहले ही मार चुका हूँ। हे सव्यसाची, आप केवल निमित्त बनिए।” अपना कर्म कीजिए, पर यह अहंकार छोड़ दीजिए कि ‘मैं ही मार रहा हूँ।’ कर्ता तो कोई और है, आप बस माध्यम हैं।

यही “निमित्त” शब्द इस पूरे अध्याय का मर्म है। कृष्ण अर्जुन से हाथ पर हाथ धरकर बैठने को नहीं कह रहे। धनुष उठाना है, बाण चलाना है, पूरा पराक्रम करना है। पर भीतर यह गाँठ खुल जानी चाहिए कि परिणाम का सूत्र किसी और के हाथ में है। कर्म पूरे मन से, और फल का अहंकार बिलकुल नहीं, गीता शुरू से यही कहती आई है, और यहाँ वह बात आँखों के सामने खड़ी हो जाती है।

ओपेनहाइमर की याद

यही “कालोऽस्मि” वाली पंक्ति बीसवीं सदी में एक बार फिर दुनिया के सामने आ गई। अमेरिका के भौतिक-विज्ञानी जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने, जिन्होंने परमाणु बम बनाने वाली मैनहटन परियोजना का नेतृत्व किया था, 16 जुलाई 1945 को हुए पहले परमाणु-परीक्षण के समय इसी श्लोक को याद किया। उस परीक्षण का नाम ट्रिनिटी था। वे कोई संस्कृत के अध्यापक नहीं थे, विज्ञान ही उनका क्षेत्र था, पर सन् 1933 के आस-पास उन्होंने संस्कृत सीखी थी और गीता को मूल भाषा में पढ़ा था। रेगिस्तान में उठे उस आग के गोले को देखकर उन्हें यही एहसास हुआ, मानो काल स्वयं, लोकों का संहारक, उनके सामने प्रकट हो गया हो।

अर्जुन की क्षमा-याचना

डर कुछ उतरा तो अर्जुन को अपनी पुरानी बातें याद आईं। कितनी ही बार उन्होंने खेल में, यात्रा में, भोजन की मेज़ पर इस सखा को हल्के-फुल्के ढंग से “हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र” कहकर पुकारा था, यह जाने बिना कि सामने कौन बैठा है। हाथ जोड़कर उन्होंने बार-बार क्षमा माँगी। फिर विनती की, “मैंने आपका यह अद्भुत रूप देख लिया, मेरा मन तृप्त भी है और भयभीत भी। कृपा कीजिए, अब उसी सौम्य रूप में लौट आइए, जिसे मैं जानता हूँ।”

कृष्ण ने कोमलता से पहले अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, फिर वही परिचित मनुष्य-रूप धारण कर लिया, और अर्जुन को धीरज बँधाया। बोले, “यह रूप, जिसे आपने देखा, बड़े-बड़े साधकों को भी सुलभ नहीं। न वेदों के पाठ से, न यज्ञों से, न कठोर तप से यह दिखता है।”

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

“हे अर्जुन, केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में जाना, देखा, और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है।” डर के रास्ते वह द्वार नहीं खुलता, प्रेम के रास्ते ही खुलता है।

सार

एक वाक्य में कहें तो, समय स्वयं कृष्ण का ही रूप है, और जो होना है वह पहले से तय है। हमारा काम इतना ही है कि अपना हिस्सा निष्ठा से निभाएँ, और फल का भार उन्हीं पर छोड़ दें। और उस विराट को भय से नहीं, प्रेम से देखा जाता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 55 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/11/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

11.1मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥1॥

madanugrahāya paramaṃ guhyam adhyātmasaṃjñitam |
yat tvayoktaṃ vacas tena moho ’yaṃ vigato mama

मदनुग्रहाय
हम पर अनुग्रह करने के लिए
परमम्
परम
गुह्यम्
गोपनीय
अध्यात्मसंज्ञितम्
अध्यात्म नाम वाला
यत्
जो
त्वया
आपके द्वारा
उक्तम्
कहा गया
वचः
वचन
तेन
उससे
मोहः
मोह
अयम्
यह
विगतः
दूर हो गया
मम
हमारा

अन्वय: मदनुग्रहाय अध्यात्मसंज्ञितम् परमम् गुह्यम् यत् वचः त्वया उक्तम्, तेन मम अयम् मोहः विगतः।

हम पर अनुग्रह करने के लिए अध्यात्म नाम वाला जो परम गोपनीय वचन आपने कहा, उससे हमारा यह मोह दूर हो गया।

11.2भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥2॥

bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā |
tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyam api cāvyayam

भवाप्ययौ
उत्पत्ति और प्रलय
हि
क्योंकि
भूतानाम्
प्राणियों के
श्रुतौ
सुने गए
विस्तरशः
विस्तार से
मया
हमने
त्वत्तः
आपसे
कमलपत्राक्ष
हे कमलनयन
माहात्म्यम्
महिमा
अपि
भी
च
और
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: कमलपत्राक्ष, हि मया त्वत्तः भूतानाम् भवाप्ययौ विस्तरशः श्रुतौ, अव्ययम् माहात्म्यम् अपि च (श्रुतम्)।

हे कमलनयन, प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय हमने आपसे विस्तार से सुने हैं, और आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।

11.3एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥3॥

evam etad yathāttha tvam ātmānaṃ parameśvara |
draṣṭum icchāmi te rūpam aiśvaraṃ puruṣottama

एवम्
ऐसा ही
एतत्
यह
यथा
जैसा
आत्थ
कहते हैं
त्वम्
आप
आत्मानम्
अपने को
परमेश्वर
हे परमेश्वर
द्रष्टुम्
देखना
इच्छामि
चाहते हैं
ते
आपके
रूपम्
रूप को
ऐश्वरम्
ईश्वरीय
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम

अन्वय: परमेश्वर, त्वम् आत्मानम् यथा आत्थ, एतत् एवम् (एव)। पुरुषोत्तम, (अहम्) ते ऐश्वरम् रूपम् द्रष्टुम् इच्छामि।

हे परमेश्वर, आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ऐसा ही है। हे पुरुषोत्तम, हम आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहते हैं।

11.4मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥4॥

manyase yadi tac chakyaṃ mayā draṣṭum iti prabho |
yogeśvara tato me tvaṃ darśayātmānam avyayam

मन्यसे
मानते हैं
यदि
यदि
तत्
वह
शक्यम्
संभव
मया
हमारे द्वारा
द्रष्टुम्
देखा जाना
इति
ऐसा
प्रभो
हे प्रभो
योगेश्वर
हे योगेश्वर
ततः
तो
मे
हमें
त्वम्
आप
दर्शय
दिखाइए
आत्मानम्
अपने को
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: प्रभो, यदि तत् मया द्रष्टुम् शक्यम् इति (त्वम्) मन्यसे, योगेश्वर, ततः त्वम् मे अव्ययम् आत्मानम् दर्शय।

हे प्रभो, यदि आप मानते हैं कि वह रूप हमारे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर, आप हमें अपने उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराइए।

11.5पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥5॥

paśya me pārtha rūpāṇi śataśo ’tha sahasraśaḥ |
nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca

पश्य
देखिए
मे
मेरे
पार्थ
हे पार्थ
रूपाणि
रूपों को
शतशः
सैकड़ों
अथ
और
सहस्रशः
हजारों
नानाविधानि
अनेक प्रकार के
दिव्यानि
दिव्य
नानावर्णाकृतीनि
अनेक रंगों और आकारों वाले
च
और

अन्वय: पार्थ, मे शतशः अथ सहस्रशः नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च रूपाणि पश्य।

हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखिए, जो अनेक प्रकार के, दिव्य और अनेक रंगों तथा आकारों वाले हैं।

11.6पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥6॥

paśyādityān vasūn rudrān aśvinau marutas tathā |
bahūny adṛṣṭapūrvāṇi paśyāścaryāṇi bhārata

पश्य
देखिए
आदित्यान्
आदित्यों को
वसून्
वसुओं को
रुद्रान्
रुद्रों को
अश्विनौ
दोनों अश्विनीकुमारों को
मरुतः
मरुतों को
तथा
और
बहूनि
बहुत से
अदृष्टपूर्वाणि
पहले न देखे गए
पश्य
देखिए
आश्चर्याणि
आश्चर्यों को
भारत
हे भारत

अन्वय: भारत, आदित्यान् वसून् रुद्रान् अश्विनौ तथा मरुतः पश्य। अदृष्टपूर्वाणि बहूनि आश्चर्याणि पश्य।

हे भारत, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखिए। पहले कभी न देखे गए बहुत से आश्चर्यों को देखिए।

11.7इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥7॥

ihaikasthaṃ jagat kṛtsnaṃ paśyādya sacarācaram |
mama dehe guḍākeśa yac cānyad draṣṭum icchasi

इह
यहाँ
एकस्थम्
एक स्थान में स्थित
जगत्
जगत् को
कृत्स्नम्
संपूर्ण
पश्य
देखिए
अद्य
आज
सचराचरम्
चर और अचर सहित
मम
मेरे
देहे
शरीर में
गुडाकेश
हे गुडाकेश
यत्
जो
च
और
अन्यत्
दूसरा
द्रष्टुम्
देखना
इच्छसि
चाहते हैं

अन्वय: गुडाकेश, अद्य इह मम देहे एकस्थम् सचराचरम् कृत्स्नम् जगत् पश्य, यत् च अन्यत् द्रष्टुम् इच्छसि (तत् अपि पश्य)।

हे गुडाकेश, आज यहाँ मेरे शरीर में एक स्थान पर स्थित चर और अचर सहित संपूर्ण जगत् को देखिए, और जो कुछ दूसरा भी आप देखना चाहते हैं, उसे भी देखिए।

11.8न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥8॥

na tu māṃ śakyase draṣṭum anenaiva svacakṣuṣā |
divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogam aiśvaram

न
नहीं
तु
परन्तु
माम्
मुझे
शक्यसे
समर्थ हैं
द्रष्टुम्
देखने में
अनेन
इस
एव
ही
स्वचक्षुषा
अपने नेत्र से
दिव्यम्
दिव्य
ददामि
देता हूँ
ते
आपको
चक्षुः
नेत्र
पश्य
देखिए
मे
मेरे
योगम्
योग को
ऐश्वरम्
ईश्वरीय

अन्वय: तु अनेन एव स्वचक्षुषा माम् द्रष्टुम् न शक्यसे। (अहम्) ते दिव्यम् चक्षुः ददामि, मे ऐश्वरम् योगम् पश्य।

परन्तु अपने इसी नेत्र से आप मुझे देखने में समर्थ नहीं हैं। मैं आपको दिव्य नेत्र देता हूँ, मेरे ईश्वरीय योग को देखिए।

11.9एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः

संजय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥9॥

evam uktvā tato rājan mahāyogeśvaro hariḥ |
darśayām āsa pārthāya paramaṃ rūpam aiśvaram

एवम्
ऐसा
उक्त्वा
कहकर
ततः
फिर
राजन्
हे राजन्
महायोगेश्वरः
महान् योगेश्वर
हरिः
हरि ने
दर्शयामास
दिखाया
पार्थाय
पार्थ को
परमम्
परम
रूपम्
रूप
ऐश्वरम्
ईश्वरीय

अन्वय: राजन्, एवम् उक्त्वा ततः महायोगेश्वरः हरिः पार्थाय परमम् ऐश्वरम् रूपम् दर्शयामास।

हे राजन्, ऐसा कहकर फिर महान् योगेश्वर हरि ने पार्थ को परम ईश्वरीय रूप दिखाया।

11.10अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥10॥

anekavaktranayanam anekādbhutadarśanam |
anekadivyābharaṇaṃ divyānekodyatāyudham

अनेकवक्त्रनयनम्
अनेक मुख और नेत्रों वाला
अनेकाद्भुतदर्शनम्
अनेक अद्भुत दृश्यों वाला
अनेकदिव्याभरणम्
अनेक दिव्य आभूषणों वाला
दिव्यानेकोद्यतायुधम्
अनेक उठे दिव्य आयुधों वाला

अन्वय: (तत् रूपम्) अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् अनेकदिव्याभरणम् दिव्यानेकोद्यतायुधम् (आसीत्)।

वह रूप अनेक मुखों और नेत्रों वाला, अनेक अद्भुत दृश्यों वाला, अनेक दिव्य आभूषणों से युक्त और अनेक उठाए हुए दिव्य आयुधों वाला था।

11.11दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥11॥

divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam |
sarvāścaryamayaṃ devam anantaṃ viśvatomukham

दिव्यमाल्याम्बरधरम्
दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए
दिव्यगन्धानुलेपनम्
दिव्य गन्ध का लेप किए
सर्वाश्चर्यमयम्
सब आश्चर्यों से युक्त
देवम्
देव को
अनन्तम्
अनन्त
विश्वतोमुखम्
सब ओर मुख वाले

अन्वय: दिव्यमाल्याम्बरधरम् दिव्यगन्धानुलेपनम् सर्वाश्चर्यमयम् अनन्तम् विश्वतोमुखम् देवम् (दर्शयामास)।

दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए, दिव्य गन्ध का लेप किए, सब आश्चर्यों से युक्त, अनन्त और सब ओर मुख वाले उस देव को उन्होंने दिखाया।

11.12दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥12॥

divi sūryasahasrasya bhaved yugapad utthitā |
yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ

दिवि
आकाश में
सूर्यसहस्रस्य
हजार सूर्यों का
भवेत्
हो
युगपत्
एक साथ
उत्थिता
उदय हुआ
यदि
यदि
भाः
प्रकाश
सदृशी
समान
सा
वह
स्यात्
हो सकता है
भासः
प्रकाश के
तस्य
उस
महात्मनः
महात्मा के

अन्वय: यदि दिवि सूर्यसहस्रस्य भाः युगपत् उत्थिता भवेत्, सा तस्य महात्मनः भासः सदृशी स्यात्।

यदि आकाश में हजार सूर्यों का प्रकाश एक साथ उदय हो, तो वह प्रकाश उस महात्मा के प्रकाश के समान हो सकता है।

11.13तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥13॥

tatraikasthaṃ jagat kṛtsnaṃ pravibhaktam anekadhā |
apaśyad devadevasya śarīre pāṇḍavas tadā

तत्र
वहाँ
एकस्थम्
एक स्थान में स्थित
जगत्
जगत् को
कृत्स्नम्
संपूर्ण
प्रविभक्तम्
विभक्त
अनेकधा
अनेक प्रकार से
अपश्यत्
देखा
देवदेवस्य
देवों के देव के
शरीरे
शरीर में
पाण्डवः
पाण्डव ने
तदा
तब

अन्वय: तदा पाण्डवः तत्र देवदेवस्य शरीरे अनेकधा प्रविभक्तम् कृत्स्नम् जगत् एकस्थम् अपश्यत्।

तब पाण्डव ने वहाँ देवों के देव के शरीर में अनेक प्रकार से विभक्त संपूर्ण जगत् को एक स्थान पर स्थित देखा।

11.14ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥14॥

tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭaromā dhanaṃjayaḥ |
praṇamya śirasā devaṃ kṛtāñjalir abhāṣata

ततः
फिर
सः
वह
विस्मयाविष्टः
आश्चर्य से भरा
हृष्टरोमा
रोमांचित
धनंजयः
धनंजय
प्रणम्य
प्रणाम करके
शिरसा
सिर से
देवम्
देव को
कृताञ्जलिः
हाथ जोड़े हुए
अभाषत
बोला

अन्वय: ततः विस्मयाविष्टः हृष्टरोमा सः धनंजयः देवम् शिरसा प्रणम्य कृताञ्जलिः अभाषत।

फिर आश्चर्य से भरे और रोमांचित उस धनंजय ने उस देव को सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए कहा।

11.15पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान्

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥15॥

paśyāmi devāṃs tava deva dehe sarvāṃs tathā bhūtaviśeṣasaṃghān |
brahmāṇam īśaṃ kamalāsanastham ṛṣīṃś ca sarvān uragāṃś ca divyān

पश्यामि
देखते हैं
देवान्
देवताओं को
तव
आपके
देव
हे देव
देहे
शरीर में
सर्वान्
सब
तथा
और
भूतविशेषसंघान्
प्राणियों के विशेष समुदायों को
ब्रह्माणम्
ब्रह्मा को
ईशम्
ईश को
कमलासनस्थम्
कमल के आसन पर बैठे
ऋषीन्
ऋषियों को
च
और
सर्वान्
सब
उरगान्
सर्पों को
च
और
दिव्यान्
दिव्य

अन्वय: देव, तव देहे सर्वान् देवान् तथा भूतविशेषसंघान्, कमलासनस्थम् ईशम् ब्रह्माणम्, सर्वान् ऋषीन् च दिव्यान् उरगान् च (अहम्) पश्यामि।

हे देव, आपके शरीर में हम सब देवताओं को और प्राणियों के विशेष समुदायों को देखते हैं। कमल के आसन पर बैठे ईश ब्रह्मा को, सब ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी देखते हैं।

11.16अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वा सर्वतोऽनन्तरूपम्

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वा सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥16॥

anekabāhūdaravaktranetraṃ paśyāmi tvā sarvato ’nantarūpam |
nāntaṃ na madhyaṃ na punas tavādiṃ paśyāmi viśveśvara viśvarūpa

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्
अनेक भुजा उदर मुख नेत्र वाले
पश्यामि
देखते हैं
त्वा
आपको
सर्वतः
सब ओर से
अनन्तरूपम्
अनन्त रूप वाले
न
न
अन्तम्
अन्त को
न
न
मध्यम्
मध्य को
न
न
पुनः
फिर
तव
आपके
आदिम्
आदि को
पश्यामि
देखते हैं
विश्वेश्वर
हे विश्वेश्वर
विश्वरूप
हे विश्वरूप

अन्वय: विश्वेश्वर विश्वरूप, (अहम्) त्वा सर्वतः अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् अनन्तरूपम् पश्यामि। तव न अन्तम्, न मध्यम्, न पुनः आदिम् पश्यामि।

हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, हम आपको सब ओर से अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों वाले अनन्त रूप में देखते हैं। हम आपका न अन्त देखते हैं, न मध्य और न आदि।

11.17किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥17॥

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca tejorāśiṃ sarvato dīptimantam |
paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantād dīptānalārkadyutim aprameyam

किरीटिनम्
किरीट धारण किए
गदिनम्
गदा धारण किए
चक्रिणम्
चक्र धारण किए
च
और
तेजोराशिम्
तेज की राशि
सर्वतः
सब ओर
दीप्तिमन्तम्
प्रकाशमान
पश्यामि
देखते हैं
त्वाम्
आपको
दुर्निरीक्ष्यम्
कठिनाई से देखे जाने योग्य
समन्तात्
सब ओर से
दीप्तानलार्कद्युतिम्
जलती अग्नि और सूर्य जैसी कान्तिवाले
अप्रमेयम्
अप्रमेय

अन्वय: (अहम्) त्वाम् किरीटिनम् गदिनम् चक्रिणम् च, सर्वतः दीप्तिमन्तम् तेजोराशिम्, समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिम्, दुर्निरीक्ष्यम् अप्रमेयम् पश्यामि।

हम आपको किरीट, गदा और चक्र धारण किए, सब ओर प्रकाशमान तेज की राशि के रूप में देखते हैं। आप सब ओर से जलती अग्नि और सूर्य जैसी कान्ति वाले, कठिनाई से देखे जाने योग्य और अप्रमेय हैं।

11.18त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥18॥

tvam akṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ tvam asya viśvasya paraṃ nidhānam |
tvam avyayaḥ śāśvatadharmagoptā sanātanas tvaṃ puruṣo mato me

त्वम्
आप
अक्षरम्
अक्षर
परमम्
परम
वेदितव्यम्
जानने योग्य
त्वम्
आप
अस्य
इस
विश्वस्य
विश्व के
परम्
परम
निधानम्
आश्रय
त्वम्
आप
अव्ययः
अविनाशी
शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातन धर्म के रक्षक
सनातनः
सनातन
त्वम्
आप
पुरुषः
पुरुष
मतः
माने गए
मे
हमारे द्वारा

अन्वय: त्वम् परमम् वेदितव्यम् अक्षरम्, त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम्। त्वम् अव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, त्वम् सनातनः पुरुषः (इति) मे मतः।

आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं, आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी, सनातन धर्म के रक्षक और सनातन पुरुष हैं, ऐसा हमारा मत है।

11.19अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥19॥

anādimadhyāntam anantavīryam anantabāhuṃ śaśisūryanetram |
paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktraṃ svatejasā viśvam idaṃ tapantam

अनादिमध्यान्तम्
आदि मध्य और अन्त से रहित
अनन्तवीर्यम्
अनन्त पराक्रम वाले
अनन्तबाहुम्
अनन्त भुजाओं वाले
शशिसूर्यनेत्रम्
चन्द्र और सूर्य जिनके नेत्र हैं
पश्यामि
देखते हैं
त्वाम्
आपको
दीप्तहुताशवक्त्रम्
प्रज्वलित अग्नि जैसे मुख वाले
स्वतेजसा
अपने तेज से
विश्वम्
विश्व को
इदम्
इस
तपन्तम्
तपाते हुए

अन्वय: (अहम्) त्वाम् अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुम् शशिसूर्यनेत्रम् दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा इदम् विश्वम् तपन्तम् पश्यामि।

हम आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त पराक्रम वाले, अनन्त भुजाओं वाले और चन्द्र तथा सूर्य को नेत्र बनाए हुए देखते हैं। आपका मुख प्रज्वलित अग्नि जैसा है और आप अपने तेज से इस विश्व को तपा रहे हैं।

11.20द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥20॥

dyāvāpṛthivyor idam antaraṃ hi vyāptaṃ tvayaikena diśaś ca sarvāḥ |
dṛṣṭvādbhutaṃ rūpam idaṃ tavograṃ lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman

द्यावापृथिव्योः
आकाश और पृथ्वी के
इदम्
यह
अन्तरम्
बीच का स्थान
हि
निश्चय ही
व्याप्तम्
व्याप्त है
त्वया
आपके द्वारा
एकेन
अकेले
दिशः
दिशाएँ
च
और
सर्वाः
सब
दृष्ट्वा
देखकर
अद्भुतम्
अद्भुत
रूपम्
रूप को
इदम्
इस
तव
आपके
उग्रम्
उग्र
लोकत्रयम्
तीनों लोक
प्रव्यथितम्
अत्यन्त व्यथित हैं
महात्मन्
हे महात्मन्

अन्वय: महात्मन्, द्यावापृथिव्योः इदम् अन्तरम् सर्वाः दिशः च हि त्वया एकेन व्याप्तम्। तव इदम् अद्भुतम् उग्रम् रूपम् दृष्ट्वा लोकत्रयम् प्रव्यथितम्।

हे महात्मन्, आकाश और पृथ्वी के बीच का यह स्थान और सब दिशाएँ अकेले आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हैं।

11.21अमी हि त्वा सुरसंघा विशन्ति के चिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति

अमी हि त्वा सुरसंघा विशन्ति के चिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥21॥

amī hi tvā surasaṃghā viśanti ke cid bhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti |
svastīty uktvā maharṣisiddhasaṃghāḥ stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ

अमी
ये
हि
निश्चय ही
त्वा
आपमें
सुरसंघाः
देवताओं के समूह
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
के चित्
कुछ
भीताः
भयभीत होकर
प्राञ्जलयः
हाथ जोड़े हुए
गृणन्ति
गुणगान कर रहे हैं
स्वस्ति
कल्याण हो
इति
ऐसा
उक्त्वा
कहकर
महर्षिसिद्धसंघाः
महर्षियों और सिद्धों के समूह
स्तुवन्ति
स्तुति कर रहे हैं
त्वाम्
आपकी
स्तुतिभिः
स्तोत्रों से
पुष्कलाभिः
उत्तम

अन्वय: अमी सुरसंघाः हि त्वा विशन्ति, के चित् भीताः प्राञ्जलयः गृणन्ति। महर्षिसिद्धसंघाः स्वस्ति इति उक्त्वा पुष्कलाभिः स्तुतिभिः त्वाम् स्तुवन्ति।

ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपका गुणगान कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह कल्याण हो, ऐसा कहकर उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।

11.22रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वा विस्मिताश्चैव सर्वे ॥22॥

rudrādityā vasavo ye ca sādhyā viśve ’śvinau marutaś coṣmapāś ca |
gandharvayakṣāsurasiddhasaṃghā vīkṣante tvā vismitāś caiva sarve

रुद्रादित्याः
रुद्र और आदित्य
वसवः
वसु
ये
जो
च
और
साध्याः
साध्य
विश्वे
विश्वेदेव
अश्विनौ
दोनों अश्विनीकुमार
मरुतः
मरुत
च
और
उष्मपाः
पितर
च
और
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः
गन्धर्व यक्ष असुर सिद्धों के समूह
वीक्षन्ते
देख रहे हैं
त्वा
आपको
विस्मिताः
आश्चर्यचकित
च
और
एव
ही
सर्वे
सब

अन्वय: रुद्रादित्याः वसवः ये च साध्याः विश्वे अश्विनौ मरुतः च उष्मपाः च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः, (ते) सर्वे विस्मिताः च एव त्वा वीक्षन्ते।

रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुत और पितर, तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह, ये सब आश्चर्यचकित होकर आपको देख रहे हैं।

11.23रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥23॥

rūpaṃ mahat te bahuvaktranetraṃ mahābāho bahubāhūrupādam |
bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃ dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitās tathāham

रूपम्
रूप को
महत्
महान्
ते
आपके
बहुवक्त्रनेत्रम्
बहुत मुख और नेत्रों वाले
महाबाहो
हे महाबाहो
बहुबाहूरुपादम्
बहुत भुजा जंघा और पैरों वाले
बहूदरम्
बहुत उदरों वाले
बहुदंष्ट्राकरालम्
बहुत दाढ़ों से विकराल
दृष्ट्वा
देखकर
लोकाः
सब लोक
प्रव्यथिताः
अत्यन्त व्यथित हैं
तथा
वैसे ही
अहम्
हम

अन्वय: महाबाहो, ते बहुवक्त्रनेत्रम् बहुबाहूरुपादम् बहूदरम् बहुदंष्ट्राकरालम् महत् रूपम् दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथिताः, तथा अहम् (अपि)।

हे महाबाहो, बहुत मुखों और नेत्रों वाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत दाढ़ों से विकराल आपके महान् रूप को देखकर सब लोक अत्यन्त व्यथित हैं, और वैसे ही हम भी।

11.24नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥24॥

nabhaḥspṛśaṃ dīptam anekavarṇaṃ vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram |
dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo

नभःस्पृशम्
आकाश को स्पर्श करते
दीप्तम्
प्रकाशमान
अनेकवर्णम्
अनेक रंगों वाले
व्यात्ताननम्
फैले हुए मुखों वाले
दीप्तविशालनेत्रम्
प्रकाशमान विशाल नेत्रों वाले
दृष्ट्वा
देखकर
हि
निश्चय ही
त्वाम्
आपको
प्रव्यथितान्तरात्मा
भीतर से अत्यन्त व्यथित
धृतिम्
धैर्य
न
नहीं
विन्दामि
पाते हैं
शमम्
शान्ति
च
और
विष्णो
हे विष्णो

अन्वय: विष्णो, नभःस्पृशम् दीप्तम् अनेकवर्णम् व्यात्ताननम् दीप्तविशालनेत्रम् त्वाम् दृष्ट्वा हि प्रव्यथितान्तरात्मा (अहम्) धृतिम् शमम् च न विन्दामि।

हे विष्णो, आकाश को स्पर्श करते, प्रकाशमान, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुखों वाले और प्रकाशमान विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर हमारा अन्तरात्मा अत्यन्त व्यथित है। हम धैर्य और शान्ति नहीं पा रहे हैं।

11.25दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसंनिभानि

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसंनिभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥25॥

daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasaṃnibhāni |
diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa

दंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
च
और
ते
आपके
मुखानि
मुखों को
दृष्ट्वा
देखकर
एव
ही
कालानलसंनिभानि
प्रलय की अग्नि के समान
दिशः
दिशाओं को
न
नहीं
जाने
जानते हैं
न
नहीं
लभे
पाते हैं
च
और
शर्म
सुख
प्रसीद
प्रसन्न होइए
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास

अन्वय: देवेश जगन्निवास, दंष्ट्राकरालानि कालानलसंनिभानि च ते मुखानि दृष्ट्वा एव (अहम्) दिशः न जाने, शर्म च न लभे, प्रसीद।

दाढ़ों से विकराल और प्रलय की अग्नि के समान आपके मुखों को देखकर ही हम दिशाओं को नहीं जान पाते और सुख भी नहीं पाते। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।

11.26अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥26॥

amī ca tvāṃ dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ sarve sahaivāvanipālasaṃghaiḥ |
bhīṣmo droṇaḥ sūtaputras tathāsau sahāsmadīyair api yodhamukhyaiḥ

अमी
ये
च
और
त्वाम्
आपमें
धृतराष्ट्रस्य
धृतराष्ट्र के
पुत्राः
पुत्र
सर्वे
सब
सह
साथ
एव
ही
अवनिपालसंघैः
राजाओं के समूहों के
भीष्मः
भीष्म
द्रोणः
द्रोण
सूतपुत्रः
सूतपुत्र
तथा
और
असौ
वह
सह
साथ
अस्मदीयैः
हमारे पक्ष के
अपि
भी
योधमुख्यैः
प्रधान योद्धाओं के

अन्वय: अमी च धृतराष्ट्रस्य सर्वे पुत्राः अवनिपालसंघैः सह एव, भीष्मः द्रोणः तथा असौ सूतपुत्रः, अस्मदीयैः योधमुख्यैः अपि सह, त्वाम् (विशन्ति)।

ये धृतराष्ट्र के सब पुत्र राजाओं के समूहों के साथ ही, और भीष्म, द्रोण तथा वह सूतपुत्र, हमारे पक्ष के प्रधान योद्धाओं के साथ भी, आपमें प्रवेश कर रहे हैं।

11.27वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
के चिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥27॥

vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti daṃṣṭrākarālāni bhayānakāni |
ke cid vilagnā daśanāntareṣu saṃdṛśyante cūrṇitair uttamāṅgaiḥ

वक्त्राणि
मुखों में
ते
आपके
त्वरमाणाः
वेग से
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
दंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
भयानकानि
भयानक
के चित्
कुछ
विलग्नाः
लगे हुए
दशनान्तरेषु
दाँतों के बीच
संदृश्यन्ते
दिखाई देते हैं
चूर्णितैः
चूर्ण हुए
उत्तमाङ्गैः
सिरों के साथ

अन्वय: (ते) त्वरमाणाः ते दंष्ट्राकरालानि भयानकानि वक्त्राणि विशन्ति। के चित् चूर्णितैः उत्तमाङ्गैः दशनान्तरेषु विलग्नाः संदृश्यन्ते।

वे वेग से आपके दाढ़ों से विकराल भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ चूर्ण हुए सिरों के साथ आपके दाँतों के बीच लगे हुए दिखाई देते हैं।

11.28यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥28॥

yathā nadīnāṃ bahavo ’mbuvegāḥ samudram evābhimukhā dravanti |
tathā tavāmī naralokavīrā viśanti vaktrāṇy abhivijvalanti

यथा
जैसे
नदीनाम्
नदियों के
बहवः
बहुत से
अम्बुवेगाः
जल के प्रवाह
समुद्रम्
समुद्र की
एव
ही
अभिमुखाः
ओर
द्रवन्ति
बहते हैं
तथा
वैसे ही
तव
आपके
अमी
ये
नरलोकवीराः
मनुष्यलोक के वीर
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
वक्त्राणि
मुखों में
अभिविज्वलन्ति
जलते हुए

अन्वय: यथा नदीनाम् बहवः अम्बुवेगाः समुद्रम् एव अभिमुखाः द्रवन्ति, तथा अमी नरलोकवीराः तव अभिविज्वलन्ति वक्त्राणि विशन्ति।

जैसे नदियों के बहुत से जल के प्रवाह समुद्र की ओर ही बहते हैं, वैसे ही मनुष्यलोक के ये वीर आपके जलते हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

11.29यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥29॥

yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṃgā viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ |
tathaiva nāśāya viśanti lokās tavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ

यथा
जैसे
प्रदीप्तम्
प्रज्वलित
ज्वलनम्
अग्नि में
पतंगाः
पतंगे
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
नाशाय
नाश के लिए
समृद्धवेगाः
बढ़े हुए वेग से
तथा
वैसे
एव
ही
नाशाय
नाश के लिए
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
लोकाः
ये लोग
तव
आपके
अपि
भी
वक्त्राणि
मुखों में
समृद्धवेगाः
बढ़े हुए वेग से

अन्वय: यथा पतंगाः समृद्धवेगाः नाशाय प्रदीप्तम् ज्वलनम् विशन्ति, तथा एव लोकाः अपि समृद्धवेगाः नाशाय तव वक्त्राणि विशन्ति।

जैसे पतंगे बढ़े हुए वेग से अपने नाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये लोग भी बढ़े हुए वेग से अपने नाश के लिए आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

11.30लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥30॥

lelihyase grasamānaḥ samantāl lokān samagrān vadanair jvaladbhiḥ |
tejobhir āpūrya jagat samagraṃ bhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣṇo

लेलिह्यसे
चाट रहे हैं
ग्रसमानः
निगलते हुए
समन्तात्
सब ओर से
लोकान्
लोकों को
समग्रान्
समस्त
वदनैः
मुखों से
ज्वलद्भिः
जलते हुए
तेजोभिः
तेज से
आपूर्य
परिपूर्ण करके
जगत्
जगत् को
समग्रम्
समस्त
भासः
प्रभाएँ
तव
आपकी
उग्राः
उग्र
प्रतपन्ति
तपा रही हैं
विष्णो
हे विष्णो

अन्वय: विष्णो, (त्वम्) ज्वलद्भिः वदनैः समग्रान् लोकान् समन्तात् ग्रसमानः लेलिह्यसे। तव उग्राः भासः तेजोभिः समग्रम् जगत् आपूर्य प्रतपन्ति।

हे विष्णो, आप जलते हुए मुखों से समस्त लोकों को सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं। आपकी उग्र प्रभाएँ अपने तेज से समस्त जगत् को परिपूर्ण करके तपा रही हैं।

11.31आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥31॥

ākhyāhi me ko bhavān ugrarūpo namo ’stu te devavara prasīda |
vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṃ na hi prajānāmi tava pravṛttim

आख्याहि
बताइए
मे
हमें
कः
कौन
भवान्
आप
उग्ररूपः
उग्र रूप वाले
नमः
नमस्कार
अस्तु
हो
ते
आपको
देववर
हे देवों में श्रेष्ठ
प्रसीद
प्रसन्न होइए
विज्ञातुम्
जानना
इच्छामि
चाहते हैं
भवन्तम्
आपको
आद्यम्
आदिपुरुष
न
नहीं
हि
क्योंकि
प्रजानामि
जानते हैं
तव
आपकी
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति को

अन्वय: देववर, उग्ररूपः भवान् कः (इति) मे आख्याहि। ते नमः अस्तु, प्रसीद। आद्यम् भवन्तम् विज्ञातुम् इच्छामि, हि तव प्रवृत्तिम् न प्रजानामि।

हे देवों में श्रेष्ठ, हमें बताइए कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं, आपको नमस्कार हो, प्रसन्न होइए। हम आदिपुरुष आपको जानना चाहते हैं, क्योंकि हम आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानते।

11.32कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥32॥

kālo ’smi lokakṣayakṛt pravṛddho lokān samāhartum iha pravṛttaḥ |
ṛte ’pi tvā na bhaviṣyanti sarve ye ’vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ

कालः
काल
अस्मि
हूँ
लोकक्षयकृत्
लोकों का नाश करने वाला
प्रवृद्धः
बढ़ा हुआ
लोकान्
लोकों को
समाहर्तुम्
संहार करने के लिए
इह
यहाँ
प्रवृत्तः
प्रवृत्त हुआ
ऋते
बिना
अपि
भी
त्वा
आपके
न
नहीं
भविष्यन्ति
रहेंगे
सर्वे
सब
ये
जो
अवस्थिताः
खड़े हैं
प्रत्यनीकेषु
विपक्षी सेनाओं में
योधाः
योद्धा

अन्वय: (अहम्) लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः कालः अस्मि, इह लोकान् समाहर्तुम् प्रवृत्तः। ये योधाः प्रत्यनीकेषु अवस्थिताः, (ते) सर्वे त्वा ऋते अपि न भविष्यन्ति।

मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। जो योद्धा विपक्षी सेनाओं में खड़े हैं, वे सब आपके बिना भी नहीं रहेंगे।

11.33तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥33॥

tasmāt tvam uttiṣṭha yaśo labhasva jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham |
mayaivaite nihatāḥ pūrvam eva nimittamātraṃ bhava savyasācin

तस्मात्
इसलिए
त्वम्
आप
उत्तिष्ठ
उठिए
यशः
यश
लभस्व
पाइए
जित्वा
जीतकर
शत्रून्
शत्रुओं को
भुङ्क्ष्व
भोगिए
राज्यम्
राज्य को
समृद्धम्
समृद्ध
मया
मेरे द्वारा
एव
ही
एते
ये
निहताः
मारे गए हैं
पूर्वम्
पहले
एव
ही
निमित्तमात्रम्
निमित्त मात्र
भव
बनिए
सव्यसाचिन्
हे सव्यसाची

अन्वय: सव्यसाचिन्, तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ, यशः लभस्व, शत्रून् जित्वा समृद्धम् राज्यम् भुङ्क्ष्व। एते मया एव पूर्वम् एव निहताः, (त्वम्) निमित्तमात्रम् भव।

इसलिए आप उठिए, यश पाइए और शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगिए। हे सव्यसाची, ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे गए हैं, आप केवल निमित्त मात्र बनिए।

11.34द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥34॥

droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca karṇaṃ tathānyān api yodhavīrān |
mayā hatāṃs tvaṃ jahi mā vyathiṣṭhā yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān

द्रोणम्
द्रोण को
च
और
भीष्मम्
भीष्म को
च
और
जयद्रथम्
जयद्रथ को
च
और
कर्णम्
कर्ण को
तथा
तथा
अन्यान्
दूसरे
अपि
भी
योधवीरान्
वीर योद्धाओं को
मया
मेरे द्वारा
हतान्
मारे गए
त्वम्
आप
जहि
मारिए
मा
मत
व्यथिष्ठाः
व्यथित होइए
युध्यस्व
युद्ध कीजिए
जेतासि
जीतेंगे
रणे
रण में
सपत्नान्
शत्रुओं को

अन्वय: मया हतान् द्रोणम् च भीष्मम् च जयद्रथम् च कर्णम् तथा अन्यान् अपि योधवीरान् त्वम् जहि, मा व्यथिष्ठाः। युध्यस्व, रणे सपत्नान् जेतासि।

मेरे द्वारा मारे गए द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा दूसरे वीर योद्धाओं को भी आप मारिए, व्यथित मत होइए। युद्ध कीजिए, रण में आप शत्रुओं को जीतेंगे।

11.35एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥35॥

etac chrutvā vacanaṃ keśavasya kṛtāñjalir vepamānaḥ kirīṭī |
namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya

एतत्
यह
श्रुत्वा
सुनकर
वचनम्
वचन
केशवस्य
केशव का
कृताञ्जलिः
हाथ जोड़े हुए
वेपमानः
काँपते हुए
किरीटी
किरीटधारी अर्जुन
नमस्कृत्वा
नमस्कार करके
भूयः
फिर
एव
भी
आह
बोला
कृष्णम्
कृष्ण से
सगद्गदम्
गद्गद स्वर में
भीतभीतः
अत्यन्त भयभीत
प्रणम्य
प्रणाम करके

अन्वय: केशवस्य एतत् वचनम् श्रुत्वा कृताञ्जलिः वेपमानः किरीटी नमस्कृत्वा, भीतभीतः प्रणम्य, भूयः एव सगद्गदम् कृष्णम् आह।

केशव का यह वचन सुनकर हाथ जोड़े हुए, काँपते हुए किरीटधारी अर्जुन ने नमस्कार करके, अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करते हुए, गद्गद स्वर में फिर कृष्ण से कहा।

11.36स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥36॥

sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā jagat prahṛṣyaty anurajyate ca |
rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti sarve namasyanti ca siddhasaṃghāḥ

स्थाने
उचित ही है
हृषीकेश
हे हृषीकेश
तव
आपके
प्रकीर्त्या
कीर्तन से
जगत्
जगत्
प्रहृष्यति
हर्षित होता है
अनुरज्यते
अनुराग करता है
च
और
रक्षांसि
राक्षस
भीतानि
भयभीत होकर
दिशः
दिशाओं में
द्रवन्ति
भागते हैं
सर्वे
सब
नमस्यन्ति
नमस्कार करते हैं
च
और
सिद्धसंघाः
सिद्धों के समूह

अन्वय: हृषीकेश, स्थाने (एतत्), (यत्) तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च, रक्षांसि भीतानि दिशः द्रवन्ति, सर्वे सिद्धसंघाः च नमस्यन्ति।

हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपके कीर्तन से जगत् हर्षित होता है और अनुराग करता है, राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भागते हैं, और सिद्धों के सब समूह नमस्कार करते हैं।

11.37कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥37॥

kasmāc ca te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo ’py ādikartre |
ananta deveśa jagannivāsa tvam akṣaraṃ sad asat tatparaṃ yat

कस्मात्
क्यों
च
और
ते
आपको
न
न
नमेरन्
नमस्कार करें
महात्मन्
हे महात्मन्
गरीयसे
गुरुतर
ब्रह्मणः
ब्रह्मा के
अपि
भी
आदिकर्त्रे
आदिकर्ता को
अनन्त
हे अनन्त
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास
त्वम्
आप
अक्षरम्
अक्षर
सत्
सत्
असत्
असत्
तत्
वह
परम्
परे
यत्
जो

अन्वय: महात्मन्, ब्रह्मणः अपि आदिकर्त्रे गरीयसे ते कस्मात् च न नमेरन्। अनन्त देवेश जगन्निवास, त्वम् अक्षरम्, सत् असत् यत् तत् परम् (च)।

हे महात्मन्, ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और उनसे भी गुरुतर आपको वे क्यों न नमस्कार करें। हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप अक्षर हैं, सत् हैं, असत् हैं और जो उनसे परे है वह भी आप हैं।

11.38त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥38॥

tvam ādidevaḥ puruṣaḥ purāṇas tvam asya viśvasya paraṃ nidhānam |
vettāsi vedyaṃ ca paraṃ ca dhāma tvayā tataṃ viśvam anantarūpa

त्वम्
आप
आदिदेवः
आदिदेव
पुरुषः
पुरुष
पुराणः
पुराण
त्वम्
आप
अस्य
इस
विश्वस्य
विश्व के
परम्
परम
निधानम्
आश्रय
वेत्ता
जानने वाले
असि
हैं
वेद्यम्
जानने योग्य
च
और
परम्
परम
च
और
धाम
धाम
त्वया
आपसे
ततम्
व्याप्त है
विश्वम्
विश्व
अनन्तरूप
हे अनन्तरूप

अन्वय: त्वम् आदिदेवः पुराणः पुरुषः, त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम्। (त्वम्) वेत्ता वेद्यम् च परम् धाम च असि। अनन्तरूप, त्वया विश्वम् ततम्।

आप आदिदेव और पुराण पुरुष हैं, आप इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप जानने वाले, जानने योग्य और परम धाम हैं, हे अनन्तरूप, आपसे ही यह विश्व व्याप्त है।

11.39वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥39॥

vāyur yamo ’gnir varuṇaḥ śaśāṅkaḥ prajāpatis tvaṃ prapitāmahaś ca |
namo namas te ’stu sahasrakṛtvaḥ punaś ca bhūyo ’pi namo namas te

वायुः
वायु
यमः
यम
अग्निः
अग्नि
वरुणः
वरुण
शशाङ्कः
चन्द्र
प्रजापतिः
प्रजापति
त्वम्
आप
प्रपितामहः
प्रपितामह
च
और
नमः
नमस्कार
नमः
नमस्कार
ते
आपको
अस्तु
हो
सहस्रकृत्वः
हजार बार
पुनः
फिर
च
और
भूयः
बार बार
अपि
भी
नमः
नमस्कार
नमः
नमस्कार
ते
आपको

अन्वय: त्वम् वायुः यमः अग्निः वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिः प्रपितामहः च। ते सहस्रकृत्वः नमः नमः अस्तु, पुनः च भूयः अपि ते नमः नमः।

आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्र, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजार बार नमस्कार, नमस्कार हो, और फिर भी बार बार आपको नमस्कार, नमस्कार।

11.40नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥40॥

namaḥ purastād atha pṛṣṭhatas te namo ’stu te sarvata eva sarva |
anantavīryāmitavikramas tvaṃ sarvaṃ samāpnoṣi tato ’si sarvaḥ

नमः
नमस्कार
पुरस्तात्
सामने से
अथ
और
पृष्ठतः
पीछे से
ते
आपको
नमः
नमस्कार
अस्तु
हो
ते
आपको
सर्वतः
सब ओर से
एव
ही
सर्व
हे सर्वरूप
अनन्तवीर्यामितविक्रमः
अनन्त सामर्थ्य और अमित पराक्रम वाले
त्वम्
आप
सर्वम्
सबको
समाप्नोषि
व्याप्त करते हैं
ततः
इसलिए
असि
हैं
सर्वः
सर्वरूप

अन्वय: सर्व, ते पुरस्तात् अथ पृष्ठतः नमः, ते सर्वतः एव नमः अस्तु। त्वम् अनन्तवीर्यामितविक्रमः, सर्वम् समाप्नोषि, ततः सर्वः असि।

हे सर्वरूप, आपको सामने से और पीछे से नमस्कार, आपको सब ओर से ही नमस्कार हो। अनन्त सामर्थ्य और अमित पराक्रम वाले आप सबको व्याप्त करते हैं, इसलिए आप ही सर्वरूप हैं।

11.41सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥41॥

sakheti matvā prasabhaṃ yad uktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakheti |
ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ mayā pramādāt praṇayena vāpi

सखा
मित्र
इति
ऐसा
मत्वा
मानकर
प्रसभम्
हठपूर्वक
यत्
जो
उक्तम्
कहा गया
हे कृष्ण
हे कृष्ण
हे यादव
हे यादव
हे सखे
हे मित्र
इति
ऐसा
अजानता
न जानते हुए
महिमानम्
महिमा को
तव
आपकी
इदम्
इस
मया
हमारे द्वारा
प्रमादात्
प्रमाद से
प्रणयेन
प्रेम से
वा
या
अपि
भी

अन्वय: तव इदम् महिमानम् अजानता मया, सखा इति मत्वा, प्रमादात् प्रणयेन वा अपि, हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति यत् प्रसभम् उक्तम्।

आपकी इस महिमा को न जानते हुए और आपको मित्र मानकर हमने प्रमाद से या प्रेम से भी हठपूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र, ऐसा कहा है।

11.42यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथ वाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥42॥

yac cāvahāsārtham asatkṛto ’si vihāraśayyāsanabhojaneṣu |
eko ’tha vāpy acyuta tatsamakṣaṃ tat kṣāmaye tvām aham aprameyam

यत्
जो
च
और
अवहासार्थम्
हँसी के लिए
असत्कृतः
अपमानित
असि
हुए हैं
विहारशय्यासनभोजनेषु
विहार शय्या आसन और भोजन में
एकः
अकेले में
अथ वा
अथवा
अपि
भी
अच्युत
हे अच्युत
तत्समक्षम्
दूसरों के सामने
तत्
उसके लिए
क्षामये
क्षमा माँगते हैं
त्वाम्
आपसे
अहम्
हम
अप्रमेयम्
अप्रमेय

अन्वय: अच्युत, विहारशय्यासनभोजनेषु एकः अथ वा अपि तत्समक्षम् अवहासार्थम् यत् च असत्कृतः असि, तत् अहम् अप्रमेयम् त्वाम् क्षामये।

हे अच्युत, विहार, शय्या, आसन और भोजन में, अकेले में अथवा दूसरों के सामने भी, हँसी के लिए जो आपका अपमान हुआ है, उस सबके लिए हम अप्रमेय आपसे क्षमा माँगते हैं।

11.43पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥43॥

pitāsi lokasya carācarasya tvam asya pūjyaś ca gurur garīyān |
na tvatsamo ’sty abhyadhikaḥ kuto ’nyo lokatraye ’py apratimaprabhāva

पिता
पिता
असि
हैं
लोकस्य
लोक के
चराचरस्य
चर और अचर
त्वम्
आप
अस्य
इस
पूज्यः
पूज्य
च
और
गुरुः
गुरु
गरीयान्
सबसे बड़े
न
नहीं
त्वत्समः
आपके समान
अस्ति
है
अभ्यधिकः
अधिक
कुतः
कहाँ से
अन्यः
दूसरा
लोकत्रये
तीनों लोकों में
अपि
भी
अप्रतिमप्रभाव
हे अतुलनीय प्रभाव वाले

अन्वय: अप्रतिमप्रभाव, त्वम् अस्य चराचरस्य लोकस्य पिता असि, पूज्यः च गरीयान् गुरुः (च)। लोकत्रये अपि त्वत्समः न अस्ति, अभ्यधिकः अन्यः कुतः।

हे अतुलनीय प्रभाव वाले, आप इस चर और अचर लोक के पिता हैं, और इसके पूज्य तथा सबसे बड़े गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं है, तो आपसे अधिक दूसरा कहाँ से होगा।

11.44तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥44॥

tasmāt praṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvām aham īśam īḍyam |
piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum

तस्मात्
इसलिए
प्रणम्य
प्रणाम करके
प्रणिधाय
भूमि पर रखकर
कायम्
शरीर को
प्रसादये
प्रसन्न करते हैं
त्वाम्
आपको
अहम्
हम
ईशम्
ईश्वर को
ईड्यम्
स्तुति के योग्य
पिता
पिता
इव
जैसे
पुत्रस्य
पुत्र का
सखा
मित्र
इव
जैसे
सख्युः
मित्र का
प्रियः
प्रिय
प्रियायाः
प्रिया का
अर्हसि
योग्य हैं
देव
हे देव
सोढुम्
सहन करने के

अन्वय: तस्मात् अहम् कायम् प्रणिधाय प्रणम्य ईड्यम् ईशम् त्वाम् प्रसादये। देव, पिता पुत्रस्य इव, सखा सख्युः इव, प्रियः प्रियायाः (इव), (त्वम्) सोढुम् अर्हसि।

इसलिए शरीर को भूमि पर रखकर प्रणाम करके हम स्तुति के योग्य ईश्वर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। हे देव, जैसे पिता पुत्र को, मित्र मित्र को और प्रिय प्रिया को सहता है, वैसे ही आप हमें सहन कीजिए।

11.45अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥45॥

adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito ’smi dṛṣṭvā bhayena ca pravyathitaṃ mano me |
tad eva me darśaya deva rūpaṃ prasīda deveśa jagannivāsa

अदृष्टपूर्वम्
पहले न देखा हुआ
हृषितः
हर्षित
अस्मि
हैं
दृष्ट्वा
देखकर
भयेन
भय से
च
और
प्रव्यथितम्
अत्यन्त व्यथित
मनः
मन
मे
हमारा
तत्
वह
एव
ही
मे
हमें
दर्शय
दिखाइए
देव
हे देव
रूपम्
रूप
प्रसीद
प्रसन्न होइए
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास

अन्वय: अदृष्टपूर्वम् (रूपम्) दृष्ट्वा (अहम्) हृषितः अस्मि, भयेन च मे मनः प्रव्यथितम्। देव, मे तत् एव रूपम् दर्शय। देवेश जगन्निवास, प्रसीद।

पहले कभी न देखे हुए इस रूप को देखकर हम हर्षित हैं, और भय से हमारा मन अत्यन्त व्यथित भी है। हे देव, हमें अपना वही रूप दिखाइए, हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।

11.46किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥46॥

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahastam icchāmi tvāṃ draṣṭum ahaṃ tathaiva |
tenaiva rūpeṇa caturbhujena sahasrabāho bhava viśvamūrte

किरीटिनम्
किरीट धारण किए
गदिनम्
गदा धारण किए
चक्रहस्तम्
हाथ में चक्र लिए
इच्छामि
चाहते हैं
त्वाम्
आपको
द्रष्टुम्
देखना
अहम्
हम
तथा
वैसे
एव
ही
तेन
उसी
एव
ही
रूपेण
रूप में
चतुर्भुजेन
चार भुजाओं वाले
सहस्रबाहो
हे सहस्रबाहु
भव
हो जाइए
विश्वमूर्ते
हे विश्वमूर्ति

अन्वय: अहम् त्वाम् तथा एव किरीटिनम् गदिनम् चक्रहस्तम् द्रष्टुम् इच्छामि। सहस्रबाहो विश्वमूर्ते, तेन एव चतुर्भुजेन रूपेण भव।

हम आपको वैसे ही किरीट धारण किए, गदा धारण किए और हाथ में चक्र लिए देखना चाहते हैं। हे सहस्रबाहु, हे विश्वमूर्ति, आप उसी चार भुजाओं वाले रूप में हो जाइए।

11.47मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्

श्रीभगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥47॥

mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitam ātmayogāt |
tejomayaṃ viśvam anantam ādyaṃ yan me tvad anyena na dṛṣṭapūrvam

मया
मैंने
प्रसन्नेन
प्रसन्न होकर
तव
आपको
अर्जुन
हे अर्जुन
इदम्
यह
रूपम्
रूप
परम्
परम
दर्शितम्
दिखाया
आत्मयोगात्
अपने योग से
तेजोमयम्
तेजोमय
विश्वम्
विश्वरूप
अनन्तम्
अनन्त
आद्यम्
आदि
यत्
जो
मे
मेरा
त्वदन्येन
आपके सिवा दूसरे ने
न
नहीं
दृष्टपूर्वम्
पहले देखा

अन्वय: अर्जुन, प्रसन्नेन मया आत्मयोगात् तव इदम् परम् तेजोमयम् विश्वम् अनन्तम् आद्यम् रूपम् दर्शितम्, यत् मे (रूपम्) त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।

हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर अपने योग से आपको यह परम, तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त और आदि रूप दिखाया है। मेरा यह रूप आपके सिवा किसी दूसरे ने पहले नहीं देखा।

11.48न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥48॥

na vedayajñādhyayanair na dānair na ca kriyābhir na tapobhir ugraiḥ |
evaṃrūpaḥ śakya ahaṃ nṛloke draṣṭuṃ tvad anyena kurupravīra

न
न
वेदयज्ञाध्ययनैः
वेदों और यज्ञों के अध्ययन से
न
न
दानैः
दानों से
न
न
च
और
क्रियाभिः
क्रियाओं से
न
न
तपोभिः
तपों से
उग्रैः
उग्र
एवंरूपः
इस रूप वाला
शक्यः
देखा जा सकता
अहम्
मैं
नृलोके
मनुष्यलोक में
द्रष्टुम्
देखा जाना
त्वदन्येन
आपके सिवा दूसरे से
कुरुप्रवीर
हे कुरुप्रवीर

अन्वय: कुरुप्रवीर, नृलोके एवंरूपः अहम् त्वदन्येन न वेदयज्ञाध्ययनैः, न दानैः, न च क्रियाभिः, न उग्रैः तपोभिः द्रष्टुम् शक्यः।

हे कुरुप्रवीर, मनुष्यलोक में इस रूप वाला मैं आपके सिवा दूसरे के द्वारा न वेदों और यज्ञों के अध्ययन से, न दानों से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से देखा जा सकता हूँ।

11.49मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥49॥

mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo dṛṣṭvā rūpaṃ ghoram īdṛṅ mamedam |
vyapetabhīḥ prītamanāḥ punas tvaṃ tad eva me rūpam idaṃ prapaśya

मा
मत
ते
आपको
व्यथा
व्यथा
मा
मत
च
और
विमूढभावः
मोहित भाव
दृष्ट्वा
देखकर
रूपम्
रूप को
घोरम्
घोर
ईदृक्
ऐसे
मम
मेरे
इदम्
इस
व्यपेतभीः
भयरहित
प्रीतमनाः
प्रसन्न मन वाले
पुनः
फिर
त्वम्
आप
तत्
वह
एव
ही
मे
मेरा
रूपम्
रूप
इदम्
यह
प्रपश्य
देखिए

अन्वय: मम ईदृक् इदम् घोरम् रूपम् दृष्ट्वा ते व्यथा मा (भवतु), विमूढभावः च मा (भवतु)। व्यपेतभीः प्रीतमनाः त्वम् पुनः मे तत् एव इदम् रूपम् प्रपश्य।

मेरे इस ऐसे घोर रूप को देखकर आपको व्यथा न हो और मोहित भाव भी न हो। भयरहित और प्रसन्न मन होकर आप फिर मेरे उसी इस रूप को देखिए।

11.50इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः

संजय उवाच

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥50॥

ity arjunaṃ vāsudevas tathoktvā svakaṃ rūpaṃ darśayām āsa bhūyaḥ |
āśvāsayām āsa ca bhītam enaṃ bhūtvā punaḥ saumyavapur mahātmā

इति
इस प्रकार
अर्जुनम्
अर्जुन से
वासुदेवः
वासुदेव ने
तथा
वैसे
उक्त्वा
कहकर
स्वकम्
अपना
रूपम्
रूप
दर्शयामास
दिखाया
भूयः
फिर
आश्वासयामास
आश्वस्त किया
च
और
भीतम्
भयभीत
एनम्
इनको
भूत्वा
होकर
पुनः
फिर
सौम्यवपुः
सौम्य शरीर वाले
महात्मा
महात्मा

अन्वय: वासुदेवः अर्जुनम् इति तथा उक्त्वा भूयः स्वकम् रूपम् दर्शयामास। महात्मा पुनः सौम्यवपुः भूत्वा भीतम् एनम् आश्वासयामास च।

वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर फिर अपना रूप दिखाया। उन महात्मा ने फिर सौम्य शरीर वाले होकर इन भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।

11.51दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥51॥

dṛṣṭvedaṃ mānuṣaṃ rūpaṃ tava saumyaṃ janārdana |
idānīm asmi saṃvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṃ gataḥ

दृष्ट्वा
देखकर
इदम्
इस
मानुषम्
मानुष
रूपम्
रूप को
तव
आपके
सौम्यम्
सौम्य
जनार्दन
हे जनार्दन
इदानीम्
अब
अस्मि
हैं
संवृत्तः
हो गए
सचेताः
स्थिर चित्त
प्रकृतिम्
स्वाभाविक स्थिति को
गतः
प्राप्त

अन्वय: जनार्दन, तव इदम् सौम्यम् मानुषम् रूपम् दृष्ट्वा (अहम्) इदानीम् सचेताः संवृत्तः अस्मि, प्रकृतिम् गतः (च)।

हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानुष रूप को देखकर अब हम स्थिर चित्त हो गए हैं और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गए हैं।

11.52सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम

श्रीभगवानुवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥52॥

sudurdarśam idaṃ rūpaṃ dṛṣṭavān asi yan mama |
devā apy asya rūpasya nityaṃ darśanakāṅkṣiṇaḥ

सुदुर्दर्शम्
अत्यन्त दुर्लभ दर्शन वाला
इदम्
यह
रूपम्
रूप
दृष्टवान्
देख चुके
असि
हैं
यत्
जो
मम
मेरा
देवाः
देवता
अपि
भी
अस्य
इस
रूपस्य
रूप के
नित्यम्
सदा
दर्शनकाङ्क्षिणः
दर्शन की आकांक्षा वाले

अन्वय: मम यत् इदम् रूपम् (त्वम्) दृष्टवान् असि, (तत्) सुदुर्दर्शम्। देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यम् दर्शनकाङ्क्षिणः (सन्ति)।

मेरा जो यह रूप आपने देखा है, यह अत्यन्त दुर्लभ दर्शन वाला है। देवता भी इस रूप के दर्शन की सदा आकांक्षा रखते हैं।

11.53नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥53॥

nāhaṃ vedair na tapasā na dānena na cejyayā |
śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavān asi māṃ yathā

न
न
अहम्
मैं
वेदैः
वेदों से
न
न
तपसा
तप से
न
न
दानेन
दान से
न
न
च
और
इज्यया
यज्ञ से
शक्यः
देखा जा सकता
एवंविधः
इस प्रकार
द्रष्टुम्
देखा जाना
दृष्टवान्
देख चुके
असि
हैं
माम्
मुझे
यथा
जैसे

अन्वय: यथा (त्वम्) माम् दृष्टवान् असि, एवंविधः अहम् न वेदैः, न तपसा, न दानेन, न च इज्यया द्रष्टुम् शक्यः।

जैसे आपने मुझे देखा है, इस प्रकार मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से देखा जा सकता हूँ।

11.54भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥54॥

bhaktyā tv ananyayā śakya aham evaṃvidho ’rjuna |
jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca paraṃtapa

भक्त्या
भक्ति से
तु
परन्तु
अनन्यया
अनन्य
शक्यः
हो सकता हूँ
अहम्
मैं
एवंविधः
इस प्रकार
अर्जुन
हे अर्जुन
ज्ञातुम्
जाना जाना
द्रष्टुम्
देखा जाना
च
और
तत्त्वेन
तत्त्व से
प्रवेष्टुम्
प्रवेश किया जाना
च
और
परंतप
हे परंतप

अन्वय: अर्जुन परंतप, तु अनन्यया भक्त्या एवंविधः अहम् तत्त्वेन ज्ञातुम्, द्रष्टुम् च, प्रवेष्टुम् च शक्यः।

परन्तु हे अर्जुन, हे परंतप, अनन्य भक्ति से ही मैं इस प्रकार तत्त्व से जाना और देखा जा सकता हूँ, और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।

11.55मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥55॥

matkarmakṛn matparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa mām eti pāṇḍava

मत्कर्मकृत्
मेरे लिए कर्म करने वाला
मत्परमः
मुझे परम मानने वाला
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सङ्गवर्जितः
आसक्ति से रहित
निर्वैरः
वैररहित
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
यः
जो
सः
वह
माम्
मुझे
एति
प्राप्त होता है
पाण्डव
हे पाण्डव

अन्वय: पाण्डव, यः मत्कर्मकृत् मत्परमः मद्भक्तः सङ्गवर्जितः सर्वभूतेषु निर्वैरः (च), सः माम् एति।

हे पाण्डव, जो मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे ही परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति से रहित और सब प्राणियों में वैररहित है, वह मुझे प्राप्त होता है।